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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

तेईसवाँ अध्याय ६१५
खटमल तेल के पास नहीं जाता, अथवा दीमक अग्नि को नहीं लगती, उसी प्रकार वह द्रव्य को स्पर्श नहीं
करता अथवा जिस प्रकार अग्नि में पड़ा लवण तड़तड़ कर बाहर आ जाता है, उसी प्रकार मोक्ष की इच्छा से
जो अपना द्रव्य तत्काल फेंक देता है वही स्वहितेच्छु हरिभक्त है। बचनाग विष क्षण भर के लिये मधुर लगता
है लेकिन उसका परिणाम मृत्यु ही होता है। उसी प्रकार अर्थ अनर्थ का कारण बनता है। इसलिये जो मोक्ष की
आकांक्षा करता है उसे हाथ में धन नहीं लेना चाहिये। काया, वाचा तथा मन से सचमुच ही द्रव्य का त्याग
करें। सारे भेद अर्थ के कारण उत्पन्न होते हैं यह पहले भी बताया गया है। किन्तु श्रीकृष्ण वही बात बार-बार
स्पष्ट करके बताते हैं।
भिद्यन्ते भ्रातरो दारा पितरः सुहृदस्तथा।
एका स्निग्धाःकाकिणिना सद्यः सर्वेऽरयःकृताः ॥ २० ॥
एक कौड़ी भी इष्टमित्रों की मित्रता तोड़ देती है। भाइयों का स्नेह बिगाड़ती है और सहृदों का सौजन्य नष्ट
करती है। पितापुत्र में जो विरोध, स्त्री पुत्र में जो कलह होता है उसका सम्बन्ध इस अर्थ से है, यह जान लो। वह
इष्टमित्रों का प्रेम ही नष्ट करता है। 'काकिनी', यानी बीस कौड़ी लेकिन वह आप्तों का सम्बन्ध तोड़ देती हैं।
इतना ही नहीं, उनमें से एक फूटी कौड़ी भी इष्टमित्रों में भेद उत्पन्न करती है।
अर्थेनाल्पीयसा ह्येते संरब्धा दीप्तमन्यवः।
त्यजन्त्याशु स्पृधो घ्नन्ति सहसोत्सृज्य सौहृदम् ॥ २१॥
द्रव्य का लोभी मनुष्य अल्प द्रव्य के लिये भी अंतःकरण का मित्रत्त्व छोड़कर क्रोध से संतप्त होकर एक-
दूसरे से धोखा करते हैं। अर्थ मनुष्य को अनर्थ में डालकर उसका प्राणान्त भी कराता है। इस प्रकार अर्थ अपने
स्वार्थ पर भी आघात करता है। जब तक मनुष्य जीवित है, तब तक यह द्रव्य अनर्थ करता है और मृत्यु के बाद
नरक के द्वार पर ले जाता है। अब यह द्रव्य किस प्रकार उत्तम देह को नष्ट कर देता है, यह भी सुनो।
लब्ध्वा जन्मामरप्रार्थ्यं मानुष्यं तद् द्विजाग्यताम्।
तदनादृत्य ये स्वार्थं घ्नन्ति यान्त्यशुभां गतिम् ॥ २२ ॥
कोटि-कोटि जन्मों का पुण्य हो, तभी इस कर्मभूमि में ( भरतखण्ड में) मनुष्यदेह प्राप्त होता है। उसमें भी
सारे वर्णों में अग्रगण्य, सामर्थ्यवान् ब्राह्मण वर्ण में जन्म और ब्राह्मणों में भी उत्तम कुल में जन्म इस मृत्युलोक में
प्राप्त करने के लिये देवता भी मृत्यु की कामना करते हैं। स्वर्ग के इन्द्रादि जो देवता हैं वे भी ऐसे जन्म की इच्छा
करते हैं। सत्यलोक तक का अद्भुत ऐश्वर्य जिन्हें प्राप्त हुआ है वे भी इस जन्म की इच्छा करते हैं। इतना ही
नहीं, बल्कि दिन-रात उसकी उत्कंठा करते रहते हैं। ऐसे इस जन्म में यदि भगवद्भक्ति करें तो चारों मुक्तियाँ
कदमों पर गिरती हैं इसलिये देवता भी ऐसे जन्म प्राप्ति की कामना करते हैं। ऐसा उत्तम जन्म प्राप्त होने पर भी,
मैं त्रिभुवन में अत्यन्त अभागा रहा और अपने स्वार्थ की उपेक्षा कर द्रव्यलोभ में द्रव्य के ही मोह में फँस गया।
द्रव्यलोभ से भ्रान्त होकर अथवा लोगों में प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिये जो भगवद्भक्ति की उपेक्षा करता है, उसे
दुर्गति प्राप्त होती है। वह दुर्गति कैसी ? तो द्रव्यलोभियों को नरकवास प्राप्त होता है और वे चौरासी लाख
योनियों में अत्यन्त दुःख से गर्भवास भोगते रहते हैं। जिस ब्राह्मण जन्म में स्वर्ग और मोक्ष सहज प्राप्त होते हैं,
उसी अर्थ का रहस्य वह द्रव्यलोभी स्वयं बता रहा है।

६१६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
स्वर्गापवर्गयोर्द्वारं प्राप्य लोकमिमं पुमान्।
द्रविणे कोऽनुषज्जेत मर्त्योऽनर्थस्य धामनि॥ २३॥
अपने धर्म के अनुसार आचरण करने पर ब्राह्मण को स्वर्गप्राप्ति की इच्छा होती है। उस समय वह ब्राह्मण
श्रेष्ठ इन्द्र चन्द्रादि का स्थान भी सरलता से प्राप्त कर सकता है। जिसके यज्ञकर्म से औरों को भी स्वर्गप्राप्ति होती
है, ऐसा स्वर्ग ब्राह्मणों के हाथ की चीज होने के कारण वह सहज ही प्राप्त होता है। लोकेषणा, पुत्रेषणा और
दारैषणा इन तीन ईषणाओं को छोड़ कर जिस ब्राह्मण से निष्काम स्वधर्माचरण होता है, उसके चरणों पर मोक्ष भी
गिरता है और रात-दिन उसका आज्ञाधारी सेवक बनकर रहता है। वह जिस पर कृपा कर दे वे भी मोक्ष पद प्राप्त
कर लें इतना सामर्थ्य उस ब्राह्मण के पास सहज ही होता है। स्वर्ग जिसके पैर के नीचे की सीढ़ी है, मोक्ष
जिसका आज्ञाकारी सेवक है, ऐसे ब्राह्मणत्व की महत्ता होने पर भी द्रव्य के लोभी ब्राह्मणजन्म का नाश कर देते
हैं। ब्राह्मण जन्म प्राप्त होने पर जन्म-मरण पूरी तरह समाप्त हो जाता है लेकिन द्रव्य के लोभ में द्रव्य प्राप्त कर
मैं फँस गया। इस संसार में मनुष्य का जन्म दुर्लभ है तिस पर ब्राह्मण का जन्म तो और भी दुर्लभ है। लेकिन वह
प्राप्त होने पर भी मैं स्वयं द्रव्य लोभ के कारण फँस गया। ब्राह्मण का देह प्राप्त कर द्रव्य के कारण बड़े-बड़े
लोग भी नष्ट हो गये हैं। अर्थ सचमुच अनर्थ का घर है और वह दुर्धर दुःखों को अवश्य बढ़ाता है। द्रव्य अनर्थ
का ही स्थान है, इसलिये उसका पूर्णरूप से त्याग करना चाहिये। इस प्रकार वैराग्य से पूरी तरह तपा हुआ वह
ब्राह्मण स्वयं बताने लगा। (आशंका) दैवयोग से यदि सम्पत्ति प्राप्त हो तो क्या उसे घूरे पर फेंक दिया जाय ? या
पानी में डुबो दिया जाय ? द्रव्य का त्याग कैसे किया जाय ? उस द्रव्यत्याग का वर्णन वह ब्राह्मण स्वयं कर रहा
है। जो धनसम्पन्न हों उन्हें ध्यानपूर्वक सुनना चाहिये।
देवर्षिपितृभूतानि ज्ञातीन् बन्धूंश्च भागिनः।
असंविभज्य चात्मानं यक्षवित्तः पतत्यधः ॥ २४॥
दैवयोग से यदि धन मिले तो पंचमहायज्ञ (भूतयज्ञ, पितृयज्ञ, देवयज्ञ, ब्रह्मयज्ञ और मनुष्ययज्ञ) करना
चाहिये। उत्साहपूर्वक बड़े उत्सव के साथ भगवान का पूजन करना चाहिये। स्वयं पितृतर्पण करना चाहिये।
प्रतिवर्ष छानबे श्राद्ध करने चाहिये। (अमावस्या १२, युगादितिथि ४, मन्वादितिथि १४, सूर्यसंक्रान्ति १२, वैधृति
१२, व्यतिपात १२, महालय १५, अष्टैका ५, अन्वष्टका ५ तथा पुर्वेद्यु ५ कुल ९६) स्वयं गया यात्रा कर पितरों
का उद्धार करना चाहिये। जीवित बड़े लोगों को त्रिकाल नमस्कार करना चाहिये। उनका कभी अपमान नहीं
करना चाहिये। उनका गौरव करना चाहिये। उन्हें उनकी इच्छानुसार भोजन देना चाहिये। यथाशक्ति धन देना
चाहिये और उनकी सेवा कर उन्हें सुखी करना चाहिये। पिता साक्षात् नारायण स्वरूप है और माँ लक्ष्मीस्वरूप है।
ऐसी भावना से जिसके हाथ से पितृ-मातृ सेवा घटती है वह एक सत्पुत्र है। जिसकी सेवा से पितर संतुष्ट होते हैं,
वही सच्चा पितृतर्पण है और जीवित अवस्था में उनकी अवज्ञा करना अनाचार है। मृत्यु के बाद श्राद्ध करना तो
केवल लोकाचार है। बड़ों के वचन पर जो विश्वास नहीं करता वह पाप की राशियाँ एकत्र कर रहा है, यह जान
लो और जो पिता के वचन पर विश्वास करता है उसके पास मोक्ष भी सेवक बन कर रहता है। जीवित पितरों को
और मृत पितरों को किस प्रकार तृप्त करना चाहिये, इसका रहस्य तुम्हें बताया। इसी का नाम है, पितृभजन ! अब
ऋषिपूजन कैसे किया जाता है, यह भी सुनो। सम्मान के साथ ब्राह्मण को लाकर श्रद्धापूर्वक उसके चरण धोये।
उसके चरणों के तीर्थ का वन्दन कर उसका कुछ भाग प्राशन करें और कुछ का अपने शरीर पर अभिषिंचन करें।

तेईसवाँ अध्याय ६१७
धूप, दीप आदि से यथासांग पूजा करें और उसकी रुचि का उत्तम अन्न उसे तृप्त होने तक खिलायें। उसे
यथाशक्ति द्रव्य दें। इसी का नाम है ऋषिपूजन। ब्राह्मण स्वयं ही महर्षि है। ब्राह्मण के योग से सनत्कुमार तृप्त
होकर ढकार देता है। भाई, सगे-सम्बन्धी, इष्टमित्र आदि की भयंकर दारिद्र्य पीड़ा उन्हें द्रव्य देकर कम करें,
यही मुख्य रूप से श्रेष्ठ धर्म है। अपने परिवार को पीड़ा देकर दूसरे को अन्न धन देना पूरी तरह अधर्म है। वह
पुण्य शुद्ध नहीं है। अपने कुटुम्ब के सभी लोगों को पूरी तरह सुखी कर, फिर जो धन बचे उसे परोपकार में खर्च
करना चाहिये। यदि कोई अतिथि आ जाय तो उसे अवश्य अन्न देना चाहिये। वह यदि विन्मुख होकर जायेगा तो
अपना सारा पुण्य नष्ट हो जाता है। सभी दानों में अन्नदान श्रेष्ठ है। दीन-गरीबों को सम्मान कर उन्हें अत्यन्त
भक्तिभाव से सुरुचि वाला भोजन देना चाहिये। जो कुटुम्ब को सुखी करता है, गरीबों को पेटभर भोजन कराता है,
लेकिन स्वयं भूखा रहता है, यह भी अधर्म है। जैसे हम गरीबों को भोजन कराते हैं, उनमें खुद को भी एक गरीब
समझ कर सबके साथ भोजन करें। पंक्ति प्रपंच (पंगत में खाना परोसने में भेदभाव करना) यह भी अन्नदान में
आने वाली बाधा है। इसलिये सबके साथ ही भोजन करें। द्रव्य का उचित व्यय अनाथों के प्रेतसंस्कार में करें,
गरीबों के उद्धार में करें अथवा अयाचित के घर भिजवा देना चाहिये। अन्धे, विकलांग, गूँगे, दीन, दुर्बल इनका
जो स्वयं संरक्षण करता है उसका ही धन सार्थक होता है और उसका ही पुण्य शुद्ध समझना चाहिये। साधु और
सज्जन की राह में आने वाले संकट को जो धनवान पुरुष नष्ट करता है, उसकी धर्मशीलता की पताका साक्षात
वैकुण्ठ में लहराती है। दुर्बल भक्त का संरक्षण जो धनवान पुरुष करता है उससे भगवान सन्तुष्ट होता है और उस
भक्त से पहले उसका उद्धार करता है। सद्गुरु के पवित्र चरण सभी मंगलों से परिपूर्ण और सभी कल्याणों में
कल्याणकारी हैं। वहाँ जिसका द्रव्य अर्पण होता है, उसके औदार्यधर्म की ध्वजा सत्यलोक में फहराती है और
वैकुण्ठ तथा कैलास में सर्वत्र उसके यश की भेरी बजती रहती है। स्वधर्म से प्राप्त किया हुआ धन जो सद्गुरु को
अर्पण करता है, वही कर्म करके भी निष्कर्मी है। परमपवित्र एक वही है जो अधिकाधिक भगवद्भक्ति से गुरु
को अपनी सम्पत्ति अर्पण करता है उसे अंगीकार कर लक्ष्मीपति तो अपनी भक्ति से उसे देता है। जिसे एकनिष्ठ
गुरुभक्ति प्राप्त होती है उसके द्वार पर चारों मुक्तियाँ दासी बनकर खड़ी रहती हैं। लक्ष्मीपति तो उससे दूर ही नहीं
होते। जिसका शरीर, मन और धन पूरी तरह गुरुचरणों में अर्पित होता है, उसे संसारभय का स्मरण कल्पांत में भी
नहीं होगा। भाग्य से जो सम्पत्ति मिली है, उसे इस प्रकार खर्च कर भाग्यवान पुरुष उस द्रव्य से निष्ठापूर्वक
परमार्थ प्राप्त कर लेते हैं। जो इस प्रकार द्रव्य खर्च न कर स्वजाति और कुटुम्ब को पीड़ा देता है और स्वयं भी
पेटभर नहीं खाता, उसका संग्रह किया हुआ धन 'यक्षधन' है। इस ढंग से अपने को कष्ट देकर जो 'यक्षधन'
एकत्र किया रहता है, वह अधःपतन का कारण होता है और उस द्रव्यलोभी को भयंकर दुःख प्राप्त होता है। उस
ब्राह्मण ने कहा, मैं भी इसी प्रकार 'यक्षधन' से कंगाल हो गया। हाथ आया हुआ लाभ व्यर्थ चला गया और हाय !
मैं मोक्ष से वंचित रह गया। यक्षवित्त एकत्र कर मैंने अपना ही अहित किया। इस प्रकार दुःखी होकर वह बड़े
कष्ट से अपना दुःख बताने लगा।
व्यर्थयार्थेहया वित्तं प्रमत्तस्य वयो बलम्।
कुशला येन सिध्यन्ति जरठः किं नु साधये॥ २५॥
स्वयं विलास का भोग न कर मैं वाणी और मन इन दोनों को कष्ट देकर उन्मत्त और अविचारी बन गया।
द्रव्यप्राप्ति के लिये प्रयास करने में यौवन, बल और आयु निकल गयी। शरीर पूरी तरह क्षीण हो गया। फिर भी

६१८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
द्रव्य की लालच कम नहीं होती। धन की वृद्धि करने में चिन्ता असीम बढ़ गयी। इससे मैं अपना हित भूल गया
और द्रव्यलोभ में कंजूस बन गया। जिस द्रव्य से और जिस जन्म से विवेकशील लोग भूतदया और परोपकार कर
संसार सागर तर गये, वहाँ मुझ अभागे का द्रव्य व्यर्थ गया, जीवन व्यर्थ हुआ, आयु व्यर्थ गयी और मेरा स्वार्थ
डूब गया। आप शायद यह कहेंगे कि जब तक जान में जान है तब तक अपना स्वार्थ सिद्ध कर लिया जाय।
लेकिन अब ऐसी स्थिति में वह भी नहीं हो पायेगा क्योंकि अब द्रव्य और सामर्थ्य दोनों ही नहीं रहे। अधर्म के
कारण सारा धन नष्ट हो गया और वृद्धावस्था ने शक्ति छीन ली। अब मैं केवल जीर्ण-शीर्ण वृद्ध और अभागा
होकर रह गया हूँ। हाय! पैसा प्राप्त करने में सब लोग फँस गये, यह बात कंजूस ब्राह्मण स्वयं बता रहा है।
कस्मात् संक्लिश्यते विद्वान् व्यर्थयार्थेहयासकृत्।
कस्यचिन्मायया नूनं लोकोऽयं सुविमोहितः॥ २६॥
ऐसे द्रव्यलोभ के सम्बन्ध में अज्ञानी लोगों की दशा का क्या वर्णन किया जाय? जो अर्थ को अनर्थकारी
कहते हैं, वे भी द्रव्यलोभी हो जाते हैं इस भ्रम में जो ज्ञाता रहते हैं, वे भी द्रव्य प्राप्त करने के लिये अच्छे-बुरे प्रयास
स्वयं करते रहते हैं इसे याद रखो। ज्ञाताओं के भ्रम के कारण, पूर्णरूप से ईश्वर की माया ही है। अघटित घटना
जिसका लक्षण है उस माया के मोह में सज्ञान धनिक फँस गये। विद्वान लोग कृष्ण की माया में मुग्ध हो गये ऐसा
कहोगे तो यह वस्तुस्थिति का वर्णन नहीं है। वास्तव में वे अपने सुख और विलास के लिये धन कमाते हैं। लेकिन
जो लोग कहते हैं कि विषयोपभोग में सुख है, वे निहायत मूर्ख हैं। यही बात कंजूस ब्राह्मण बता रहे हैं।
किं धनैर्धनदैर्वा किं कामैर्वा कामदैरूत।
मृत्युना ग्रस्यमानस्य कर्मभिर्वोत जन्मदैः॥ २७॥
हाय, हाय! जरा देखिये। सभी वर्गों में पूज्य वह ब्राह्मण भी माया के मोह में फँस जाता है। लेकिन जो देह
नाना प्रकार के उपभोगों से सजाया जाता है, वही नश्वर है। जिस देह को नाना प्रकार के उपभोग लेने हैं उसे
क्षयरोग हो जाता है और अधिक धन प्राप्त करना ही दारिद्र्य का मार्ग है। द्रव्य अनायास मिलता है, इसलिये
श्रीमान् गृहस्थ उसकी उपासना करता है। लेकिन अत्यन्त कष्ट से द्रव्य प्राप्त कर कामवासना का उपभोग लेने में
क्या सचमुच सुख है? कामसुख स्त्री की संगत में लिया जाता है इसलिये वह स्त्री को पालता-पोसता है। लेकिन
वह स्त्री नाना प्रकार से उसका छल करने लगती है और किसी तरह नहीं छूटती है। स्त्री, पुत्र, कामभोग आदि से
देह को सुख दें तो वह देह ही मृत्यु की ओर अग्रसर है। उसका पीछा काल कर रहा है। हर पल काल आयु को
कम करता रहता है। ऐसी स्थिति में सुख की मिठास भी क्या है? लेकिन द्रव्य की इच्छा ने ज्ञाताओं को भी
पागल बना दिया। मेंढ़क साँप के मुँह में जा रहा है, फिर भी वह मछली खाता रहता है और इससे उसका साँप
के मुँह से छुटकारा होता है, उसी प्रकार नाना प्रकार के भोग भोगने से मृत्यु पीछे नहीं हटता। यह सब जानकर
भी ज्ञानी लोग द्रव्य के पीछे अन्धे हो जाते हैं। जो स्वयं कर्त्ता है, उसी के पीछे मृत्यु लगा हुआ है। उसका
समाधान किस भोग से हो पायेगा? यह केवल माया का भ्रम है। उस भ्रम से बड़े-बड़े सिद्ध भी भ्रमित हो गये
हैं। द्रव्य के योग ने यज्ञायाग कर स्वर्गलोक प्राप्त होगा, लेकिन वह स्वर्गभोग भी दुःखदायी है। कर्म से अज्ञानी
बने हुए लोगों का उस भोग का क्षय होने के बाद अधःपतन होता है या, भोग भेजने के लिये सकाम कर्म करो तो
पुनः मरण और पुनः जन्म यही अखण्ड भोगना पड़ता है। द्रव्यलोभी का यह बहुत बड़ा दुःख है, उसे सुख है ही
नहीं। मैं भी ऐसा ही मूर्ख था। लेकिन सौभाग्य से मेरा द्रव्य चला गया।

तेईसवाँ अध्याय ६१९
नूनं मे भगवांस्तुष्टः सर्वदेवमयो हरिः।
येन नोतो दशामेतां निर्वेदश्चात्मनः प्लवः ॥ २८ ॥
पहले मैं बहुत अभागा था लेकिन अब बहुत भाग्यवान हो गया हूँ। मुझ पर श्रीकृष्ण प्रसन्न हो गये, मुझे
विवेक और वैराग्य प्राप्त हो गया। मैंने एकत्र किया हुआ धन ही मेरा एकमात्र अज्ञान था। उसे पूरी तरह नष्ट कर
श्रीहरि ने मुझ पर बहुत बड़ी कृपा की है। वह भक्तों का अज्ञान हरण करता है इसीलिये उसका नाम श्रीहरि है।
उसने ही मुझ पर पूर्ण कृपा कर मेरे अंतःकरण में विवेक उत्पन्न किया। वैराग्य विवेक के बिना अन्धा रहता है
और विवेक वैराग्य के बिना लंगड़ा रहता है। मैंने अपने हृदय में ये दोनों एक ही साथ उत्पन्न किये। श्रीहरि ने
कृपा की और द्रव्य के साथ मेरा अज्ञान हरण किया और वैराग्य और विवेक इन दोनों को मेरे हृदय मन्दिर में
प्रकाशित किया। लेकिन कब, कहाँ और किस प्रसंग में श्रीहरि ऐसी कृपा करते हैं, यह किसी को नहीं मालूम
होता। भक्तों का चित्त हरण करने के लिये श्रीहरि पहले उनका द्रव्य हरण करता है और द्रव्यनाश से उनका चित्त
शुद्ध कर उन्हें विवेक युक्त वैराग्य प्रदान करता है। इस प्रकार के लेनदेन की कला ब्रह्मादिकों के लिये भी अतर्क्य
है, ऐसा समझ लो। इसलिये वह भगवंत-पूर्ण भाग्यवान है। छह गुण उसके वश में रहते हैं। उसका स्वरूप
अचिंत्य और अनंत है। लेकिन मेरे लिये वह कृपालु बन गया और मेरे लिये मेरे पाप द्रव्य के साथ नष्ट कर
ज्ञानदीप जलाया। भगवान की कृपा हुई यह सच है, लेकिन मैंने यज्ञदेवताओं को फँसाया है, वे नाराज हो जाएँ
तो मुझ पर आघात करेंगे ऐसा कहें तो वह कभी नहीं होगा। हाथ में देदीप्यमान चक्र धारण करने वाला श्रीहरि
जिसका रखवाला है उसके पास विघ्न की हवा भी नहीं आ पायेगी। भगवान उसका वंदन करेंगे। भगवान ने ही
प्रह्लाद को वन्दन कर नृसिंह को शान्त कराया। वह नरहरि ही जिसका रखवाला है, उसके पास विघ्न कैसे
आयेगा। उसने कोटि-कोटि देवताओं को क्षणमात्र में बंदिवास से छुड़ाया है, उसके भक्त का बाल यज्ञादि
देवतागण कैसे टेढ़ा कर पायेंगे? जो समस्त देवताओं का नियामक है जिसके चरण देवतागण भी वंदन करते हैं,
वह भगवान ही जब सहायक है तो उसे विघ्नों की कोई पीड़ा नहीं होगी। जिसके बल से देवता इतने महान हुए
हैं, देवता ही जिसके अवयव हैं, वह श्रीहरि ही जब प्रसन्न हो जाय तो किस विघ्न का वहाँ आना सम्भव है?
श्रीहरि सर्वदेवस्वरूप ही हैं। इन्द्र और चन्द्र मेरे श्रीहरि ही हैं। मुझ दीन पर संसार में कोई विघ्न नहीं आयेगा।
भगवान की इस कृपा का कारण यदि देखा जाय तो मैंने तो कोई साधन नहीं किया। समझ लो कि यह मेरा
पूर्वजन्मों का ऋण भगवान के पास सुरक्षित था। पहले किस जन्म में, किस देश में, किस तीर्थक्षेत्र में, किस वंश
में, मैंने सत्कर्म किया था कि जिसके योग से परमेश्वर मुझ पर प्रसन्न हुआ? या मुझे दुःखी देखकर कृपासागर
श्रीहरि मुझ पर सन्तुष्ट हुए और मुझ पर कृपा की जिससे मैं विवेकसम्पन्न हो गया। जरा देखिये! मुझे दुःख हुआ
जिससे मुझे आत्मसुख का लाभ हुआ। इस संसार सागर को पार करने के लिये वैराग्ययुक्त विवेक यही मजबूत
जहाज है। इस प्रकार वह ब्राह्मण हर्ष से बोला— अब शेष जीवन में मैं एक क्षण भी व्यर्थ नहीं जाने दूँगा। सुख-
दुःखों का निर्मूलन कर डालूँगा।
सोऽहं कालावशेषेण शोषयिष्येऽङ्गमात्मनः।
अप्रमत्तोऽखिलस्वार्थे यदि स्यात् सिद्ध आत्मनि ॥ २९ ॥
संसारभय की किसे परवाह है? कोटि-कोटि जन्मों का बदला लूँगा। जो जीवन व्यर्थ गया है उसकी इसी
देह से पूर्ति करूँगा। शरीर अवश्य वृद्ध हो गया है लेकिन मेरा अंतःकरण वृद्ध नहीं हुआ है। इसलिये इसी

६२० श्रीमद् एकनाथी भागवत
अंतःकरण से भगवान का चिन्तन कर संसार बन्धन तोड़ डालूँगा। अब शेष जीवन में कलिकाल के दाँत तोड़
डालूँगा। गर्भवास के दुःख की परत फाड़ कर मृत्यु को मार डालूँगा। जिस देह ने सच्चे, झूठे सभी कर्मों का
आचरण किया, उस देह को ही यहाँ विदेह स्थिति की आत्मभावना से सुखा डालूँगा। आत्मज्ञान का प्रहार कर
देह की बाड़ ही तोड़ डालूँगा और सुख-दुःख का बन्धन तोड़ कर सायुज्य की पताका फहराऊँगा। आज मैं
वैराग्य और विवेक से युक्त होकर अपने स्वार्थ के प्रति सचेत हो गया हूँ। अब मैं जिस परमार्थ को भी साधने का
प्रयास करूँगा, वह मुझे प्राप्त होगा। मेरा ही स्वार्थ सधेगा ऐसा कोई विशेष नियम नहीं है। तो जो भी कोई
वैराग्य विवेक होगा उसे अपने आप ही परमार्थ प्राप्त होने वाला है। वैराग्य विवेक का यही लक्षण है कि देह,
घर, स्त्रियाँ आदि वैभव के होते हुए उसका मन उनमें आसक्त नहीं होता। इसी का नाम है पूर्ण वैराग्य। अस्तु!
मैंने जिस बात की शुरुआत की है उसे देव और देवी इनके साथ पूरे समुदाय के साथ देवाधिदेव मुझे सहायक हों
ऐसी मैं प्रार्थना करता हूँ।
तत्र मामनुमोदेरन् देवास्त्रिभुवनेश्वरः।
मुहूर्तेन ब्रह्मलोकं खट्वाङ्गः समसाधयत्॥ ३०॥
इन्द्रियों में अधिष्ठित समस्त देवताएँ मुझे सहायक हों। परमार्थ सिद्धि तक पहुँचने में वे मेरे इन्द्रियों को
विजय प्रदान करें। जो त्रिभुवनेश्वर के नाम से प्रसिद्ध है वह भगवान यदि सहायक हो तो सारे देवता मुझे साध्य
होंगे क्योंकि वे सारे श्रीहरि के स्वरूप में ही अंतर्भूत हैं। सारे देवताओं में श्रीहरि का ही स्वरूप है ऐसी भावना
मन में रखकर मैं सारे देवताओं की सेवा करता हूँ। मुझ दीन का उद्धार करने में सहायक होकर वे मुझे भवसागर
से तारें। इस पर आप शायद कहेंगे कि "तुम्हारे जीवन का अब अन्तिम काल आया है। तुम वयोवृद्ध हो गये हो।
अब वृद्धावस्था में यह प्रयास करने का कष्ट क्यों कर रहे हो?" लेकिन ऐसा विचार मन में न आने दें। खटाङ्ग
राजा का नाम प्रसिद्ध ही है। उसने क्षणमात्र में परमार्थ साधा। मेरी आयु तो उससे अधिक ही होगी। सारे देवता
मुझे सहायक हों तो मैं क्षणमात्र में परमार्थ साध लूँगा। आज जैसा विवेक वैराग्य प्राप्त हुआ है, वही जब तक
अटल रहेगा, तब तक दोबारा कलिकाल क्या करेगा? मैं तो संसार पर विजय प्राप्त कर लूँगा। यह पहले कैसा
था? अब इसकी वृत्ति में परिवर्तन हो गया। वह विवेक वैराग्ययुक्त हो गया। श्रीकृष्ण यह बात आश्चर्यपूर्वक
वर्णन करते हैं।
श्रीभगवानुवाच
इत्यभिप्रेत्य मनसा ह्यावन्त्यो द्विजसत्तमः।
उन्मुच्य हृदयग्रन्थीन् शान्तोभिक्षुरभून्मुनिः॥ ३१॥
ऐसा वह अवंती का ब्राह्मण अत्यन्त कृपण था। लेकिन उसके हाथ से द्रव्य निकल जाते ही उसका स्वभाव
बदल गया और उसे वैराग्यलक्षण प्राप्त हो गया। इसलिये मन में वैराग्य विवेक उत्पन्न होने पर उसे अपने आप
ही ब्रह्मप्राप्ति होती है। आत्मस्वरूप की स्थिति साध्य करने के लिये श्रीकृष्ण उद्धव को बताते हैं। वह पहले
अधम ब्राह्मण था। वह द्रव्यलोभी था तथा निंद्यकर्म करता था। लेकिन विवेक से वह परम वैरागशाली उत्तम
ब्राह्मण बन गया। मैंने पहले किया हुआ निश्चय पूरी तरह साध्य करूँगा, ऐसे उल्हास से वह अपने परमार्थ का
साधक बना। अपने दुःख का कारण मैं स्वयं ही बना। काम, लोभ और द्रव्य का अभिमान करने के कारण मुझे
स्वयं ही अत्यन्त दुःख भोगना पड़ा। द्रव्य ही मुझे दुःख दे गया इसलिये द्रव्य ही दुःखों का घर है। पत्नी और

तेईसवाँ अध्याय ६२१
बच्चों का मोह मैंने ही किया था लेकिन देखो, उन्होंने ही मुझे घर से बाहर निकाला। जाति का अभिमान करूँ तो
मैं अपने जाति भाइयों से भी दूर हो गया। मेरे सगे-सम्बन्धी भी मुझसे विमुख हो गये। इसलिये उनका भी लोभ
मैं क्यों करूँ? पत्नी, बच्चे, सगे-संबंधी, धन आदि के लोभ का मुख्य कारण मुझे हुआ मेरा देहाभिमान ही है।
उस देहाभिमान को ही मैं अब साष्टांग नमस्कार करता हूँ। पत्नी, बच्चे और द्रव्य को नमस्कार करता हूँ। जाति
भाइयों और सगे-संबंधियों को नमस्कार करता हूँ। अब मेरा आप से कोई संबंध नहीं रहा। पानी और उसमें
प्रतिबिम्बित होने वाला चन्द्रमा ये दोनों एक साथ रहते दिखायी देते हैं, लेकिन चन्द्रमा पानी से बिलकुल अलग
रहता है। उसी प्रकार तुमसे अब मेरा कोई संबंध नहीं है। जिस प्रकार छाया दिन-रात लगी रहती है, फिर भी
पदार्थ छाया से चिपक कर नहीं रहता, उसी प्रकार मेरा आपसे कोई संबंध नहीं है अथवा जिस प्रकार देह के
पास यौवन आता है और उस यौवन से देह खिल उठता है, लेकिन अन्त में यौवन देह को छोड़कर चला जाता
है, उसी प्रकार मैंने आपका त्याग किया है। वन में बसन्त ऋतु का प्रवेश होने पर वनश्री की शोभा निखर उठती
है। लेकिन जब वसन्त अपना काल समाप्त होते ही वन को छोड़कर चला जाता है, उसी प्रकार मैं ममता का
अहंकार छोड़ रहा हूँ। वैराग्य के साथ विवेक का सामर्थ्य आश्चर्यजनक है। उसने मुझसे कैसा अलौकिक त्याग
कराया इससे मैंने देहाभिमान और ममता को तिलांजलि दे दी। जिस प्रकार पिता अपने भ्रष्ट पुत्र से सम्बन्ध
विच्छेद कर देता है, उसी प्रकार देहाभिमान त्याग कर वह संन्यासी बन गया। फल जब पक जाता है तो वह
अपने पूर्वदेह का त्याग करता है, डंठल भी फल को पकड़कर नहीं रखता और फल भी डंठल से चिपका नहीं
रहता, उसीप्रकार यह अहंता के पास नहीं रहता और अहंता भी इसके पास नहीं आती। यह भी सद्भावना से
देहाभिमान का स्पर्श नहीं करता। जिस प्रकार पानी में रहते हुए भी कमलपत्र उससे अलिप्त रहता है, उसी प्रकार
देहाभिमान का स्पर्श किये बिना उसने विधिपूर्वक संन्यास ग्रहण किया। अन्य संन्यासी होम करते हैं और क्रोध
और काम को जलाने की बात करते हैं लेकिन अंत में तिल और घी का तो भस्म हो जाता है और काम-क्रोध
जैसे के तैसे रह जाते हैं। इसका होम उस प्रकार का नहीं था। उसने विकल्प की वृत्तियाँ जला डाली थीं और
अहंकार के साथ कामक्रोध की पूर्णाहुति कर दी थी। अपने मूल स्वभाव का होम कर वह त्रिदंडी स्वामी हो गया
और गुरु से आज्ञा लेकर सुखपूर्वक विचरण करने लगा।
स चचार महीमेतां संयतात्मेन्द्रियानिलः ।
भिक्षार्थं नगरग्रामानसङ्गोऽलक्षितोऽविशत् ॥ ३२॥
मन और प्राण को जीत कर, मानाभिमान छोड़कर परमानन्द से परिपूर्ण होकर वह पृथ्‍वी पर संचार करने
लगा। देह की संगति जिसे नहीं भाती, उसे साथ में किसी को रखना कैसे अच्छा लगेगा? वह आत्मज्ञान से
आत्मास्वरूप में मग्न होकर पृथ्‍वी पर अकेला ही घूम रहा था। निरन्तर अरण्य में रहता था। भिक्षा के लिये
अवश्य गाँव में आता था और जहाँ बाजार लगता था ऐसी शहर या गाँव से जो भी भिक्षा मिलती थी, उसे ग्रहण
करता था। मैं भिक्षा के लिये आने वाला हूँ, ऐसा कोई नियम वह नहीं बनाता था। गाँव में बिना किसी के देखे
चला जाता था और हाथ में जो भी आ जाये उसमें संतोष मानता था। पाँच सात घरों में जाकर भिक्षा माँगने का
उसने कोई नियम नहीं बनाया था। किसी भी बात का थोड़ा भी अहंकार उसके मन में नहीं था।
तं वै प्रवयसं भिक्षुमवधूतमसज्जनाः ।
दृष्ट्वा पर्यभवन् भद्र बह्वीभिः परिभूतिभिः ॥ ३३ ॥

६२२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
शरीर पर का मल भी कभी साफ नहीं करता था। मूसल की तरह स्नान करता था इसलिये उसका रंग भी
राख जैसा हो गया था। इसलिये उसे अवधूत कहते थे। इस प्रकार पृथ्वी पर संचार करते-करते वह अकस्मात
अवंती नगरी में आया। तो अत्यन्त वृद्ध संन्यासी हुए अवधूत वेष में लोगों ने उसे देखा। संन्यास लेने के बाद
एक बार मातृभूमि का दर्शन करने की पद्धति के बारे में बड़े-बड़े आचार्यों ने लिख रखा है। उसे देखते ही उस
गाँव के लोग कहने लगे, "अरे! यह तो कदर्यु ब्राह्मण है। इसका धन चला गया इसलिये अब संन्यासी बन गया
है।" यह सुनाते ही दुष्ट लोग उसके पास एकत्र होने लगे और उन्होंने एक-दूसरे को इशारा कर उसका छल
प्रारम्भ कर दिया। लेकिन कष्ट सहकर भी उसके चित्त में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। वह बिलकुल नाराज नहीं
हुआ। वह इतना अधिक विवेकी और धैर्यवान हो गया था। लोगों ने उसे दिये हुए कष्टों का वर्णन और उसकी
सहनशीलता के बारे में मैं तुम्हें अब बताऊँगा। ध्यान देकर सुनो। उसके तात्पर्य पर ध्यान देने से श्रोतागण विवेक
से चतुर बनेंगे और जो इसके अर्थ पर भक्ति करेगा, उसी सच्ची शान्ति प्राप्त होगी। हे विवेकयुक्त चित्तचकोर के
चंद्र! भगवद्भक्त के भाग्य से शुद्धस्वरूपा! हे शान्ति सौभाग्य के राजा! हे भाग्यवान उद्धव! सुनो। आत्मशान्ति
प्राप्त करने के लिये कृष्ण उद्धव की पुकार करने लगे और उसे स्वस्थचित्त कर बोले, शान्ति का स्वरूप ऐसा है।
कोई जीवन क्रम में बाधा लाये, सम्मान के बहाने अपमान करे तो भी जो नाराज नहीं होता, उसके ही पास शान्ति
रहती है। उसके बारे में सुनो।
केचित्त्रिवेणुं जगृहुरेके पात्रं कमण्डलुम्।
पीठं चैकेऽक्षसूत्रं च कन्थां चीराणि केचन॥ ३४॥
उन दुष्टों ने संन्यासी को घेर लिया और छलने के लिये उसके चरणों पर मस्तक रखने लगे। उद्देश्य यही
था कि पैरों पर मस्तक रखकर नमस्कार करने लगे सब लोग उसे छू लेंगे। किसी ने कहा- "यह बूढ़ा संन्यासी
है।" किसी ने कहा, "क्या उम्र है आपकी?" किसी ने पूछा, "आप किस सम्प्रदाय के हैं? किस गुरु ने
आपका मुण्डन किया?" किसी ने इशारा किया, "यह किस गाँव का है, यह पूछिये।" कोई बोला, "अरे, यह
पूछिये कि इसके पास कितना धन है?" किसी ने पूछा, "स्वामीजी! आप किस गाँव के हैं? आप व्यापारी हैं या
उद्यमी हैं?" कोई बोला, "इसके पास थोड़ा पैसा है। अब यह द्रव्यहीन हो गया है। इसे कष्ट न दें। वह पूर्ण
विरक्त संन्यासी है।" इस प्रकार उस पर नाना प्रकार की व्यंगोक्तियाँ कसने पर भी उस संन्यासी को जरा भी कष्ट
नहीं हुआ। मुँह से एक भी शब्द निकालने के बजाय उसने मौन रखा। किसी ने कहा, "यह त्रिदण्डी संन्यासी
मालूम होता है। उस त्रिदण्ड का कारण यह है कि यह पहले अत्यन्त धनसम्पन्न था, उसने सारा धन इस दण्ड में
भरकर रखा होगा। यही त्रिदण्ड का रहस्य है।" किसी ने कहा, "देखिये, इसने कितनी बड़ी कथरी तैयार की
है। उसमें ठूँस कर धन भरा हुआ है। उसके मुँह की ओर क्यों देख रहे हैं? इसने पूरा पाखण्ड मचा रखा है।"
इस प्रकार जब उसकी निन्दा चल रही थी, तभी किसी ने उसका दण्ड छीन लिया। किसी ने कमण्डल गायब
किया, तो किसी ने आसन पर हाथ साफ किया। एक ने रुद्राक्ष की माला गायब की और एक ने तो काषायवस्त्र
ही छीन लिया। एक ने कहा, "यह मेरा कर्जदार है। अच्छा हुआ यहाँ मिल गया।" यह कहकर उसने उसकी
कथरी में हाथ डाल और साथ ही लंगोटी भी ले ली। वे दुर्जन इस प्रकार उसका छल कर रहे थे तो भी उसका
मन विचलित नहीं हुआ। उसका धैर्य क्षमा से परिपूर्ण था। उसने मन ही मन कहा, "आना और जाना दोनों
प्रारब्ध के अधीन है।" इसलिये अपनी चीजें वापस माँगने के बजाए, वह संन्यासी आगे बढ़ गया। उसे जाता

तेईसवाँ अध्याय ६२३
देख उन दुष्टों का जो प्रमुख नेता था उसने संन्यासी को साष्टांग नमस्कार किया और अत्यन्त नम्र होकर उसकी
विनती करने लगे। उन्होंने कहा, "हर हर ! हमारे हाथ से बहुत बड़ा अपराध हुआ। ये दुष्ट लड़के उन्मत्त हो गये
हैं। योग्य और अयोग्य का विचार ही नहीं करते। स्वामी महाराज ! मन में किसी प्रकार का राग द्वेष न रखें।
कृपया अपने वस्त्र वापस ले लें।" इस प्रकार उसके चरणों पर गिर कर उसका पुनः छल करने के लिये उसे
वापस लाये।
प्रदाय च पुनस्तानी दर्शितान्याददुर्मुनेः ।
इस प्रकार संन्यासी को वापस लाकर उसके सामने सभ्यतापूर्वक दण्ड कमल लाकर रख दिया। कोई वस्त्र
लाने लगा तो कोई उसे छीनकर भागने लगा। कोई बोला, "यह संन्यासी बूढ़ा है। इसे उसके वस्त्र वापस
दीजिये।" तो कोई बोला, "इस बदमाश की पिटाई करने से हमें बहुत पुण्य लगने वाला है।" आखिर उसका
तिरस्कार कर किसी ने उसे वस्त्र वापस नहीं किये। तब वह संन्यासी स्वस्थ अन्तःकरण से वहाँ से चला गया।
तभी किसी ने आकर उसे कपड़े वापस किये और जाने के लिये कहा। इतने में एक आदमी दौड़ता हुआ आया
और उस संन्यासी के सिर पर जोर की चपत लगाकर तथा उसके कपड़े छीन कर चला गया। कोई बोला, "अब
दे भी दो। उस बूढ़े को अधिक न सताओ।" बाद में वह संन्यासी स्वयं ही अपने वस्त्र वहाँ छोड़कर, स्नान
संध्या तथा भिक्षा माँगने के लिये चला गया।
अन्नं च भैक्ष्यसम्पन्नं भुञ्जानस्य सरित्तटे ॥ ३५ ॥
मूत्रयन्ति च पापिष्ठाः ष्ठीवन्त्यस्य च मूर्धनि ।
यतवाचं वचयन्ति ताडयन्ति न वक्ति चेत् ॥ ३६ ॥
भिक्षा माँगने के बाद शास्त्रोक्त ढंग से उसके भाग करने के बाद, नदी के किनारे बैठ कर वह संन्यासी
भोजन कर रहा था यह देखकर आवारा लोग वहाँ इकट्ठा हो गये और बोले, "अरे! यह तो संन्यासी नहीं है।
हमारे गाँव में जो कृपण ब्राह्मण था, वह यही है। यह मुँह से 'हाँ' या 'ना' नहीं कहता। यह धोखाधड़ी की बात
है। इसलिये जो इसके मुँह से बिना कुछ उगलवाये जायेगा वह इसकी ही दासी का पुत्र कहलायेगा।" ऐसी
शपथ लेकर वे सब एकत्र होकर उसके पास आये। उनमें से एक ने कहा, "इसका मौन मैं क्षण भर में समाप्त
कर दूँगा। मैं उसका उपाय जानता हूँ।" इतना कह कर उस दुष्ट और महापातकी मनुष्य ने भोजन कर रहे
संन्यासी के मस्तक पर मूत दिया। फिर भी उस संन्यासी के मन में क्रोध नहीं हुआ। वह आत्मज्ञान से शांत रहा।
भले ही मन में क्रोध आया हो, लेकिन वह मनुष्य शांतिरहित हो ही गया। वह क्रोध के शब्द नहीं बोल रहा
इसका कारण यही है कि वह लोकलज्जा के लिये अथवा पेट के कारण डर गया। लेकिन वह संन्यासी वैसा नहीं
था। अपनी लज्जा उसने धोकर नष्ट कर डाली थी। आत्मशान्ति का स्वरूप कैसा होता है ? क्रोध मन में भी नहीं
आता। भीतर एक और बाहर कुछ दूसरा इसी का नाम है 'दांभिकता'। लेकिन यह वैसा संन्यासी नहीं है। यह
आत्मशांति से अंतर्बाह्य बिलकुल निर्मल था। तब वे आवारा किस्म के लोग कहने लगे, "अरे ! यह सचमुच ही
नहीं बोलता।" यह कहकर वे उसके सामने खड़े हो गये और उसके मुँह पर थूका। अत्यन्त दुःख देकर उसकी
बहुत निंदा करने लगे। कोई लात मारने लगा, कोई मस्तक पर प्रहार करने लगा और कोई कहने लगा कि "यदि
यह न बोले तो इसे छोड़िये मत।"

६२४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
तर्जयन्त्यपरे वाग्भिः स्तेनोऽयमिति वादिनः।
बध्नन्ति रज्ज्वा तं केचिद् बध्यतां बध्यतामिति ॥ ३७ ॥
कोई दूर से वाग्बाण छोड़ने लगा। बोला, "इसके इस वेष का कारण हमने अच्छी तरह जान लिया है।
इसके वेष का मर्म यही है कि यह एक बड़ा ठग, नीच और बड़ा ढोंगी है, भिक्षा माँगने के भेष में यह जासूस
घर-घर घूम रहा है। इस चोर को पकड़िये। " इन निंदास्पद भाषण के साथ वे सब जोर-जोर से चिल्लाने लगे।
कुछ लोग उसे नीचे गिरा कर रस्सी से बाँधने लगे।
क्षिपन्त्येकेऽवजानन्त एष धर्मध्वजः शठः।
क्षीणवित्त इमां वृत्तिमग्रहीत् स्वजनोज्झितः ॥ ३८ ॥
उसकी पहले की स्थिति जो जानते थे, वे उसका अपमान कर उसकी निन्दा करने लगे। वे बोले, "पहले
यह कदर्यू नाम से प्रसिद्ध था और आज यह हमारे सामने संन्यासी का भेष बनाकर घूम रहा है। इसने शुभ-
अशुभ कर्मों से द्रव्य एकत्र किया और अधर्म के कारण वह द्रव्य नष्ट हो गया। इसलिये स्वजनों ने इसे घर से
बाहर निकाल दिया। इस पेट के लिये अन्न मिलना मुश्किल हो गया इसलिये यह कपटी भेष बदल कर संन्यासी
बन गया है। हमारे सामने अपनी प्रतिष्ठा का प्रदर्शन करने में इसे लज्जा नहीं आती। पहले से ही यह धोखेबाज
था और अब ढोंगी संन्यासी बन गया है। यह सोचता था कि ये लोग भोले-भाले हैं, इन्हें कुछ मालूम नहीं है।
अब इस महाठग ने मौन धारण कर लिया है। जिस प्रकार बहुरूपिया स्वांग रचते हैं, उसी प्रकार यह उत्तम वेष में
संन्यासी बनकर हमें धोखा देने आया है। इसे मारने से दोष नहीं लगेगा।"
अहो एष महासारो धृतिमान् गिरिराडिव।
मौनेन सधयत्यर्थं बकवद् दृढनिश्चयः॥ ३९ ॥
यह प्रबल ढोंगी है। अपना स्वांग अच्छी तरह निभाता है। जिस प्रकार तूफान में महामेरू अडिग रहता है,
उसी प्रकार हमारे कष्ट देने से वह विचलित नहीं होता। अन्न और वस्त्र प्राप्त करने के लिये ही इसने धैर्य कायम
रखा है। स्वार्थ पर दृष्टि रख कर ही इसने बगुले की तरह मौनव्रत धारण किया है। मछली निकलने के लिये
जिस प्रकार बगुला मौन धारण करता है, उसी प्रकार इसका ध्यान अपने लक्ष्य पर रहता है। यह भोले भोले लोगों
को लूटेगा। अब द्रव्यलोभ के लिये यह पुराने कष्टों का ख्याल नहीं करता। उसकी यह आदत अब दृढ़ हो गयी
है। किसी ने कहा, "कैसा धैर्यवान है!" और इतना कहकर उसे लतियाने लगे। कोई उसके कान में सींक
घुसेड़ने लगा और बोला, "अब देखें इसकी शान्ति।" फिर भी उसके मन में द्वेष नहीं उत्पन्न हुआ। उसकी
शान्ति अटल थी। उसकी शान्ति की परीक्षा लेते-लेते वे दुष्ट लोग और भी अधिक क्रुद्ध हो गये और उसे नाना
प्रकार के कष्ट देने लगे। श्रीकृष्ण यही वर्णन करते हैं।
इत्येके विहसन्त्येनमेके दुर्वातयन्ति च।
तं बबन्धुर्निरुरुधुर्यथा क्रीडनकं द्विजम् ॥ ४० ॥
कोई उसकी खिल्ली उड़ाने लगा, कदर्यू को तो पूर्ण शान्ति प्राप्त हो गयी। किसी ने उसके नाक पर चूना
लगाया, किसी ने तो उसके मुँह में काजल पोत दिया। कुछ तो और भी निर्लज्ज थे। वे उसके सामने पीठ करके
खड़े हो गये और अपानवायु छोड़ने लगे। वह दुर्गन्ध उसके नाक और मुँह में भर गयी। फिर भी उसकी

तेईसवाँ अध्याय ६२५
आत्मरूप स्थिति के कारण उसके चित्त में जरा भी क्षोभ नहीं हुआ। क्रोध लाने का प्रयत्न करने पर भी जिस की
शान्ति नहीं ढलती वही त्रिभुवन में संन्यासी है। सारांश, उसका मन क्षुब्ध नहीं हो रहा है यह देखकर दुष्ट लोग
और भी अधिक तैश में आ गये। उन्होंने उस संन्यासी के गले में लोहे का सिक्कड़ बाँध दिया और उसे चौरस्ते
पर ले आये। "अरे! आप में से कोई तो इसे पहचानो। जो निंद्य कर्म किया करता था वही यह द्रव्यलोभी है।
उसे हमने आज पकड़ लिया। यह अत्यन्त अधर्मी और ढोंगी है। जिस प्रकार मदारी बन्दर को बाँध कर रखता है
उसी प्रकार उन्होंने संन्यासी को बाँध कर रखा था और फिर सब मिलकर उसे आगे-पीछे खींचने लगे। कोई पूर्व
की ओर खींच रहा था तो कोई पश्चिम की ओर। इसमें सबको संतोष प्राप्त हो रहा है यह देखकर संन्यासी भी
मन ही मन हँसने लगा। देह प्रारब्ध भोग रहा है। मेरा उससे क्या सम्बन्ध है ? इस विवेक से वह क्षमा से परिपूर्ण
हो गया था। वह किसी का मन दुखा नहीं रहा था। जिन्होंने कभी उसका सम्मान किया था उन भाईयों, रिश्ते नाते
वालों के सामने वह अपमान सहन कर रहा था। उद्धव! जिसका मन लौकिक प्रतिष्ठा के कारण लज्जित होता है
उसके मन में शान्ति नहीं रहती। जरा देखो! जिसे इतना कष्ट दिया उसके मन में क्रोध नहीं आया। उस संन्यास
का हृद्गत देवाधिदेव स्वयं बता रहे हैं।"
एवं स भौतिकं दुःखं दैविकं दैहिकं च यत्।
भोक्तव्यमात्मना दिष्टं प्राप्तं प्राप्तमबुध्यत ॥ ४१ ॥
भिक्षु ने अपना विचार बतलाया। उसने कहा, सारे लोग तीन प्रकार के प्रारब्ध से बँधे हुए हैं। इसलिये उन्हें
भोगना आवश्यक है। राजा और रंक भी उससे नहीं छूट पाते। पंचमहाभूतों से होने वाली पीड़ा 'भौतिक' होती
है। देवताओं से होने वाली पीड़ा 'दैविक' होती है और देह में ही ज्वर आदि होने वाली पीड़ा 'दैहिक' होती है।
इस प्रकार यह जो तीन प्रकार का दुःख है वह प्रारब्ध से उत्पन्न होता है। उसको भोगते समय जो कष्ट का
अनुभव करता है वह मंदबुद्धि और मूर्ख है। प्रारब्ध से हमारे भाग्य में जो भोग आये हैं, वे हरिहर को वश में
करने पर भी भोगने ही पड़ते हैं, उससे प्राणी बच नहीं पाता यह जानकर ही वह संन्यासी क्षमाशील हो गया था।
श्रीकृष्ण पाण्डवों की सहायता कर रहा था, फिर भी उन्हें भोग भोगने ही पड़े। ऐसे में विष्णु और शंकर इन दोनों
को वश में कर लेने पर भी, प्रारब्ध से कोई नहीं बच पाता।
परिभूत इमां गाथामगायत् नराधमैः।
पातयद्भिःस्वधर्मस्थोधृतिमास्थायसात्त्विकीम् ॥ ४२ ॥
दुष्ट लोगों के उपद्रव से भी वह संन्यासी शान्ति नहीं छोड़ रहा था। सात्त्विक धैर्य धारण करने के कारण
उसकी धर्मस्थिति ढली ही नहीं। उस भिक्षु ने जिस गाथा का गायन किया, उसे मैं अब सुनाऊँगा। उद्धव! चित्त
को अत्यन्त सावधान रखकर श्रवण करो। वह उपदेश मन में धारण करने से मन में द्वंद्व की समता दिखायी देने
लगती है, आत्मशान्ति सहज प्रकट होती है और सायुज्यमुक्ति घर में प्रवेश करती है। जिसे श्रीकृष्ण ने स्वस्थचित्त
किया उस उद्धव का भाग्य इस संसार में बहुत बड़ा था। श्रीकृष्ण ने कहा—भिक्षु ने स्वयं जो कहा, उसे सुनो।
द्विज उवाच
नायं जनो मे सुखदुःखहेतुर्न देवतात्मा ग्रहकर्मकालाः।
मनः परं कारणमामनन्ति संसारचक्रं परिवर्तयेद् यत् ॥ ४३ ॥

६२६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
वह भिक्षु बोला, सज्जन, दुर्जन और साधारण ये जो तीन प्रकार के लोग होते हैं, वे मेरे सुख या दुःख के
लिये बिलकुल कारणीभूत नहीं होते। जितने भी प्रकार के लोग हैं वे सब पंचमहाभूतों से ही उत्पन्न हुए हैं। मेरा
भी देह वैसा ही है। इसलिये सारे लोगों में और मुझमें एक प्रकार का ऐक्य है। सुख-दुःख केवल मन में ही
उत्पन्न होता है। सुख-दुःख देने वाले देवता हैं, यदि ऐसा कहा जाय तो देवता मन की कल्पना हैं। अतः उनके
सुख-दुःख का भी मुझ पर कोई प्रभाव नहीं होगा। देवता रूप हमारा मन ही है और उस मन ने ही समस्त
देवताओं की कल्पना की है। अर्थात् देवता जब सुख-दुःख देते हैं तो इसका कारण मन ही रहता है। जैसा मन
का सद्भाव होता है, वहीं उसी के अनुसार उस स्वरूप में देवी या देवता का आभास होता है। जहाँ मन में
अश्रद्धा रहती है वहाँ देव भी नहीं दिखाई देता। इसलिये जो समस्त देवतागण हैं, वे मन से कल्पित ही हैं। अतः
यदि उनसे सुख-दुःख की व्यथा होती है तो वह मन के कारण ही है, यह जान लो और यदि आत्मा का सुख या
दुःख का कारण मान लें तो वह भी गलत है। आत्मा में द्वैत की भावना बिलकुल नहीं होती। मैं सुख-दुःख देने
वाला हूँ और यह सुख-दुःख का भोक्ता है ऐसी भावना आत्मा में नहीं होती। जन्म के समय के क्रूर ग्रह सुख-
दुःख का कारण है ऐसा यदि कहें तो वास्तव में हमारा मन ही सारे ग्रहों का ग्रह है। वह जन्म-मरण का भोग
कराता है। ग्रहों की ग्रहदशा देह रहने तक होती है, लेकिन मन की ग्रहदशा उससे भी अधिक है। वह नाना
प्रकार का भोग कराती है और जन्म जन्मान्तर में भी नहीं छोड़ती। दुष्ट ग्रह थोड़े ही समय के लिये पीड़ा देता है
लेकिन मन की पीड़ा कोटि-कोटि जन्मों तक रहती है। दुष्ट ग्रह अपनी भोगदशा पूरी होने के बाद छोड़ देता है
लेकिन मन कल्पांत में भी नहीं छोड़ता। मन यदि देहाभिमान धारणा न करे तो ग्रहों की पीड़ा की कौन चिन्ता
करता है? इसलिये सुख-दुःख के लिये कारणीभूत होने वाला मन, यही एक महाग्रह है। अब हम अपने कर्म
को ही दुखदायक नहीं कह सकते क्योंकि कर्म ही कर्मबन्धन से छुड़ाता है। वह दुःखदायक कैसे हो सकता है?
अपना कर्म स्वाभाविक और पवित्र होने पर मन ही उसे सकाम बनाता है और उसे अनेक प्रकार के दुःख देकर
उसे अनेक योनियों का भोग भोगने को बाध्य करता है। जब कर्म की क्रिया के सम्बन्ध में मन का संकल्प कर्म
पर लागू नहीं होता तो सुख-दुःख कितने ही क्यों न हो, लेकिन अपना कर्म ही उनका नाश करता है। देह को
सुख-दुःख का क्या ज्ञान होगा? आत्मा तो सुख-दुःख बिलकुल नहीं जानता। इसलिये सुख-दुःखों का खजाना
बनाना और फिर उसे भोगना यह सब मन के आदेश से ही होता है। सुख-दुःख देने वाला काल है यह कहना
भी सर्वथा सच नहीं है। मन का संकल्प जैसा संकेत देता है, उसी प्रकार काल की सत्ता चलती है। अजर-अमर
रहते हुए यदि कोई अपने लिये मृत्यु की कल्पना कर ले तो काल उसके पीछे लग जाता है और क्षण-प्रतिक्षण
उसकी आयु कम करता है। जैसे बिस्तर में कोई सुआ चुभो कर रख दे और रात को सोने पर वह शरीर में घुसते
ही, साँप ने काटा इस भय से मर जाय। वास्तव में साँप ने उसे काटा ही नहीं था फिर उस पर विष का असर
कैसे होगा? वह केवल शंका से ही मर गया। उसी प्रकार काल लोगों के पीछे लगा हुआ है। एक आदमी की
पीठ में साँप ने काट लिया था। उसने अपने मित्र से पूछा, "मेरी पीठ में क्या घुस गया था?" उसने कहा,
"कुछ नहीं। एक काँटा गड़ गया था, जिसे मैंने खींच कर निकाल दिया।" इससे उसे साँप की शंका ही नहीं हुई
और विष की बाधा भी नहीं हुई। बहुत दिनों के बाद जब मित्र ने बताया कि उसे साँप ने ही काटा था और उसे
पीठ पर साँप को काटने का निशान भी दिखाया तो पुरानी याद आते ही तत्काल विष का प्रभाव हो गया और
उसने प्राण त्याग दिये। उसी प्रकार निर्विकल्प पुरुष को संकल्प की शंका होती है, उसी समय उसके विनाश के
लिये काल तैयार हो जाता है। लेकिन जिसका मन निःसंकोच 'मैं अमर हूँ' कहता है, उसका घर काल छोड़ देता

तेईसवाँ अध्याय ६२७
है। मन की शंका से ही काल प्रबल हो उठता है। जो स्वयं निर्विकल्प है, उसके पास काल कभी नहीं आता
क्योंकि उसके पास नश्वर कुछ भी नहीं होता। अतः काल कहाँ जायेगा? इस प्रकार काल सुख-दुःख देने वाला
नहीं है, इसे ध्यान में रखो। सुख-दुःख उत्पन्न करने वाला एक मन ही है, इसे निश्चित जान लो। संसार भी मनः
कल्पित ही है यह समझ लो। मन ने ही जन्म-मरण की कल्पना की है। संसार चक्र में बार-बार जो परिक्रमा
करनी पड़ती है वह भी मन के ही कारण। ये छह प्रकार ही सुख-दुःख का कारण है, ऐसा कुछ लोग कहते हैं।
विचार करने पर यह भी असत्य मालूम होता है क्योंकि सुख-दुःख मन से ही उत्पन्न होते हैं। वह मन कितने
आश्चर्यकारक ढंग से मोहित करने वाला है कि वह 'मैं' का भान उत्पन्न कर तथा शुद्ध ब्रह्मस्वरूप आत्मा की ओर
प्रीति लगाकर सुख-दुःख भोगने को बाध्य करता है। आँख में छोटा-सा भी कण क्यों न चला जाय लेकिन वह
बहुत कष्ट देता है। उसी प्रकार मन भी वासना के बहाने भयंकर सुख-दुःख देता है। अब शायद आप यह कहेंगे
कि अविद्या ही सुख-दुःख देने वाली है। लेकिन अविद्या ब्रह्मस्वरूप होने के कारण, मन के सिवा सुख-दुःख
कभी नहीं होगा। अविद्या ब्रह्मस्वरूप होने के कारण मन सुषुप्ति में लीन रहता है। उस समय तो सुख-दुःख
रहता ही नहीं है। इसलिये किसी को वहाँ भोग दिखायी ही नहीं देता। मन जब निश्चित नहीं रहता तभी देह का
सुख-दुःख हमें नहीं मालूम होता। यह अनुभव हमें स्वयं अपने देह में अनुभव करना चाहिये। इसलिये हमारे
सुख-दुःख का कारण स्वयं हमारा मन ही है। उसी ने जन्म-मरण का चक्र मनुष्य के पीछे लगा दिया है और
मन उसे उस चक्र में घुमाता रहता है। वह कैसे घुमाता है उसी का निरूपण भिक्षु स्वयं सुना रहा है।
मनो गुणान् वै सृजते बलीयस्ततश्च कर्माणि विलक्षणानि।
शुक्लानि कृष्णान्यथ लोहितानि तेभ्यः सवर्णाः सृतयो भवन्ति ॥ ४४ ॥
मन ही अपनी सत्ता से कल्पना कर अनेक प्रकार की वृत्ति उत्पन्न करता है। यही वृत्ति बाद में त्रिगुणात्मक
हो जाती हैं और गुणों के प्रकारों के अनुसार उनकी वृत्ति बनती हैं। उन्हीं सत्त्व, रज, तमादि गुणों से देवता,
मनुष्य और पशु-पक्षी आदि योनि, मन से ही त्रिभुवन की सृष्टि उत्पन्न कर संसार सदन में विचरण करते हैं। उस
मन का सामर्थ्य विचित्र है। वह एक क्षण में कोई व्यूह रचना करता है और दूसरे ही क्षण उसे गिरा देता है। मन
ब्रह्मादि देवताओं पर भी अपनी मोहिनी चलाता है फिर औरों की क्या बिसात है? मन का प्रभाव इतना विचित्र है
कि वह निर्गुण को गुणों के पाश में फँसाता है। उसे जीवन की तंद्रा में लगा कर संसार के चक्र में घूमने के लिये
छोड़ देता है। विचार करने पर मालूम होता है कि मन, जड़, मूढ़ और अचेतन है। उसकी उत्पत्ति कैसे होगी?
उसी का वर्णन श्रीकृष्ण कर रहे हैं।
अनीह आत्मा मनसा समीहता हिरण्मयो मत्सख उद्द्विचष्टे।
मनः स्वलिङ्गं परिगृह्य कामान् जुषन् निबद्धो गुणसङ्गतोऽसौ ॥ ४५ ॥
आत्मा ज्ञानस्वरूप होने के कारण परिपूर्ण है। वह निःसंग, निर्विकार और निर्गुण है। उसे संसारबन्धन की
बाधा नहीं होती। जो आत्मा स्वयं प्रकाश से ही प्रकाशित है, स्वतेज से ही सुशोभित है और जो आत्मा परिपूर्ण
है, उसे क्रियाचरण कभी नहीं घटता। अपनी कल्पना से विचार करने से मन जड़ मालूम होता है, अतः उसे भी
संसार घटना सम्भव नहीं है। अब, यह संसार का बन्धन किसे होता है, सुनिये। मन का कौशल आश्चर्यजनक
है। वह शुद्ध आत्मा में 'मैं' का भाव उत्पन्न करता है और उसी ब्रह्म में जीवभाव लाकर स्वयं ही उसे सगुण
स्वरूप में ले आता है। मन के संकल्प का सामर्थ्य इतना अधिक है कि वह शुद्ध ब्रह्म को अविद्यात्मक कर देता

६२८ श्रीमद् एकनाथी भागवत

है और त्रिगुणों की माला से स्वयं ही संसाररूपी जाल तैयार करता है। जिस प्रकार घट का पानी अलिप्त
चन्द्रबिम्ब का अपने में आकलन कराता है, उसी प्रकार केवल मन के संकल्प ने ज्ञानस्वरूप आत्मा को
अविद्यात्मक बनाया है। घट का पानी हिलने पर चन्द्रबिम्ब को भी कंपित करता है, उसी प्रकार मन के कारण
शुद्ध ब्रह्म को जन्म-मरण और सुख-दुःख उत्पन्न हुए हैं। आत्मा स्वयंप्रकाश और ज्ञानस्वरूप है। मन जड़ है तथा
कल्पनारूप है। लेकिन उसी को अपना स्वरूप मानकर यह जीवात्मा उसका पाप-पुण्य भोगता है। जीव का
सच्चा आत्मीय, सुहृद और मित्र केवल परमात्मा है। वही मन का और जीव का नियामक तथा साक्षी के रूप में
प्रेक्षक है। जो जीव अविद्या के रोग से स्पष्ट रूप से प्रतिबिम्बित होता है वही मेरा मित्र है। वही मन के भ्रम से
भ्रमण कर मन से उत्पन्न होने वाले सुख-दुःख भोग रहा है। मन की एकात्मता विलक्षण है। इससे जीव भ्रम में
पड़ जाता है और स्वयं निष्कर्म होते हुए भी कर्माकर्म भोगता है। वास्तव में देखा जाय तो जीव मन का नियंता है
लेकिन वह मन से एकरूप होकर मन के व्यर्थ के सुख-दुःखों को सहन करता है। जिस प्रकार पड़ोस का
रिश्तेदार यदि राजा का प्रधान हो तो वह राजा को ही अपनी मुट्ठी में रखता है और राजा गरीब हो जाता है और
प्रधान की इच्छा से सुख-दुःख भोगता रहता है। वही स्थिति जीव की है। मन ने उसे सांसारिक बना दिया है
इसलिये वह अनेक जन्म-मरण तथा दिन-रात अनेक सुख-दुःख भोगता रहता है। उस मन का यदि निग्रह न
किया जाय तो जीव का दुःख भी नहीं टलेगा। मन की इच्छा से ही चलने पर सारे साधन व्यर्थ हो जाते हैं।
दानं स्वधर्मो नियमो यमश्च श्रुतं च कर्माणि च सद्व्रतानि।
सर्वे मनोनिग्रहलक्षणान्ताः परो हि योगो मनसः समाधिः ॥ ४६ ॥
मनोनिग्रह पर ध्यान न देकर यदि सर्वस्व का भी दान कर दिया जाय तो 'मैं ही एक दाता हूँ' यह अहंभाव
उत्पन्न होता है और मन गर्व से उन्मत्त हो जाता है अथवा मनोनिग्रह को भूलकर वर्णाश्रम धर्म का आचरण किया
जाय तो उससे मनोधर्म आनन्द से प्रबल हो उठता है और 'मेरा स्वकर्म ही अत्यन्त श्रेष्ठ है' ऐसा लगने लगता
है। त्रिभुवन में एक मैं ही आचारसम्पन्न, मैं ही अपना स्वयं पाकी हूँ, इस प्रकार स्वधर्म का आचरण करने से मन
और भी क्षुब्ध हो उठता है। मन पर नियंत्रण करने की बुद्धि न हो तो यम-नियम भी एक विकार ही है क्योंकि
उसके कारण 'सच्चा साधक मैं ही हूँ' यही मनोधर्म बताता रहता है। वेदशास्त्र श्रवण करने से घमण्ड बढ़ जाता
है, पांडित्य के प्रति अभिमान बढ़ने लगता है। फिर मन पर नियंत्रण कैसे होगा? अपना ही कर्म करने जाओ तो
कर्मक्रिया अत्यन्त कठिन है। उस कर्मठता का ही भ्रम जब बढ़ता जाता है तो मन का नियमन कैसे होगा? कर्म
केवल देह में है। आत्मा देह में होने पर भी विदेह स्थिति में है। कर्म से उसे कर्मबद्धता प्राप्त होती है, ऐसा
कर्मठ लोग मूर्खतावश मानते हैं। असंख्य व्रत कर व्रतस्थ होते हुए वे उसके बदले धनधान्य की अपेक्षा करते हैं
क्योंकि उनके मन में मनोनिग्रह नहीं होता। अच्छे-अच्छे व्रत भी इस प्रकार व्यर्थ हो जाते हैं। व्रत, दान, स्वधर्म
आदि जो सब है उनके लिये मनोनिग्रह ही सबसे बड़ा फल है। उसके बिना सारे साधक दुर्बल और साधकों के
लिये निष्फल हैं। दान आदि सात साधन ज्ञान के ही अन्तर्गत हैं, वे सभी साधन निष्फल हैं यह कैसे कह सकते
हैं? इसका उत्तर यह है कि यहाँ दानादिक जो साधन हैं, उन्हें इस लोक में और परलोक में फल आता है,
लेकिन वह फल ही यहाँ निष्फल होता है और जन्म-मरण को बढ़ाता है। इसमें यदि साधक ज्ञानसम्पन्न हो तो
वह फल की आशा पूरी तरह त्याग कर दान आदि स्वधर्म का आचरण करेगा और वह केवल उसकी चित्तशुद्धि
के लिये उपयोगी होगा। लेकिन चित्तशुद्धि होने के लिये पहले भगवान की कृपा होनी चाहिये। सभी साधनों में

मेरी भक्ति प्रमुख है। उसमें भी नाम की विशेष कीर्ति है। नाम से चित्त की शुद्धि होती है और साधकों को
स्वस्वरूप स्थिति प्राप्त होती है। नाम से श्रेष्ठ कोई साधन नहीं है। उद्धव! नाम से सचमुच ही संसार बन्धन
टूटता है, इसे ध्यान में रखो। स्वस्वरूप में रहकर मन जब निश्चल हो जाता है, उस समय जहाँ साधन लज्जित
हो जाता है, वहाँ दान आदि का साधन अपने आप ही व्यर्थ हो जाता है।
समाहितं यस्य मनः प्रशान्तं दानदिभिः किं वद तस्य कृत्यम्।
असंयतं यस्य मनो विनश्यद् दानादिभिश्चेदपरं किमेभिः॥ ४७॥
जिस पुरुष का मन अपने मूल स्वरूप में प्रविष्ट होता है, उसे दानादि साधनों की क्या आवश्यकता है?
पूरी तरह तृप्त व्यक्ति के सामने यदि पंच पकवान परोसा गया हो तो जिस प्रकार वह उसकी ओर देखना भी नहीं
चाहता उसी प्रकार जिसका मनोविकार नष्ट हो गया है उसके लिये साधन व्यर्थ है। बाढ़ में गंगा नदी पार करने
के लिये कोई मनुष्य बड़े कष्ट से नौका तैयार करता है लेकिन बाढ़ जब पूरी तरह उतर जाती है तो वह नौका
हटा देता है। उसी प्रकार काम, क्रोध आदि उर्मियों से जिसका मन निर्विकल्प में स्थिर हो गया है, उसे सचमुच
दानादिक साधनों की आवश्यकता नहीं है। जिस प्रकार सूर्योदय होने पर लाखों मशालें भी उपयोगी नहीं होतीं,
उसी प्रकार मन में निर्विकल्पता उत्पन्न होने पर कोटि-कोटि साधन निष्फल हो जाते हैं। इस प्रकार जिसका मन
शान्त हो गया है, उसके लिये दानादि नाना प्रकार के साधन करने की आवश्यकता नहीं है। उसके विचारों का
पूर्ण रूप से विलय हुआ रहता है। जिसका मन किसी भी प्रकार के नियमों का पालन नहीं करता, जिसका मन
सदा विचारशून्य रहता है, जो विषयों के प्रति सदा आसक्त रहता है उसके लिये भी साधन व्यर्थ हैं। जिस प्रकार
उन्मत्त हाथियों के झुण्ड के कारण सेना अनेक दिशाओं से भागने लगती है, उसी प्रकार विषयासक्त पुरुष के पास
साधन व्यर्थ हो जाते हैं। जो मन से विषयासक्त है, वह साधनों का जरा भी आचरण नहीं करता क्योंकि यदि वह
साधन करे भी तो उसके मन में विषयों की ही कल्पनाएँ रहती हैं। स्वयं साधना करते समय वासना जिस फल
की इच्छा करती है वही फल उसे प्राप्त होता है और वह दानादि का नाश करती है। जिस प्रकार किसी बलशाली
घोड़े पर कोई निर्बल पुरुष सवारी करे तो वह घोड़ा बेकाबू हो जाता है और क्षणभर के लिये भी शान्त नहीं
रहता, उसी प्रकार जिसका मन अत्यन्त दुर्बल रहता है और पूरी तरह कामक्रोध से भरा रहता है, जो स्वयं ही मन
का दास बना रहता है, जिसका मन सदा महामोह में ही डूबता उतराता रहता है, वह साधन क्या करेगा? वह
कभी साधन करता भी है तो वह महामोह के कारण। इससे तमोगुण बढ़ता है, लेकिन मन पर नियंत्रण नहीं
होता। मान लो, यदि श्रवणादि इन्द्रियों का नियमन कर साधन किया जाय तो उसके मन का आकलन नहीं होता,
क्योंकि इन्द्रियाँ मन के अधीन होती हैं।
मनोवशेऽन्ये ह्यभवन् स्म देवा मनश्च नान्यस्य वशं समेति।
भीष्मो हि देवः सहसः सहीयान् युञ्ज्याद् वशे तं स हि देवदेवः॥ ४८॥
मन ने सबको अपने वश में किया है किन्तु मन किसी के वश में नहीं रहता। मन ने देवताओं का भी छल
किया है, फिर इन्द्रियों के वह किस प्रकार वश में रहेगा? मन पर नियंत्रण करने वाला चन्द्र है। लेकिन मन ने
उस चन्द्रमा को भी छला। मन ने ही चन्द्रमा को गुरु पत्नी से व्यभिचार करा कर उसे क्षयरोगी बनाया। ब्रह्मदेव
बुद्धि का नियंता है। लेकिन मन ने उस ब्रह्मदेव की बुद्धि भी भ्रष्ट की इसलिये उसकी कन्या उसका निवारण कर
रही थी, फिर भी ब्रह्मदेव ने अपनी उस लड़की की ही अभिलाषा की। अंतःकरण में वासुदेव का अधिष्ठान है

६३० श्रीमद् एकनाथी भागवत

लेकिन उस वासुदेव को भी मन ने फँसाया। उसे वृन्दा का ध्यान लगाकर, मानों उसे श्मशान में गिरा दिया। रुद्र
(महादेव) अहंकार का नियंता है लेकिन मन ने उसे भी फँसाया। उसने ऋषि पत्नी की अभिलाषा की तो महर्षि
ने उसे शाप देकर उसका लिंगघात कराया। इस प्रकार देवतागण भी जिस मन को नहीं जीत सके उसे और कोई
कैसे नियंत्रित कर सकता है ? आप कहेंगे कि इन्द्रियाँ मन पर नियंत्रण करेंगी। लेकिन वे इन्द्रियाँ भी मन के
अधीन होती हैं। जब इन्द्रियों को स्वतंत्र रख कर मन ही किसी विषय में एकाग्र रहता है, तब इन्द्रियों का सामर्थ्य
सचमुच निष्फल हो जाता है। इन्द्रियाँ और विषय यदि एक हो जाएँ और उस समय मन की वृत्ति बदल जाय तो
उन विषयों का भोग नहीं हो पाता क्योंकि इन्द्रियों में उपभोग की स्फूर्ति ही नहीं रह पाती। मन के धर्म आसक्ति
रहित हो जाते हैं तो इन्द्रियों की इच्छा कुछ नहीं कर पाती। इन्द्रियों का पूरा समुदाय मन के अधीन होता है।
इसलिये इन्द्रियों के द्वारा मन पर नियंत्रण कभी नहीं हो पाता। मन इन्द्रियों का राजा है। इन्द्रियाँ मन के बिना
नहीं चल पातीं। पुरुष को भी मन ही अपने वश में करता है। मन प्रबल में प्रबलतम है। मन का दमन करने में
बड़ों-बड़ों को भी साहस नहीं होता। काल अपने सामर्थ्य से सबका भक्षण करता है लेकिन मन का रोम भी वह
नहीं उखाड़ पाता। उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करने में भी काल मन को काबू में नहीं रख पाता। मन शस्त्र से
नहीं टूट सकता, पानी भी उसे नहीं घोल सकता; अग्नि भी उसे नहीं जला सकता है अथवा आकाश भी मन को
शून्य नहीं कर सकता है। मन को कोई रोग नहीं लगता, कोई रोग उसे दुर्बल नहीं कर सकता, मन को काबू में
रख सके ऐसी कोई भी सिद्धि नहीं दिखायी देती। मन करोड़ों ब्रह्मदेव उत्पन्न करता है, मन ब्रह्माण्ड उत्पन्न करता
है और उन्हें नष्ट कर देता है; मन अपनी कल्पना की उड़ान से सारे त्रैलोक्य को जबर्दस्ती नचाता है। मन
कलिकाल को भी छलता है। मन प्रलयानल को भी निगल लेता है। मन बलाढ्यों में महाबली है। मन को काबू
में रख सके ऐसा कोई नहीं है। मन देवताओं को भी असह्य है। मन भयंकरों में भी भयंकर है। मन ने हरिहर को
भी नियंत्रण में रखा है। ऐसे इस मन के सामने कौन टिक पायेगा ? मन के प्रहार को निवारण करना कठिन है।
मन को जो जीत सके ऐसा पराक्रमी देवता, मानव, राक्षस कोई भी नहीं दिखायी देता। मन के साथ दो हाथ कर
सके ऐसा बलवान पूरे त्रिभुवन में नहीं है। मन कलिकाल को भी अपने काबू में रखता है। प्रलयरुद्र दाँत लगाये
बिना निगल लेता है। मन की महिमा ऐसी अगाध है इसलिये उसे 'देव' कहते हैं। जो भयंकर हैं उन्हें भी मन
का भय लगता है, इसलिये उसे 'भीष्मदेव' कहते हैं। मन की स्थिति अत्यन्त बेकाबू है। उसे नियंत्रित करने की
युक्ति और उसका मर्म तुम्हें सचमुच बताऊँगा, ध्यानपूर्वक श्रवण करें। जिस प्रकार हीरा से ही हीरा काटते हैं,
उसी प्रकार मन से ही मन को नियंत्रित करना चाहिये। लेकिन जब स्वयं गुरु की ही कृपा होती है, तभी यह भी
प्राप्त होता है। मन गुरु कृपा की क्रीतदासी है। मन सद्गुरु से सदा भयभीत रहता है। उसे गुरु के चरणों पर रखने
से ही साधकों को संतोष होता है। यह मन का उत्तम गुण है कि यदि वह परमार्थ की ओर लग जाय तो चारों
मुक्तियों को अपने पास दासी बनाकर रखता है और परब्रह्म हाथ में दे देता है। मन ही मन का प्रकाशक है, मन
ही मन का साधक है, मन ही मन का बाधक है और मन ही मन के लिये घातक है। जिस प्रकार बाँस अपना
जंगल बढ़ाता है और एक बाँस दूसरे से रगड़ने पर जो चिनगारी निकलती है उससे स्वयं ही अपने को जला
डालता है। उसी प्रकार मन ही जब मन की मृत्यु की चिन्ता करता है तभी वह सद्गुरु की शरण में ले आता है
और उसका वचन मानकर, अभिमान रहित होकर गुरुभजन कराता है। सद्गुरु की पूर्ण कृपा होने पर मन ही मन
को संकेत देता है अपने सुख से सुखी होकर मन ही मन पर प्रसन्न होता है। जब मन ही मन पर प्रसन्न हो जाता
है तो वृत्ति अभिमानरहित हो जाती है। मानों, मन स्वयं ही साधकों को निजसमाधान साध्य करा रहा हो। गुरुकृपा

तेईसवाँ अध्याय ६३१
का प्रसाद मिलने पर मन स्वयं ही मनोजय की पताका फहराता है और साक्षात साधक के हाथ में देता है। इस
प्रकार साधक का मन स्वयं ही अपनी जय करा कर देता है और अन्त में सद्गुरु के आत्मज्ञान में मन स्वयं
आत्मस्वरूप से पूर्णरूप से लीन हो जाता है। जिस प्रकार नमक का ठोंका समुद्र के जल में घुलमिलकर स्वयं
समुद्र जैसा हो जाता है उसी प्रकार साधक भी अभिमानरहित होते ही 'मैं' 'तू' का अहंभाव नष्ट कर स्वयं
पूर्णब्रह्म हो जाते हैं, यह ध्यान में रखो। फिर उसकी आत्मदृष्टि को सारी सृष्टि एक मैं ही दिखायी देने लगती है,
द्वंद्व की त्रिपुटी नष्ट हो जाती है और सुख-दुःख का पीछा करना छूट जाता है। फिर कैसा सुख और कैसा दुख !
कैसा बन्धन और कैसा मोक्ष ? पण्डित कौन और मूर्ख कौन ? चारों ओर केवल एक ब्रह्म ही दिखायी देता है।
वहाँ कौन देवता है और कौन भक्त है ? कौन शान्त है और कौन अशान्त है ? द्वैत-अद्वैत विलीन हो जाता है और
केवल एक परब्रह्म ही सदा आनन्दरूप से रहता है। वहाँ क्रिया और कर्म नष्ट हो जाते हैं, धर्म और अधर्म लज्जा
से ही नष्ट हो जाते हैं, वहाँ कनिष्ट उत्तम और मध्यम भी कैसे ? परिपूर्ण ब्रह्म ही सर्वत्र भर जाता है। फिर शास्त्र
और वेद, बुद्धि और बोध का भेद समाप्त हो जाता है और केवल आनन्दस्वरूप परब्रह्म ही सर्वत्र भर जाता है।
इस प्रकार मनोविजय से इस स्थिति को भाव पहुँचता है। स्वयं भगवान ने यह बताया इसलिये इसमें कोई सन्देह
नहीं है। मनोजय की स्थिति ब्रह्मदेव आदि देवताओं को भी अगम्य है। ऐसी स्थिति में जो इसे स्वयं अपने आप
प्राप्त कर लेता है, वह आत्मज्ञान से देवाधिदेव हो गया ऐसा समझना चाहिये। इस प्रकार जो अपने मन को जीत
कर इस लोक में ही जनता से एकरूप हो गया वह त्रिभुवन में धन्य है। उसके कारण पृथ्वी पावन होती है। उसी
ने पूर्वजों को तारा, सारे कुल का उद्धार किया। जिसने मन को जीत लिया, समझो कि उसने परब्रह्म को अपना
बना लिया। मनोजय से जो अत्यन्त समर्थ हो जाते हैं, वहीं शान्ति सर्वस्व बिकती है। उन्हें आत्मबोध के कारण
सुख-दुःख के भँवर बिना मिले निकल जाते हैं। स्वयं भिक्षु द्वारा किया गया यह भाषण भगवान श्रीकृष्ण ने
अत्यन्त उल्हास से उद्धव को सुनाया और कहा, मनोजय त्रिभुवन में धन्य है। जिसने मन को जीत लिया उसने
मुझे अपना दास बना लिया, मुझे खरीद लिया। मुझ आनन्दस्वरूप को उससे आनन्द प्राप्त होता है, मुझ नित्य
तृप्त को उससे तृप्ति मिलती है। मुझ अनंत का उसी के पास निवास रहता है, उसके ही कारण मैं त्रिभुवन में
बलवान हुआ। 'मैं' और 'वह' कहने का जो कौशल है वह भी हमसे परे है। यदि आप अपने अंतःकरण से
विचार करें तो आत्मैक्य के साथ सचमुच मैं ही हूँ। मनोजय से इतना अधिकार प्राप्त होता है। जो मनोजय न कर
इस लोक के साधारण शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर लेने के कारण अहंकार से फूल जाते हैं उनकी भर्त्सना स्वयं
भिक्षु कर रहे हैं।
तं दुर्जयं शत्रुमसह्यवेगमरुन्तुदं तन्न विजित्य केचित्।
कुर्वन्त्यसद्विग्रहमत्र मर्त्यैर्मित्रान्युदासीनरिपून् विमूढाः ॥ ४९ ॥
बड़े-बड़े शक्तिशाली राजा शत्रु के रूप में आते हैं, उस समय साम, दाम आदि उपायों से उनका दमन
होता है या उन्हें पराक्रम से जीता जा सकता है। लेकिन ये उपाय मन के सन्दर्भ में काम नहीं आते। किसी की
मध्यस्थता की जाय तो मन किसी की सुनता ही नहीं। मन को विषयों का दान दिया जाय तो उससे भी मन तृप्त
नहीं होता। इसके विपरीत वह और भी भयप्रद हो जाता है। उसे कौन सँभाल पायेगा ? शमदम आदि उपाय उस
पर चलते नहीं हैं, अतः ऐसे मन को मार ही डालने की सोचें तो उस पर कोई शस्त्र काम नहीं करता और मारने
का विचार मन में नहीं आता। इस प्रकार यह मनरूपी शत्रु अजेय होने के कारण अत्यन्त कठिन हो गया है। वही

६३२ श्रीमद् एकनाथी भागवत

सुख-दुःख की सामग्री से क्षण-प्रतिक्षण जन्म-मरण से मारता है। अन्य शत्रु यदि काबू से बाहर हो जाएँ तो कोई
तत्काल भाग सकता है। पहाड़ पर के किले पर अपनी सुरक्षा की जा सकती है लेकिन मन से आगे भागने पर
त्रिभुवन भी कम पड़ जाता है। जिस गुप्त स्थान पर छिपने का प्रयास करो वो मन वहाँ भी उपस्थित रहता है।
काम-क्रोध आदि महान वीर मन के पराक्रमी सेनापति हैं और उनकी मार असह्य है। वे एक ही झटके में बड़े-
बड़ों को धराशायी कर देते हैं। बाहर के शत्रु दूर देशों में रहते हैं। उन्हें हमारे पास आने में काफी समय लगता
है। किन्तु मनोरूपी शत्रु हमारे पास ही सदा चिपका रहता है। आसन पर भोजन के समय, एकान्त में, जप करते
समय अथवा ध्यान करते समय मन एकाएक कूद पड़ता है और शत्रु बनकर पूर्ण रूप से पराजित करता है। बाहर
के शत्रु का दुःख बहुत कम होता है, लेकिन मन की पीड़ा विशाल रहती है। मन जन्म-मरण के आवर्त भोगने
को बाध्य करता है। बाह्य शत्रु मरणाधीन होते हैं किन्तु मन मृत्यु में भी विघ्न लाता है। इस मनरूपी शत्रु पर यदि
विजय न प्राप्त की जाय तो जीव का बड़ा दुःख नहीं टल पायेगा। मन की तीव्र गति को देवता या मनुष्य भी
सहन नहीं कर सकते। कोई कितना भी परिश्रम क्यों न करे लेकिन वह मन को नहीं जीत सकता। इसीलिये मन
अजेय हो गया है। ऐसे इस मन को न जीत कर जो अन्य बाह्य शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर गर्व से फूल जाते हैं,
उन्हें महामूर्ख ही समझो। मन से मन को जीतें यह पिछले श्लोक में यथार्थ रीति से बताया ही गया है। वही
मनोजय का उपाय है। सारांश यदि इस प्रकार मन को शत्रु बना कर मन को जीतना सम्भव नहीं है तो मन से
मैत्री कर मित्रभाव से ही मन को सुखी करना चाहिये। सामान्यतः मित्रों की मैत्री ऐसी होती है कि यदि एक-
दूसरे पर उपकार करता है तो दूसरा भी उसका उपकार करता है, लेकिन वह सारी मैत्री विषयसुख की होती है
और उचित प्रसंगों पर वे एक-दूसरे के घर जाते भी हैं। मन की मैत्री वैसी नहीं होती। वह किसी के उपकार
किये बिना ही उस पर उपकार करता है और सारे दुःखों का निवारण कर सुखसागर में विचरण कराता है।
सामान्यतः जिससे हमारी मित्रता रहती है उससे अपना दुःख कहने पर वे उसे पूरी तरह दूर नहीं कर पाता। वह
कहता है, "मेरे लिये यह असाध्य है।" मन की मैत्री ऐसी नहीं होती। मन को स्थिर कर यदि उससे अपना
दुःख कहा जाय तो वह जन्म-मरण की बड़ी पीड़ा भी दूर करता है। मृत्यु का भय मन में होते हुए भी उसे
कनक और कांता से आसक्ति रहती है। स्त्रियाँ भर्त्सना करती हैं लेकिन निर्लज्ज को लज्जा नहीं होती। परस्त्री,
परधन, परद्रोह और परनिन्दा की लत लग जाने पर वे व्यसन उसे क्षणभर के लिये भी खाली नहीं बैठने देते और
भयंकर नरकवास का भोग करने को बाध्य करते हैं। क्षुधा के सामने तो जरा सा भी विलम्ब सम्भव नहीं है। द्वंद्व
के दुःख तो एक के बाद एक आने शुरू हो जाते हैं। इन्द्रियों की वृत्ति तो संभाले नहीं संभलती। ऐसा मन से
कहने पर मन स्वयं वैराग्य से बिफर उठता है और विवेक के सहारे दुःख का नाश करने के लिये तत्पर हो उठता
है। यदि चोर को ही भंडारी बना दिया जाय तो वह स्वयं ही चोरों का निवारण करता है। उसी प्रकार, मन से
मैत्री करने पर वह स्वयं ही दुर्गुणों का नाश कर देता है। हम अधर्म कृत्यों की ओर प्रवृत्त होने लगते हैं तो मन
ही उसका निवारण करता है। मन स्वयं ही वाणी को असत्य न बोलने की शपथ दिलाता है। मन की मैत्री इतनी
श्रेष्ठ है। कर्माकर्म को समूल नष्ट करने के लिये तथा चित्तशुद्धि का मर्म जानने के लिये वह रात-दिन हरिनाम
का स्मरण करता है। 'श्रीराम जयराम' में से केवल 'राम' इन दो अक्षरों से ही महापातकों का नाश होता है। वह
मन उस नाम को छोड़ कर एकक्षण का भी विश्राम नहीं करता। अखण्ड हरि का ही स्मरण करता है। उस समय
वह असत्य का शिरच्छेद करता है, अधर्म की खाल उधेड़ता है, कल्पना के पैर तोड़ता है और आशा की उमंग
समाप्त करता है। विकल्प का घर ही उजाड़ देता है प्रपंच के दाँत तोड़ देता है, अविश्वास के टुकड़े-टुकड़े कर

तेईसवाँ अध्याय ६३३
देता है और अन्त में मन विश्वास के टुकड़े-टुकड़े कर देता है और अन्त में वह मन विश्वास की पताका
फहराता है। ऐसे परिपक्व विश्वास से सद्गुरु के चरणों पर शरीर, मन और धन आदि सर्वस्व अर्पण कर
गुरुवचन पर विश्वास करता है। पूर्ण विश्वास का यही लक्षण है कि गुरु का उपदेश श्रवण करते ही, जिस प्रकार
पारस के स्पर्श से लोहे का स्वरूप बदल कर वह सोना बन जाता है, उसी प्रकार उसका अंतःकरण भी बदलता
है। गुरु का उपदेश सुनाने के बाद समाप्त हो जाता है लेकिन मन का मनन समाप्त नहीं होता। भृंगी की लगन से
रूप बदलने वाले कीट की तरह वह मन तद्रूप होता है। उस समय वह मन सौन्दर्यसम्पन्न स्त्री अथवा द्रव्य को
विष्ठा के समान समझता है। निन्दा, द्वेष, मान, अभिमान आदि मन के दुर्गुणों को मन ही समाप्त कर देता है। मन
की मित्रता धन्य है। पूरे विश्वास के साथ वह जन्म-मरण का संहार करता है और जीव को युवा और अमर कर
डालता है। इस प्रकार मन से मैत्री करने से मन बहुत उपकार करता है और जीव का हाथ पकड़ कर उसे
आत्मानंद सागर में गोता लगवाता है। उस समय मन का मनपन नष्ट हो जाता है, जीव का जीवपन पिघल जाता
है, बन्ध-मोक्ष की दौड़ समाप्त हो जाती है और संसार का भय पूर्णरूप से समाप्त हो जाता है। ऐसी मन की
स्थिति है। वह मन अपने वंश को स्वयं मार डालता है और मित्र पर उपकार करने के लिये स्वयं भी मर जाता
है। मन मित्रता में धोखेबाजी नहीं करता। इस प्रकार सदा आदरपूर्वक वश में होने वाले मन के रहते क्षुद्र लोग
साधारण मनुष्य से मैत्री करते हैं। मन से शत्रुता करके उसे या तो मार ही दे या फिर उससे मित्रता कर उसे
अपनी ओर मोड़े और यह दोनों ही यदि सम्भव न हो तो मन को बिलकुल छोड़ देना चाहिये। मन के कहने पर
न चलें, मन को साथ न रखें और जीवभाव से मन को बिलकुल स्पर्श न करें। मन जिसे सुख कहे उसे अवश्य
छोड़ देना चाहिये और जिसे वह दुःख कहे उसे भी पूरी तरह छोड़ देना चाहिये। इस प्रकार जो पुरुष अपने मन
के प्रति उदासीन रहेगा वह मनरहित हो गया ऐसा समझना चाहिये। वहाँ अलौकिक शान्ति प्राप्त होती है। शत्रुत्त्व
से मित्रता से अथवा उदासीन होकर जो मन को वश में नहीं करेगा और देहाभिमान लेकर बैठा रहेगा उसका
संसारचक्र का भ्रमण नहीं टलेगा।
देहं मनोमात्रमिमं गृहीत्वा ममाहमित्यन्धधियो मनुष्या।
एषोऽहमन्योऽयमिति भ्रमेण दुरन्तपारे तमसि भ्रमन्ति॥५०॥
आत्मा विदेही है और ज्ञानस्वरूप है। ऐसा होते हुए भी मन अपने को देहधारी मानता है। उस देह के साथ
ही 'मैं' और 'मेरा' यह भाव उत्पन्न होकर जन्म-मरण और सुख-दुःख भोगने पड़ते हैं। आत्मा नित्यमुक्त और
विदेही है। मन से एकरूप हो जाने के कारण वह मूलतः विदेही होते हुए भी स्वयं को देही कहता है और अन्त
में देह के प्रति ही आत्मीय हो जाता है। मन कहता है कि 'मैं देह हूँ', इससे देहाभिमान प्रबल हो उठता है और
वह आत्मा स्वयं ही देहरूप होकर उस देह के प्रति अपनत्व दिखाने लगता है। मैं सच्चिदानंद और परिपूर्ण हूँ यह
अपना लक्षण आत्मा स्वयं भूल जाता है और मैं वैश्य, शूद्र, क्षत्रिय, ब्राह्मण हूँ अथवा मैं ही एक मूर्ख अथवा
ज्ञाता हूँ, ऐसा मानने लगता है। मैं दुबला, पतला, काना, कुब्जा हूँ, मैं अत्यन्त धीर और चतुर हूँ; आदि देह के
मिथ्या गुण स्वयं से जोड़ कर वह स्वयं मानव देहधारी बन जाता है। कोई संन्यासी जिस प्रकार स्वप्न में अपने
को अंत्यज वंश में जन्मा देखता है और ब्राह्मण को स्पर्श करने में डरता है, उसी प्रकार जीव की दशा हो जाती
है। परमात्मा स्वयं भेदरहित होते हुए भी वह मैं, मेरी स्त्री, मेरा पुत्र, मेरा द्रव्य आदि मानता है और अपने
इष्टमित्र, दुर्जन, उदासीन आदि जो त्रिविध भेद हैं उन्हें सच समझने लगता है। इस प्रकार देहात्मभाव सिद्ध होने

६३४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
पर और भेदभाव सच हैं वह विश्वास होने पर जीव की अपनी आत्मबुद्धि अन्धी हो गयी ऐसा समझना चाहिये।
जिस प्रकार स्वप्न की बातें मिथ्या होती हैं, उसी प्रकार मन का कल्पित संसार भी मिथ्या है। उसे सत्य मानने से
देह का अन्धकार बढ़ता है। देहाभिमान प्रबल हो जाने पर पुनः जन्म और पुनः मरण इस प्रकार संसार चक्र का
परिभ्रमण जीव को उसके ही भ्रम के कारण भोगना पड़ता है। जिस प्रकार केवल अग्नि को हथौड़े के घाव कभी
नहीं लगते लेकिन लोहे की संगति से वह अपने शरीर पर हथौड़े का प्रहार सह लेता है, उसी प्रकार नित्यमुक्त
और परिपूर्ण आत्मा जब देहाभिमान धारण करता है, तब उसमें जीवत्व आ जाता है और वह जन्म-मरण का
दुःख भोगने लगता है। जिस प्रकार घानी का बैल आँखों में पट्टी बँधी होने के कारण अन्धेपन से गोल-गोल
घूमता रहता है, उसी प्रकार मनुष्य भी अहंकार के कारण अन्धा होकर विराट संसार चक्र में घूमता रहता है। वहाँ
जन्म-मरण का भोग भोगते हुए वह अत्यन्त दुःखी होता है किन्तु देहाभिमान नहीं छोड़ता। अन्त में वह अभिमान
उसे अंधतम नरक में ढकेल देता है। ऐसा नरक जिसका दुःख अपार है और दुस्तर होने के कारण उसे पार भी
नहीं किया जा सकता। जो अघोर भोग भोगने को बाध्य करता है वह संसार मन की कल्पना ही है। मन ही
सुख-दुःख का कारण है यह बात आठवें श्लोक में भिक्षु ने स्वयं ही बतायी है। अब दुःखों का कारण लोग हैं,
ऐसा जो कहा जाता है वह मिथ्या है यह भी वह बताता है।
जनस्तु हेतुः सुखदुःखयोश्चेत् किमात्मनश्चात्र ह भौमयोस्तत्।
जिह्वा क्वचित् संदशति स्वदद्भिस्तद्वेदनायां कतमाय कुप्येत्॥५१॥
जिसे जननी के उदर में जन्म लेना पड़ता है उसे 'जन' कहते हैं। वे जन मेरे सुख-दुःख के लिये बिलकुल
कारण नहीं होते। लोग लोगों को ही दुःख पीड़ा देते हैं, उसका आत्मा से क्या सम्बन्ध है? आत्मा देह से स्वतंत्र
एवं शुद्ध है। उसे सुख-दुःख की बाधा नहीं होती। देह से देह को दुःख होता है ऐसा कहें, तो देह तो
पंचभूतात्मक है। अतः उनमें परस्पर एकता है। अर्थात् उन्हें भी सुख-दुःख नहीं होगा। जल में जल उड़ेलने से
जिस प्रकार जल को कोई कष्ट नहीं होता अथवा दीपक की ज्योति से ज्योति मिलाने पर दीपक को कोई कष्ट
नहीं होता, उसी प्रकार देह को (पार्थिव = पृथ्वी से उत्पन्न हुआ) देह से स्पर्श करने पर बिलकुल पीड़ा नहीं
होती और आत्मा देह को स्पर्श भी नहीं करता इसलिये वह सुख-दुःख को भी स्पर्श नहीं करता। अब आप यह
कहेंगे कि जो जीव देहाभिमानी है, उसी को सुख-दुःख होते हैं क्योंकि दुख का भोक्ता कोई और तो खोजने से
भी नहीं मिलता। हमारी जीभ यदि दाँत के नीचे आ गयी तो उसका गुस्सा किस पर निकाला जाय? क्या वह
क्रोध के आवेग में दाँत तोड़ता है या जीभ को काटकर फेंकता है? उसी प्रकार संसार में जब सर्वत्र एकता
दिखायी दे रही है तो क्रोध करने का कोई कारण नहीं है। दूसरे का धक्का लगने से जो गिरता है वह धक्का देने
वाले पर गुस्से में हाथ उठाता है, लेकिन जो स्वयं ही गिर कर जमीन पर लोटने लगता है, वह शरमा कर, किसी
पर गुस्सा किये बिना चला जाता है। उसी प्रकार प्राणीमात्र मैं ही हूँ और भोग भोगनेवाला भी मैं ही हूँ; मेरा दुःख
देने वाला भी मैं ही हूँ; संसार में ऐक्यरूप में मैं ही भरा हुआ हूँ। ऐसी स्थिति में क्रोध किस पर करें? इस प्रकार
मेरे सुख-दुःख के लिये अन्य लोग कारण नहीं हैं। अब यदि उसके लिये देवताओं को कारण समझा जाय तो
वैसा भी नहीं लगता।
दुःखस्य हेतुर्यदि देवतास्तु किमात्मनस्तत्र विकारयोस्तत्।
यदङ्गमङ्गेन निहन्यते क्वचित् क्रुध्येत कस्मै पुरुषः स्वदेहे॥५२॥