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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 645, कुल 869 में से

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पृष्ठ 645

मेरी भक्ति प्रमुख है। उसमें भी नाम की विशेष कीर्ति है। नाम से चित्त की शुद्धि होती है और साधकों को
स्वस्वरूप स्थिति प्राप्त होती है। नाम से श्रेष्ठ कोई साधन नहीं है। उद्धव! नाम से सचमुच ही संसार बन्धन
टूटता है, इसे ध्यान में रखो। स्वस्वरूप में रहकर मन जब निश्चल हो जाता है, उस समय जहाँ साधन लज्जित
हो जाता है, वहाँ दान आदि का साधन अपने आप ही व्यर्थ हो जाता है।
समाहितं यस्य मनः प्रशान्तं दानदिभिः किं वद तस्य कृत्यम्।
असंयतं यस्य मनो विनश्यद् दानादिभिश्चेदपरं किमेभिः॥ ४७॥
जिस पुरुष का मन अपने मूल स्वरूप में प्रविष्ट होता है, उसे दानादि साधनों की क्या आवश्यकता है?
पूरी तरह तृप्त व्यक्ति के सामने यदि पंच पकवान परोसा गया हो तो जिस प्रकार वह उसकी ओर देखना भी नहीं
चाहता उसी प्रकार जिसका मनोविकार नष्ट हो गया है उसके लिये साधन व्यर्थ है। बाढ़ में गंगा नदी पार करने
के लिये कोई मनुष्य बड़े कष्ट से नौका तैयार करता है लेकिन बाढ़ जब पूरी तरह उतर जाती है तो वह नौका
हटा देता है। उसी प्रकार काम, क्रोध आदि उर्मियों से जिसका मन निर्विकल्प में स्थिर हो गया है, उसे सचमुच
दानादिक साधनों की आवश्यकता नहीं है। जिस प्रकार सूर्योदय होने पर लाखों मशालें भी उपयोगी नहीं होतीं,
उसी प्रकार मन में निर्विकल्पता उत्पन्न होने पर कोटि-कोटि साधन निष्फल हो जाते हैं। इस प्रकार जिसका मन
शान्त हो गया है, उसके लिये दानादि नाना प्रकार के साधन करने की आवश्यकता नहीं है। उसके विचारों का
पूर्ण रूप से विलय हुआ रहता है। जिसका मन किसी भी प्रकार के नियमों का पालन नहीं करता, जिसका मन
सदा विचारशून्य रहता है, जो विषयों के प्रति सदा आसक्त रहता है उसके लिये भी साधन व्यर्थ हैं। जिस प्रकार
उन्मत्त हाथियों के झुण्ड के कारण सेना अनेक दिशाओं से भागने लगती है, उसी प्रकार विषयासक्त पुरुष के पास
साधन व्यर्थ हो जाते हैं। जो मन से विषयासक्त है, वह साधनों का जरा भी आचरण नहीं करता क्योंकि यदि वह
साधन करे भी तो उसके मन में विषयों की ही कल्पनाएँ रहती हैं। स्वयं साधना करते समय वासना जिस फल
की इच्छा करती है वही फल उसे प्राप्त होता है और वह दानादि का नाश करती है। जिस प्रकार किसी बलशाली
घोड़े पर कोई निर्बल पुरुष सवारी करे तो वह घोड़ा बेकाबू हो जाता है और क्षणभर के लिये भी शान्त नहीं
रहता, उसी प्रकार जिसका मन अत्यन्त दुर्बल रहता है और पूरी तरह कामक्रोध से भरा रहता है, जो स्वयं ही मन
का दास बना रहता है, जिसका मन सदा महामोह में ही डूबता उतराता रहता है, वह साधन क्या करेगा? वह
कभी साधन करता भी है तो वह महामोह के कारण। इससे तमोगुण बढ़ता है, लेकिन मन पर नियंत्रण नहीं
होता। मान लो, यदि श्रवणादि इन्द्रियों का नियमन कर साधन किया जाय तो उसके मन का आकलन नहीं होता,
क्योंकि इन्द्रियाँ मन के अधीन होती हैं।
मनोवशेऽन्ये ह्यभवन् स्म देवा मनश्च नान्यस्य वशं समेति।
भीष्मो हि देवः सहसः सहीयान् युञ्ज्याद् वशे तं स हि देवदेवः॥ ४८॥
मन ने सबको अपने वश में किया है किन्तु मन किसी के वश में नहीं रहता। मन ने देवताओं का भी छल
किया है, फिर इन्द्रियों के वह किस प्रकार वश में रहेगा? मन पर नियंत्रण करने वाला चन्द्र है। लेकिन मन ने
उस चन्द्रमा को भी छला। मन ने ही चन्द्रमा को गुरु पत्नी से व्यभिचार करा कर उसे क्षयरोगी बनाया। ब्रह्मदेव
बुद्धि का नियंता है। लेकिन मन ने उस ब्रह्मदेव की बुद्धि भी भ्रष्ट की इसलिये उसकी कन्या उसका निवारण कर
रही थी, फिर भी ब्रह्मदेव ने अपनी उस लड़की की ही अभिलाषा की। अंतःकरण में वासुदेव का अधिष्ठान है