श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६३० श्रीमद् एकनाथी भागवत
लेकिन उस वासुदेव को भी मन ने फँसाया। उसे वृन्दा का ध्यान लगाकर, मानों उसे श्मशान में गिरा दिया। रुद्र
(महादेव) अहंकार का नियंता है लेकिन मन ने उसे भी फँसाया। उसने ऋषि पत्नी की अभिलाषा की तो महर्षि
ने उसे शाप देकर उसका लिंगघात कराया। इस प्रकार देवतागण भी जिस मन को नहीं जीत सके उसे और कोई
कैसे नियंत्रित कर सकता है ? आप कहेंगे कि इन्द्रियाँ मन पर नियंत्रण करेंगी। लेकिन वे इन्द्रियाँ भी मन के
अधीन होती हैं। जब इन्द्रियों को स्वतंत्र रख कर मन ही किसी विषय में एकाग्र रहता है, तब इन्द्रियों का सामर्थ्य
सचमुच निष्फल हो जाता है। इन्द्रियाँ और विषय यदि एक हो जाएँ और उस समय मन की वृत्ति बदल जाय तो
उन विषयों का भोग नहीं हो पाता क्योंकि इन्द्रियों में उपभोग की स्फूर्ति ही नहीं रह पाती। मन के धर्म आसक्ति
रहित हो जाते हैं तो इन्द्रियों की इच्छा कुछ नहीं कर पाती। इन्द्रियों का पूरा समुदाय मन के अधीन होता है।
इसलिये इन्द्रियों के द्वारा मन पर नियंत्रण कभी नहीं हो पाता। मन इन्द्रियों का राजा है। इन्द्रियाँ मन के बिना
नहीं चल पातीं। पुरुष को भी मन ही अपने वश में करता है। मन प्रबल में प्रबलतम है। मन का दमन करने में
बड़ों-बड़ों को भी साहस नहीं होता। काल अपने सामर्थ्य से सबका भक्षण करता है लेकिन मन का रोम भी वह
नहीं उखाड़ पाता। उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करने में भी काल मन को काबू में नहीं रख पाता। मन शस्त्र से
नहीं टूट सकता, पानी भी उसे नहीं घोल सकता; अग्नि भी उसे नहीं जला सकता है अथवा आकाश भी मन को
शून्य नहीं कर सकता है। मन को कोई रोग नहीं लगता, कोई रोग उसे दुर्बल नहीं कर सकता, मन को काबू में
रख सके ऐसी कोई भी सिद्धि नहीं दिखायी देती। मन करोड़ों ब्रह्मदेव उत्पन्न करता है, मन ब्रह्माण्ड उत्पन्न करता
है और उन्हें नष्ट कर देता है; मन अपनी कल्पना की उड़ान से सारे त्रैलोक्य को जबर्दस्ती नचाता है। मन
कलिकाल को भी छलता है। मन प्रलयानल को भी निगल लेता है। मन बलाढ्यों में महाबली है। मन को काबू
में रख सके ऐसा कोई नहीं है। मन देवताओं को भी असह्य है। मन भयंकरों में भी भयंकर है। मन ने हरिहर को
भी नियंत्रण में रखा है। ऐसे इस मन के सामने कौन टिक पायेगा ? मन के प्रहार को निवारण करना कठिन है।
मन को जो जीत सके ऐसा पराक्रमी देवता, मानव, राक्षस कोई भी नहीं दिखायी देता। मन के साथ दो हाथ कर
सके ऐसा बलवान पूरे त्रिभुवन में नहीं है। मन कलिकाल को भी अपने काबू में रखता है। प्रलयरुद्र दाँत लगाये
बिना निगल लेता है। मन की महिमा ऐसी अगाध है इसलिये उसे 'देव' कहते हैं। जो भयंकर हैं उन्हें भी मन
का भय लगता है, इसलिये उसे 'भीष्मदेव' कहते हैं। मन की स्थिति अत्यन्त बेकाबू है। उसे नियंत्रित करने की
युक्ति और उसका मर्म तुम्हें सचमुच बताऊँगा, ध्यानपूर्वक श्रवण करें। जिस प्रकार हीरा से ही हीरा काटते हैं,
उसी प्रकार मन से ही मन को नियंत्रित करना चाहिये। लेकिन जब स्वयं गुरु की ही कृपा होती है, तभी यह भी
प्राप्त होता है। मन गुरु कृपा की क्रीतदासी है। मन सद्गुरु से सदा भयभीत रहता है। उसे गुरु के चरणों पर रखने
से ही साधकों को संतोष होता है। यह मन का उत्तम गुण है कि यदि वह परमार्थ की ओर लग जाय तो चारों
मुक्तियों को अपने पास दासी बनाकर रखता है और परब्रह्म हाथ में दे देता है। मन ही मन का प्रकाशक है, मन
ही मन का साधक है, मन ही मन का बाधक है और मन ही मन के लिये घातक है। जिस प्रकार बाँस अपना
जंगल बढ़ाता है और एक बाँस दूसरे से रगड़ने पर जो चिनगारी निकलती है उससे स्वयं ही अपने को जला
डालता है। उसी प्रकार मन ही जब मन की मृत्यु की चिन्ता करता है तभी वह सद्गुरु की शरण में ले आता है
और उसका वचन मानकर, अभिमान रहित होकर गुरुभजन कराता है। सद्गुरु की पूर्ण कृपा होने पर मन ही मन
को संकेत देता है अपने सुख से सुखी होकर मन ही मन पर प्रसन्न होता है। जब मन ही मन पर प्रसन्न हो जाता
है तो वृत्ति अभिमानरहित हो जाती है। मानों, मन स्वयं ही साधकों को निजसमाधान साध्य करा रहा हो। गुरुकृपा