श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 648, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ें६३२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
सुख-दुःख की सामग्री से क्षण-प्रतिक्षण जन्म-मरण से मारता है। अन्य शत्रु यदि काबू से बाहर हो जाएँ तो कोई
तत्काल भाग सकता है। पहाड़ पर के किले पर अपनी सुरक्षा की जा सकती है लेकिन मन से आगे भागने पर
त्रिभुवन भी कम पड़ जाता है। जिस गुप्त स्थान पर छिपने का प्रयास करो वो मन वहाँ भी उपस्थित रहता है।
काम-क्रोध आदि महान वीर मन के पराक्रमी सेनापति हैं और उनकी मार असह्य है। वे एक ही झटके में बड़े-
बड़ों को धराशायी कर देते हैं। बाहर के शत्रु दूर देशों में रहते हैं। उन्हें हमारे पास आने में काफी समय लगता
है। किन्तु मनोरूपी शत्रु हमारे पास ही सदा चिपका रहता है। आसन पर भोजन के समय, एकान्त में, जप करते
समय अथवा ध्यान करते समय मन एकाएक कूद पड़ता है और शत्रु बनकर पूर्ण रूप से पराजित करता है। बाहर
के शत्रु का दुःख बहुत कम होता है, लेकिन मन की पीड़ा विशाल रहती है। मन जन्म-मरण के आवर्त भोगने
को बाध्य करता है। बाह्य शत्रु मरणाधीन होते हैं किन्तु मन मृत्यु में भी विघ्न लाता है। इस मनरूपी शत्रु पर यदि
विजय न प्राप्त की जाय तो जीव का बड़ा दुःख नहीं टल पायेगा। मन की तीव्र गति को देवता या मनुष्य भी
सहन नहीं कर सकते। कोई कितना भी परिश्रम क्यों न करे लेकिन वह मन को नहीं जीत सकता। इसीलिये मन
अजेय हो गया है। ऐसे इस मन को न जीत कर जो अन्य बाह्य शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर गर्व से फूल जाते हैं,
उन्हें महामूर्ख ही समझो। मन से मन को जीतें यह पिछले श्लोक में यथार्थ रीति से बताया ही गया है। वही
मनोजय का उपाय है। सारांश यदि इस प्रकार मन को शत्रु बना कर मन को जीतना सम्भव नहीं है तो मन से
मैत्री कर मित्रभाव से ही मन को सुखी करना चाहिये। सामान्यतः मित्रों की मैत्री ऐसी होती है कि यदि एक-
दूसरे पर उपकार करता है तो दूसरा भी उसका उपकार करता है, लेकिन वह सारी मैत्री विषयसुख की होती है
और उचित प्रसंगों पर वे एक-दूसरे के घर जाते भी हैं। मन की मैत्री वैसी नहीं होती। वह किसी के उपकार
किये बिना ही उस पर उपकार करता है और सारे दुःखों का निवारण कर सुखसागर में विचरण कराता है।
सामान्यतः जिससे हमारी मित्रता रहती है उससे अपना दुःख कहने पर वे उसे पूरी तरह दूर नहीं कर पाता। वह
कहता है, "मेरे लिये यह असाध्य है।" मन की मैत्री ऐसी नहीं होती। मन को स्थिर कर यदि उससे अपना
दुःख कहा जाय तो वह जन्म-मरण की बड़ी पीड़ा भी दूर करता है। मृत्यु का भय मन में होते हुए भी उसे
कनक और कांता से आसक्ति रहती है। स्त्रियाँ भर्त्सना करती हैं लेकिन निर्लज्ज को लज्जा नहीं होती। परस्त्री,
परधन, परद्रोह और परनिन्दा की लत लग जाने पर वे व्यसन उसे क्षणभर के लिये भी खाली नहीं बैठने देते और
भयंकर नरकवास का भोग करने को बाध्य करते हैं। क्षुधा के सामने तो जरा सा भी विलम्ब सम्भव नहीं है। द्वंद्व
के दुःख तो एक के बाद एक आने शुरू हो जाते हैं। इन्द्रियों की वृत्ति तो संभाले नहीं संभलती। ऐसा मन से
कहने पर मन स्वयं वैराग्य से बिफर उठता है और विवेक के सहारे दुःख का नाश करने के लिये तत्पर हो उठता
है। यदि चोर को ही भंडारी बना दिया जाय तो वह स्वयं ही चोरों का निवारण करता है। उसी प्रकार, मन से
मैत्री करने पर वह स्वयं ही दुर्गुणों का नाश कर देता है। हम अधर्म कृत्यों की ओर प्रवृत्त होने लगते हैं तो मन
ही उसका निवारण करता है। मन स्वयं ही वाणी को असत्य न बोलने की शपथ दिलाता है। मन की मैत्री इतनी
श्रेष्ठ है। कर्माकर्म को समूल नष्ट करने के लिये तथा चित्तशुद्धि का मर्म जानने के लिये वह रात-दिन हरिनाम
का स्मरण करता है। 'श्रीराम जयराम' में से केवल 'राम' इन दो अक्षरों से ही महापातकों का नाश होता है। वह
मन उस नाम को छोड़ कर एकक्षण का भी विश्राम नहीं करता। अखण्ड हरि का ही स्मरण करता है। उस समय
वह असत्य का शिरच्छेद करता है, अधर्म की खाल उधेड़ता है, कल्पना के पैर तोड़ता है और आशा की उमंग
समाप्त करता है। विकल्प का घर ही उजाड़ देता है प्रपंच के दाँत तोड़ देता है, अविश्वास के टुकड़े-टुकड़े कर