श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 649, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेईसवाँ अध्याय ६३३
देता है और अन्त में मन विश्वास के टुकड़े-टुकड़े कर देता है और अन्त में वह मन विश्वास की पताका
फहराता है। ऐसे परिपक्व विश्वास से सद्गुरु के चरणों पर शरीर, मन और धन आदि सर्वस्व अर्पण कर
गुरुवचन पर विश्वास करता है। पूर्ण विश्वास का यही लक्षण है कि गुरु का उपदेश श्रवण करते ही, जिस प्रकार
पारस के स्पर्श से लोहे का स्वरूप बदल कर वह सोना बन जाता है, उसी प्रकार उसका अंतःकरण भी बदलता
है। गुरु का उपदेश सुनाने के बाद समाप्त हो जाता है लेकिन मन का मनन समाप्त नहीं होता। भृंगी की लगन से
रूप बदलने वाले कीट की तरह वह मन तद्रूप होता है। उस समय वह मन सौन्दर्यसम्पन्न स्त्री अथवा द्रव्य को
विष्ठा के समान समझता है। निन्दा, द्वेष, मान, अभिमान आदि मन के दुर्गुणों को मन ही समाप्त कर देता है। मन
की मित्रता धन्य है। पूरे विश्वास के साथ वह जन्म-मरण का संहार करता है और जीव को युवा और अमर कर
डालता है। इस प्रकार मन से मैत्री करने से मन बहुत उपकार करता है और जीव का हाथ पकड़ कर उसे
आत्मानंद सागर में गोता लगवाता है। उस समय मन का मनपन नष्ट हो जाता है, जीव का जीवपन पिघल जाता
है, बन्ध-मोक्ष की दौड़ समाप्त हो जाती है और संसार का भय पूर्णरूप से समाप्त हो जाता है। ऐसी मन की
स्थिति है। वह मन अपने वंश को स्वयं मार डालता है और मित्र पर उपकार करने के लिये स्वयं भी मर जाता
है। मन मित्रता में धोखेबाजी नहीं करता। इस प्रकार सदा आदरपूर्वक वश में होने वाले मन के रहते क्षुद्र लोग
साधारण मनुष्य से मैत्री करते हैं। मन से शत्रुता करके उसे या तो मार ही दे या फिर उससे मित्रता कर उसे
अपनी ओर मोड़े और यह दोनों ही यदि सम्भव न हो तो मन को बिलकुल छोड़ देना चाहिये। मन के कहने पर
न चलें, मन को साथ न रखें और जीवभाव से मन को बिलकुल स्पर्श न करें। मन जिसे सुख कहे उसे अवश्य
छोड़ देना चाहिये और जिसे वह दुःख कहे उसे भी पूरी तरह छोड़ देना चाहिये। इस प्रकार जो पुरुष अपने मन
के प्रति उदासीन रहेगा वह मनरहित हो गया ऐसा समझना चाहिये। वहाँ अलौकिक शान्ति प्राप्त होती है। शत्रुत्त्व
से मित्रता से अथवा उदासीन होकर जो मन को वश में नहीं करेगा और देहाभिमान लेकर बैठा रहेगा उसका
संसारचक्र का भ्रमण नहीं टलेगा।
देहं मनोमात्रमिमं गृहीत्वा ममाहमित्यन्धधियो मनुष्या।
एषोऽहमन्योऽयमिति भ्रमेण दुरन्तपारे तमसि भ्रमन्ति॥५०॥
आत्मा विदेही है और ज्ञानस्वरूप है। ऐसा होते हुए भी मन अपने को देहधारी मानता है। उस देह के साथ
ही 'मैं' और 'मेरा' यह भाव उत्पन्न होकर जन्म-मरण और सुख-दुःख भोगने पड़ते हैं। आत्मा नित्यमुक्त और
विदेही है। मन से एकरूप हो जाने के कारण वह मूलतः विदेही होते हुए भी स्वयं को देही कहता है और अन्त
में देह के प्रति ही आत्मीय हो जाता है। मन कहता है कि 'मैं देह हूँ', इससे देहाभिमान प्रबल हो उठता है और
वह आत्मा स्वयं ही देहरूप होकर उस देह के प्रति अपनत्व दिखाने लगता है। मैं सच्चिदानंद और परिपूर्ण हूँ यह
अपना लक्षण आत्मा स्वयं भूल जाता है और मैं वैश्य, शूद्र, क्षत्रिय, ब्राह्मण हूँ अथवा मैं ही एक मूर्ख अथवा
ज्ञाता हूँ, ऐसा मानने लगता है। मैं दुबला, पतला, काना, कुब्जा हूँ, मैं अत्यन्त धीर और चतुर हूँ; आदि देह के
मिथ्या गुण स्वयं से जोड़ कर वह स्वयं मानव देहधारी बन जाता है। कोई संन्यासी जिस प्रकार स्वप्न में अपने
को अंत्यज वंश में जन्मा देखता है और ब्राह्मण को स्पर्श करने में डरता है, उसी प्रकार जीव की दशा हो जाती
है। परमात्मा स्वयं भेदरहित होते हुए भी वह मैं, मेरी स्त्री, मेरा पुत्र, मेरा द्रव्य आदि मानता है और अपने
इष्टमित्र, दुर्जन, उदासीन आदि जो त्रिविध भेद हैं उन्हें सच समझने लगता है। इस प्रकार देहात्मभाव सिद्ध होने