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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

तेईसवाँ अध्याय ६३५
अब जो लोग दूसरा ही कारण मानते हैं, वे कहते हैं कि देवताओं के कारण ही दुःख प्राप्ति होती है। किन्तु
देवताओं का वास देह में ही होता है और आत्मा आत्मस्वरूप में रहकर विदेही ही रहता है। देह के इन्द्रियों के
विकारों का नियंता देवता ही है। आत्मा अखण्ड अविकारी ही होता है। वह सुख-दुःख से अलिप्त रहता है।
भूमि स्वाभाविक रूप से निर्विकार ही है। किन्तु उस पर बनी हुई दीवारें सविकार होती हैं। उसके अनुसार ब्रह्म
नित्य और निर्विकार ही है। उसमें जो नियामक देवता हैं वे सविकार होने का आभास देते हैं। दीवार जब जमीन
पर गिर पड़ती है तो भूमि उसे अपने में एकरूप करती है, उसी प्रकार निर्गुण और निर्विकार ब्रह्म में इन्द्रियों के
नियामक देवता एक हो जाते हैं। हमारे देह में या दूसरों के देह में इन्द्रियों का नियंत्रण करने वाले देवता एक
समान हैं। इसलिये इन्द्रियों का सुख-दुःख देवता स्वयं भोगते हैं। हाथ से मुँह पर मारने पर वहाँ क्रमानुसार इन्द्र
और अग्नि यही नियामक देवता हैं, इसलिये एक तरह से इन्द्र ही अग्नि को मारता है। आत्मा अविकारी होने के
कारण वह दुःख से अलिप्त ही है अथवा यदि मुँह हाथ को काट खाता है तो इसका यह अर्थ हुआ कि अग्नि ने
इन्द्र को घायल कर दिया। आत्मा इन्द्रादि देवताओं से भिन्न होने के कारण उसे सुख-दुःख स्पर्श नहीं करते।
दूसरे के मुख से हमारे मुँह पर थूक गिरती है तो दोनों ही मुखों में अग्नि का ही वास होने के कारण कौन किस
पर क्रोध करेगा? आत्मस्वरूप में दूसरा कोई नहीं होता। चाहे थूक हो या पेशाब हो दोनों देह से ही उत्पन्न हैं
अर्थात् देह के ही बच्चे हैं। देह के ही होने के कारण वे देह पर ही लोटते हैं, तो कौन किस पर नाराज हो?
अपने मुख से दूसरे के मुख को चुम्बन दे तो अग्नि ने ही अग्नि का चुम्बन लिया। उस आनन्द से कौन फूलेगा?
क्योंकि आत्मस्वरूप में दूसरा कोई नहीं होता या अपनी देह से दूसरे की देह को आलिंगन दे तो उन दोनों के
स्पर्श के बीच केवल वायु ही रहता है। उस आनन्द से प्रफुल्लित कौन होगा? क्योंकि वहाँ कोई 'दूजा' नहीं
होता। इसका अर्थ यह हुआ कि देवताओं का समुदाय सुख-दुःख के लिये कारण नहीं है क्योंकि आत्मा में ही
सभी देवताओं का बिना किसी भेदभाव के विलय होता है। देवताओं द्वारा देह को प्रताड़ित करने से देहाभिमानी
को दुःख होगा ऐसा जो मानते हैं, वे मूर्ख हैं क्योंकि वैसा भी कभी घटता नहीं है। पुर अर्थात् देह, उस देह में जो
निवास करता है, वह सभी की देह में एक ही पुरुष है। ऐसा होने पर किसके लिये कौन दुःख मनायेगा? तैश में
आकर मारा गया अपना ही हाथ अपने ही शरीर पर नहीं लग जाय तो उस दुःख के जिम्मेदार हम ही होते हैं
तथा क्रोध करने का कारण हम ही होते हैं। जब सर्वत्र अपना ही एकपन हो तो कौन किसका दुःख मानेगा और
कौन किस पर गुस्सा करेगा? क्योंकि चारों ओर तो अपने आप ही अकेला है। उसी प्रकार मैं ही एक विश्वात्मा
हूँ, मैं ही देवता हूँ, मैं ही जनता हूँ, फिर कौन किसे दुःख देता है? और मैं क्रोध करूँ भी तो किस पर? इस
प्रकार मन में विचार करने पर, मन में विश्वास हो जाता है कि देवताओं से सुख या दुःख बिलकुल नहीं होता।
आत्मा को सुख-दुःख का कारण माना जाय तो यह बात मुझे स्वीकार नहीं है क्योंकि आत्मा में कार्य का कारण
और सुख-दुःख होते ही नहीं हैं।
आत्मा यदि स्यात् सुखदुःखहेतुः किमन्यतस्तत्र निजस्वभावः।
न ह्यात्मनोऽन्यत् यदि तन्मृषा स्यात् क्रुध्येत कस्मान्न सुखं न दुःखम्॥ ५३ ॥
आत्मा तो केवल अकेला है, उसे सुख कैसा और दुःख कैसा? जो आत्मा को सुख-दुःख देने वाला कहते
हैं, वे मूर्ख और अविचारी हैं। जिस प्रकार पतले घी को कोई आकार नहीं होता और रंग भी नहीं होता, लेकिन
गाढ़ा होने पर उसके कण-कण में आकार और श्वेत वर्ण दिखायी देता है, और उन कणों के परस्पर मिलने से

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उन्हें परस्पर कोई सुख या दुःख नहीं होता, उसी प्रकार आत्मा एक ही होते हुए अनेक रूप धारण करता है। जल
में जल की लहरें एक-दूसरे पर गिरती रहती हैं, फिर भी उनमें सुख-दुःख उत्पन्न नहीं होता। उसी प्रकार चराचर
में परमात्मा का वास होता है। परमात्मा एक अकेला होते हुए अनेक रूप धारण करता है फिर भी उसमें
विविधता नहीं है। फिर सुख और दुःख किसका होगा ? आत्मा आनन्दस्वरूप होकर सर्वत्र एक ही है। उसमें
अनेकत्व का जो आभास होता है वह मायामय होकर काल्पनिक है। वह मिथ्या होने के कारण स्वप्न की तरह
है। मृगजल में जल ही दिखायी देता है लेकिन वह पूरी तरह शुष्क रहता है। उसी प्रकार यह जो संसार फैला
हुआ दिखायी देता है वह मिथ्या है तथा समूल माया के कारण है। जहाँ मायामय मिथ्या भेद विभेद रहता है वहाँ
एक अकेला परमात्मा ही रहता है। अर्थात् तब सुख-दुःख नष्ट हो जाते हैं और गुस्सा होने की कोई व्यथा ही
नहीं रह गयी है। जहाँ हमारे आत्मा के कारण ही सर्वत्र एकता है, वहाँ सुख-दुःख नहीं हैं यह ध्यान में रखो।
जहाँ आत्मा को अपना ही अनुभव होता है वहाँ द्वैत का अभाव होता है और जब सुख-दुःख ही मिथ्या हो जाते
हैं वहाँ क्रोध के लिये कोई स्थान नहीं रह जाता। इस आत्मस्वरूपता को न जान जो सुख-दुःख को वास्तविक
मानते हैं, वे भले ही वेद शास्त्र के ज्ञाता क्यों न हों, लेकिन क्रोध उन्हें समाप्त कर देता है। जब समस्त प्राणिमात्र
में आत्मभाव दिखायी देता है वहाँ कौन किसे दुःख देगा? और कौन किस पर नाराज होगा? क्योंकि सर्वत्र
केवल एक आत्मस्वरूप ही रहता है। इस प्रकार वास्तव में आत्मा सुख-दुःख का प्रदाता नहीं है क्योंकि कोई
कितना भी बड़ा मूर्ख क्यों न हो, लेकिन वह स्वयं को दुःख नहीं देता। अब इसमें से चौथे मत के अनुसार ग्रहों
को दुःख का कारण मानें तो वह भी सच नहीं है। सुनो। तुम्हें निश्चित रूप से बताता हूँ।
ग्रहा निमित्तं सुखदुःखयोश्चेत् किमात्मनोऽजस्य जनस्य ते वै।
ग्रहैर्ग्रहस्यैव वदन्ति पीडां क्रुध्येत कस्मै पुरुषस्ततोऽन्यः ॥ ५४ ॥
देह जननी के उदर में जन्म लेता है, इसलिये उस देह को 'जन' कहते हैं। उस जन्म के समय जो 'लग्न'
रहता है, उस जन्म लग्न के लिये जन्मकाल से ही ग्रहों का परिभ्रमण शुरू हो जाता है। उसमें बारहवें, आठवें,
जन्मस्थ आदि विभिन्न स्थानों पर जो शुभाशुभ ग्रह उपस्थित रहते हैं, वही सुख-दुःख के प्रणेता हैं। किन्तु आत्मा
ग्रहों की गति से अलिप्त ही रहता है। आत्मा का जन्म ही नहीं होता फिर उसे ग्रह की व्यथा कैसे होगी? जहाँ
खेत में बीज डाला ही नहीं गया है वहाँ चूहे क्या खायेंगे? जब घर ही नहीं बना है, तो उसकी छत कैसे जलेगी?
उसी प्रकार जब आत्मा जन्म ही नहीं लेता तो उसे ग्रहों के शुभाशुभ फल कैसे लगेंगे? ग्रहों की ग्रहदशा देह के
पास होती है और आत्मा देहभाव से अलिप्त ही रहता है। जिस प्रकार काक कैलास पर नहीं चढ़ता उसी प्रकार
ग्रह भी आत्मा को स्पर्श नहीं करते। जिस प्रकार मक्खी अग्नि का स्वाद नहीं लेती अथवा चील चन्द्रमा पर झपट्टा
नहीं मारती, उसी प्रकार आत्मा को व्यथा देने का सामर्थ्य ग्रहों के पास नहीं होता। आत्मा सभी का एक ही है
अर्थात् ग्रहों का आत्मा भी वही है। ग्रह यदि अपने ही आत्मा को दुःख दें तो यही होगा कि ग्रहों ने स्वयं ही
अपने को पीड़ा पहुँचायी है। देह, जड़, मूढ़ और अज्ञानी है। उस देह को सुख-दुःख का कोई ज्ञान नहीं होता।
कोई स्वयं ही अपने को दुःख नहीं पहुँचाता। इसलिये आत्मा को ग्रहों की पीड़ा कल्पांत में भी नहीं हो सकती।
ग्रहों में वैरभावना है ही। ग्रह ग्रहों को पीड़ा देते हैं। उस सम्बन्ध में भी विवेचन ध्यान से सुनें। ज्योतिष शास्त्र के
अनुसार शनि का मंगल और सूर्य से बैर है। गुरु और शुक्र एक-दूसरे के शत्रु हैं। उसी प्रकार बुध और चन्द्रमा में
भी बड़ा बैर है। इन ग्रहों में कुछ की गति तीव्र रहती है तो कुछ मंद गति से चलते हैं। कुछ अत्यन्त तीव्र गति से

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चलते हैं, तो कुछ वक्र गति से पीछे लौटते रहते हैं। कुछ दूसरे ग्रह मण्डल को भेदकर एक साथ आते हैं। परस्पर
वैरी ग्रह जब एक राशि में एकत्र हो जाते हैं एक ही नक्षत्रचरण में साथ रहने लगते हैं, तो उसमें राहु सूर्य को ग्रस
लेता है और सूर्य चन्द्र का लोप कराकर अमावस्या (काली रात) करा देता है। इस प्रकार ग्रह स्वयं ही परस्पर
पीड़ा देते रहते हैं। किन्तु मैं आत्मस्वरूपी हूँ तथा उनसे भिन्न हूँ अतः मुझे उनके सुख-दुःख से कोई सरोकार नहीं
है। अलंकार यदि तोड़ भी दिये जाएँ तो इससे सुवर्ण को कोई कष्ट नहीं होता। उसी प्रकार ग्रह यदि ग्रहों को
पीड़ा देने लगें तो उसमें आत्मा को सुख या दुःख क्यों होगा? समरभूमि में युद्ध होता है तो उससे भूमि घायल
नहीं होती। उसी प्रकार मैं आत्मस्वरूपी होने के कारण ग्रहपीड़ा से अलिप्त रहता हूँ। रजस्वला स्त्री धरती पर
चलती रहती है उससे धरती को अस्पृश्यता की बाधा नहीं होती। उसी प्रकार ग्रह अन्य ग्रहों को पीड़ा पहुँचाते हैं,
फिर भी मैं सुख-दुःख से अलिप्त हूँ। सारांश, ग्रहों के कारण जो भी सुख-दुःख देहों में उत्पन्न होता है, उससे
मुझ आत्मा को कोई बाधा नहीं होती। जिसे सुख या दुःख का कोई अनुभव ही नहीं होता, उसे कभी क्रोध नहीं
आता। इसीलिये ग्रहों के कारण कोई दुःख नहीं होता। अगर यह कहें कि सुख-दुःख देने वाला कर्म है तो इससे
लोग भ्रम में पड़ जाते हैं। लेकिन वास्तव में आत्मा केवल निष्कर्म है, उसे जड़ कर्म की बाधा कैसे होगी ?
कर्मास्तु हेतुः सुखदुःखयोश्चेत् किमात्मनस्तद्वि जडाजडत्वे ।
देहस्त्वचित् पुरुषोऽयं सुपर्णः क्रुध्येत कस्मै न हि कर्ममूलम् ॥ ५५ ॥
कर्म जड़ होने के कारण अत्यन्त बाधक है और आत्मा ज्ञानस्वरूप होने के कारण अत्यन्त शुद्ध है। उसे
कर्म का दोष बिलकुल नहीं लगता। सूर्य अगर अन्धकार में छिप कर बैठ सके, दावाग्नि को यदि घास में ही
टोका जा सके, अथवा किलनी अपने मुख से दीपक का स्पर्श कर सके, चक्रवाक पर यदि घास का नियंत्रण हो
सके, गड्ढे के कीचड़ से यदि चन्द्रमा पर लेप लगाया जा सके तो कर्म से उत्पन्न होने वाले सुख-दुःख का
बन्धन आत्मा भी स्वीकार कर लेगा। आत्मा कर्माकर्म का संहार करता है और सुख-दुःख की होली जलाता है।
वह कर्मफलों का उपभोग करता है, ऐसा मूर्ख लोग अवश्य मान सकते हैं। स्वप्न में प्राप्त संतति यदि जागृत
अवस्था में किसी से भेंट कर सके तभी कर्म से प्राप्त होने वाले सुख-दुःख आत्मा के लिये भी बाधक होंगे।
जिस प्रकार चींटी अग्नि पर नहीं चलती, उसी प्रकार आत्मा कर्म के फल में लिप्त नहीं होता। जिस प्रकार
आकाश में शस्त्र से छिद्र नहीं होता, उसी प्रकार आत्मा भी कर्म के फल को स्पर्श नहीं करता। कर्म जो भी कुछ
है वह सब अविद्यात्मक है और आत्मा विद्या-अविद्या से परे है तथा अत्यन्त निर्मल है। उसे कर्म का सुख-दुःख
होता है, ऐसा मूर्ख लोग देह के मोह के कारण मानते हैं। कर्म नितांत जड़ है और आत्मा शुद्ध है। कर्म सीमित है
तथा आत्मा अनंत है। कर्म अपनी कर्मठता के चलते नित्य बन्धनमुक्त है और आत्मा चिदानंदस्वरूप है। कर्म
मिथ्या तथा मायिक है और आत्मा नित्य होकर अमायिक है। कर्म का ब्रह्म से परिचय नहीं है इसलिये जहाँ ब्रह्म
है वहाँ कर्म नहीं रहता। रस्सी को सर्प मान लेने से, जब उसमें सर्प का अंश ही नहीं है तो उसके डसने से विष
कैसे फैलेगा ? उसी प्रकार स्वस्वरूप में कर्म मिथ्या ही है। वह आत्मा के लिये बाधक कैसे हो सकता है ? बाँझ
रानी का लाडला पोता जिस प्रकार राजसत्ता से संसार पर शासन करता है, उसी प्रकार कर्म के सुख-दुःख की
कथाएँ कर्मठों में ही अधिक प्रचलित रहती हैं। सारांश, यहाँ कर्म ही मिथ्या है। वह सुख-दुःख कैसे देगा? यह
निश्चित रूप से जान लेने पर कौन किस पर कोप करेगा? इस प्रकार कर्म सुख-दुःख तो नहीं ही देता, इसलिये
सुख-दुःख काल देता है, ऐसा कहें तो वह भी ठीक नहीं है।

६३८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
कालस्तु हेतुः सुखदुःखयोश्चेत् किमात्मनस्तत्र तदात्मकोऽसौ।
नाग्नेर्हि तापो न हिमस्य तत् स्यात् क्रुध्येत कस्मै न परस्य द्वन्द्वम् ॥ ५६ ॥
काल शीतकाल में ठंडक की पीड़ा देता है, गर्मियों में गर्मी से त्रस्त रहता है, वर्षाऋतु में जल बरसाता है
और तीन-तीन मंजिल वाले मकानों को ध्वस्त कर देता है। सात-सात दिन तक लगातार अखण्ड वर्षा के कारण
आँख भी खोलने नहीं देता। इसलिये सभी प्राणियों को पीड़ा होती है और खाद्यान्न की समस्या उत्पन्न हो जाती
है। खाद्यान्न के अभाव के कारण पशु, पक्षी तथा प्राणी व्याकुल हो जाते हैं। उस समय कोई भी सुख-दुःख की
बात नहीं करता क्योंकि उस समय काल ही दुःख देनेवाला होता है। भीषण गर्मी, भीषण सर्दी अथवा अत्यधिक
वायु के साथ काल संसार को खाता रहता है। इसलिये संसार भी काल से थर-थर काँपता रहता है। काल के
पराक्रम की बात सुनकर देवता भी तत्काल काँप उठते हैं। औरों की क्या बात की जाय? साक्षात् ब्रह्मदेव भी
अंतःकरण में काल से भयभीत रहते हैं। अतिवृष्टि और अनावृष्टि के साथ काल अनेक प्रकार के संकटों से लोगों
को पीड़ा देता है और अन्त में प्रलय कर देता है। ऐसा यह महाकाल सृष्टि को दुःख देने वाला है ऐसे बड़े-बड़े
ज्ञानी लोग कहते हैं लेकिन वे अपने ज्ञानी होने के कारण ही मूर्ख बने रहते हैं क्योंकि काल ही ईश्वर है और वह
सबके लिये सुखदायी है। ईश्वर से जो काल को अलग कहता है वह जड़, मूर्ख और अज्ञानी है। काल ही ईश्वर
है, यह जान लो। वह विश्वात्मा है तथा पूर्णरूप से दयालु है। काल योग्य समय पर बारिश करता है तथा संतप्त
हुए लोगों को सुखी करता है और धरती को गीली बनाकर उसे खेती करने के लिये बीज डालने लायक बनाता
है। उस समय यदि शीतल हवा नहीं बहेगी तो बोया हुआ बीज जल कर राख हो जायेगा। इसलिये उस समय
पानी बरसा कर अनाज फलद्रूप करता है। पका हुआ अनाज गीला रहता है और उसे उसी प्रकार संग्रह करना
सम्भव नहीं है, इसलिये ग्रीष्म की गर्मी लाकर अनाज का गीलापन सोख लेता है। इस प्रकार प्राणियों के हित में
जाड़ा, धूप, वर्षा आदि की योजना काल करता है। किन्तु देह स्वयं ही 'मैं' के भ्रम में होने के कारण वही उसे
दुःखदायक मालूम होता है। पुराने वस्त्रों को बदलकर जो आस्थापूर्वक नये वस्त्र पहनाता है, उसी कल्याणकर्ता
काल को मूर्ख लोग शत्रु कहते हैं। उसी प्रकार वृद्धावस्था से जर्जर होकर जो देह विगलित हो जाता है, उसे काल
योग्य समय पर नष्ट कर देता है और तत्काल नया देह देता है। इस प्रकार काल लोगों पर उपकार करता है।
पुराना लेकर जो बदले में नया देता है ऐसे उपकार कर्ता को देह के लोभ से लोभी बने लोग अपकार कर्ता कहते
हैं। मनुष्य जिस भावना से जो भी दृढ़ वासना मन में रखता है, उसी के अनुरूप देह उसे कृपालु काल तत्काल
देता है। पिता आनन्दपूर्वक पुत्र के पुराने वस्त्र उतार कर उसे पहनने के लिये नये वस्त्र देता है, उसी प्रकार
प्रलयकाल संसार को भी नये-नये रूप देता है। काल प्रलयकाल में संसार के सभी पुराने देहों का विनाश कर,
फिर उन सबको कृपापूर्वक नया देह देकर उनका गौरव करता है। इस प्रकार काल कृपालु है। मूर्ख लोग उसे बैरी
कहते हैं। काल स्वयं ही संसार का वास्तविक आत्मा है। वह किसी को भी दुःख देकर छल नहीं करता। देखो!
लोगों की देह पर ही भक्ति रहती है, इसलिये काल भी लोगों की भक्ति के अनुसार एक के बाद एक देह उत्पन्न
करता है और इसीलिये यह जन्म-मरण का झगड़ा बढ़ता है। जो सचमुच ही विदेह भावना की ही इच्छा करता
है, उसका अहम्भाव काल नष्ट करता है और स्वयं आत्मानन्द से तृप्त कर जन्म-मरण का ठिकाना ही तोड़
देता है। जिसकी जैसी बुद्धि होती है, उसके ही अनुरूप काल उसे सिद्धि देता है। किन्तु काल सचमुच ही कृपालु
है, यह बात देह के मोह से अन्धे हुए लोग नहीं जानते। संसार में काल ही हमारा आत्मा है। यह बात जो
आत्मज्ञानी जानता है वहाँ कौन किसका दुःख मानेगा? क्योंकि दूसरा कोई होता ही नहीं है। यहाँ मैं दुःख देने

तेईसवाँ अध्याय ६३९
वाला हूँ और दूसरी ओर कोई दुःख भोगने वाला है ऐसी द्वैत वाली बात ही नहीं है क्योंकि संसार का एकमेव
आत्मा वह काल ही है। काल और हमारा आत्मा ये दोनों एक ही हैं। ऐसी स्थिति मे किसका सुख किसे होगा
और कौन किसके लिये शोक मनायेगा ? यहाँ द्वंद्व का दुःख ही नहीं रहता। जिस प्रकार मृगजल केवल नाममात्र
का है, उसमें एक बूँद भी पानी नहीं है, उसी प्रकार आत्मस्वरूप में संसार का जो विस्तार है, वह केवल मन का
भ्रम है। आत्मा एक ही होने के कारण उसमें कोई भेद नहीं है। वही 'काल' के नाम से प्रसिद्ध है। जीव उसी का
अंश होने के कारण वह ज्ञानस्वरूप से शुद्ध है। इसलिये उसे काल आदि की बाधा नहीं है। क्या आग से अग्नि
जलता है, या धूप से सूर्य जलता है ? लहरों की उथल-पुथल से क्या समुद्र डूब जाता है ? या काजल ने अन्धकार
को और अधिक काला किया है ? या हिमालय पर्वत बर्फ से काँपने लगता है ? या घृत डालने से घृत टूटता है ?
यदि यह सब संभव हो तभी काल के प्रयास से आत्मा अनेक द्वंद्व भोगेगा ? कोई स्वयं ही अपने ऊपर कोई
आपत्ति नहीं लाता, उसी प्रकार काल भी आत्मा पर बाधा नहीं ला पाता। इस प्रकार जहाँ एकता के कारण अभेद
रहता है, वहाँ काल की भी पीड़ा नहीं हो पाती। अभेद में द्वंद्व बिलकुल नहीं है, फिर कोप किस पर किया जाय ?
जीव-शिवरूप में केवल मैं ही हूँ। मैं ही आत्मा हूँ और मैं ही काल हूँ। द्वंद्व दुःखों का झमेला मिथ्या है। तब
क्रोध किस पर करूँ ? इस प्रकार विचार करने से काल सुख-दुःख देने वाला सिद्ध नहीं होता क्योंकि सुख-दुःखों
की पीड़ा आत्मा को नहीं होती। 'नायंजनः' आदि श्लोकों में (अ २३ श्लोक ४३) सुख-दुःख के जो छः कारण
बताये गये हैं, उन पर ठीक तरह से विचार करने पर वे आत्मा के लिये बाधक सिद्ध नहीं होते, यह ज्ञात होता है।
इसके अलावा देशवास अथवा त्रिगुणों के गुण से बाधक बनकर आत्मा को पीड़ा देने वाला कोई दिखायी नहीं
देता। आत्मा को किसी से कभी भी पीड़ा होने की सम्भावना नहीं है। लोगों को देह का अहंकार ही बाधक होता
है। यही बात भिक्षु बता रहे हैं।
न केनचित् क्वापि कथंचनास्य द्वन्द्वोपरागः परतः परस्य।
यथाहमः संसृतिरूपिणः स्यादेवं प्रबुद्धो न बिभेति भूतैः ॥५७॥
आत्मा गुणों से भिन्न होते हुए शुद्ध है। वह माया से परे तथा आनन्दस्वरूप है। वह परिपूर्ण सच्चिदानंद है।
उसमें द्वंद्व की बाधा नहीं है। आत्ममन्दिर में द्वंद्व प्रवेश करने लायक बाधक हो सके इस प्रकार का कर्म, कार्य
अथवा क्रिया कैसी भी, कैसे भी और किसी से भी नहीं हो सकती। अभेद को द्वंद्व की बाधा नहीं होती, स्वानंद
का दुःख से सम्बन्ध नहीं है, फिर परिपूर्ण के विरुद्ध कौन रहेगा? परमानन्द एक अकेला ही रहता है।
(आशंका) आत्मा के द्वंद्व से संबंध नहीं होता और देह जड़ होने के कारण द्वंद्व नहीं जानता; तो फिर यह जो
सुख-दुःख की अत्यन्त प्रसिद्ध पीड़ा है, वह किसे होती है? (उत्तर) सुख-दुःख का भोग भोगने के लिये और
जन्म-मरण का भोग सहन करने का प्रमुख कारण देहाभिमान है। लेकिन उसका लक्षण भी समझ में नहीं आता।
जिस प्रकार पति के साथ रहकर सुवासिनी स्त्री व्यभिचार करे और उससे उसे गर्भ रह जाय तो वह किसी की
समझ में नहीं आता उसी प्रकार इस अभिमान का आश्चर्य है। वह ज्ञानस्वरूप से एकरूप होकर मिथ्या जीवत्व
दिखाकर अपनी इच्छा से सुख-दुःख भोगता है। जिस प्रकार राजा के आश्रय में रहने वाला कपटी प्रधान
राज्याधिकार के जोर पर अधर्म करता है, अनेक प्रकार से प्रजा का छल करता है, उसी प्रकार अहंकार भी शरीर
में अपने मन की करता रहता है। अग्नि की संगति से लोहा स्वयं अग्नि की ही तरह हो जाता है, उसे हाथ में
कौन पकड़ पायेगा? वह सबको आगे से झुलसा देता है। उसी प्रकार ज्ञानस्वरूप का अहंकार जब देहात्मता के

६४० श्रीमद् एकनाथी भागवत
योग से पूरी तरह उफन कर सुख-दुःखादिक जन्म-मरण बढ़ाने लगता है तो उसे काबू में कौन ला पायेगा ?
स्वप्न का देह केवल मन का खेल है। उस देह में भी मनपन रहता है। उसी प्रकार इस देह को भी मन ही
समझो। वह अभिमान के कारण कठिन और स्थूल बन गया है। इसे ध्यान में रखो कि कार्यकारण रूप में संसार
ही मन का अभिमान है। वह भयंकर सुख-दुःख बढ़ा कर जन्म-मरण का दुःख स्वयं भोगता है। बार-बार वही
भोग भोगते हुए कष्ट होता है लेकिन वह अपनी अहंता नहीं छोड़ता और देह का अपने ढंग से पोषण करता है।
चाहे ब्रह्मप्रलय ही क्यों न हो जाय लेकिन देह की अहंता नष्ट नहीं होती, प्रलय में भी अभिमान नष्ट नहीं होता।
वह सुख-दुःख भोगता रहता है। इस अभिमान में जीव की क्या स्थिति रहती है? वैसी ही, जिस प्रकार अड़हुल
के फूल पर स्फटिक रखने से वह स्फटिक फूल के ही रंग का दिखायी देता है लेकिन उसके जैसा नहीं होता।
आत्मस्वरूप में सुख-दुःख नहीं है। वह देह में स्पष्टरूप से दिखायी देता है। यह सुख-दुःख अविचार के कारण
मनोरम लगता है और कल्पना जैसा भासित होता है। वह देह मेरा ही है इस अभिमान से उसे मस्तक पर धारण
कर जन्म-मरण के चक्कर में फँस कर सुख-दुःख का स्वयं ही भोक्ता बनता है। इसी विचार से जो आत्मज्ञानी
होते हैं, उनके मन पर गुरुपदेश का तत्त्वज्ञान पूरी तरह अंकित होने के कारण वे जन में या वन में कहीं भी
देहाभिमानी नहीं रहते। इस प्रकार जो आत्मस्वरूप के अनुभव से बुद्धिमान हुए पुरुष रहते हैं उन्हें प्रारब्ध की
गति से, प्राणिमात्रों से कैसे भी दुःख क्यों न प्राप्त हो लेकिन उनकी आत्मस्वरूप स्थिति अटल रहती है। उनमें
प्राणिमात्र के प्रति न द्वेष उत्पन्न होता है और न उन पर क्रोध ही होता है। त्रिभुवन में वे स्वानंद में रहते हैं और
निश्चिंत होकर द्वंद्वरहित रहते हैं। ऐसा पुरुष संकट देखकर भयभीत नहीं होता और किसी को पराया नहीं
समझता। सभी आत्मस्वरूप होने के कारण वह सबके साथ अपनत्व का व्यवहार करता है। ज्ञाता सदा
भेदभावरहित होता है। उसमें समविषम भाव और भेदभाव नहीं होता। वह किसी से डरता भी नहीं है और किसी
से दुःख भी नहीं करता है। वह सदा सुख में और आत्मानंद में मगन रहता है। निन्दा हो या कष्ट हो वह बिना
उद्विग्न हुए, सब कुछ सहन कर सुखी पुरुष की तरह व्यवहार करता है, यही सिद्ध का प्रमुख लक्षण है, और
साधकों के लिये साधन भी वही है।
एतां स आस्थाय परात्मनिष्ठामध्यासितां पूर्वतमैर्महर्षिभिः ।
अहं तरिष्यामि दुरन्तपारं तमो मुकुन्दाङ्घ्रिनिषेवयैव ॥ ५८ ॥
देखो! मेरे पूर्व पुण्य के भाग्योदय से अद्वैत स्वरूप आत्मनिष्ठा मुझ में उत्पन्न हुई। उसी आत्मनिष्ठा के
आश्रय से मैं द्वंद्वरहित होकर अनेक प्रकार के दुःख सहन कर रहा हूँ। भेदभाव से दूर रहकर सुख-दुःख सहन
करने का गुण यही सिद्धों का स्वाभाविक लक्षण है। मेरा मुख्य रूप से यही साधन है। इसी के योग से मन पर
विजय होती है। यही परमार्थ का श्रेष्ठ साधन है। महान ऋषियों की यही आत्मनिष्ठा है। विष्णु का मुख्य भजन
यही है। इसी के योग से आत्मनिष्ठा साध्य होती है। इसके योग से द्वंद्व से होने वाले दुःख की बाधा नहीं होती।
इसी के योग से शाश्वत सुख की प्राप्ति होती है। यही आत्मविवेक हमें दुस्तर संसार से पार कराने वाला है।
संसारसागर पार करना अत्यन्त कठिन है, उसे पार करने के लिए आत्मविवेक उत्तम नौका है। उसका सद्गुरु
नाविक बनकर माया के उस किनारे पर पहुँचाता है। यह आत्मविवेक कैसे प्राप्त हो? उसकी चिन्ता करने की
आवश्यकता नहीं है। आत्मभावना से एकाग्र होकर भगवान की शरण जायें। लौकिक की लज्जा त्याग कर तथा
अभिमान का बोझ फेंक कर भगवान की शरण में जाना चाहिये, तभी आत्मविवेक प्राप्त होता है। जिस प्रकार
नन्हा बालक माँ की अनन्य भाव से शरण जाता है, उसी प्रकार अनन्य भाव से दिन-रात श्रीहरि की शरण में

तेईसवाँ अध्याय ६४१
जायें। हरि की शरण में जाने से जन्म-मरण अपना मुँह भी नहीं दिखाते। जब हरि स्वयं ही अपने भक्तों की रक्षा
करता है तो फिर द्वंद्व की पीड़ा कौन दे सकेगा ? श्रीहरि पूर्णरूप से मोक्षदाता हैं। उसकी शरण में कैसे जायें ? वह
अनंतस्वरूप होते हुए भी स्वयं निर्गुण है। वहाँ कौन जायेगा ? किन्तु हरि का स्वरूप अत्यन्त निर्गुण होते हुए भी,
उसकी सगुण मूर्ति का चिन्तन करने से, यदि वही मूर्ति मन में बस जाय तो भी द्वंद्व से होने वाले सारे दुःखों का
लय हो जाता है। यदि श्रीहरि की सम्पूर्ण मूर्ति मन में न बसती हो तो उनके चरणों का ही ध्यान करना चाहिये।
इससे जन्म-मरण भाग जाता है और भेदभाव भी अपने ही भय से स्वयं भाग जाते हैं। अगर उनके चरणों का भी
ध्यान सम्भव न हो तो केवल नाम-स्मरण करना चाहिये। उस नामस्मरण से यम और काल थर-थर काँपते हैं।
जहाँ हरिनाम का नित्य घोष चलता है, वहाँ मरण का भी मरण हो जाता है। जन्म का मुँह काला पड़ जाता है
और वह शरमा कर भाग जाता है। रामनाम के घोष के आगे भेदाभेद का दुःख ही कितना होता है ? नाम माहात्म्य
की गर्जना करते समय संसार का सारा भय ही उड़ जाता है। जिसकी वाणी निरन्तर नाम की गर्जना करती है,
उसके शब्दों में श्रीहरि का वास रहता है। उसके घर ऋद्धि-सिद्धि पानी भरती हैं, मुक्ति उसकी दासी बनकर
रहती है। स्वयं विकल्परहित, शुद्ध भक्तिभाव से सगुण ध्यान, निर्गुण चिंतन अथवा नामस्मरण आदि में से भक्त
भक्ति भाव से जो भी स्वीकार करेगा, वह सब सद्‌भक्ति से परिपूर्ण होता है। भक्ति भाव से भगवान से प्रीति करने
का नाम ही सच्ची भक्ति है। भक्तिभाव से ही श्रीहरि प्रसन्न होकर साधकों को आत्मशान्ति प्रदान करता है। उस
आत्मशांति के साथ ही करोड़ों द्वंद्वों के दुःख समाप्त हो जाते हैं। सारी सृष्टि परमानन्द से भर जाती है और 'मैं',
'तू' दृष्टि को नहीं दिखायी देता। ऐसे अभेदभाव से श्रीहरि के चरणों की सेवा करने पर मैं स्वयं ही मुझे
भवसागर से तारूँगा। लेकिन जो सचमुच ही श्रीहरि का भक्त हो जाता है उसका संसार ही नहीं होता। इस प्रकार
भिक्षु ने जिस गाथा का वर्णन किया, वह भगवान को बहुत अच्छी लगी। उनका अंतःकरण आनन्द से भर आया
और उन्होंने उद्धव का मस्तक सहलाया। ऐसी जो यह आत्मशान्ति है वह मेरे उद्धव को प्राप्त हो ऐसी भाव
विह्वलता मन में उत्पन्न होकर श्रीकृष्ण ने उद्धव से कहा-
श्रीभगवानुवाच
निर्विद्य नष्टद्रविणो गतक्लमः प्रव्रज्य गां पर्यटमान इत्थम्।
निराकृतोऽसद्‌भिरपि स्वधर्मादकम्पितोऽमूं मुनिराह गाथाम् ॥ ५९ ॥
जिसके विश्वास से वेदों का निर्माण हुआ, जिसके चरणों से गंगा का उद्गम हुआ, जिसका नाम संसार का
बन्धन तोड़ डालता है वह श्रीकृष्ण अपने मुख से उद्धव को बताने लगा। इसलिये उद्धव के भाग्य की प्रशंसा करनी
चाहिये। श्रीकृष्ण उस पर सन्तुष्ट हुआ और उसने उसके शाश्वत निवास के लिये आत्मशांति का मन्दिर दिखलाया।
उद्धव ! अच्छी तरह ध्यान देकर सुनो। जो धन का लोभी था उसका धन नष्ट होकर वह धननाश ही उस धन लोभी
पर प्रसन्न हुआ और उसे विवेकसम्पन्न वैरागी बनाया। जो धन लोभी पूरा पेट खा भी नहीं रहा था, जिसका कोई नाम
नहीं ले रहा था, उसे ही वैराग्य ने सर्वश्रेष्ठ बनाया। उसकी बात सदा मेरे मुख में रहती है। उसका नाम मेरे मुख में
रहता है। उसकी कृति का स्वयं मैं ही वर्णन करता हूँ। जो विवेकसम्पन्न वैरागी रहता है वह मुझे अत्यन्त प्रिय रहता
है। वैराग्य जैसा महान भाग्य संसार में और कोई नहीं है। उद्धव ! जो सचमुच विवेक और वैराग्य से युक्त रहता है
वह मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय है। विवेक और वैराग्य से जो सम्पन्न हो जाता है, वह मेरा हो जाता है, ऐसा समझ
लो। मैं उसकी बातों के वश में रहता हूँ और वह भी पूरी तरह मुझ पर समर्पित रहता है। लोभी का धन गया, धन

६४२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
के साथ मान अभिमान गया और उस अभिमान के ही साथ द्वंद्व के कारण होने वाला दुःख भी समाप्त हो गया। धन
के जाते ही विरक्ति उत्पन्न हुई, जिससे वह नियमित एकनिष्ठ संन्यासी बन गया। भिक्षा के लिये भटकते समय दुष्ट
लोगों ने अपने दुर्भाषणों से उसकी भर्त्सना की। अनेक प्रकार के विकारों से पीड़ित होने पर तथा नाना प्रकार के
उपद्रवों के चलते भी वह अपने दृढ़ निश्चय से नहीं डिगा। स्वधर्म के धैर्य ने उसे पूर्णरूप से अभेदस्वरूप बना
दिया था। संन्यासी का पूर्ण स्वधर्म यही है कि मैं देह से भिन्न नारायण स्वरूप हूँ। इस भाव ज्ञान से उसके
देहाभिमान का त्याग किया रहता है इसीलिये वह आत्मस्वरूप से नहीं डिगता। जिस प्रकार छाया पर प्रहार करने से
उस पुरुष को जरा भी भय नहीं होता, उसी प्रकार दुर्जन जब उसके देह को प्रताड़ित करते हैं तो उस निरहंकारी
पुरुष को दुःख या भय नहीं होता। देह को नाना प्रकार की पीड़ा होने पर उसकी जो देहातीत स्थिति हुई थी, उसी
की गाथा उस भिक्षु ने गाकर सुनायी और वही अब मैंने तुम्हें सुनायी। इसमें हमें जो सुख-दुःख का अनुभव होता है
वह हमारा भ्रम ही है ऐसा समझो। इसी बात का निरूपण श्रीकृष्ण स्वयं कर रहे हैं।
सुखदुःखप्रदो नान्यः पुरुषस्यात्मविभ्रमः।
मित्रोदासीनरिपवः संसारस्तमसः कृतः॥६०॥
अविद्यात्मक जो हमारा अज्ञान है, उसमें मन के स्वरूप से मन ही उत्पन्न होता है और वही मन भेदभाव
उत्पन्न कर सुख-दुःख भोगने को बाध्य करता है। आत्मा भेदरहित है। उसमें शत्रु, मित्र, उदासीन आदि भेद की
मन ही कल्पना करता है और वह मन स्वयं चालित करता है। इस प्रकार भेदभाव में मन का उलझे रहना ही
पुरुष का अज्ञान है। ऐसे भ्रमित पुरुष के लिये द्वंद्व दुःख के कारण संसार भयावह हो जाता है। मन ही सुख-
दुःख का कारण है और संसार भी मन की ही कल्पना है, यह ध्यान में रखो। उस मन का निग्रह कैसे किया जाय
इसका उपाय स्वयं श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
तस्मात् सर्वात्मना तात निगृहाण मनो धिया।
मय्यावेशितया युक्त एतावान् योगसंग्रहः ॥ ६१ ॥
जिसे संसार का दुःख नष्ट करना हो, उसे मन का नियंत्रण करना चाहिये क्योंकि त्रिभुवन में मन जैसा दुःख
देने वाला अन्य कोई नहीं है। मन अत्यन्त चंचल है, वह सहसा स्थिर नहीं हो पाता। इसलिये जिससे भेदभाव दूर
हो सके ऐसा दिन-रात विचार करने का उसे अवसर देना चाहिये। मन कहीं विवेक को धोखा देकर भाग न जाये
इसलिये इन दोनों के हाथों में बेड़ियाँ डाल कर इन्हें एक साथ रखना चाहिये ताकि यदि मन विकल्प उत्पन्न करने के
लिये भागना चाहे तो वहाँ विकल्प को नष्ट करने के लिये विवेक तत्पर होकर खड़ा रहे और जहाँ मन अधर्म की
ओर मुड़ना चाहे वहाँ विवेक उसे भगाने के लिये दौड़ कर आ जाये। मन यदि कामक्रोध के पास जाकर बैठता है तो
विवेक उसके केश पकड़ कर उसे पीछे खींचता है। मन यदि निन्दा के पास जाता है तो विवेक उसे चपत मारता है
मन विषय की ओर जाने की बात करता है तो विवेक उसके मस्तक में वैराग्य की लाठी से प्रहार करता है। मन
कल्पना के पीछे भागने लगता है तो विवेक उसे उससे परावृत्त करता है। परस्त्री और पराया धन की इच्छा कर यदि
मन उस ओर दौड़ने लगता है तो विवेक वहाँ जाकर भीषण युद्ध शुरु कर देता है। इस प्रकार मन और विवेक में
झगड़ा प्रारम्भ होकर शिकायत सद्गुरु के सामने आती है। उनका न्याय करने के लिये वह उन दोनों को अद्वैत के
बाड़े में बन्द कर देता है। उस स्थान को देखते ही मन का स्वभाव ही बदल जाता है और मन विवेक के साथ ऐक्य
स्थापित कर लेता है। वहाँ मन भी अपना मनपन भूल जाता है और विवेक मन का आकलन करना भूल जाता है।

तेईसवाँ अध्याय ६४३
जीव का जीवत्व नष्ट हो जाता है और अद्वय के योग से सम्पूर्ण परब्रह्म ही बन जाता है। सुवर्ण के सर्पाकार
अलंकार बनाने पर उस पर नाग के ही अनुरूप फन, पूँछ आदि सुशोभित रहते हैं, लेकिन यदि नाग के आकार का
वह अलंकार तोड़ा न जाय तो सुवर्ण सुवर्ण के ही रूप में होने के कारण आग को उसका भान ही नहीं रहता। उसी
प्रकार पूर्ण ब्रह्म जानकर संसार को तोड़े बिना ही जीव जीवत्व भूल जाता है और मन मनस्वरूप से वंचित हो उठता
है। विवेक की ऐसी युक्ति से मन मेरे स्वरूप में प्रवेश करता है। जहाँ मन मनस्वरूप से उद्वेलित नहीं होता, उसी का
नाम मनोनिग्रह है। हे चतुर चित्तचिंतामणि! हे विवेक चक्रवर्त्ति चूड़ामणि! हे भक्तशिरोमणि उद्धव! तुम मनोनिग्रह
करने का प्रयास करो। श्रीकृष्ण मानों प्रेम से पागल हो गया था। उसने कहा—"अरे भाई! तुम यहाँ आदरपूर्वक
मनोनिग्रह करो। जो आदरपूर्वक मन का निग्रह कर मन से उत्पन्न होने वाले भेद का त्याग करता है, उसे, जिस
प्रकार माँ अपने बच्चों को नहीं छोड़ती, उसी प्रकार शान्ति उसे नहीं छोड़ती। सच्ची आत्मशान्ति यदि मन में रचबस
गयी हो तो उसे किसी प्रकार का भेदभाव पीड़ा नहीं पहुँचाता। जिसे बड़े-बड़े सिद्ध और योगी 'योगसंग्रह' कहते
हैं, वह यही है। संसार की स्फूर्ति छोड़कर चित्स्वरूप की ओर वृत्ति मुड़ती है और जीव-शिव एकसाथ आते हैं,
उसी का नाम है 'योगसंग्रह स्थिति'। ऐसे योगसंग्रह की शान्ति प्राप्त होने पर साधकों को द्वंद्व की बाधा नहीं होती।
लेकिन अब इतना ही पर्याप्त है। सारांश जिस किसी को भी यह भिक्षुगीत की भक्ति प्राप्त होगी उसे द्वंद्वों से मुक्ति
मिल जायेगी।"
य एतां भिक्षुणा गीतां ब्रह्मनिष्ठां समाहितः।
धारयञ्छ्रावयञ्छृण्वन् द्वन्द्वैर्नैवाभिभूयते॥६२॥
शान्ति प्राप्त करने के लिये कोटि-कोटि साधन करने पर भी वह नहीं प्राप्त होती। किन्तु इस भिक्षुगीत का
रहस्य मन में रखने से वह साधकों को अपने आप ही प्राप्त हो जाती है। वह योगनिष्ठा और ब्रह्मज्ञान ही
भिक्षुगीत का निरुपण है जो ध्यानपूर्वक इस मन में रखता है, उसके पास शान्ति दासी बनकर रहती है। इस
भिक्षुगीत का गूढार्थ जो शान्त चित्त से ध्यान में रखता है, उसे द्वंद्व की पीड़ा नहीं सताती और आत्मज्ञान से वह
बिलकुल शान्त हो जाता है। भिक्षुगीत के रहस्य के अनुरूप चलने से समाधान होगा इसमें आश्चर्य करने की
बात नहीं है। लेकिन जो केवल भक्तिपूर्वक इसका श्रवण करेगा, उसे भी द्वंद्व पीड़ा नहीं पहुँचाएंगे। पति अधिक
समय तक दूसरे देश में गया हो तो उसका पत्र पत्नी जिस उत्कंठा से सुनती है, उसी एकाग्रता से भिक्षुगीत सुनना
चाहिये। लड़का घर से भाग गया हो और उसका पता लगने का समाचार जब कोई उसकी माँ को देता है तो भाग
जाने का कारण आदि सुनकर माँ मन ही मन छटपटाती है, विह्वल होती है। ऐसे समय उसके पास जो अन्य
स्त्रियाँ होती हैं वे भी स्नेह से विह्वल हो उठती हैं किन्तु माँ के मन में जो छटपटाहट होती है वह अन्य स्त्रियों में
नहीं होती। उसी प्रकार भिक्षुगीत का श्रवण करते समय जिसका मन द्रवित हो उठता है, जो सात्त्विक वृत्ति से
परिपूर्ण हो जाता है, वह द्वंद्वों के चक्कर में नहीं फँसता। अस्तु! इस प्रकार आदरपूर्वक श्रवण सम्भव न भी हो तो
भी इसका नित्य पठन करने से भिक्षुगीत के प्रभाव से द्वंद्व उसका स्पर्श भी नहीं करते। सिंह के शरीर के दर्प से
ही मदोन्मत्त हाथी भागना शुरु करते हैं, उसी प्रकार भिक्षुगीत के पठन से द्वंद्वों में भगदड़ प्रारम्भ हो जाती है। मन
में लोभरहित होकर, जो साधु-सन्तों के सान्निध्य में भिक्षुगीत सुनेगा, उसे द्वंद्व स्पर्श भी नहीं करेंगे। इस भिक्षुगीत
का अर्थ अथवा इस भिक्षुगीत पाठ का श्रवण करने से यह भिक्षुगीत द्वंद्वों का निवारण करता है। यह मर्म श्रीकृष्ण
को मालूम था। उसने उसे उद्धव के कल्याण के लिये बतलाया। जिस भिक्षु के गीत की फलश्रुति स्वयं श्रीकृष्ण
अपने मुख से सुना रहे हों, उस भिक्षु के भाग्य का क्या वर्णन किया जाय? त्रिभुवन में वही एक धन्य पुरुष है।

६४४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
विवेक और वैराग्य को शरीर में धारण कर जो बड़े-बड़े द्वंद्वों को सहन करता है, वही भगवान को प्रिय बनता है,
यह बात उन्होंने उद्धव को स्पष्ट कर दी। उद्धव ने समस्त संसार पर उपकार किया है क्योंकि उसके लिये
श्रीकृष्ण ने अपना गुह्य और आध्यात्मिक ज्ञान का भण्डार खोलकर भिक्षुगीत का रहस्य प्रकट किया। उद्धव ने
यदि शांति के बारे में न पूछा होता तो श्रीकृष्ण ने यह वर्णन क्यों किया होता ? लेकिन श्रीकृष्ण को उद्धव से
अत्यन्त प्रेम था इसलिये उसने उद्धव को अनेक प्रकार से उपदेश किया। इस उपाय से दीन-हीन भी संसार सागर
पार कर लेते हैं। जगजीवन श्रीकृष्ण ने संसार का उद्धार करने के लिये ही उद्धव को उपदेश करने के बहाने ये
बातें कहीं। श्रीकृष्ण ने ऐसा भिक्षुगीत सुनाया है जिसमें वेदशास्त्रों का तात्पर्य, उपनिषदों का सार और वार्तिक में
निहित गूढ़ रहस्य है। इस भिक्षुगीत से जीव अपने आप ही आत्मा से तद्रूप हो जाता है। ऐसा यह गूढ़ज्ञान
श्रीकृष्ण ने भक्तों की कृपा के लिये बतलाया। इसके योग से जीव का जीवत्व नष्ट होता है, शिव का शिवत्व
विलीन हो जाता है, द्वंद्वों का पीड़ा देने का गुण नष्ट हो जाता है और आत्मांनंद का भण्डार खुल जाता है। जहाँ
वेद मौन रह गये, शब्द शास्त्र भी लजा गये ऐसा उत्कृष्ट वह भिक्षुगीत मुझ जैसे साधारण पुरुष ने सुनाया। जिस
प्रकार राम ने डूबने वाले पत्थरों को तारा, उसी प्रकार मैं जड़, मूढ़ और अज्ञानी होते हुए भी जनार्दन की कृपा
मुझसे ब्रह्मज्ञान कहलवा रही है। जो अहिल्या व्यभिचारिणी थी वह श्रीराम के चरणों में लगने के कारण, उसके
नामस्मरण से पाप भी नष्ट हो जाते हैं। उसका नाम प्रातःस्मरणीय लोगों की श्रेणी में लिखा हुआ है। उसी प्रकार
यह सद्गुरु की कृपा का प्रसाद है। मेरी प्राकृत जड़ और मूढ़ वाणी साधु और ज्ञाता स्वीकार कर सकें ऐसे भाषण
आपने मुझसे कहलवाये। सरस्वती जिस पर प्रसन्न होती हैं, वह गूँगा होने पर भी वेदशास्त्र बोलता है उसी प्रकार
जनार्दन मुझ पर प्रसन्न हुए और प्राकृत भाषा में भिक्षुगीत गवाया। जिसके हाथ में राजमुद्रा रहती है, उसे सब
लोग सम्मान देते हैं। उसी प्रकार जनार्दन ने ही मेरी वाणी को श्रेष्ठ बनाया। बच्चे के तोतले बोल सुनकर माँ
प्रसन्न होती है, उसी प्रकार मेरी संस्कारहीन वाणी भी संतजनों को प्रिय लगती है। मैं और मेरी अच्छी-बुरी बातें
कौन-कौन स्वीकार करेगा ? क्योंकि मेरा मैं पन लेकर स्वयं जनार्दन स्वामी ही यह ग्रन्थ लिखवा रहे हैं। वैसे ही
यह भागवत है, तिस पर गूढ़ार्थ से भरा हुआ एकादश स्कन्ध और उसमें भी यह भिक्षुगीत पूर्णरूप से निर्द्वंद्व करने
वाला, अत्यन्त गूढ़ अर्थ से भरा हुआ है। उस भिक्षुगीत पर टीका लिखने वाला अकेला एक एकनाथ ही नहीं है
क्योंकि वह एकपन नष्ट कर ग्रंथार्थ का निरूपण जनार्दन ने कराया। उसमें न एक है न अनेक है। उसमें द्वंद्वों की
समता करने का कौशल है जिसके योग से ग्रन्थ का उत्तम स्वागत होता है। एका जनार्दन की शरण में है।
जनार्दन से उसका ऐक्य हो गया है। ऐसे ऐक्यरूप से यह भिक्षुगीत समाप्त किया। मेरे गुरु का भी गुरु, वही
योगियों का योगीश्वर इस भिक्षुगीत के अर्थ से सन्तुष्ट हुआ। उस अद्भुत आनन्द से उन्होंने मुझे आश्वासन दिया
और मुझे अभय का आशीर्वाद देकर आनन्द से डोलने लगे। एका जनार्दन की शरण में है। श्रोतागण सावधान हो
जाएँ। अगले अध्याय में श्रीकृष्ण प्रकृति-पुरुषों के लक्षण बतायेंगे। उस कथा का विचार मेरे अंतःकरण में घूम
रहा है इसलिये मैं सुख-दुःख द्वंद्व से अलग हो गया हूँ। आत्मज्ञान के योग से मेरा आत्मा से ऐक्य हो गया है।
संतसज्जनों को मैं दण्डवत् करता हूँ। श्रोताओं को भी दण्डवत् करता हूँ। अब एकनाथस्वरूप जनार्दन विनती
करते हैं कि आगे का निरूपण अत्यन्त मधुर और रस से परिपूर्ण है।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादश स्कंधे श्रीकृष्ण उद्धव संवादे एकाकार टीकायां
भिक्षुगीत निरूपणं नाम त्रयोविंशतितमोध्यायः ॥
श्रीकृष्णार्पणमस्तु।

चौबीसवाँ अध्याय

हे ओंकारस्वरूप गुणातीत ! तुम्हें नमस्कार है। हे व्यक्तिरहित ! हे अव्यक्त ! तुझमें द्वैत की बात ही नहीं है।
तुम अद्वैत में ही रहने वाले हो। अद्वैत ही तुम्हारा अपना निवास है। वहाँ देवी-देवता आदि का भेदभाव नहीं है।
वहाँ उदय-अस्त नहीं है, क्योंकि सूर्य और चन्द्रमा को वहाँ कोई स्थान ही नहीं है। वहाँ शब्द के साथ वेद लीन
हो गया। बुद्धि को ज्ञान मिथ्या लगने लगा। वहाँ रत्तीभर भी भेदभाव नहीं है। एक अद्वयानंद ही भरा हुआ है।
ऐसे अद्वैत में प्रकृति पुरुषों की कहानी केवल अज्ञानी लोग ही ज्ञानी होने का ढोंग रचकर बड़ी चतुरता से सुनाते
हैं क्योंकि वास्तव में जहाँ 'मैं' और 'तू' के लिये स्थान नहीं है, वहाँ प्रकृति और पुरुष के लिये स्थान कहाँ मिल
पाएगा ? जिसके गर्भ में आने की भी सम्भावना नहीं रहती, उसकी जन्मपत्रिका बनाकर सुनाते हैं। जिसका जन्म
ही नहीं हुआ उसका श्राद्ध करना क्या उचित है? कोई बाँझ स्त्री के बेटे के विवाह समारोह में चलने के लिये
कहे तो अज्ञानी को यह बात सच और ज्ञानी को मिथ्या लगती है, वही बात प्रकृति-पुरुषों की है। इस प्रकार जो
मिथ्या है उसे सच बना दिया जाय और एक में ही अनेकता दिखाई जाय तो भी उसका एकपन नहीं टूटता। इस
प्रकार एकपन से एक ही होने के कारण वह स्वयं ही अपनी पत्नी बना और पत्नी का पति भी खुद ही बना। यह
विलक्षण प्रेम समझ से बाहर है। जिस प्रकार अर्धनारीश्वर की मूर्ति में जो पुरुष है वही स्त्री रहता है, उसी प्रकार
संसार में प्रकृति और पुरुष एक साथ रहते हैं। वह पुरुष और उस पतिव्रता में एकात्मभाव से अत्यन्त प्रेम है।
एक-दूसरे से अलग रहकर वे एक पग भी नहीं चल सकते। दोनों सदा एक साथ रहते हैं, दोनों का परिधान एक
है, दोनों एक ही सत्ता के अधीन रहते हैं, दोनों एक ही जीव बन कर रहते हैं। दोनों एक ही चीज देखते हैं, एक
ही चीज खाते हैं, दोनों की बातें एक-सी होती हैं और करना भी एक-सा ही होता है। दोनों का प्रेम कितना
अलौकिक है। वे एक-दूसरे के बिना विष भी नहीं खा सकते। वे दूसरे के बिना पानी भी नहीं पीते। एक-दूसरे
के बिना वे अन्धे ही रहते हैं। उसमें पत्नी का कर्तृत्व तो और भी विचित्र है। उस नपुंसक को यह पुरुषत्व प्रदान
करती है और फिर यह सदा उसी के अधीन रहता है। फिर यह उसी की आँखों से देखता है, उसके ही मुख से
बोलता हे, उसके ही कारण यह सुख-दुःख भोगता है, उसके ही कारण बन्ध मोक्ष का स्वाद चखता है। उसके
ही कारण 'मैं ब्रह्म' कहलाता है, उसके कारण यह कर्माकर्म करता है और उसके ही कारण धर्माधर्म के परिणाम
के अनुसार मरण और जन्म भोगता है। उसके ही कारण उसके हाथों पाप होता है, उसके ही कारण उसे पुण्य
प्राप्त होता है, उसके ही कारण उसका महत्त्व बढ़ता है और उसके ही कारण उसका अधःपतन होता है। अब
तक अपनी प्रकृति इस पुरुष ने बढ़ायी और प्रकृति ने भी पतिव्रत धर्म के अनुसार आचरण कर पति को अपने
वश में रखा। इन दोनों का रिश्ता विचित्र है। ये दोनों सगे भाई-बहन थे अथवा वह बाप और वह उसकी कन्या
थी और अधिक विचार करें तो वह उसका पुत्र होता है। इस प्रकार उन दोनों ने अगम्यागमन (जिन स्त्री-पुरुषों
के लिये संभोग निषिद्ध है, उनसे संभोग करना) कर किसी तीसरे का सम्पर्क हुए बिना अनेक लोग उत्पन्न किये।
इस प्रकार अव्यभिचार रूपी व्यभिचार कर संसार का आकार बढ़ाया है। वह शंकर आदि के लिये भी अतर्क्य,
अगोचर और दुर्गम असाध्य है। यह अपनी ही शक्ति प्रकृति के साथ मिलकर शिवत्व के सारे सुख भोगता है।
उसका कोई गाँव नहीं है, ठौर ठिकाना नहीं है, रूप, नाम, काल, समय नहीं है, फिर भी प्रकृति ने केवल अपने

६४६ श्रीमद् एकनाथी भागवत

गुणों से उसे प्रबल किया है। प्रकृति ने अपने गुणों से ही वर्ण, व्यक्ति, रूप, नाम आदि नाना प्रकार के वैभव से
अपने पति को स्वरूप दिया। तब शिव ने अपना पूर्णत्व छोड़कर शिवत्व धारण किया और वह प्रकृति सुहागिन
पतिव्रता रहकर रूप और नाम से शिव की पूजा करती है। उन दोनों के संगम से ही सारा संसार उत्पन्न हुआ है।
लेकिन उसमें तीसरी कोई भी बात नहीं दिखायी देती, और भिन्नता दिखाने का प्रयत्न करने पर भी अनन्य भाव
से स्थापित एकता भंग नहीं होती। सारा त्रिभुवन ढूँढ़ने पर भी तीसरी चीज नहीं दिखायी देती। प्रकृति और पुरुष
से ही सारा संसार भरा हुआ है। दोनों में इतना प्रेम है कि वे अनन्य भाव से एक-दूसरे से चिपके रहते हैं। एक
अणु में भी वे अपनी मालकियत के हक से रहते हैं। यदि पति न हो तो वह पतिव्रता पूरी तरह समाप्त ही हो
जायेगी और पति स्त्री के बिना अस्तित्वहीन हो जायेगा। वह वास्तव में कुछ न होते हुए ही पति बन गया है।
शिव सचमुच सदा निःसंग, बिना कोई कर्म किये ही रहता है। लेकिन उसकी स्त्री अपने प्रेमपाश से उसे वश में
कर उसे अनेक प्रकार के सुख-दुःख भोगने को विवश करती है। इस प्रकार प्रकृति ने अपने पति को गृहकर्म में
उलझा दिया और फिर उस पर प्रपंच का अधिकार जताने लगी। प्रकृति पतिव्रता होती है तथा कभी पति से
वंचना नहीं करती। वह अनेक कर्माकर्म में कष्ट सह कर भी अनेक प्रकार के सुख-दुःख पति को देती है और
आश्चर्य की बात तो यह है कि पत्नी जो कमाती है, वह पति खाता है। कारण यह है कि पत्नी के बिना उसे
एक कौड़ी भी नहीं प्राप्त होती। प्रकृति पतिव्रताओं में बिल्कुल श्रेष्ठ है। उसने अपने गुणों से ही पति को वश में
किया है। वह सुगृहिणी रात-दिन पति से वासना तंतुरूपी सेवई का सेवन कराती है। जब प्रकृति के भय से वह
भी संसार सागर में जलक्रीड़ा करने लगता है, उस समय प्रकृति ही जबर्दस्ती से पुरुष को उसमें डुबाती है।
कभी-कँभी पुरुष भी प्रकृति को डुबोता है। ऐसी प्रकृति की सोहबत में जब पुरुष के पीछे पंचमहाभूत लग जाते
हैं, उस समय वह साकार होकर जन्म-मरण की डुबकी लगाता रहता है। ऐसी प्रकृति के भय से पुरुष पागल बन
गया है और अपना मूलरूप भूल जाने के कारण प्रकृति ने उसे दीनहीन बना दिया है। इस प्रकार पूर्णत्व को
भूलकर वह जीव और शिव का भेद स्वयं ही भोगने लगता है। उसे पुनः उसके मूलस्वरूप में लाने में गुरुराज ही
पूर्णरूप से कुशल हैं। उसके वचन का इतना प्रभाव रहता है कि उसके एक ही शब्द पर जीव का जीवत्व समाप्त
हो जाता है और शिव को शिव पद का स्थान मिलता है। उसका उपदेश भक्तिभाव से सुनने पर अहंकार तत्काल
नष्ट हो जाता है, जन्म-मरण का फेरा टूटता है और संसार का भय दृष्टि को दिखायी भी नहीं देता। जिसकी
कृपादृष्टि से जीव और शिव का बन्धन टूट जाता है माया मिथ्या होकर पूर्णरूप से उड़ जाती है और पूर्णत्व का
भण्डार खुल जाता है। शिव अपना शिवत्त्व भूलकर जब दूर चला जाता है, तभी वह अपने मूलस्वरूप में आने के
लिये जब गुरु से आज्ञा माँगता है तभी उसे उसका मूल शिवस्वरूप प्राप्त होता है। सद्गुरु की ऐसी महिमा है।
उसका वर्णन मैं शब्दों में कैसे करूँ? लेकिन गौरव की वाणी से वर्णन करने के लिये मेरे मुख से साक्षात् गुरुराज
ही बोलते हैं। अतः वर्णन करने का श्रेय मैं अपने माथे कैसे ले सकता हूँ? गुरु ने तो सारा अहंकार ही छीन
लिया है अतः मैं कर्त्ता कैसे हो सकता हूँ? तिस पर ऐसे प्रसंग में यदि मैं अहंता स्वीकार भी करता हूँ तो मेरे
'मैंपन' में गुरु का ही वास है। गुरु के सिवा कोई स्थान रिक्त नहीं है इसलिये 'मैंपन' के माथे पर गुरुराज ही हैं।
मेरा जो 'मैंपन' है वह सद्गुरु स्वयं ही बन गये हैं। अतः हम दोनों का रूप एक ही हो गया है, केवल नाम
अलग-अलग है। वैसे, एका और जनार्दन ये दोनों ऐक्य रूप से एक ही हैं। सर्वत्र जनार्दन ही है, लेकिन वही
उपनाम से एकनाथ हो गया है और उसी के नाम से श्रीमद्भागवत का अर्थ देशी भाषा में बताया। अब तेईसवें
अध्याय के अन्त में भगवान ने उद्धव से यह कहा था कि यदि हमें द्वंद्व भोग प्राप्त हों तो उन्हें शान्तिपूर्वक सहन

चौबीसवाँ अध्याय ६४७
करना चाहिये। जिनके मन में अटल शान्ति का वास होता है वे मुझ अजेय को भी जीत लेते हैं। वही वास्तव में
परमार्थ साधक होते हैं ऐसा श्रीकृष्ण ने स्वमुख से कहा है। कृष्ण का वह भाषण सुनकर उद्धव का मन चौंक
उठा। उसने सोचा कि भेदाभेद सहन करने का यह काम तो अत्यन्त कठिन है। वह मुझसे कैसे सध पायेगा?
फिर, भेदाभेद सहन करने के लिये साधन क्या है, यह पूछने पर भगवान नाराज हो जायेंगे। इसलिये उद्धव
संकोच के मारे मौन रह गया। भगवान ने उद्धव के मन का हेतु जान कर द्वंद्व को सहन करने का उपाय मूल से
ही बताया। पुरुष अद्वयगुण से परिपूर्ण है तथा वह प्रकृति से भिन्न है यह आत्मज्ञान मन में जम जाने पर द्वंद्व की
बाधा नहीं होती। इसलिये द्वंद्वों पर पूर्णरूप से विजय प्राप्त करने के लिये प्रकृति पुरुषों का विवेचन उद्धव के पूछे
बिना ही श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं। श्रीकृष्ण भक्तों के अंतःकरण की बात जानता है इसीलिये वह भक्तों का
अंतरात्मा है। वह अपने भक्तों के कल्याण के लिये पूर्ण परमार्थ बता रहा है। भक्तों का मनोगत जानकर कृपालु
श्रीकृष्ण उन भक्तों के हित के लिये कृपापूर्वक बता रहा है। संसार में उद्धव अपने भाग्य के कारण धन्य है
क्योंकि त्रिभुवन का देवता श्रीकृष्ण स्वयं ही कृपा की वर्षा कर प्रकृतिपुरुष का रहस्य उसे बता रहा है। उद्धव ने
अपनी शंका स्पष्ट न करने पर भी, श्रीकृष्ण उसका निरूपण सुनाने लगा। कृष्ण जिसे तारने की बात करते हैं,
वह पहले ही तर गया ऐसा समझना चाहिये। सारे संसार का उद्धार करने के लिये श्रीकृष्ण कृपापूर्वक बोलने
लगा। गौ बछड़े के प्यार के कारण जिस प्रकार पूरे घर को दूध देती है, उसी प्रकार पद्मनाभ कृष्ण ने उद्धव से
प्रेम के कारण सारे संसार का उद्धार किया।
श्रीभगवानुवाच
अथते सम्प्रवक्ष्यामि सांख्यं पूर्वैर्विनिश्चितम्।
यद् विज्ञाय पुमान् सद्यो जह्याद् वैकल्पिकं भ्रमम् ॥ १॥
जो योगियों का योगीन्द्र है, ज्ञानियों का ज्ञानेन्द्र है, भक्तचित्तरूप चकोर का चन्द्र है, जो यदुवंश का
यादवेन्द्र है, जो प्रकृति पुरुष से भिन्न है, उस श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा- उद्धव ! द्वंद्व सहन करने के प्रकार का
अत्यन्त गूढ विचार तुम्हें बताता हूँ, सुनो। जिस निरूपण को सुनते ही हम सुख-दुःख से बिलकुल विलग हैं यह
भाव उत्पन्न होता है, वह गुप्त ज्ञान सुनो। मैंने कपिलऋषि का अवतार लेकर अपनी माँ से (देवहुति को) प्रकृति
पुरुष के सम्बन्ध में सविस्तार बताकर उपदेश किया। वही पूर्व की बात सुनाऊँगा। इस बात को सुनने से मनुष्य
स्वयं ही ज्ञानसम्पन्न हो जाता है। पुरुष से प्रकृति भिन्न है और सारा सुख-दुःख उसी के पास है यह ध्यान में
रखो। सुख-दुःख केवल मायिक हैं यह ज्ञान जिसे हो गया वह उसी क्षण संसारभय का भ्रम त्याग देता है। जिस
प्रकार मोतियों का हार सर्प का भ्रम दूर होने के बाद ही गले में डालते हैं और फिर सर्प के भय का कष्ट नहीं रह
जाता, उसी प्रकार शिव और शक्ति का विचार मैं तुम्हें पूरी तरह बताता हूँ। ब्रह्म आनन्दरूप में केवल एक है।
जिनके कारण उत्पन्न हुए द्वंद्वों के सुख-दुःख त्रिभुवन में भी नहीं समा पाते, ऐसे प्रकृति और पुरुष कहाँ से
आये? इसी अर्थ का निरूपण श्रीकृष्ण स्वयं कर रहे हैं। प्रकृति-पुरुषों का जन्म ही मुख्य रूप से सुख-दुःखों का
कारण है।
आसीज्ज्ञानमथो ह्यर्थ एकमेवाविकल्पितम्।
यदा विवेकनिपुणा आदौ कृतयुगेऽयुगे ॥ २॥
जिस प्रकार सोये हुए पुरुष की छाया उसके शरीर के नीचे ही समाप्त हो जाती है, उसी प्रकार सविकार

६४८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
माया को निगल कर ब्रह्म फिर से एक अकेला बच रहता है। ब्रह्म अकेला रहकर भी परिपूर्ण है। लेकिन ऐसा
कौन कहेगा ? उसका न नाम है, न रूप है और न पूर्ण व्यक्तित्व ही है। पूर्ण ब्रह्म में ब्रह्मपन का स्फुरण नहीं
होता। उसमें न युगों की संख्या है, न काल है, न समय है। दिनमान नहीं, घटिका और पल नहीं। शून्य से
शून्यत्व का मण्डल भी नहीं है। ऐसा यह ब्रह्म केवल परिपूर्ण स्वरूप के कारण है। उसमें मैं ब्रह्म हूँ का जो
स्फुरण होता है, वही माया का मुख्य लक्षण है। प्रकृति और पुरुष इन दोनों का जन्मस्थान वही है। वहीं से इन
जुड़वाँ फलों की उत्पत्ति होती है। जिस प्रकार पेट में अनाज का दाना रख कर सत्त्वहीन छिलका स्वयं बढ़ता है,
उसी प्रकार पुरुष के योग से यह प्रकृति पूर्णरूप से विकसित होती है। मिठास अन्दर रखकर कटहल के शरीर
पर काँटे बढ़ते रहते हैं, उसी प्रकार पुरुष के योग से प्रकृति को बहुत अहंकार होता है। जिस प्रकार आँख का
पानी जमकर आँख में ही परदा आ जाता है, उसी प्रकार ब्रह्म में भी मायारूपी मैल एकत्र होकर वह शुद्ध ब्रह्म
को भी मलिन कर देता है। आँख पर आया परदा दृष्टि को क्षीण करता है, उसी प्रकार माया आत्मानन्द के आड़े
आती है। उसकी ही माया उस पर विकसित होकर पुरुष को पागल बना देती है। इस प्रकार कर्त्ता के बिना ही
जिस कार्यकारण ने आकार लिया उसे कृतयुग कहने के लिये वेद तत्काल उद्यत हुआ। 'अ' कार, 'उ' कार तथा
'म' कार के साथ प्रकृति पुरुषों में वेद उत्पन्न हुआ। जिस प्रकार अंकुरित बीज में पहले तीन पत्तों का उद्भव
होता है, उसी प्रकार उस वेद का भावार्थ वही है कि ब्रह्म ही सत्य हैऔर माया मिथ्या है और यदि हम भेदाभेद
का त्याग करें तो ब्रह्मस्वरूप की प्राप्ति होती है। विचारशील और कुशल लोग यह बात जानते हैं। इस प्रकार जो
वेद के विचार से, अभेद भावना से योगी बनते हैं, वे कृतयुग से लेकर कलियुग तक विचरण करते समय सदा
युगरहित ही रहते हैं। उन्हें युग का बन्धन नहीं होता। कृतयुगादि जो युगों की पंक्तियाँ हैं या चराचरादि जो नाना
प्रकार के व्यक्ति हैं उन्हें प्रकृति ही उत्पन्न करती है। उस प्रकृति की उत्पत्ति श्रीकृष्ण बताते हैं।
तन्मायाफलरूपेण केवलं निर्विकल्पितम्।
वाङ्मनोऽगोचरं सत्यं द्विधा समभवद् बृहत् ॥ ३ ॥
जो परब्रह्म है, वह सर्वव्यापी है, जिसमें रूप और नाम का प्रवेश नहीं है, जो मन और बुद्धि को भी दुर्गम
है और इन्द्रियों के लिये भी जो दुर्गम है, जो सचमुच ही सत्यस्वरूप है, जो परा से परे है और जो निर्विकार तत्त्व
है, उस परब्रह्म में माया के चमत्कार तर्क से परे हैं। वह परब्रह्म में ही दृश्य और द्रष्टा का विकार उत्पन्न करती
है, वही वास्तव में प्रकृति और पुरुष बन जाती है और इस प्रकार चराचर की वृद्धि करती है। जिस प्रकार स्वरूप
के साथ ही छाया की मूर्ति उत्पन्न होती है, उसी प्रकार ब्रह्म में माया की स्थिति है। उसी ने शिव-शक्ति को पुरुष
और प्रकृति इस भेद से उत्पन्न किया है। ब्रह्माण्ड में जो ईश्वर का स्वरूप होता है वही पिण्ड में (देह में) जीव
का रूप ले लेता है। इस प्रकार प्रकृति-पुरुष की यह जोड़ी माया ने ही दो प्रकार की बनायी है। ब्रह्म अच्छेद्य है,
ऐसा वेद कहते हैं। उसे फाड़कर दो भाग कैसे किये? उसी प्रकार जैसे दर्पण में हमें अपना मुख अलग प्रकार
का दिखायी देता है। उसी प्रकार हम यदि पूर्व की ओर मुँह करके खड़े हो जाएँ तो हमें दर्पण में अपना
प्रतिबिम्ब पूर्वाभिमुख नहीं दिखायी देता। वह हमारे सामने ही (पश्चिमाभिमुख) रहता है। यही माया का
चमत्कार है अर्थात् पुरुष यदि पूर्व की ओर देख रहा है तो प्रतिबिम्ब पश्चिम की ओर रहता है। उसी प्रकार
आत्मदृष्टि स्वरूप की ओर रहती है और जीवदृष्टि प्रपंच की ओर रहती है। इसलिये जीवस्वरूप के सम्मुख हो
नहीं पाता। जीव ठीक विपरीत दिशा की ओर देखता रहता है। उसी प्रकार ब्रह्म में ब्रह्म का जो स्फुरण होता है

चौबीसवाँ अध्याय ६४९
वही मूल माया का स्वरूप है। वहाँ हम ईश्वर के स्वस्वरूप से ही अपने सामने सन्मुख होते हैं। वास्तव में जो
शुद्ध और अद्वितीय ब्रह्म है, उसमें माया का सम्बन्ध मिथ्या है। किन्तु उस माया ने अभेद में भी भेद उत्पन्न कर
शिव और शक्ति (पुरुष और प्रकृति) अलग-अलग बना दिये।
तयोरेकतरो ह्यर्थः प्रकृतिः सोभयात्मिका।
ज्ञानं त्वन्यतमो भावः पुरुषः सोऽभिधीयते ॥ ४॥
उन दो भागों में प्रकृति का भाग विकारयुक्त है तथा पुरुष का भाग अविकारी है ऐसा श्रीकृष्ण स्वयं बताते
हैं। वहाँ पुरुष स्वयं ही अपनी स्त्री बनता है और स्वयं ही उस स्त्री का पति बनता है। इस प्रकार एक में ही
द्विधाभाव दिखा कर शिव और शक्ति ये दो भाग बना दिये। जिस प्रकार हमारा शरीर एक ही होने पर भी उसमें
दायाँ और बायाँ ये दो भाग होते हैं, उसी प्रकार प्रकृति और पुरुष ये भाग भी पूर्णरूप से मायिक हैं, ऐसा समझना
चाहिये। अर्धनारीश्वर में जो पुरुष है, वही स्त्री रहता है। प्रकृति पुरुष का भी वही प्रकार है। अर्थात् उन दोनों
का शरीर एक होकर, उनका आत्मा भी एक है। जब पुरुष का भाग छिपाती है तो प्रकृति को स्वेच्छा से नाचने
देती है और जब प्रकृति का भाग छिपाती है तो पुरुष का स्वरूप स्पष्ट दिखायी देता है। प्रकृति और पुरुष के
बीच का भिन्न भाग जब टूटता है तब न पुरुष रहता है, न प्रकृति। उस समय हमारा स्वस्वरूप ही प्रकट होता है।
सारांश, स्त्री-पुरुष व्यक्ति यह भेद ही समूल व्यर्थ है। इस प्रकार प्रकृति मायिक होने के कारण मिथ्या है। उससे
गुण उत्पन्न होते हैं और उन गुणों से संसार उत्पन्न होता है, ऐसा श्रीकृष्ण स्वयं बताते हैं।
तमो रजः सत्त्वमिति प्रकृतेरभवन् गुणाः।
मया प्रक्षोभ्यमाणायाः पुरुषानुमतेन च॥५॥
प्रकृति पूर्णतयः गुणमयी है उसे पुरुषदृष्टि प्राप्त होने पर तीनों गुण प्रकट करती है। श्रीकृष्ण यही बात
अपने निरूपण में बताते हैं। सूर्य की दृष्टि पहुँचते ही कमल की कली अलग-अलग पंखुड़ियों से विकसित होती
है लेकिन वे सारी पंखुड़िया उस कली में ही होती हैं, उसी प्रकार प्रकृति ईश्वर की दृष्टि मात्र से ही अपने गर्भ
में गुणों को धारण कर गर्भिणी होती है और सत्त्व, रज और तम इन तीन गुणों को उत्पन्न करती है। जिस प्रकार
बीज पानी से फूल कर द्विदलों को खोलता है और उसमें से तीन पत्तों का अंकुर बाहर आता है, उसी प्रकार मुझ
परमात्मा ने स्वयं पुरुषत्व पाकर तथा प्रकृति को पूर्ण रूप से क्षुब्ध कर तीनों गुण प्रकट किये हैं। सूर्य की किरणों
से जिस प्रकार सूर्यकांत पत्थर से अग्नि प्रकट होता है, उसी प्रकार पुरुष जब प्रकृति का उपभोग करता है तो वह
तीनों गुण प्रकट करती है।
तेभ्यः समभवत् सूत्रं महान् सूत्रेण संयुतः।
ततो विकुर्वतो जातोऽहंकारो यो विमोहनः ॥ ६॥
वे तीनों गुण भिन्न-भिन्न हैं किन्तु उस भिन्नता में भी वे एक साथ बढ़ते रहते हैं। उनके नाम हैं सूत्र, प्रधान
और क्रिया। क्रियाशक्ति में जड़त्त्व होता है। उसमें जो चेतनात्मक ज्ञान उत्पन्न होता है उसी का नाम महत्तत्त्व है।
यह अलग नाम उसे इसी कारण प्राप्त हुआ है। महत्तत्त्व और प्रधान इन दोनों का स्वरूप एक ही है। वहाँ क्रिया
और ज्ञान का स्फुरण होता है, इसीलिये दोनों के नाम भिन्न हैं। क्रियायुक्त जिस ज्ञान का स्फुरण होता है, वहीं
अभिमान जागृत होता है और तीन गुणों से पूर्ण अहंकार वहाँ उत्पन्न होता है। अहंकार जब भीषण रूप से
उफनता है तो वह शिव को शिवत्त्व का विस्मरण कराता है और देहात्मवाद का पूरी तरह भुलावा देकर जन्म-

६५० श्रीमद् एकनाथी भागवत
मरण का भोग भोगने को बाध्य करता है। उस अहंकार की सम्मोहक शक्ति संसार के भ्रम से भ्रमित करती है।
अहंकार से किस प्रकार विकार उत्पन्न होते हैं, उसके बारे में श्रीकृष्ण बताते हैं।
वैकारिकस्तैजसश्च तामसश्चेत्यहं त्रिवृत्।
तन्मात्रेन्द्रियमनसां कारणं चिदचिन्मयः ॥७॥
अहंकार अत्यन्त असाध्य है। सत्त्वादि गुणों के अनुसार उसके तीन प्रकार हैं। गुण और अहंता यही बड़ा
संसार है। गुणों का विकार ऐसा है कि पहले सात्त्विक अहंकार उत्पन्न होकर, वह अंतःकरण को प्रकाशित करता
है। वही अनेक देवताओं में विकार उत्पन्न करने वाला है, इसलिये उसे 'वैकारिक' कहते हैं। राजस अहंकार
ज्ञानेन्द्रियों का तथा कर्मेन्द्रियों का प्रकाशक रहता है। राजस तेज का विलास उसे अच्छा लगता है इसलिये उसे
'तैजस' कहते हैं। तामस अहंकार का परिणाम यह होता है कि वह सूक्ष्म परमाणुरूप भूतों को उत्पन्न करता है।
इसीलिये, हे उद्धव! उसे 'भूतादि' कहते हैं। अहंकार का प्रभाव विचित्र है। वह सचेतन को अचेतन (माया) से
जोड़ता है और ज्ञान-अज्ञान से पक्का मेल कराकर बड़े प्रेम से अपना ब्याह रचाता है। जीव ज्ञानस्वरूप है,
उसका जड़ देह के साथ ब्याह करा देता है। अभिमान ही 'ॐ पुण्याहं' कहकर उसे एक करने वाला ज्योतिषी
है। जीव विशुद्ध ज्ञानस्वरूप है तथा उसे हड्डियों के ढाँचे में जकड़ देता है। इस प्रकार अहंकार अत्यन्त उत्पाती
है। वही सात्त्विक, राजस और तामस का चारों ओर विस्तार कर संसार की वृद्धि करता है।
अर्थस्तन्मात्रिकाज्जज्ञे तामसादिन्द्रियाणि च।
तैजसाद् देवता आसन्नेकादश च वैकृतात् ॥८॥
विषय ही महाभूत हैं। तामसगुण ने उन पंचमहाभूतों का एक-दूसरे से मिले बिना अलग-अलग निर्माण
किया है। वे पंचमहाभूत विषयों से उत्पन्न होते हैं। अब उनके ही बारे में बताता हूँ, सुनो। शब्द से आकाश उत्पन्न
होता है, स्पर्श से वायु उत्पन्न होता है, रूप से तेज उत्पन्न होता है और रस से जल उत्पन्न होता है। गंध से कठोर
पृथ्वी का जल में निर्माण हुआ है। इस प्रकार इनका निर्माण अलग-अलग होता दिखायी देने पर भी उनकी परस्पर
एकता भंग नहीं होती। उसका कारण इस प्रकार है—निःशब्द (परब्रह्म) से शब्द का निर्माण हुआ और उसने
आकाश उत्पन्न किया। आकाश में सूक्ष्म स्पर्श उत्पन्न हुआ और उस स्पर्श ने वायु का निर्माण किया। इस प्रकार वायु
में शब्द और स्पर्श इन दोनों का वास रहता है। उस वायु ने रूप उत्पन्न किया और उस रूप से तेज का उदय हुआ।
उत्पन्न हुए उस तेज में शब्द, स्पर्श और रूप इन तीनों का वास रहता है। रूप से रस उत्पन्न हुआ और उस रस से
जल का उद्भव हुआ। इस प्रकार जन्म लेनेवाले जल में शब्द, स्पर्श, रूप और रस का वास रहता है। इस प्रकार
विषयों में विषय मिलकर एक साथ रहते हैं। जल में गंध उत्पन्न होता है और उस गन्ध से शुद्ध पृथ्वी का निर्माण
होता है। ऐसी यह पृथ्वी शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध इन पाँच विषयों से युक्त है। ऐसे ये विषययुक्त विविध
पंचमहाभूत जो पहले सूक्ष्म रीति से विलीन हुए रहते हैं, वे ही अब स्थूल रूप लेकर पंचमहाभूत के नाम से प्रसिद्ध
हो जाते हैं। पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय और कान आदि दस इन्द्रिय राजस अहंकार से अपने आप ही उत्पन्न होते
हैं। सत्त्वाहंकार के विकारों से मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार आदि चित्तचातुष्ट्य का चमत्कार उत्पन्न होता है और
प्रजापति-इंद्रादि ग्यारह देवतागण इन्द्रियों के अधिष्ठाता बन जाते हैं। वास्तव में महाभूत अत्यन्त जड़ हैं। इन्द्रियाँ
उनकी प्रवर्त्तक हैं, अंतःकरण उनका चालक है तथा देवता कर्म के प्रकाशक हैं। तीन प्रकार की अहंकार वृत्ति
गुणक्षोभ से क्षोभक शक्ति बन जाती है। इस प्रकार सारे ब्रह्माण्ड की रचना हुई है।

चौबीसवाँ अध्याय ६५१
मया संचोदिता भावाः सर्वे संहत्यकारिणः।
अण्डमुत्पादयामासुर्मायातनमुत्तमम् ॥९॥
भूतों में एक-दूसरे के प्रति वैरभाव रहता है। जल, पृथ्वी को निगलने के लिये दौड़ता रहता है; तेज
(अग्नि) निश्चित रूप से उस जल का विनाश करता है, तेज को वायु निगल लेता है, वायु को आकाश निगल
जाता है। इस प्रकार भूतों में भी परस्पर प्रेम भाव नहीं होता। उसमें मैं अंतःकरणस्वरूप से स्वयं प्रवेश कर सभी
भूतों को एकत्र लाकर उनकी मर्यादा की रक्षा करता हूँ। मैंने मर्यादा की सीमारेखा बना दी है इसलिये जल पृथ्वी
को घुला नहीं सकता। तेज ही शोषण क्रिया का नख उदक को नहीं लगा पाता। उसी प्रकार वायु भी तेज को
नहीं निगलता और वायु कितनी भी स्वेच्छाचारिता क्यों न करे लेकिन उसे आकाश कभी नहीं निगलता और न
उसकी गति पर ही प्रतिबन्ध लगाता है। इस प्रकार इन सारे महाभूतों ने मिलकर मुझ महापुरुष के रहने के लिये
इस ब्रह्माण्ड का निर्माण किया है। विशाल सप्त आवरणों के साथ विस्तीर्ण स्थान व्याप कर मयूर के अण्डे के
आकार का ब्रह्माण्ड निर्मित किया है।
तस्मिन्नहं समभवमण्डे सलिलसंस्थितौ।
मम नाभ्यामभूत् पद्मं विश्वाख्यं तत्र चात्मभूः ॥१०॥
इस प्रकार आज जो ब्रह्माण्ड अस्तित्व में है; उसमें स्वयंभू विश्वात्मा रहने वाला मैं नारायण अपनी लीला
से देहधारी बन गया। मेरी उस नाभि में विश्व का आधारभूत नाभिकमल उत्पन्न हुआ और उसमें उत्तम 'आत्मभू'
नामक ब्रह्मदेव का जन्म हुआ। वह उदर में गर्भस्थ रहकर योनिद्वार से इस संसार में नहीं आया था, बल्कि वह
मेरे आत्मा से स्वयंभू ही उत्पन्न हुआ था। इसीलिये ब्रह्मदेव को 'आत्मभू' कहते हैं। ब्रह्माण्ड स्वयं ही विराट् देह
है और विग्रह उसका प्रमुख भाग है। इस प्रकार ब्रह्मदेव मेरे नाभिकमल से उत्पन्न हुआ है। सृष्टि का निर्माण
करने के लिये पद्मनाभ के नाभिकमल में रजोगुण की प्रधानता बढ़ाकर ब्रह्मदेव ने स्वयं ही जन्म लिया।
सोऽसृजत्तपसा युक्तो रजसा मदनुग्रहात्।
लोकान् सपालान् विश्वात्मा भूर्भुवःस्वरिति त्रिधा ॥११॥
इस प्रकार रजोगुण प्रधान ब्रह्मदेव, जन्म से लेकर नाभिकमल में बैठ गया लेकिन वह उसके जन्म का
कारण जो मैं नारायण हूँ, उसे नहीं देख सका। वह स्वयं कमल में बैठा था, इसलिये कमल का मूल नहीं देख
सका। वह रजोगुण में लीन था इसलिये उसे सर्वत्र एकरूप समुद्र का जल ही दिखायी देने लगा। उस कमल का
मूल देखने के लिये उसने समुद्र में डुबकी ली और कितने ही दिन तक वह पानी में ही था फिर भी उसे कमल
के मूल का पता नहीं चला। अन्त में वह पानी के भय से घबरा गया और पानी के बाहर आकर लम्बी साँस लेने
लगा। फिर वह पुनः कमल पर आकर बैठ गया, लेकिन आगे क्या किया जाय, उसकी समझ में नहीं आ रहा
था। वह बोला, “हे अच्युत! दौड़कर आ जाओ और मुझ पर प्रसन्न हो। मुझ पर संसार के प्रति आया अंधत्व दूर
करो। तुम्हारे सिवा मेरा पूरी तरह संरक्षण करने वाला कोई नहीं है।” ब्रह्मदेव आखिर मेरी ही सृष्टि था। बेचारा
रज से अन्धा हो गया था। वह जब नाभिकमल से ही चिपक कर बैठ गया तो मुझे तत्काल उस पर दया आ
गयी। मुझ विश्वात्मा का ही वह पुत्र था लेकिन केवल जड़त्त्व के कारण स्तब्ध होकर रह गया। तब मैंने उस
तपोनिष्ठ को सृष्टि का निर्माण करने का उपदेश दिया। महाकल्पादिक के प्रारम्भ में मैंने अपनी आकाशवाणी से
'तप तव' इन दो शब्दों से श्रेष्ठ ब्रह्मदेव को उपदेश दिया। मेरे उपदेश के अनुसार तप करने के कारण उसके

६५२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
सत्त्वगुण में वृद्धि हुई और उसके पहले के उस सत्त्वगुण के कारण ही मैं साक्षात नारायण बन गया।
"त्रिकालाबाधित विश्वात्मा सचमुच तुम ही हो" इस आशय के चतुःश्लोकी भागवत का मैंने उसे उपदेश किया।
मेरे उपदेश से वह समबुद्धि होकर रह गया और इतने कल्प बीतने पर भी उसे मोह स्पर्श नहीं कर पाता। इस
प्रकार कल्प के प्रारम्भ में ब्रह्मदेव ने जब समाधि धारण की तो उसे आत्मबुद्धि प्राप्त होकर उसने यह सारी
उत्पत्ति करने का कार्य पूर्ण किया। देवता, राक्षस, मनुष्य, सर्प आदि के बस्ती वाले तीनों लोक, सात पाताल तथा
विलक्षण सात गोपुरों का भी उन्होंने निर्माण किया। 'भूः' अर्थात् पाताल लोक, 'भुवः' अर्थात् मृत्युलोक और
'स्वः' अर्थात् स्वर्गलोक इन्हीं को मिलाकर त्रिभुवन कहा गया है। कुल मिलाकर चौदह लोक हैं और वहाँ रहने
वाले लोकपालों का स्पष्ट वर्णन श्रीकृष्ण कर रहे हैं।
देवानामोक आसीत् स्वभूतानां च भुवः पदम्।
मर्त्यादीनां च भूर्लोकः सिद्धानां त्रितयात् परम्॥ १२॥
अधोऽसुराणां नागानां भूमेरोकोऽसृजत् प्रभुः।
त्रिलोक्यां गतयः सर्वाः कर्मणां त्रिगुणात्मनाम्॥ १३॥
पिछले श्लोक के अन्त में भूः, भुवः, स्वः इस प्रकार तीन लोकों का श्रीकृष्ण ने स्पष्ट वर्णन किया है।
उसी प्रकार अगले श्लोक में पाताल लोक का अर्थ बताया है और उसका मृत्युलोक से ऐक्य है इसका भी
यथातथ्य निरूपण किया है। इन्द्रादि समस्त देवताओं के रहने के लिये स्वर्ग ही एक स्थान है। यक्ष, राक्षस, भूत
और गन्धर्वों के रहने के लिय आकाश है और जहाँ से मोक्ष जा सकते हैं, परलोक जा सकते हैं, वह कर्मभूमि
अथवा अतल सप्त पाताल के साथ पृथ्वी बड़े भाग्य से मनुष्य को रहने के लिये मिली है। सिद्ध पुरुष त्रैलोक्य
के ऊपर रहते हैं। वह सिद्धों के रहने का सिद्धस्थान है। अतल, वितल, सुतल, रसातल, महातल, तलातल और
पाताल ये पृथ्वी के नीचे रहने वाले पाताल हैं। अब सप्त पाताल के अधिकारियों के भी नाम सुन लो। तो अतल
में मयासुर का पुत्र बल रहता है। वह पराक्रम में प्रबल है। उसके पास राक्षसों का बड़ा समुदाय है। वितल में
हाटकेश्वर है। कर्पूर की तरह गौरवर्ण जो उमाकांत है वही हाटकेश्वर है। वहाँ हाटक नाम की नदी बहती है
जिसमें सुवर्ण की राशियाँ बहती हैं। सुतल में महान भगवद्भक्त बली राजा है और उसका द्वारपाल विष्णु है।
प्रह्लाद भी उसके पास विष्णु भक्तों के साथ रहता है। शंकर ने त्रिपुरासुर का वध करने के उपरान्त रसातल में
मयासुर की स्थापना की। वह मायावी तथा महान पराक्रमी वीर सपरिवार वहीं रहता है। विष धारण करने वाले
क्रोध कद्रू कु पुत्र सर्प, वे सारे महातल में निवास करते हैं। तलातल में दानव रहते हैं, जिन्हें 'निवातकवची' वीर
कहते हैं। (वे प्रह्लाद के भाई संह्लाद के पुत्र हैं) वहाँ का राजा नाग है जो उन्हें पूज्य है। उस स्थान की रचना
अपूर्व है। सातवें पातल में नाग रहते हैं। जहाँ एक लाख नागों का समुदाय जिसकी सेवा में तत्पर है, ऐसे
वासुकि आदि अनेक महान नाग पद्मिनीयों के साथ विलास करते रहते हैं। जिस प्रकार स्वर्ग में रंभा, उर्वशी आदि
सुन्दर स्त्रियाँ हैं, उसी प्रकार पाताल में पद्मिनी नाम की स्त्रियाँ हैं। उनके सौन्दर्य का वर्णन परलोक में भी होता
रहता है। उसके नीचे तीन सौ योजन नीचे सहस्रमुख का शेषनाग रहता है। उसके शरीर पर ही मैं भगवान शयन
करता हूँ। इसके भी काफी नीचे अंधतामिस्रादि बड़े-बड़े नरक हैं। उससे भी नीचे कूर्म है तथा उसके नीचे
आवरणोदक है। जिनका स्वर्ग का भोग क्षीण होने लगता है और केवल अधोभाग का ही भोग भोगने का पुण्य
शेष रह जाता है उस पुण्य के क्रम से ही वे लोक सप्तपाताल में जन्म लेते हैं। जिसकी गाँठ में केवल पाप ही

चौबीसवाँ अध्याय ६५३

रहता है वह अनेक प्रकार के नरकों का भोग भोगता है। ऐसी यह सृष्टि त्रिलोकी ब्रह्मदेव की ही रचना है। हे
उद्धव ! जिसका मन इच्छारहित नहीं है, जिसने स्वप्न में भी विरक्ति का दर्शन नहीं किया है, उन्हें निश्चित रूप
से त्रैलोक्य से ऊपर गति नहीं है। जो मेरी भक्ति नहीं करते, जो मेरी कीर्ति नहीं सुनते, जो संसारबन्धन को तोड़ने
वाले मेरे रामनाम का उच्चार नहीं करते, उन्हें बार-बार स्वर्ग तथा नरक का भोग भोगना पड़ता है और वे बार-
बार पाताल लोक तथा मृत्युलोक में अनेक प्रकार की योनि में जन्म लेकर दुःख भोगते हैं। जो इन तीन गुणों में
लिप्त रहते हैं तथा सदैव लोभी बने रहते हैं, वे निरन्तर सकाम कर्म ही करते रहते हैं, उन्हें उनका त्रिगुणात्मक
धर्म कभी त्रैलोक्य के बाहर नहीं जाने देता। यह पाताल का वर्णन हुआ अब स्वर्ग की रचना सुनो। फिर अन्य
लोकों की रचना भी सुनाऊँगा। जहाँ तक सूर्य और चन्द्रमा का प्रकाश पहुँचता है वहीं तक पृथ्वी का महत्त्व है।
लेकिन लोगों की बस्ती नीचे पाताल से लेकर ऊपर स्वर्गलोक तक अनेक लोकों में है ही। जहाँ पैरों से चलते हैं,
वह भूलोक है। वहाँ से सूर्य तक भुवलोकों का विस्तार है। उस भुवलोक में यक्ष, रक्ष और गन्धर्वों की बस्ती है।
भुवलोक से भी ऊपर सूर्यलोक का विस्तार होता है। पृथ्वी से लक्ष योजन दूर सूर्यलोक है, यह ध्यान में रखो।
कालरूपी, सूत्रधार वायु निर्मित चक्र पर सूर्य, चन्द्रमा और तारागण इन्हें बड़े कौशल से सजाकर उन्हें गोल-गोल
घुमाता रहता है। लेकिन उस काल पर भी मेरा नियंत्रण है। मेरे भय से ही क्षण, लव, निमिष आदि विभागों में
आधिक्य या कमी नहीं आ पाती। इस कालचक्र की गति बड़ी आश्चर्यजनक है। एक महीने में सूर्य और चन्द्रमा
एक साथ आते हैं। नक्षत्रचक्र में चन्द्रमा का एक परिभ्रमण पूर्ण होने के दो दिन के बाद कुल मिलाकर २९ दिन
के बाद चन्द्र सूर्य के आड़े आता है। अमावस्या और प्रतिपदा के संधिकाल में जब चन्द्रमा अपने भ्रमण मार्ग में
यथावकाश चलता रहता है उस समय उसका राशि अंशादि स्थान सूर्य के जितना ही होता है। सूर्य के तेज के
कारण वह लोगों को दिखायी नहीं देता। इतनी-सी बात पर ज्योतिषी लोग उन दिन सजीव रहने वाले (आकाश
पर उपस्थित) चन्द्रमा को मृत कह देते हैं और सब लोग उसे सच मान लेते हैं। सूर्य और चन्द्रमा अपने अलग-
अलग रास्तों पर चलते हुए कभी एक-दूसरे से नहीं टकरायेंगे। किन्तु महीने के अन्त में (अमावस्या के दिन)
उनकी गति से उनके बिम्ब लक्षान्तर पर समान दूरी पर आ जाते हैं। जो ग्रह अपनी गति से सूर्य के आड़े आता है
(सूर्य के निकट होने के कारण नहीं दिखायी देता) उसके अस्त होने की सूचना ज्योतिषी देते हैं और लोगों को
उनकी बात सच लगती है क्योंकि उस समय वह ग्रह दिखायी भी नहीं देता। वेदांत में जो दृष्टि सृष्टि का
सिद्धान्त है वह ज्योतिषशास्त्र में भी सत्य है क्योंकि जो नहीं दिखायी देता उसका ज्योतिषी लोग अस्त मानते हैं
और जो दिखायी देता है, उसकी पूजा करते हैं। ग्रहण लगने के बाद वह कुछ समय तक बादलों के पीछे रहता
है, फिर भी यदि बादल न होते तो उन्हें ग्रहण दिखायी देता है। वे लोग उस काल को पर्वकाल मानते हैं लेकिन
वही ग्रहण जिस देश में दृश्य आकाश में नहीं होता (चन्द्रग्रहण यदि दिन में हो जाय तो उस समय चन्द्र दृश्य
आकाश में नहीं होता, उसी प्रकार रात्रि का सूर्यग्रहण भी दृश्य आकाश में नहीं होता) वहाँ के लोग ग्रहण लगा
हो ऐसा मानते ही नहीं हैं। सूर्य और चन्द्र के एक ओर राहुकेतु की बस्ती है। वे राहु केतु जब सूर्यचन्द्र के बिम्ब
के आड़े आते हैं तो उन्होंने सूर्य-चन्द्र को ग्रस लिया ऐसा कहा जाता है। वास्तव में यदि राहु सूर्य को निगलने
का प्रयास करे तो उसका मुँह ही जल गया होता है। एक बिम्ब के आड़े दूसरा बिम्ब आता है, यही उस ग्रहण
के सर्वग्रासों का सामान्य तत्त्व है। वास्तव में सूर्य अपने 'सूर्यमण्डल' में राजकाज करता है किन्तु सूर्यग्रहण के
समय उसके सर्वग्रास का माहात्म्य ज्योतिषी घर-घर में बताता रहता है और वह ग्रहण देखकर साधारण जनता
भी कोलाहल करने लगती है। सूर्य के खग्रास ग्रहण की बात सुनकर संसार में अपूर्व कोलाहल मच जाता है।

६५४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
किन्तु वास्तव में सूर्य और राहु की भेंट भी नहीं होती और अन्त तक उनका परस्पर स्पर्श भी नहीं होता।
ग्रहमण्डल भले ही तीव्र गति से पूर्व से पश्चिम की ओर जाता दिखायी दे लेकिन सूर्य चन्द्रादि की वास्तविक
गति वैसी नहीं होती। वे अपनी मर्यादा के अनुसार ही चलते रहते हैं (नक्षत्रमण्डल के क्रम के अनुसार पश्चिम
से पूर्व की ओर जाते रहते हैं। वास्तव में वे पूर्व से पश्चिम की ओर नहीं चलते लेकिन केवल वैसा आभास होता
है। सूर्यलोक से लक्ष-लक्ष योजन ऊपर चन्द्रलोक है (तैत्तिरीय संहिता, तैत्तिरीय ब्राह्मण और श्रीमद्भागवत की
ऐसी कल्पना है)। चन्द्रलोक से लक्ष-लक्ष योजन की दूरी पर नक्षत्रलोक है। उसके ऊपर दो लक्ष योजन के
अन्तर पर बुधलोक है। उसके ऊपर दो लक्ष योजन के अन्तर पर शुक्र लोक है। सारे दैत्य एक साथ मिलकर
जिसकी नित्य शरण में आते हैं वही दैत्यों का गुरु शुक्राचार्य है। शुक्र लोक से ऊपर दो लक्ष योजन के अन्तर पर
मंगल लोक आकाश में है। उससे ऊपर दो लाख योजन के अन्तर पर देवगुरु निवास करते हैं। इन्द्र, चन्द्र, वरुण,
सूर्य आदि देवता आदरपूर्वक नित्य आकर जिनके चरणों का वन्दन करते हैं, उसी गुरु का वह वृहस्पति लोक है।
उससे भी ऊपर दो लाख योजन के अन्तर पर सूर्यपुत्र शनि का वास है। उससे ऊपर एक लाख योजन के अन्तर
पर सप्तऋषि का निवासस्थान है। जहाँ सप्तऋषियों का समुदाय रहता है, वहीं अरुंधती भी रहती है और उससे
भी ऊपर इन्द्र के वैभव से सुशोभित अमरावती बसी हुई है। वहीं इन्द्र रहता है, ऐरावत पर आरोहण करता है,
मरुद्गण जिसके सभासद हैं, देवतागण ही जिसकी सेना है, जहाँ उच्चैःश्रवा नामक अश्व है, कल्पतरु का मनोहर
बगीचा है। कामधेनुओं के झुण्ड हैं और क्रीड़ा करने के लिये नंदनवन है। जहाँ की सीढ़ियाँ चिन्तामणि की बनी
हुई हैं जहाँ रंभा-उर्वशी सरीखी विलासिनी स्त्रियाँ हैं, जहाँ अष्टनायिकायें नृत्यांगना बनकर रंगसभा में नृत्य
प्रस्तुत करती हैं, ऐसे उस इन्द्र के वैभव से सजी हुई अमरावती का अधिपति इन्द्र है। यहीं स्वर्ग की सीमा
समाप्त होती है। यही सचमुच त्रैलोक्य है। अब इस त्रैलोक्य के बाहर एक लाख योजन के अन्तर पर
भक्तवत्सल श्रीहरि ने अपनी कृपा से ध्रुवमण्डल का निर्माण किया है। त्रैलोक्य में प्रलय ही क्यों न आ जाय
लेकिन ध्रुव को कभी भी अपने स्थान से नहीं हटना पड़ता। वह सदा अटल रहता है। इसीलिये ध्रुवपद को
अटल कहा जाता है। पृथ्‍वी से एक करोड़ योजन के अन्तर पर महर्लोक है, यह ध्यान में रखो। वहाँ कल्पांत तक
की आयु के लोग रहते हैं। वही उनका वसतिस्थान है और देखो। वहाँ से एक कोटि योजन के अन्तर पर
जनोलोक है। वहाँ जितेन्द्रिय तथा महोयोगी जैसे सनकादिक वास करते हैं। वहाँ से आगे जाने पर दो कोटि
योजन के अन्तर पर तपोलोक है। तपस्वी वैराजदेव ही वहाँ के सच्चे निवासी हैं। वहाँ से ऊपर चार कोटि योजन
के अन्तर पर जो प्रदेश है, वहाँ सत्यलोक है। वहाँ के अधिपति ब्रह्मदेव हैं। वहाँ चारों वेद मूर्तिमंत हैं, सुप्रसिद्ध
सर्व धर्ममूर्तिमंत है। शुद्ध ब्रह्मचर्य मूर्तिमंत है और साक्षात तप भी मूर्तिमंत है। वहाँ गायत्री मूर्तिमंत रहती है, वाणी
मूर्तिमंत रहती है, दया मूर्तिमंत रहती है और उस ब्रह्मदेव के घर में योग भी मूर्तिमंत रहता है। दक्षिणाग्नि,
गार्हपरय तथा आहवनीय इस प्रकार जो तीन अग्नि वास्तव में एकरूप होते हुए भी भिन्न-भिन्न मालूम होते हैं, वे
वहाँ मूर्तिमंत रहते हैं। सत्यलोक में सत्य मूर्तिमंत रहता है, वहाँ असत्य रहता ही नहीं है। वहाँ रहने वाले लोग
कौन हैं, बताता हूँ। गायत्री मंत्र का जाप करने वाले, ब्राह्मणों का चरणतीर्थ प्राशन करने वाले और यज्ञयाग के
निष्काम उपासक वहीं रहते हैं। जिन्होंने ब्राह्मणों का कार्य करते मृत्यु प्राप्त की, जिन्होंने गौरक्षा के लिये अपने
प्राणों की बलि चढ़ा दी जो परोपकार करते-करते दरिद्र बन गये, वही लोग सत्यलोक में गये हैं। जिन्होंने
निष्काम बुद्धि से ब्राह्मणों की सेवा की, जिन्होंने निष्काम बुद्धि से ब्राह्मणों की पूजा की, जिन्होंने निष्काम बुद्धि
से ब्राह्मणों को भोजन कराया, वे सत्यलोक पहुँच गये। जो दीनजनों पर उपकार करने के लिये कृपालु बने, संसार