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हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा

DevanagariHindipublished167 पृष्ठ

पृष्ठ 40, कुल 167 में से

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२४ हिन्दुत्व
तक इस संसारमें और राष्ट्रीय तथा जातीय भेद इतने बलवान
हैं कि मनुष्योंको पशु बना देते हैं, तबतक हिन्दुस्थानको यदि
जीना है, चाहे वह जीवन राजनीतिक हो या आध्यात्मिक, तो
राष्ट्रीय और जातीय अखंडतासे उत्पन्न होनेवाले बलकी उपेक्षा
करनेसे काम नहीं चल सकता। इस प्रकार तत्कालीन देश-
नेताओंका जी विश्वबन्धुत्वकी इन बातोंसे ऊब गया और वे कहने
लगे—
ये त्वया देव निहता असुराश्चैव विष्णुना ।
ते जाता म्लेच्छरूपेण पुनरद्य महीतले ॥
व्यापादयन्ति ते विप्रान् घ्नंति यज्ञादिकाः क्रियाः ।
हरन्ति मुनिकन्याश्च पापाः किं किं न कुर्वति ॥
म्लेच्छाक्रांते च भू लोके निर्वषट्कार मंगले ।
यज्ञायागादि विच्छेदाद्वै लोकोऽवसीदति ॥ ( गुणाढ्य )
और जिन जंगली शकों और हूणोंने भिक्षुवेश धारण किये
और शस्त्र त्यागकर हाथमें तुलसी-माला लिये अहिंसाव्रती इस
सुरम्य देशको उजाड़ डाला था, उन्हें इन्होंने सिन्धु नदीके पार
मार भगाया और सुदृढ़ तथा अखंड राष्ट्रकी स्थापना की। तब
स्वभावतः ही हमारे देश-नेताओंके ध्यानमें यह बात भी आ गयी
कि इस नवीन राष्ट्रीय राज्यके पीछे यदि वैसे ही राष्ट्रीय धर्मका
बल हो तो फिर राष्ट्रकी शक्तिका क्या कहना है।
और एक बात ध्यानमें रखनेकी यह है कि हम और हमारे
शत्रुओंके बीच जितनी बातें समान होंगी, उतना ही उनका