श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६१६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
स्वर्गापवर्गयोर्द्वारं प्राप्य लोकमिमं पुमान्।
द्रविणे कोऽनुषज्जेत मर्त्योऽनर्थस्य धामनि॥ २३॥
अपने धर्म के अनुसार आचरण करने पर ब्राह्मण को स्वर्गप्राप्ति की इच्छा होती है। उस समय वह ब्राह्मण
श्रेष्ठ इन्द्र चन्द्रादि का स्थान भी सरलता से प्राप्त कर सकता है। जिसके यज्ञकर्म से औरों को भी स्वर्गप्राप्ति होती
है, ऐसा स्वर्ग ब्राह्मणों के हाथ की चीज होने के कारण वह सहज ही प्राप्त होता है। लोकेषणा, पुत्रेषणा और
दारैषणा इन तीन ईषणाओं को छोड़ कर जिस ब्राह्मण से निष्काम स्वधर्माचरण होता है, उसके चरणों पर मोक्ष भी
गिरता है और रात-दिन उसका आज्ञाधारी सेवक बनकर रहता है। वह जिस पर कृपा कर दे वे भी मोक्ष पद प्राप्त
कर लें इतना सामर्थ्य उस ब्राह्मण के पास सहज ही होता है। स्वर्ग जिसके पैर के नीचे की सीढ़ी है, मोक्ष
जिसका आज्ञाकारी सेवक है, ऐसे ब्राह्मणत्व की महत्ता होने पर भी द्रव्य के लोभी ब्राह्मणजन्म का नाश कर देते
हैं। ब्राह्मण जन्म प्राप्त होने पर जन्म-मरण पूरी तरह समाप्त हो जाता है लेकिन द्रव्य के लोभ में द्रव्य प्राप्त कर
मैं फँस गया। इस संसार में मनुष्य का जन्म दुर्लभ है तिस पर ब्राह्मण का जन्म तो और भी दुर्लभ है। लेकिन वह
प्राप्त होने पर भी मैं स्वयं द्रव्य लोभ के कारण फँस गया। ब्राह्मण का देह प्राप्त कर द्रव्य के कारण बड़े-बड़े
लोग भी नष्ट हो गये हैं। अर्थ सचमुच अनर्थ का घर है और वह दुर्धर दुःखों को अवश्य बढ़ाता है। द्रव्य अनर्थ
का ही स्थान है, इसलिये उसका पूर्णरूप से त्याग करना चाहिये। इस प्रकार वैराग्य से पूरी तरह तपा हुआ वह
ब्राह्मण स्वयं बताने लगा। (आशंका) दैवयोग से यदि सम्पत्ति प्राप्त हो तो क्या उसे घूरे पर फेंक दिया जाय ? या
पानी में डुबो दिया जाय ? द्रव्य का त्याग कैसे किया जाय ? उस द्रव्यत्याग का वर्णन वह ब्राह्मण स्वयं कर रहा
है। जो धनसम्पन्न हों उन्हें ध्यानपूर्वक सुनना चाहिये।
देवर्षिपितृभूतानि ज्ञातीन् बन्धूंश्च भागिनः।
असंविभज्य चात्मानं यक्षवित्तः पतत्यधः ॥ २४॥
दैवयोग से यदि धन मिले तो पंचमहायज्ञ (भूतयज्ञ, पितृयज्ञ, देवयज्ञ, ब्रह्मयज्ञ और मनुष्ययज्ञ) करना
चाहिये। उत्साहपूर्वक बड़े उत्सव के साथ भगवान का पूजन करना चाहिये। स्वयं पितृतर्पण करना चाहिये।
प्रतिवर्ष छानबे श्राद्ध करने चाहिये। (अमावस्या १२, युगादितिथि ४, मन्वादितिथि १४, सूर्यसंक्रान्ति १२, वैधृति
१२, व्यतिपात १२, महालय १५, अष्टैका ५, अन्वष्टका ५ तथा पुर्वेद्यु ५ कुल ९६) स्वयं गया यात्रा कर पितरों
का उद्धार करना चाहिये। जीवित बड़े लोगों को त्रिकाल नमस्कार करना चाहिये। उनका कभी अपमान नहीं
करना चाहिये। उनका गौरव करना चाहिये। उन्हें उनकी इच्छानुसार भोजन देना चाहिये। यथाशक्ति धन देना
चाहिये और उनकी सेवा कर उन्हें सुखी करना चाहिये। पिता साक्षात् नारायण स्वरूप है और माँ लक्ष्मीस्वरूप है।
ऐसी भावना से जिसके हाथ से पितृ-मातृ सेवा घटती है वह एक सत्पुत्र है। जिसकी सेवा से पितर संतुष्ट होते हैं,
वही सच्चा पितृतर्पण है और जीवित अवस्था में उनकी अवज्ञा करना अनाचार है। मृत्यु के बाद श्राद्ध करना तो
केवल लोकाचार है। बड़ों के वचन पर जो विश्वास नहीं करता वह पाप की राशियाँ एकत्र कर रहा है, यह जान
लो और जो पिता के वचन पर विश्वास करता है उसके पास मोक्ष भी सेवक बन कर रहता है। जीवित पितरों को
और मृत पितरों को किस प्रकार तृप्त करना चाहिये, इसका रहस्य तुम्हें बताया। इसी का नाम है, पितृभजन ! अब
ऋषिपूजन कैसे किया जाता है, यह भी सुनो। सम्मान के साथ ब्राह्मण को लाकर श्रद्धापूर्वक उसके चरण धोये।
उसके चरणों के तीर्थ का वन्दन कर उसका कुछ भाग प्राशन करें और कुछ का अपने शरीर पर अभिषिंचन करें।