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हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा

DevanagariHindipublished167 पृष्ठ

४४ हिन्दुत्व
अकस्मात् आक्रमण किया। उस दिनसे जो संग्राम आरम्भ हुआ
वह कई शताब्दियोंतक जारी रहा और हिन्दुस्थान अकेला लड़ता
रहा—युद्ध नैतिक क्षेत्रमें भी था और रणक्षेत्रमें भी। नैतिक क्षेत्रमें
जो संपत्ति मुसलमानोंकी छिन गयी उसे लौटा लानेके लिये औरं-
गजेबने पागलपनका उद्योग आरम्भ किया। उससे रणक्षेत्रमें भी
उनकी हार होनेका दिन और भी निकट आ गया। अन्तको भाऊ-
साहेबने मुगलोंकी राजधानीका छत्र भङ्गकर उसके टुकड़े टुकड़े
कर डाले, पानीपतका दिन उदय हुआ, हिन्दू उस खास लड़ाईमें
हारे, पर दीर्घ कालसे चले आये हुए संग्राममें जीते। फिर किसी
पठानने दिल्लीपर आक्रमण करनेकी हिम्मत नहीं की। हिन्दुओंकी
जो विजय वैजयंती मराठोंने अटकमें फहरायी उसे हमारे सिख
और आगे बढ़कर सिन्धु पार करके काबुलके तटपर फहरा आये।
इस दीर्घकालीन संग्राममें हिन्दुओंको इस बातकी पूरी पह-
चान हुई कि हम हिन्दू हैं और यह हिन्दूराष्ट्र ऐसा अखंड बन
गया कि इसके पूर्व ऐसी अखंडता नहीं देखनेमें आयी थी। यह
स्मरण रहे कि हम समग्र हिन्दूजातिकी बात कह रहे हैं, किसी
खास संप्रदाय या पंथकी नहीं। सनातनी, सतनामी, सिख, आर्य,
अनार्य, मराठे, मद्रासी, ब्राह्मण और पंचम—सब हिन्दूके नाते हारे
और हिन्दूके नाते जीते। क्या मित्र और क्या शत्रु—दोनों, और
सब नामोंको दबाकर हिन्दू और हिन्दुस्थान—इन नामोंको बढ़ानेमें
सहायक हुए। आर्यावर्त और दक्षिणापथ, जंबुद्वीप और भारत-
वर्ष—इन नामोंमें हिन्दुओंकी उस राजनीतिक और सांस्कृतिक

हिन्दवानेकी ढाल [४५]


अखंडताकी भावनाको व्यक्त करनेका वैसा सामर्थ्य नहीं था जैसा
कि “हिन्दुस्थान” नाममें। सिन्धुके इस पार रहनेवाले सब लोग
जो सिन्धुनदीसे सिन्धु-समुद्रपर्यन्त अपनी जन्मभूमि मानते थे, इस
एक “हिन्दुस्थान” नाममें अपना अस्तित्व अनुभव करते थे। हमारे
शत्रु हमें हिन्दू कहकर हमारा तिरस्कार करते थे और हिन्दुस्तान-
की सब जातियां, सब संप्रदाय,सब पंथ,अटकसे कटकपर्यन्तः एक
शरीर,एक मन,एक राष्ट्र हो गये । इस मौकेपर हमसे यह कहे बिना
नहीं रहा जाता कि अबतक सन् १३००से सन् १८०० तक काश्मीरसे
लेकर सिंहलद्वीपतक और सिन्धसे बंगालतक भिन्न भिन्न प्रदेशोंमें
हिन्दुओंके जो उद्योग कभी एक साथ और कभी अलग अलग होते
रहे उनका, सम्पूर्ण हिन्दूजातिके इतिहासकी दृष्टिसे अबतक किसी-
ने विचार ही नहीं किया है । इस कालमें संपूर्ण राष्ट्रके सामने
हिन्दुत्वकी रक्षा,हिन्दूजातिके मान और मर्यादाकी रक्षाका एकसा
प्रश्न था और इसके लिये सैकड़ों रणक्षेत्र बन रहे थे और अन्य
प्रयत्न भी हो रहे थे । यही एक शब्द था—“हिन्दुत्व” जो हमारे
राष्ट्रके मनोमय शरीरके मेरुदंडका काम कर रहा था । इसी
हिन्दुत्वके कारण काश्मीरके ब्राह्मणोंपर होनेवाले अत्याचारोंकी
वेदना मद्रासके नायरोंने नहीं सही जाती थी। हिन्दुओंकी हार
देखकर हमारे भाट रोते थे, हमारे आचार्य हिन्दुओंको बढ़ावा देते
थे, हमारे वीर हिन्दुओंकी लड़ाइयां लड़ते थे, हमारे साधु
महात्मा हिन्दुओंको आशीर्वाद देते थे, हमारे राजनीतिज्ञ
हिन्दुओंके भाग्यका विधान करते थे, हमारी माताएँ हिन्दुओं-

४६ हिन्दुत्व
के घावोंपर विलाप करतीं और हिन्दुओंकी विजयपर गर्व
करतो थीं।
इस संबंधमें उस समयके ग्रन्थकारोंने जो कुछ लिख रखा है
उसके यदि हम अवतरण दें तो एक बड़ा ग्रन्थ बन जायगा।
यह काम तो बड़ा प्रिय है पर जो बात यहां सिद्ध करनी है उसके
लिये इसकी आवश्यकता नहीं। इसलिये यहां उस कालके श्रेष्ठ
पुरुषोंके मुखसे या लेखनीसे निकले हुए वर्णनोंके कुछ अवतरणों-
से ही हमें संतोष करना चाहिये।
हिन्दी भाषामें जितने नये पुराने ग्रन्थ हैं उनमें चन्दबरदाई-
कृत “पृथ्वीराज रासो” नामक महाकाव्य सबसे प्राचीन प्रामा-
णिक ग्रन्थ है। इसमें एक ही पद्य ऐसा है जो इस ग्रन्थकी रच-
नासे भी पहलेका है। परन्तु आश्चर्य और आनन्दका विषय
यह है कि हमारे उत्तरापथके प्राकृत साहित्यकी इस सबसे
प्राचीन कवितामें हिन्दुस्थानकी पूर्ण देशाभिमानयुक्त और गौरव-
सूचक स्तुति है। चन्दबरदाईके पिता, वेन कवि, पृथ्वीराजके पिता
अजमेर-महाराजको संबोधन कर कहते हैं—
अटल ठाट महिपाट, अटल तारागढ़ थानं ।
अटल नग्र अजमेर, अटल हिन्दव अस्थानं ॥
अटल तेज परताप, अटल लंका गढ़ डंडिय ।
अटल आप चहुवान, अटल भूमि जस मंडिय ॥
संभरी भूप सोमेसनृप, अटल छत्र ओपै सुसर ।
कविराज वेन आसीस दे, अटल जगां रजेस कर ॥

हिन्दवानेको ढाल ४७
चन्दबरदाई हिन्दी-साहित्यके अदि कवि माने जाते हैं और
इन्होंने हिन्दु, हिंदवान, हिन्द—इन शब्दोंका इतनी बार और इतनी
स्वाभाविकताके साथ प्रयोग किया है कि इस विषयमें कोई
सन्देह ही नहीं रह जाता कि ११ वीं शताब्दीमें ये शब्द सर्व-
साधारणमें प्रचलित थे । यह वह समय है, जब पंजाबमें भी
मुसलमानोंके पैर नहीं जमे थे और यह सम्भव नहीं है कि वे इस
समयके स्वाधीन और स्वाभिमानी राजपूतोंसे कोई ऐसा नाम
स्वीकार करा सकते, जो उनके प्रति घृणा सूचित करनेके लिये
उनके शत्रुओने रखा हो, और न यह संभव है कि ऐसा नाम ये
राजपूत गौरव और अभिमानके साथ अपना लेते । शहाबुद्दीनको
जिस समय हिन्दुओंने कैद किया और पृथ्वीराजने उससे यह शर्त
करा कर कि फिर कभी “हिन्दुओंपर आक्रमण नहीं करेंगे”, उसे
छोड़ दिया, उस समयका वर्णन करते हुए चन्द कहते हैं—
“राखि पंच दिन साहि अदब आदर बहु किन्नौ।
सुज हुसैन गाजी सुपूत हथ्थे ग्रहि दिन्नौ ॥
किय सलाम तिन बार जाहु अपन्ने सुथानह ।
मति हिन्दुपर साहि सज्जि आऔ स्वस्थानह ॥”
(पृ० रासो स० ६)
पर शहाबुद्दीन ऐसा आदमी नहीं था जो हिन्दुओंकी वीरो-
चित उदारताका कृतज्ञ होता । बार बार फौज जमा करके वार
वार उसने अपने उपकारीके साथ जंग छेड़ा—
"जब हिन्दु दल जोर हुअ छुट्टि मीरधर भ्रम ।

४८ हिन्दुत्व
असमय अरबस्तान चला करन उद्दूसा क्रम ॥”
और फिर—
“जुरे हिन्दु मीरे, बहे खग्ग तारं ।
मुखे मार मारं बहे सूरसारं ॥”
अन्तको—
“हिन्दु म्लेच्छ अघाइ घाइन ।
नंचि नारद युद्ध चायन ॥”
पर हिन्दुओंको कुचलनेका इतना प्रयत्न करके भी शहाबुद्दीन-
से कुछ न बन पड़ा और दिल्लीमें जब यह समाचार पहुँचा कि
शहाबुद्दीन फिर कैद किया गया तब प्रजाके आनन्दका पारावार
न रहा । प्रजाने पृथ्वीराजको प्रेम और आनन्दसे बधाई दी—
“आज भाग चहुआन घर ।
आज भाग हिन्दवान ॥
इन जीवित दिल्लीश्वर ।
गंज न सकै आन ॥”
शहाबुद्दीनने फिर प्रतिज्ञा की कि अब ऐसा नहीं करूँ गा । पहली
सब प्रतिज्ञाएं वह भंग कर चुका था । फिर इस प्रतिज्ञाने उसे
रिहाई दिला दी । पर कृतघ्न शहाबुद्दीनने फिर हिन्दुस्थानपर
आक्रमण किया । और ऐसी तैयारी और जोरके साथ आक्रमण
किया कि बातकी बातमें दिल्लीके द्वारपर पहुँच गया । हिन्दपति
पृथ्वीराजने युद्धसभा निमंत्रित की, शहाबुद्दीनने गुस्ताखीके
साथ हिन्दपतिको ललकारा, सब रावल और सामन्तोंकी आँखोंसे

हिन्दूवानका ढाल ४६
आगकी चिनगारियां निकलने लगीं, शहाबुद्दीनकी ललकार सुनाने-
के लिये जो यवनदूत दरबारमें आया था उससे चामुण्डरायने कहा
कि, “शाहको याद दिलाओ कि हमारे ही सामने तुमने अपनी नाक
रगड़ी थी, अब बेहया होकर चढ़ाई करने आये हो !” चामुण्डराय
फिर बोले—
“निर्लज्ज म्लेच्छ लजै नहीं । हम हिन्दू लजवान ॥”
दुःखका दिन समीप आया । दोनों ओरके लोग जानते थे कि
यह भाग्यका खेल है । न जाने कौन हारेगा और कौन जीतेगा ।
हम्मीरकी हारके कुछ ही पहले चन्द बरदाई भगवती दुर्गाकी
स्तुति करते हैं—कैसी हृदयद्रावक और देशभक्ति पूर्ण स्तुति है--
“तू गे हिन्दुराजान वन्दी न आर्यं ।
जपै जाप जालंधरं तूं सहायं ॥
नमस्ते नमस्ते इ जालंधररानी !
सुरं आसुरं नागपूजा प्रमानी ॥”
चन्दने फिर युद्धका जो कुछ परिणाम हुआ उसका वर्णन
करके उस प्रसंगका वर्णन किया है जब कौशल रचकर पृथ्वी-
राजने शहाबुद्दीनका सिर धड़से उतार लिया । अन्तमें विजित
हिन्दपति पृथ्वीराजकी इस प्रकार मर्मस्पर्शी शब्दोंमें स्तुति की--
“धनि हिन्दु पृथिराज, जिने रजवट्ठ उजारिय ।
धनि हिन्दु पृथिराज, बाले कलिमझूझ उजारिय ॥
धनि हिन्दु पृथिराज, जेन सुविहान ह संध्यो ।
बार बारह ग्रहि मुक्कि, अन्तकाल सर बन्ध्यो ॥”

५० हिन्दुत्व


यह ध्यानमें रखनेकी बात है कि रासोमें बार बार "भारत"
शब्द आया है पर वह "महाभारत" के अर्थमें आया है। भारत-
वर्षके अर्थमें शायद ही कहीं आया हो । यही बात इसके बादके
साहित्यमें भी देखते हैं। हिन्दुओंका फिरसे उत्थान होने और
हिन्दू-स्वातंत्र्यका युद्ध आरम्भ होनेके पूर्वतक संपूर्ण साहित्यमें
"हिन्दु और हिन्दुस्थान" इन नामोंकी ही सर्वत्र महिमा गायी
गयी है। हिन्दू-स्वातन्त्र्य-युद्धके महोपदेशक और आचार्य समर्थ
रामदास स्वामी अपनी अलौकिक उक्तियोंमें एक स्थानपर उस
दिव्य दृश्यका वर्णन करते हैं जिसे उन्होंने स्वप्नमें देखा था और
जिसे वे विजयोत्साहके साथ कृतज्ञतापूर्वक कहते हैं कि, अधि-
कांशमें सिद्ध हो गया है—
* स्वप्नें जें देखिलें रात्रीं, तें तें तैसेंचि होतसे ।
हिंडतां फिरतां गेलों, आनन्दवनभुवनीं ॥ १॥
बुडाले सर्व ही पापी, हिन्दुस्थान बलावलेँ ।
अभक्तांचा क्षयो झाला, आनन्दवनभूवनीं ॥२॥
कल्पांत मांडिला मोठा, म्लेच्छ दै त्य बुडावया ।
कैपक्ष घेतला देवीं, आनन्दवनभूवनीं ॥ ३ ॥

※ “रातको स्वप्न देखा, ठीक वही सब हो रहा है। घूमते फिरते
आनन्दवन भवनमें गये। देखा सब पापियोंका नाश हो गया है, हिन्दुस्थान
सबसे बलवान हुआ है; अभक्तोंका क्षय हो गया है और पापियोंका नाश
करनेके लिये, प्रलयंकारो प्रचंड उद्योग हो रहा है, देवता हमारे साथ हैं।
यहांसे राजधर्मके साथ साथ धर्मका अभ्युत्थान हो रहा है; सबको इससे
बड़ा संतोष है। औरंग डूबा। शत्रुओंका संहार हुआ। अष्ट छत्र फिरसे
प्रतिष्ठित हुए । बोलनेमें दोष है, करके दिखाना चाहिये; आगे जो कुछ हो,
वही सत्य है। स्नान-सांध्या, जप-तप. अनुष्ठानके लिये अब जलकी कोई
कमी नहीं है। जो कुछ स्मरण हुआ, वही लिखा । भगवान प्रत्यक्ष हैं।
राम ही कर्त्ता और राम ही भोक्ता हैं।”

हिन्दवानका ढाल ५१
येथून वाढला धर्म, राजधर्मासमागमें ।
संतोष मांडिला मोठा, आनन्दवनभुवनीं ॥ ४ ॥
बुडाला औरंग्या पापी, म्लेच्छ संहार जाहला ।
मोडिलीं मांडिलीं छत्रें, आनन्दवनभुवनीं ॥ ५ ॥
बोलणें वाउगें होतें, चालणें पाहिजे बरें ।
पुढें घडेल तें खरें, आनन्दवनभुवनीं ॥ ६ ॥
स्मरलें लिहिलें आहे, बोलता चालता हरो ।
उदंड जाहलें पाणी, स्नान संध्या करावया ।
जप तप अनुष्ठानें, आनन्दवनभुवनीं ॥ ७ ॥
राम कर्ता राम भोक्ता, आनन्दवनभुवनीं ॥ ८ ॥
हमारे उन राष्ट्रीय चारणोंमें जो हिन्दू स्वाधीनताके युद्धके
उस कालमें देशभरमें भ्रमण करके हिन्दुस्थानको “तस्मात् त्व-
मुत्तिष्ठ यशोलभस्व” का उपदेश दे रहे थे उनमें भूषण कवि बहुत
प्रसिद्ध हैं। उन्होंने औरङ्गजैबको ललकारा था—
लाजधरौ शिवजीसे लरौ सब सैयद सेख पठान पठायके ।
भूषन ह्यां गढकोटन हारे उहां तुम क्यों मठ तोरे रिसायके ॥
हिन्दुनके पतिसों न बिसात सतावत हिन्दु गरीबन पायके ।
लीजै न कलंक दिल्लीके बालम आलम आलमगीर कहायके ॥
भूषण फिर दूसरे स्थानमें कहते हैं—
जगतमै जीते महावीर महाराजनेते
महाराज बावनहू पातसाह लेवा ने ।
पातसाह बावनौ दिल्लीके पातसाह दिल्लीपति
पातसाहजीसो हिन्दुपति सेवाने ॥

५२ हिन्दुत्व
दाढ़ीके रखयनकी दाढ़ीसी रहति छाति ।
बाढ़ी जस मर्याद हद्द हिन्दुवानेकी।
कढि गयी रयतिके मनकी कसक
मिट गयी ठसक तमाम तुरकानेकी ॥
भूषन भनत दिल्लोपति दिल धकधका
सुनि सुनि धाक सिवराज मरदानेकी ।
मोटी भई चण्डी बिन चोटीके चबाय सीस
खोटी भई संपति चकताके घरानेकी ॥
शिवाजीके पराक्रमका वर्णन करते हुए भूषण कहते हैं—
राखी हिन्दुवानी, हिन्दुवानके तिलक राख्यो ।
स्मृति और पुराण राख्यो, वेद विधी सुनि मैं ।
राखी रजपूती राजधानी राखी राजनकी ।
धरामैं धरम राख्यो राख्यो गुण गुणीमें ॥
भूषण सुकवि जीति हद्द मरहट्टनकी
देस देस कीरति बखानि तव सुनि मैं ।
साहिके सुपूत सिवराज समसेर तेरी,
दिल्लो दल दाबिकै दिवाल राखी दुनिमैं ॥
इस दृष्टिसे शिवाजी महाराज और उनके साथियोंके पराक्र-
मोंकी समस्त हिन्दुस्थानमें स्तुति हो रही थी । भूषण मराठे नहीं
थे, पर शिवाजीसे बाजीरावपर्यन्त समस्त मराठा विजेताओंकी
विजययात्राका उन्हें उतना ही अभिमान था, जितना स्वयं मरा-
ठोंको । भूषण हिन्दुत्वके परम अभिमानी थे और अपने जीवनके

हिन्दवानेकी ढाल ५३
शेष क्षणतक वे अपने उद्दीपक गीतोंको सुनाकर तत्कालीन हिन्दू
नेताओंमें हिन्दुत्वका अभिमान जगाते रहते थे। शिवाजीके
बाद उनके दूसरे प्रिय नेता बुन्देलखण्डके वीर छत्रसाल महा-
राज थे।
भूषण कहते हैं—
हैबर हट्ट साजि, गैबर गट्ट सम-
पैदर थट्ट फौज तुरकानेकी।
भूषन भनत राय चंपतिको छत्रसाल
रोप्यो रनख्याल व्हैकै ढाल हिन्दवानेकी ॥
यह महाराज छत्रसालकी केवल व्याजस्तुति नहीं है। छत्र-
साल वास्तवमें वैसे ही थे जैसे शिवाजी, राजसिंह, गुरुगोविन्द
सिंह जो “ढाल हिंदवानेकी” थे। वे अपनेको "हिन्दुत्व" के
रक्षक समझते थे। छत्रसाल कहते हैं—
हिंदू तुरक दीन द्वै गाये। तिनसों बैर सदा चलि आये ॥
लेख्यो सुर असुरनको जैसो। केहरि करिन बखानो तैसो ॥
जबते शहा तखतपर बैठे। तब तै हिंदुन सौं उर डाठे ॥
जजिये कर तीरथिन लगाये। वेद देवाले निदर ढहाये ॥
सब रजपूत सीस नित नावै। ऐड करै नित पै दल धावै ॥
ऐड एक सिवराज निबाही। करै आपके चित्तकि चाही ॥
आठ पातसाही झुक झोरै। सूबनि बांधि डांड लै छोरै ॥
बुन्देला वीर महाराज छत्रसाल छत्रपति श्रीशिवाजी महा-

५४ \qquad हिन्दुत्व
राजसे मिले थे। तब शिवाजी महाराजने यह कहकर उन्हें बहुत
ही उत्साहित किया था कि—
“तुम छत्री सिरताज। जीत अपनी भूमिकौ करौ देशको राज॥”
पीछे बुन्देलखंडके सुजानसिंह नामक एक शक्तिशाली क्षत्रिय
राजा महाराज छत्रसालसे मिले। दोनोंकी जो बातचीत हुई,
उसमें सुजानसिंहने देशकी तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितिका
कैसा हृदय-विदारक वर्णन किया है—
“पातसाह लागे करन, हिन्दूधर्मकौ नासु।
सुधि कर चंपतरायकी, लइ बुन्देला सासु॥
जब तैं चंपति कस्यौ पयानौ, तबतैं पर्यो हीन हिंदवानो॥
लग्यो होग तुरकनको जोरा, को राखे हिन्दुनको तोरा॥
अब जो तुम कटि कसौ कृपाती, तौ फिरि चढे हिंदु मुख पानी॥”
वृद्ध सुजानसिंहने यह कह कर अपना खड्ग और हृदय छत्र-
सालको अर्पण किया और उन्हें आशीर्वाद दिया—
यह कहि प्रीति हिये उमगाई। दिये पान किरबान बधाई॥
दोऊ हाथ माथपर राखे। पूरन करौ काज अभिलाषे॥
हिन्दुधरम जग जाई चलावौ। दौरि दिल्लीदल हलनि हलावौ॥
(छत्रप्रकाश)*
पंजाबमें गुरु तेगबहादुर सिंहने स्वाधीनताका पक्ष केवल
ग्रहण ही नहीं किया बल्कि उसपर अपने प्राण उत्सर्ग कर दिये।

  • छत्रप्रकाश ऐतिहासिक ग्रन्थ है। इसमें महाराज छत्रसालके राज्यका
    वर्णन है और इसे उन्हींकी आज्ञासे लाल कविने लिखा है।

हिन्दवानेकी ढाल ५५
उनके पास जब काश्मीरके ब्राह्मण आये और कहने लगे कि
हमारे ऊपर असह्य अत्याचार हो रहा है और हमसे यह कहा जा
रहा है कि "या तो इस्लाम कबूल करो या मौत", तब गुरु तेग-
बहादुरने उन्हें यह सलाह दी—
तुम सुनो दिजेसु ढिग तुर्केसु अबैसु इम गावो ।
इक पीर हमारा हिंदु भारा भाईचारा लख पावो ॥
है तेगबहादुर जगत उजागर ता आगर तुर्क करो ।
तिस पाछे तबही हम फिर सबही बन हैं तुरक भरो ॥
( पंथप्रकाश )
"हे द्विजो ! सुनो । तुम लोग तुर्कों ( मुसलमानों ) के पास
जाओ और निर्भय होकर उनसे कहो, "हमारा एक बड़ा हिंदू पीर
है, जिसके लाखों शिष्य हैं। उसका नाम तेगबहादुर है, वह जग-
तमें प्रकाश फैलानेवाला है। पहले उससे इस्लाम कबूल करवाओ
तब हमलोग भी इस्लाम कबूल करेंगे ।"
और जब जाति और धर्मके शत्रु आने उन्हें ललकारा तब—
तिनते सुन श्रीतेगबहादुर । धर्म निबाहण विषे बहादुर ॥
उत्तर भन्यौ धर्म हम हिन्दु । अति प्रियको किमकरे निकंदु ॥
( सूर्य प्रकाश )
"उनकी बात सुनकर धर्म निबाहनेमें बहादुर श्रीतेगबहादुरने
यह जवाब दिया कि हमारा धर्म हिन्दू है,यह हमारा अति प्रिय हैं,
इसका अपमान न होने देंगे ।"
इन्हींके पुत्र जगवंदित गुरुगोविन्दसिंह, जो हमारी हिन्दुजाति-
के कवि, धर्मोपदेशक और योद्धा थे, कहते हैं—

५६ हिन्दुत्व
सकल जगतमें खालसा पंथ गाजे ।
जगे धर्म हिंदू सकल भंड भाजे ॥
(गुरु गोविन्दसिंहकृत विचित्र नाटक)
छत्रपति श्रीशिवाजी महाराजके बखरकार कहते हैं—
“शिवाजीचें मनांत आलें जे आपण हिंदू। सर्व दक्षिण देश
यवनांनी पादाक्रांत केला। क्षेत्रांस पीडा केली। हिंदु-धर्म बुड-
विला। प्राण ही देऊन धर्म रक्षूं। आपलें पराक्रमें नवीन दौ-
लत संपादू, तें अन्न भक्षूं।”
अर्थात् “शिवाजीने मन ही मन विचार किया कि हम हिन्दू
हैं। सर्व दक्षिण देशको यवनोंने पादाक्रांत कर डाला है। तीर्थ-
स्थानोंको क्लेश पहुंचाया है। हिंदू-धर्म डुबा दिया है। प्राण देकर
धर्म-रक्षण करेंगे। अपने पराक्रमसे नवीन राज्य स्थापित करेंगे।
वही अन्न भक्षण करेंगे।”
परंतु बुद्धिमान और विश्वासपात्र दादाजीने सलाह दी--
“आप कहते हैं वह काम तो बहुत अच्छा है, पर इसका पार
लगना बड़ा कठिन है। इसके लिये मजबूत गढ़ चाहिये। स्थान
स्थानमें हिन्दू राजा और हिंदू फौजें सहायता करें तब यह हो।
ईश्वर अनुकूल और सिद्ध पुरुषोंका आशीर्वाद हो तो ऐसी बातें
हो सकती हैं।” (चिटणीस बखर)
शिवाजीके इस संपूर्ण उद्योगमें दादाजीका हाथ था-उन्हींका
तत्वावधान था। युवक शिवाजी अपने एक सहयोगी नवयुवक
देशभक्तको सन् १६४६ ई० में लिखते हैं—

हिन्दवानेकी ढाल ५७
"शहास तुम्ही आपली बेमानगिरो करीत नाहीं। आदि
कुलदेव स्वयंभू। त्यांनीं आम्हांस यश दिलें व पुढें तो
मनोरथ हिन्दवी स्वराज्य करून पुरविणार आहे हें राज्य
व्हावें हें श्रीचे मनांत फार आहे।"
अर्थात् "आप शाहसे बेईमानी नहीं करेंगे (अच्छी बात है) !
हमारे आदि कुलदेव (तो) स्वयंभू हैं। उन्होंने हमें यश दिया
है और आगे भी वे हमारा मनोरथ हिन्दवी स्वराज्य करके
पूरा करनेवाले हैं। यह राज्य स्थापित हो ऐसी श्रीकी उत्कट
इच्छा है।"
श्रीयुत राजवाडे महोदयके पास इस चिट्ठीकी असली नकल
है, जिससे यह पता लगता है कि १७ वीं और १८ वीं शताब्दीमें
हिन्दू-जातिने जो महदुद्योग किया, उसकी मूल भावना क्या थी।
यह कोई क्षुद्र उद्योग नहीं था—कोई संकुचित भाव इसमें नहीं
था—यह हिन्दवी स्वराज्य—हिन्दू-साम्राज्यकी स्थापनाका
महान् उद्योग था। इसी प्रेरणासे शिवाजीके सब काम हुए जब
वह केवल एक बालक थे। इसका प्रमाण हमें उनके शब्दोंमें
मिलता है।
परंतु जब राणा जयसिंह दिल्लीपतिकी ओरसे शिवाजीका
दमन करनेके लिये आये, तब स्वभावतः ही उनका सामना करने-
वाले खड्गकी धार कुंद हो गयी। जो राजपूत हिंदुत्वकी रक्षा करने-
वाले हिंदुओंकी ढाल थे, उन्हीं राजपूतोंको अपना और अपने
सहधर्मी और हिन्दू-भाइयोंका रक्त गिरानेपर उद्यत देखकर और

५८ हिंदुत्व
सो भी इसलिये कि जिसमें मुसलमानोंकी विजय हो, चित्त
अत्यन्त उद्विग्न हो उठा—वीरोंका उत्साह भंग होने लगा ! शिवाजी
जयसिंहसे कहते हैं—"आप जो किले चाहते हों, मैं देनेके लिये
तैयार हूं। उनपर आपका झण्डा चढ़ाता हूं। पर मुसलमानोंको
यश मत दो। मैं हिन्दू हूं। आप राजपूत हैं; इसलिये आप भी
हिन्दू ही हैं। असलमें राज हिन्दुओंका ही है। हिन्दू धर्मरक्षकके
सामने सौ बार मैं अपना मस्तक झुकाऊंगा। पर हिन्दू धर्म
अपमानित हो, ऐसा कभी नहीं हो सकता।
जयसिंहपर इसका असर हुआ और उन्होंने जवाब दिया—
"औरंगजेब बादशाह पृथ्वीपति हैं। उनसे आप मैत्री कर लें।
शत्रुत्व करके इस कालमें निबाहना नहीं हो सकता। हम हिन्दू
जयपुरके राजा हैं। आप भी हिन्दू ही हैं। आप हिन्दू धर्म
स्थापन करते हैं, इसलिये हम आपके अनुकूल हैं।"
शिवाजीके अधीन हिंदुओंका जो उत्थान हुआ, उससे हिंदु-
स्थानके समस्त हिंदुओंमें नवजीवनका सञ्चार हो गया था।
पीड़ित जाति उन्हें अवतार और रक्षक मानती थी। सावनूरके
हिंदुओंने मुसलमानोंके अत्याचारोंसे त्रस्त होकर देखिये किस
प्रकार उन्हें पुकारा है,— "यह यूसुफ बड़ा दुष्ट है। स्त्रियों और
बच्चोंपर अत्याचार करता है। गोवध आदि निंद्य कर्म करता है।
हमलोग इसके राज्यमें बहुत ही तंग आ गये हैं। आप हिन्दूधर्मके
संस्थापक हैं, म्लेच्छोंके नाशक हैं; इसलिये आपकी शरणमें
आये। हमलोग आपके पास आये इसलिये हमारे द्वारपर पहरा

हिन्दवानेकी ढाल ५६
खड़ा है। अन्न-जलके बिना हमें मार डालना चाहते हैं। इसीलिये
रातका दिन करके (बहुत जल्द) आइये।”
इसके बाद फिर जब शिवाजीने तंजोरकी जागीर अपने भाई
व्यंकोजीको इस शर्तपर लौटा दी कि वह मुसलमान बादशाहका
सार्वभौमत्व न माने तब शिवाजीने लिखा है—“दुष्ट हिन्दु-
विद्वेषियोंको अपने राज्यमें न रहने दें।”
स्वातंत्र्ययुद्धमें संताजी और उनके भाइयोंने जो पराक्रम
किया उसका यथा-उचित सत्कार करनेके लिये राजाराम महा-
राजने जो महान् और अभिमानास्पद पदवी दी वह पदवी थी
“हिन्दुराव”। जब जिंजिके किलेको शत्रुओंने मजबूतीसे घेर
लिया था तब उस घिरावको तोड़नेके लिये मुगल सेनापतिके
अधीनस्थ मराठे सैनिकोंको फोड़ लेनेका प्रयत्न किया गया—
“गुप्तरूपसे नागोजी राजाके साथ बातचीत की गयी कि हम और
आप यदि एक हो जायं तो यह सेना नष्ट करके हिन्दू-धर्मकी रक्षा
कर सकेंगे। इसलिये आप मुसलमानोंका पक्ष त्यागकर हमारे
पक्षमें आ मिलें।” तब नागोजी राजा मुसलमानोंकी नौकरी
छोड़कर, ५ हजार फौजके साथ शहरमें गये……शिर्के
मुगलोंके ताबेदार बने (कारण संभाजीने शिर्कोंको कतल कराया
था)। तब खण्डो बल्लालने कहा, “जिस प्रकार आपके परिवार-
वालोंका कतल कराया उसी प्रकार हमारे भी तीन पुरुष हाथीके
पैरोंतले कुचलवा कर मारे गये। परन्तु हिन्दुओंके राज्यके लिये
हम उद्योग कर रहे हैं और इसमें आप भी हिस्सेदार हैं।” तब

६० ( हिन्दुत्व
शिर्के भी इस षड्यन्त्रमें सम्मिलित हुए और मराठोंसे मिले और
राजाराम शत्रु के घिरावको तोड़कर वहांसे निकले ।
शाहू महाराज और सवाई जयसिंहसे तो इस विषयमें वाद-
विवाद ही चल पड़ा था कि, “हिन्दू-धर्मकी रक्षाके लिये हमने
क्या किया और तुमने क्या किया ?” (सरदेसाई मध्यविभाग । )
यही भाव बाजीराव और नाना साहेबकी संतानोंमें था ।
इतिहासकारने लिखा है—“बहुतोंने बाजीरावके ही उद्योगका
अनुकरण और परिपोष किया दिखाई देता है.........ब्रह्मेन्द्र
स्वामी, गोविंद दीक्षित आदि देशभर भ्रमण करके अनुभव प्राप्त
किये हुए साधु पुरुषोंमें यही 'हिंदूपदपादशाही' की भावना काम
कर रही थी और वे अपने सब शिष्योंको इसी भावनासे उप-
देश दिया करते थे ।” (सरदेसाई) बाजीराव स्वयं कहते हैं—“अरे
देखते क्या हो ? चलो कूचकर आगे बढ़ो । हिन्दू-पद-पादशाही
होनेमें अब विलम्ब ही क्या है ?” (बाजीराव)
उस समय पण्डित-समाजमें ब्रह्मेन्द्र स्वामी मुख्य थे ।
परंतु जिस राज्यमें हिंदू-धर्मका उच्छेद होता है उस राज्यमें
रहना उन्होंने उचित नहीं समझा ।......'हिंदू-साम्राज्यमें देव
ब्राह्मणोंपर अत्याचार' यह कितना लज्जाजनक विषय है यह बात
उन्होंने शाहू महाराजको अच्छी तरह समझा दी । ( सरदेसाई )
मथुराबाईने ब्रह्मेंद्र स्वामीको लिखा—“शंकराजी मोहिते,
गणोजी शिंदे, खंडोजी नालकर, रामाजी खराडे, कृष्णाजी मोड
आदि बड़े बड़े सरदारोंने राज्य-रक्षण करके शामलों ( पुर्तगीजों )

हिन्दवानेकी ढाल ६१
को परास्त किया और कोंकणमें हिंदू-धर्मको रक्षा की।” इस
वीरांगना मथुराबाईने जो चिट्ठियां लिखी हैं उनमें देश-भक्तिकी
इतनी प्राण-शक्ति भरी हुई है कि इन चिट्ठियोंको वे लोग अवश्य
पढ़ें जो उस समयके हिंदू-उत्थानका वास्तविक भाव समझना
चाहते हैं।
पुर्तगीजोंने गोवामें जो धर्मोन्माद-मूलक अत्याचार किया
वह यूरोपके धर्मके नामपर होनेवाले अत्याचारका ही भारतीय
संस्करण था। एक बार तो इन्होंने खुलेआम हिन्दू-धर्म-कर्म
करनेकी बिलकुल मनाई कर दी थी। तब स्वाभिमानी अन्ताजी
रघुनाथने इस आज्ञाका उल्लंघन किया और अन्य हिन्दुओंको भी
ऐसा करनेके लिये उत्साहित करने लगा। पर वह यह अच्छी
तरह जानता था कि शक्तिहीन निष्क्रिय प्रतिरोध शक्तिहीन निष्फल
सहिष्णुता है। इसलिये इस प्रतिरोधके पीछे बाजीराव या चिम-
णाजीका खड्ग होना चाहिये। अन्ताजी रघुनाथने ही हिन्दुस्तानके
पुर्तगीज राज्यमें राज्यक्रांति करायी, बाजीरावके पक्षके समस्त
हिन्दू नेताओंकी सहानुभूति प्राप्त की और ऐसा उद्योग किया कि
गोवापर मराठे आक्रमण करें। चिमणाजी अप्पाके सेनापतित्वमें
मराठोंने पुर्तगीजोंपर चढ़ाई की और उनके अधीनस्थ समस्त हिन्दू
प्रदेशोंको स्वाधीन किया।
परन्तु इसी बीच, वसई पुर्तगीजोंके हाथसे निकलनेके पूर्व
नादिरशाहने हिन्दुस्तानपर चढ़ाई की और उसने दिल्लीपर कब्जा-
किया। बाजीरावके मराठे दूतोंने उन्हें लिखा—"तहमास्म कुली-

६२ हिन्दुत्व
खान (नादिरशाह) कोई देव नहीं है जो संसारको कतल कर
डाले। जबरदस्तसे सन्धि करेगा। इसलिये बलवान फौजके साथ
आइये। पहले जबरदस्ती और फिर सन्धि। अब सब राजपूत और
स्वामी (बाजीराव) एक हो जायं तो काम बन जाय। सबको—
बुंदेले आदिको—एकत्र करके बड़ा भाव दिखाना होगा। नादिर-
शाह वापिस नहीं जाना चाहता। वह सीधे हिन्दूराज्यपर चढ़ाई
करेगा। सवाई जयसिंहकी यह इच्छा है कि दिल्लीके तख्तपर
उदयपुरके राणा बैठाये जायं। (सब) हिन्दू राजा सवाई आदि
श्रीमान्‌की मार्ग-प्रतीक्षा कर रहे हैं। श्रीमान्‌का पृष्ठबल होते ही
जाट आदि फौज दिल्लीपर भेज सवाईजी स्वयं दिल्ली जायंगे।”
(धोंडो गोविन्दकी चिट्ठियां बाजीरावके नाम)
परन्तु वसईकी लड़ाई अभी चल रही थी, इससे बाजीराव
समयपर नहीं पहुंच सके। अपनी कठिनाइयोंको देखकर अपनी
लाचारीपर उन्हें बड़ा मानसिक क्लेश हो रहा था। उन्होंने लिखा,
“हिन्दुओंपर बड़ा भारी संकट उपस्थित है। अभीतक वसई हाथ
नहीं आयी।...ऐसी अवस्थामें सब मराठी फौजें एक होकर
चमेली पार हो जायं। उसे (नादिरको) इस ओर न आने देना-
ऐसा विचार है।” (बाजीरावका पत्र ब्रह्मेंद्रस्वामीको)
परन्तु बाजीरावके अजेय धैर्यने सब विघ्नोंको पार किया।
वे फिर लिखते हैं—"घरके झगड़ोंको अब किनारे करो। इस
समय समग्र हिन्दुस्थानका एक शत्रु उत्पन्न हुआ है। मैं तो
नर्मदा पार करके समस्त मराठा फौज चम्बलतक फैला दूंगा।
फिर देखें, नादिरशाह कैसे आगे बढ़ता है! (बाजीरावके पत्र)

हिन्दवानेकी ढाल ६३
सवाई जयसिंहको अपने हिन्दुत्वका वैसा ही ज्वलन्त अभि-
मान था जैसा हिन्दुओंके अन्य नेताओंको । इन्होंने ही मालवेके
परराज्यपीड़ित हिन्दुओंसे यह कहा था कि बाजीरावसे प्रार्थना
करो कि वे हिन्दुओंकी स्वाधीनताके युद्धका क्षेत्र मालवेतक
विस्तृत करें और इस प्रकार शिवाजीके अनुयायियोंकी संततिका
उद्देश्य—हिन्दू-पद्-पादशाहीकी स्थापनाका उद्देश्य पूरा करनेमें
और आगे बढ़ें। अपनी एक चिट्ठीमें इन सुसंस्कृत और देशभक्त
राजपूत राणाने लिखा है—
“सिधिश्री... ...नन्दलालजी प्रधान व भाईजी ठाकुर संस्थान
इन्दोर अमरगढ़सु महाराजाधिराज श्रीसवाई जयसिंगजी कृत
प्रणाम बंचजो ।......सो आपको लिखते हैं कि बादशाहने चढ़ाई
की है तो कुछ चिन्ता नहीं। श्रीपरमात्मा पार लगावेगा। बाजी-
राव पेशवासे हमने आपके निसबत कोलवचन कर लिया है।”
पीछे फिर लिखा है—“हजार शाबाश है। आप सब मालवे सर-
दार एक रहके हिन्दू धर्मका कल्याण होना और मालवेमें हिन्दू-
धर्मकी वृद्धि होना। इस बातपर विचारकर मालवेमेंसे मुसल-
मानोंको नौमेद किये। और हिन्दुधर्म कायम रखा।।” (जयसिं-
हके पत्र २६—१०—१७२१ ई०)
हिन्दुपदपादशाही और हिन्दू-स्वातंत्र्यके इस प्रचण्ड
उद्योगमें बाजीरावके पुत्र नाना साहब सबसे बड़े नेता हुए।
इनका पत्रव्यवहार स्वयं एक अध्ययनकी वस्तु है। सर्वत्र इन्हें
हिन्दुत्वका ही पक्ष करते हुए हम देखते हैं। ताराबाईको नाना