श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 639, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेईसवाँ अध्याय ६२३
देख उन दुष्टों का जो प्रमुख नेता था उसने संन्यासी को साष्टांग नमस्कार किया और अत्यन्त नम्र होकर उसकी
विनती करने लगे। उन्होंने कहा, "हर हर ! हमारे हाथ से बहुत बड़ा अपराध हुआ। ये दुष्ट लड़के उन्मत्त हो गये
हैं। योग्य और अयोग्य का विचार ही नहीं करते। स्वामी महाराज ! मन में किसी प्रकार का राग द्वेष न रखें।
कृपया अपने वस्त्र वापस ले लें।" इस प्रकार उसके चरणों पर गिर कर उसका पुनः छल करने के लिये उसे
वापस लाये।
प्रदाय च पुनस्तानी दर्शितान्याददुर्मुनेः ।
इस प्रकार संन्यासी को वापस लाकर उसके सामने सभ्यतापूर्वक दण्ड कमल लाकर रख दिया। कोई वस्त्र
लाने लगा तो कोई उसे छीनकर भागने लगा। कोई बोला, "यह संन्यासी बूढ़ा है। इसे उसके वस्त्र वापस
दीजिये।" तो कोई बोला, "इस बदमाश की पिटाई करने से हमें बहुत पुण्य लगने वाला है।" आखिर उसका
तिरस्कार कर किसी ने उसे वस्त्र वापस नहीं किये। तब वह संन्यासी स्वस्थ अन्तःकरण से वहाँ से चला गया।
तभी किसी ने आकर उसे कपड़े वापस किये और जाने के लिये कहा। इतने में एक आदमी दौड़ता हुआ आया
और उस संन्यासी के सिर पर जोर की चपत लगाकर तथा उसके कपड़े छीन कर चला गया। कोई बोला, "अब
दे भी दो। उस बूढ़े को अधिक न सताओ।" बाद में वह संन्यासी स्वयं ही अपने वस्त्र वहाँ छोड़कर, स्नान
संध्या तथा भिक्षा माँगने के लिये चला गया।
अन्नं च भैक्ष्यसम्पन्नं भुञ्जानस्य सरित्तटे ॥ ३५ ॥
मूत्रयन्ति च पापिष्ठाः ष्ठीवन्त्यस्य च मूर्धनि ।
यतवाचं वचयन्ति ताडयन्ति न वक्ति चेत् ॥ ३६ ॥
भिक्षा माँगने के बाद शास्त्रोक्त ढंग से उसके भाग करने के बाद, नदी के किनारे बैठ कर वह संन्यासी
भोजन कर रहा था यह देखकर आवारा लोग वहाँ इकट्ठा हो गये और बोले, "अरे! यह तो संन्यासी नहीं है।
हमारे गाँव में जो कृपण ब्राह्मण था, वह यही है। यह मुँह से 'हाँ' या 'ना' नहीं कहता। यह धोखाधड़ी की बात
है। इसलिये जो इसके मुँह से बिना कुछ उगलवाये जायेगा वह इसकी ही दासी का पुत्र कहलायेगा।" ऐसी
शपथ लेकर वे सब एकत्र होकर उसके पास आये। उनमें से एक ने कहा, "इसका मौन मैं क्षण भर में समाप्त
कर दूँगा। मैं उसका उपाय जानता हूँ।" इतना कह कर उस दुष्ट और महापातकी मनुष्य ने भोजन कर रहे
संन्यासी के मस्तक पर मूत दिया। फिर भी उस संन्यासी के मन में क्रोध नहीं हुआ। वह आत्मज्ञान से शांत रहा।
भले ही मन में क्रोध आया हो, लेकिन वह मनुष्य शांतिरहित हो ही गया। वह क्रोध के शब्द नहीं बोल रहा
इसका कारण यही है कि वह लोकलज्जा के लिये अथवा पेट के कारण डर गया। लेकिन वह संन्यासी वैसा नहीं
था। अपनी लज्जा उसने धोकर नष्ट कर डाली थी। आत्मशान्ति का स्वरूप कैसा होता है ? क्रोध मन में भी नहीं
आता। भीतर एक और बाहर कुछ दूसरा इसी का नाम है 'दांभिकता'। लेकिन यह वैसा संन्यासी नहीं है। यह
आत्मशांति से अंतर्बाह्य बिलकुल निर्मल था। तब वे आवारा किस्म के लोग कहने लगे, "अरे ! यह सचमुच ही
नहीं बोलता।" यह कहकर वे उसके सामने खड़े हो गये और उसके मुँह पर थूका। अत्यन्त दुःख देकर उसकी
बहुत निंदा करने लगे। कोई लात मारने लगा, कोई मस्तक पर प्रहार करने लगा और कोई कहने लगा कि "यदि
यह न बोले तो इसे छोड़िये मत।"