श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६३४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
पर और भेदभाव सच हैं वह विश्वास होने पर जीव की अपनी आत्मबुद्धि अन्धी हो गयी ऐसा समझना चाहिये।
जिस प्रकार स्वप्न की बातें मिथ्या होती हैं, उसी प्रकार मन का कल्पित संसार भी मिथ्या है। उसे सत्य मानने से
देह का अन्धकार बढ़ता है। देहाभिमान प्रबल हो जाने पर पुनः जन्म और पुनः मरण इस प्रकार संसार चक्र का
परिभ्रमण जीव को उसके ही भ्रम के कारण भोगना पड़ता है। जिस प्रकार केवल अग्नि को हथौड़े के घाव कभी
नहीं लगते लेकिन लोहे की संगति से वह अपने शरीर पर हथौड़े का प्रहार सह लेता है, उसी प्रकार नित्यमुक्त
और परिपूर्ण आत्मा जब देहाभिमान धारण करता है, तब उसमें जीवत्व आ जाता है और वह जन्म-मरण का
दुःख भोगने लगता है। जिस प्रकार घानी का बैल आँखों में पट्टी बँधी होने के कारण अन्धेपन से गोल-गोल
घूमता रहता है, उसी प्रकार मनुष्य भी अहंकार के कारण अन्धा होकर विराट संसार चक्र में घूमता रहता है। वहाँ
जन्म-मरण का भोग भोगते हुए वह अत्यन्त दुःखी होता है किन्तु देहाभिमान नहीं छोड़ता। अन्त में वह अभिमान
उसे अंधतम नरक में ढकेल देता है। ऐसा नरक जिसका दुःख अपार है और दुस्तर होने के कारण उसे पार भी
नहीं किया जा सकता। जो अघोर भोग भोगने को बाध्य करता है वह संसार मन की कल्पना ही है। मन ही
सुख-दुःख का कारण है यह बात आठवें श्लोक में भिक्षु ने स्वयं ही बतायी है। अब दुःखों का कारण लोग हैं,
ऐसा जो कहा जाता है वह मिथ्या है यह भी वह बताता है।
जनस्तु हेतुः सुखदुःखयोश्चेत् किमात्मनश्चात्र ह भौमयोस्तत्।
जिह्वा क्वचित् संदशति स्वदद्भिस्तद्वेदनायां कतमाय कुप्येत्॥५१॥
जिसे जननी के उदर में जन्म लेना पड़ता है उसे 'जन' कहते हैं। वे जन मेरे सुख-दुःख के लिये बिलकुल
कारण नहीं होते। लोग लोगों को ही दुःख पीड़ा देते हैं, उसका आत्मा से क्या सम्बन्ध है? आत्मा देह से स्वतंत्र
एवं शुद्ध है। उसे सुख-दुःख की बाधा नहीं होती। देह से देह को दुःख होता है ऐसा कहें, तो देह तो
पंचभूतात्मक है। अतः उनमें परस्पर एकता है। अर्थात् उन्हें भी सुख-दुःख नहीं होगा। जल में जल उड़ेलने से
जिस प्रकार जल को कोई कष्ट नहीं होता अथवा दीपक की ज्योति से ज्योति मिलाने पर दीपक को कोई कष्ट
नहीं होता, उसी प्रकार देह को (पार्थिव = पृथ्वी से उत्पन्न हुआ) देह से स्पर्श करने पर बिलकुल पीड़ा नहीं
होती और आत्मा देह को स्पर्श भी नहीं करता इसलिये वह सुख-दुःख को भी स्पर्श नहीं करता। अब आप यह
कहेंगे कि जो जीव देहाभिमानी है, उसी को सुख-दुःख होते हैं क्योंकि दुख का भोक्ता कोई और तो खोजने से
भी नहीं मिलता। हमारी जीभ यदि दाँत के नीचे आ गयी तो उसका गुस्सा किस पर निकाला जाय? क्या वह
क्रोध के आवेग में दाँत तोड़ता है या जीभ को काटकर फेंकता है? उसी प्रकार संसार में जब सर्वत्र एकता
दिखायी दे रही है तो क्रोध करने का कोई कारण नहीं है। दूसरे का धक्का लगने से जो गिरता है वह धक्का देने
वाले पर गुस्से में हाथ उठाता है, लेकिन जो स्वयं ही गिर कर जमीन पर लोटने लगता है, वह शरमा कर, किसी
पर गुस्सा किये बिना चला जाता है। उसी प्रकार प्राणीमात्र मैं ही हूँ और भोग भोगनेवाला भी मैं ही हूँ; मेरा दुःख
देने वाला भी मैं ही हूँ; संसार में ऐक्यरूप में मैं ही भरा हुआ हूँ। ऐसी स्थिति में क्रोध किस पर करें? इस प्रकार
मेरे सुख-दुःख के लिये अन्य लोग कारण नहीं हैं। अब यदि उसके लिये देवताओं को कारण समझा जाय तो
वैसा भी नहीं लगता।
दुःखस्य हेतुर्यदि देवतास्तु किमात्मनस्तत्र विकारयोस्तत्।
यदङ्गमङ्गेन निहन्यते क्वचित् क्रुध्येत कस्मै पुरुषः स्वदेहे॥५२॥