श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 647, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेईसवाँ अध्याय ६३१
का प्रसाद मिलने पर मन स्वयं ही मनोजय की पताका फहराता है और साक्षात साधक के हाथ में देता है। इस
प्रकार साधक का मन स्वयं ही अपनी जय करा कर देता है और अन्त में सद्गुरु के आत्मज्ञान में मन स्वयं
आत्मस्वरूप से पूर्णरूप से लीन हो जाता है। जिस प्रकार नमक का ठोंका समुद्र के जल में घुलमिलकर स्वयं
समुद्र जैसा हो जाता है उसी प्रकार साधक भी अभिमानरहित होते ही 'मैं' 'तू' का अहंभाव नष्ट कर स्वयं
पूर्णब्रह्म हो जाते हैं, यह ध्यान में रखो। फिर उसकी आत्मदृष्टि को सारी सृष्टि एक मैं ही दिखायी देने लगती है,
द्वंद्व की त्रिपुटी नष्ट हो जाती है और सुख-दुःख का पीछा करना छूट जाता है। फिर कैसा सुख और कैसा दुख !
कैसा बन्धन और कैसा मोक्ष ? पण्डित कौन और मूर्ख कौन ? चारों ओर केवल एक ब्रह्म ही दिखायी देता है।
वहाँ कौन देवता है और कौन भक्त है ? कौन शान्त है और कौन अशान्त है ? द्वैत-अद्वैत विलीन हो जाता है और
केवल एक परब्रह्म ही सदा आनन्दरूप से रहता है। वहाँ क्रिया और कर्म नष्ट हो जाते हैं, धर्म और अधर्म लज्जा
से ही नष्ट हो जाते हैं, वहाँ कनिष्ट उत्तम और मध्यम भी कैसे ? परिपूर्ण ब्रह्म ही सर्वत्र भर जाता है। फिर शास्त्र
और वेद, बुद्धि और बोध का भेद समाप्त हो जाता है और केवल आनन्दस्वरूप परब्रह्म ही सर्वत्र भर जाता है।
इस प्रकार मनोविजय से इस स्थिति को भाव पहुँचता है। स्वयं भगवान ने यह बताया इसलिये इसमें कोई सन्देह
नहीं है। मनोजय की स्थिति ब्रह्मदेव आदि देवताओं को भी अगम्य है। ऐसी स्थिति में जो इसे स्वयं अपने आप
प्राप्त कर लेता है, वह आत्मज्ञान से देवाधिदेव हो गया ऐसा समझना चाहिये। इस प्रकार जो अपने मन को जीत
कर इस लोक में ही जनता से एकरूप हो गया वह त्रिभुवन में धन्य है। उसके कारण पृथ्वी पावन होती है। उसी
ने पूर्वजों को तारा, सारे कुल का उद्धार किया। जिसने मन को जीत लिया, समझो कि उसने परब्रह्म को अपना
बना लिया। मनोजय से जो अत्यन्त समर्थ हो जाते हैं, वहीं शान्ति सर्वस्व बिकती है। उन्हें आत्मबोध के कारण
सुख-दुःख के भँवर बिना मिले निकल जाते हैं। स्वयं भिक्षु द्वारा किया गया यह भाषण भगवान श्रीकृष्ण ने
अत्यन्त उल्हास से उद्धव को सुनाया और कहा, मनोजय त्रिभुवन में धन्य है। जिसने मन को जीत लिया उसने
मुझे अपना दास बना लिया, मुझे खरीद लिया। मुझ आनन्दस्वरूप को उससे आनन्द प्राप्त होता है, मुझ नित्य
तृप्त को उससे तृप्ति मिलती है। मुझ अनंत का उसी के पास निवास रहता है, उसके ही कारण मैं त्रिभुवन में
बलवान हुआ। 'मैं' और 'वह' कहने का जो कौशल है वह भी हमसे परे है। यदि आप अपने अंतःकरण से
विचार करें तो आत्मैक्य के साथ सचमुच मैं ही हूँ। मनोजय से इतना अधिकार प्राप्त होता है। जो मनोजय न कर
इस लोक के साधारण शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर लेने के कारण अहंकार से फूल जाते हैं उनकी भर्त्सना स्वयं
भिक्षु कर रहे हैं।
तं दुर्जयं शत्रुमसह्यवेगमरुन्तुदं तन्न विजित्य केचित्।
कुर्वन्त्यसद्विग्रहमत्र मर्त्यैर्मित्रान्युदासीनरिपून् विमूढाः ॥ ४९ ॥
बड़े-बड़े शक्तिशाली राजा शत्रु के रूप में आते हैं, उस समय साम, दाम आदि उपायों से उनका दमन
होता है या उन्हें पराक्रम से जीता जा सकता है। लेकिन ये उपाय मन के सन्दर्भ में काम नहीं आते। किसी की
मध्यस्थता की जाय तो मन किसी की सुनता ही नहीं। मन को विषयों का दान दिया जाय तो उससे भी मन तृप्त
नहीं होता। इसके विपरीत वह और भी भयप्रद हो जाता है। उसे कौन सँभाल पायेगा ? शमदम आदि उपाय उस
पर चलते नहीं हैं, अतः ऐसे मन को मार ही डालने की सोचें तो उस पर कोई शस्त्र काम नहीं करता और मारने
का विचार मन में नहीं आता। इस प्रकार यह मनरूपी शत्रु अजेय होने के कारण अत्यन्त कठिन हो गया है। वही