श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
तर्जयन्त्यपरे वाग्भिः स्तेनोऽयमिति वादिनः।
बध्नन्ति रज्ज्वा तं केचिद् बध्यतां बध्यतामिति ॥ ३७ ॥
कोई दूर से वाग्बाण छोड़ने लगा। बोला, "इसके इस वेष का कारण हमने अच्छी तरह जान लिया है।
इसके वेष का मर्म यही है कि यह एक बड़ा ठग, नीच और बड़ा ढोंगी है, भिक्षा माँगने के भेष में यह जासूस
घर-घर घूम रहा है। इस चोर को पकड़िये। " इन निंदास्पद भाषण के साथ वे सब जोर-जोर से चिल्लाने लगे।
कुछ लोग उसे नीचे गिरा कर रस्सी से बाँधने लगे।
क्षिपन्त्येकेऽवजानन्त एष धर्मध्वजः शठः।
क्षीणवित्त इमां वृत्तिमग्रहीत् स्वजनोज्झितः ॥ ३८ ॥
उसकी पहले की स्थिति जो जानते थे, वे उसका अपमान कर उसकी निन्दा करने लगे। वे बोले, "पहले
यह कदर्यू नाम से प्रसिद्ध था और आज यह हमारे सामने संन्यासी का भेष बनाकर घूम रहा है। इसने शुभ-
अशुभ कर्मों से द्रव्य एकत्र किया और अधर्म के कारण वह द्रव्य नष्ट हो गया। इसलिये स्वजनों ने इसे घर से
बाहर निकाल दिया। इस पेट के लिये अन्न मिलना मुश्किल हो गया इसलिये यह कपटी भेष बदल कर संन्यासी
बन गया है। हमारे सामने अपनी प्रतिष्ठा का प्रदर्शन करने में इसे लज्जा नहीं आती। पहले से ही यह धोखेबाज
था और अब ढोंगी संन्यासी बन गया है। यह सोचता था कि ये लोग भोले-भाले हैं, इन्हें कुछ मालूम नहीं है।
अब इस महाठग ने मौन धारण कर लिया है। जिस प्रकार बहुरूपिया स्वांग रचते हैं, उसी प्रकार यह उत्तम वेष में
संन्यासी बनकर हमें धोखा देने आया है। इसे मारने से दोष नहीं लगेगा।"
अहो एष महासारो धृतिमान् गिरिराडिव।
मौनेन सधयत्यर्थं बकवद् दृढनिश्चयः॥ ३९ ॥
यह प्रबल ढोंगी है। अपना स्वांग अच्छी तरह निभाता है। जिस प्रकार तूफान में महामेरू अडिग रहता है,
उसी प्रकार हमारे कष्ट देने से वह विचलित नहीं होता। अन्न और वस्त्र प्राप्त करने के लिये ही इसने धैर्य कायम
रखा है। स्वार्थ पर दृष्टि रख कर ही इसने बगुले की तरह मौनव्रत धारण किया है। मछली निकलने के लिये
जिस प्रकार बगुला मौन धारण करता है, उसी प्रकार इसका ध्यान अपने लक्ष्य पर रहता है। यह भोले भोले लोगों
को लूटेगा। अब द्रव्यलोभ के लिये यह पुराने कष्टों का ख्याल नहीं करता। उसकी यह आदत अब दृढ़ हो गयी
है। किसी ने कहा, "कैसा धैर्यवान है!" और इतना कहकर उसे लतियाने लगे। कोई उसके कान में सींक
घुसेड़ने लगा और बोला, "अब देखें इसकी शान्ति।" फिर भी उसके मन में द्वेष नहीं उत्पन्न हुआ। उसकी
शान्ति अटल थी। उसकी शान्ति की परीक्षा लेते-लेते वे दुष्ट लोग और भी अधिक क्रुद्ध हो गये और उसे नाना
प्रकार के कष्ट देने लगे। श्रीकृष्ण यही वर्णन करते हैं।
इत्येके विहसन्त्येनमेके दुर्वातयन्ति च।
तं बबन्धुर्निरुरुधुर्यथा क्रीडनकं द्विजम् ॥ ४० ॥
कोई उसकी खिल्ली उड़ाने लगा, कदर्यू को तो पूर्ण शान्ति प्राप्त हो गयी। किसी ने उसके नाक पर चूना
लगाया, किसी ने तो उसके मुँह में काजल पोत दिया। कुछ तो और भी निर्लज्ज थे। वे उसके सामने पीठ करके
खड़े हो गये और अपानवायु छोड़ने लगे। वह दुर्गन्ध उसके नाक और मुँह में भर गयी। फिर भी उसकी