हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)
Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar
स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा
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हमारे ही स्वप्न हैं और यदि इस मृत्युलोकमें कभी साधुताका
ही नियम चला तो हे तथागत ! आप देखेंगे कि जिस भूमिके
पालनेमें आप पले, जिस जातिने आपको दूध पिलाया वही उस
नियमको सिद्ध करनेमें सबके आगे रहेगी। यह बात इसके पूर्व
भी सिद्ध हो चुकी है।
( ४ )
“हिन्दवानेकी ढाल”
यहां तक हमने संस्कृत ग्रन्थोंके आधारपर सिन्धु शब्दकी
उत्पत्तिका पता चलाया और इस बाततक पहुँचे कि भारतीय
राष्ट्रकी कल्पना ज्यों-ज्यों व्यापक हुई त्यों-त्यों अन्य सब शब्दों
की अपेक्षा सिन्धुस्थान शब्द उस कल्पनाका अधिक द्योतक
हुआ। आर्यावर्त आदि शब्दोंके समान यह शब्द संप्रदाय विशेष
की ही संज्ञा नहीं है; उदाहरणार्थ, एक ग्रन्थकारने आर्यावर्तकी
परिभाषा यों दी है—
चातुर्वर्ण्यव्यवस्थानं यस्मिन्देशे न विद्यते ।
तं म्लेच्छदेशं जानीयादार्यावर्तस्ततः परम् ॥
यह परिभाषा है तो ठीक, पर यह स्थायी होनेवाली नहीं है।
कोई संस्था या संप्रदाय समाजके लिये होता है न कि समाज
उस 'स्था या संप्रदायके लिये । “चातुर्वर्ण्यव्यवस्थानं” रह भी
सकता है अथवा अपना काम पूरा करके नष्ट भी हो सकता ;
पर उससे हमारा देश “म्लेच्छदेश”—विदेशियोंका देश—नहीं
जायगा। संन्यासी, आर्यसमाजी, सिख तथा और भी कई संप्रदाय