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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 636, कुल 869 में से

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पृष्ठ 636

६२० श्रीमद् एकनाथी भागवत
अंतःकरण से भगवान का चिन्तन कर संसार बन्धन तोड़ डालूँगा। अब शेष जीवन में कलिकाल के दाँत तोड़
डालूँगा। गर्भवास के दुःख की परत फाड़ कर मृत्यु को मार डालूँगा। जिस देह ने सच्चे, झूठे सभी कर्मों का
आचरण किया, उस देह को ही यहाँ विदेह स्थिति की आत्मभावना से सुखा डालूँगा। आत्मज्ञान का प्रहार कर
देह की बाड़ ही तोड़ डालूँगा और सुख-दुःख का बन्धन तोड़ कर सायुज्य की पताका फहराऊँगा। आज मैं
वैराग्य और विवेक से युक्त होकर अपने स्वार्थ के प्रति सचेत हो गया हूँ। अब मैं जिस परमार्थ को भी साधने का
प्रयास करूँगा, वह मुझे प्राप्त होगा। मेरा ही स्वार्थ सधेगा ऐसा कोई विशेष नियम नहीं है। तो जो भी कोई
वैराग्य विवेक होगा उसे अपने आप ही परमार्थ प्राप्त होने वाला है। वैराग्य विवेक का यही लक्षण है कि देह,
घर, स्त्रियाँ आदि वैभव के होते हुए उसका मन उनमें आसक्त नहीं होता। इसी का नाम है पूर्ण वैराग्य। अस्तु!
मैंने जिस बात की शुरुआत की है उसे देव और देवी इनके साथ पूरे समुदाय के साथ देवाधिदेव मुझे सहायक हों
ऐसी मैं प्रार्थना करता हूँ।
तत्र मामनुमोदेरन् देवास्त्रिभुवनेश्वरः।
मुहूर्तेन ब्रह्मलोकं खट्वाङ्गः समसाधयत्॥ ३०॥
इन्द्रियों में अधिष्ठित समस्त देवताएँ मुझे सहायक हों। परमार्थ सिद्धि तक पहुँचने में वे मेरे इन्द्रियों को
विजय प्रदान करें। जो त्रिभुवनेश्वर के नाम से प्रसिद्ध है वह भगवान यदि सहायक हो तो सारे देवता मुझे साध्य
होंगे क्योंकि वे सारे श्रीहरि के स्वरूप में ही अंतर्भूत हैं। सारे देवताओं में श्रीहरि का ही स्वरूप है ऐसी भावना
मन में रखकर मैं सारे देवताओं की सेवा करता हूँ। मुझ दीन का उद्धार करने में सहायक होकर वे मुझे भवसागर
से तारें। इस पर आप शायद कहेंगे कि "तुम्हारे जीवन का अब अन्तिम काल आया है। तुम वयोवृद्ध हो गये हो।
अब वृद्धावस्था में यह प्रयास करने का कष्ट क्यों कर रहे हो?" लेकिन ऐसा विचार मन में न आने दें। खटाङ्ग
राजा का नाम प्रसिद्ध ही है। उसने क्षणमात्र में परमार्थ साधा। मेरी आयु तो उससे अधिक ही होगी। सारे देवता
मुझे सहायक हों तो मैं क्षणमात्र में परमार्थ साध लूँगा। आज जैसा विवेक वैराग्य प्राप्त हुआ है, वही जब तक
अटल रहेगा, तब तक दोबारा कलिकाल क्या करेगा? मैं तो संसार पर विजय प्राप्त कर लूँगा। यह पहले कैसा
था? अब इसकी वृत्ति में परिवर्तन हो गया। वह विवेक वैराग्ययुक्त हो गया। श्रीकृष्ण यह बात आश्चर्यपूर्वक
वर्णन करते हैं।
श्रीभगवानुवाच
इत्यभिप्रेत्य मनसा ह्यावन्त्यो द्विजसत्तमः।
उन्मुच्य हृदयग्रन्थीन् शान्तोभिक्षुरभून्मुनिः॥ ३१॥
ऐसा वह अवंती का ब्राह्मण अत्यन्त कृपण था। लेकिन उसके हाथ से द्रव्य निकल जाते ही उसका स्वभाव
बदल गया और उसे वैराग्यलक्षण प्राप्त हो गया। इसलिये मन में वैराग्य विवेक उत्पन्न होने पर उसे अपने आप
ही ब्रह्मप्राप्ति होती है। आत्मस्वरूप की स्थिति साध्य करने के लिये श्रीकृष्ण उद्धव को बताते हैं। वह पहले
अधम ब्राह्मण था। वह द्रव्यलोभी था तथा निंद्यकर्म करता था। लेकिन विवेक से वह परम वैरागशाली उत्तम
ब्राह्मण बन गया। मैंने पहले किया हुआ निश्चय पूरी तरह साध्य करूँगा, ऐसे उल्हास से वह अपने परमार्थ का
साधक बना। अपने दुःख का कारण मैं स्वयं ही बना। काम, लोभ और द्रव्य का अभिमान करने के कारण मुझे
स्वयं ही अत्यन्त दुःख भोगना पड़ा। द्रव्य ही मुझे दुःख दे गया इसलिये द्रव्य ही दुःखों का घर है। पत्नी और