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हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा

DevanagariHindipublished167 पृष्ठ

पृष्ठ 44, कुल 167 में से

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२८ हिन्दुत्व
भेद निर्दिष्ट किया गया, वह यही तो था कि—
चातुर्वर्ण्यं व्यवस्थानं यस्मिन्देशे न विद्यते ।
तं म्लेच्छदेशं जानीयादार्यावर्तस्ततःपरः ॥
इसीके एक कदम आगे बढ़कर यह किया गया कि हमारे
लोग समुद्रपारके उन देशोंमें न जायँ, जो हमारे रहने योग्य नहीं
हैं और जहाँ हमारे आचार-विचारका आदर नहीं होता; उलटे
विरोध होता है और इसलिये जहाँ हम अपने आचार-विचारोंकी
रक्षा न कर सकेंगे । बौद्ध-मतसे जो चित्त हट गया, उसकी यह
तद्विरुद्ध प्रतिक्रिया थी और अवश्य ही यह अति मात्रामें थी ।
तथापि, यदि राजनीतिक दृष्टिसे विचार किया जाय तो इसका
अर्थ समझमें आ जाता है; क्योंकि आज भी तो इस बातका
आन्दोलन होता रहता है कि जिन देशोंमें हमारी जातिका अपमान
होता है, उन देशोंमें हमारे यहाँके लोग न भेजे जाय—उपनिवेशों-
में भारतीयोंका भेजा जाना बन्द किया जाय ।
इस प्रकार भारतवर्षसे बौद्धमत जो उठ गया, उसका कार्य-
कारण राजनीतिक और राष्ट्रीय प्रयोजन था । बौद्ध-मतका कोई
भौगोलिक केन्द्र नहीं था । बौद्धमतको स्वीकार करके भारतवर्षने
अपना वह भौगोलिक केंद्र खो दिया था और अब फिरसे उसकी
स्थापना करनी थी । जब राष्ट्रका आत्म-चैतन्य पूर्ण रूपसे जागा
और उसे स्व-परके भेदाभेदकी पूरी पहचान हुई, तब उसने यह
भेद निर्दिष्ट भी कर दिया और अपनी स्थिति अपने सामने ऐसी
स्पष्ट कर दी कि उसे यह मालूम हो कि हम कहाँ हैं और संसार