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हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा

DevanagariHindipublished167 पृष्ठ

पृष्ठ 49, कुल 167 में से

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पृष्ठ 49

हिन्दुस्थान और म्लेच्छस्थान ३३
का म्लेच्छस्थान था। सिन्धुस्थानकी यह परिभाषा किसी
पौराणिक लेखकके शब्दोंके बालकी खाल खींचकर या धार्मिक
उन्मादसे नहीं की गयी है। भविष्यपुराणान्तर्गत उक्त श्लोकोंमें
"आर्य" शब्दका अर्थ ही उन सब लोगोंसे है जो सिन्धुके इस पार
एक राष्ट्र और एक जातिके अखण्ड अङ्ग हो गये थे—वैदिक-
अवैदिक, ब्राह्मण-चांडाल, सबका उसमें समावेश था और सब-
की एक संस्कृति थी, सबको एक जाति थी, एक देश था, एक
राजनीति थी; "म्लेच्छ" शब्द "सिन्धुस्थान" के मुकाबले विदे-
शियोंका बोधक है जिनका राष्ट्र और जाति भिन्न है—धर्म चाहे
एक हो या भिन्न हो ।
यह राजाज्ञा, सिन्धुस्थानकी अन्य राजाज्ञाओंके समान,
सब लोगोंके ही विचार और उद्योगका फल था। यदि ऐसा न
हो तो अटक स्थानको लोग जो परंपरासे अपने देशका सीमान्त
या "अटक" मानते आये इसका कारण क्या है ? कारण यही
है कि ऐसी ही राष्ट्रीय भावना थी कि यह सिन्धुओंके देशकी
सीमा और विदेशियोंकी गतिकी अटक है। सब लोग—राजा-
रंक—जो अबतक यही मानते चले आये हैं इसीसे यह मालूम
होता है कि इस तरहकी कोई राजाज्ञा निकली होगी और
उसमें हमारे देशकी सीमा "सिन्धु" और हमारे देश और
राष्ट्रका नाम सिन्धुस्थान घोषित किया गया होगा। और इस
राजाज्ञा तथा सर्वजनेच्छाका सबसे श्रेष्ठ धार्म्मिक संस्कार भी
कराया गया होगा जिससे हमारे देशका प्राचीन वैदिक नाम