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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 641, कुल 869 में से

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पृष्ठ 641

तेईसवाँ अध्याय ६२५
आत्मरूप स्थिति के कारण उसके चित्त में जरा भी क्षोभ नहीं हुआ। क्रोध लाने का प्रयत्न करने पर भी जिस की
शान्ति नहीं ढलती वही त्रिभुवन में संन्यासी है। सारांश, उसका मन क्षुब्ध नहीं हो रहा है यह देखकर दुष्ट लोग
और भी अधिक तैश में आ गये। उन्होंने उस संन्यासी के गले में लोहे का सिक्कड़ बाँध दिया और उसे चौरस्ते
पर ले आये। "अरे! आप में से कोई तो इसे पहचानो। जो निंद्य कर्म किया करता था वही यह द्रव्यलोभी है।
उसे हमने आज पकड़ लिया। यह अत्यन्त अधर्मी और ढोंगी है। जिस प्रकार मदारी बन्दर को बाँध कर रखता है
उसी प्रकार उन्होंने संन्यासी को बाँध कर रखा था और फिर सब मिलकर उसे आगे-पीछे खींचने लगे। कोई पूर्व
की ओर खींच रहा था तो कोई पश्चिम की ओर। इसमें सबको संतोष प्राप्त हो रहा है यह देखकर संन्यासी भी
मन ही मन हँसने लगा। देह प्रारब्ध भोग रहा है। मेरा उससे क्या सम्बन्ध है ? इस विवेक से वह क्षमा से परिपूर्ण
हो गया था। वह किसी का मन दुखा नहीं रहा था। जिन्होंने कभी उसका सम्मान किया था उन भाईयों, रिश्ते नाते
वालों के सामने वह अपमान सहन कर रहा था। उद्धव! जिसका मन लौकिक प्रतिष्ठा के कारण लज्जित होता है
उसके मन में शान्ति नहीं रहती। जरा देखो! जिसे इतना कष्ट दिया उसके मन में क्रोध नहीं आया। उस संन्यास
का हृद्गत देवाधिदेव स्वयं बता रहे हैं।"
एवं स भौतिकं दुःखं दैविकं दैहिकं च यत्।
भोक्तव्यमात्मना दिष्टं प्राप्तं प्राप्तमबुध्यत ॥ ४१ ॥
भिक्षु ने अपना विचार बतलाया। उसने कहा, सारे लोग तीन प्रकार के प्रारब्ध से बँधे हुए हैं। इसलिये उन्हें
भोगना आवश्यक है। राजा और रंक भी उससे नहीं छूट पाते। पंचमहाभूतों से होने वाली पीड़ा 'भौतिक' होती
है। देवताओं से होने वाली पीड़ा 'दैविक' होती है और देह में ही ज्वर आदि होने वाली पीड़ा 'दैहिक' होती है।
इस प्रकार यह जो तीन प्रकार का दुःख है वह प्रारब्ध से उत्पन्न होता है। उसको भोगते समय जो कष्ट का
अनुभव करता है वह मंदबुद्धि और मूर्ख है। प्रारब्ध से हमारे भाग्य में जो भोग आये हैं, वे हरिहर को वश में
करने पर भी भोगने ही पड़ते हैं, उससे प्राणी बच नहीं पाता यह जानकर ही वह संन्यासी क्षमाशील हो गया था।
श्रीकृष्ण पाण्डवों की सहायता कर रहा था, फिर भी उन्हें भोग भोगने ही पड़े। ऐसे में विष्णु और शंकर इन दोनों
को वश में कर लेने पर भी, प्रारब्ध से कोई नहीं बच पाता।
परिभूत इमां गाथामगायत् नराधमैः।
पातयद्भिःस्वधर्मस्थोधृतिमास्थायसात्त्विकीम् ॥ ४२ ॥
दुष्ट लोगों के उपद्रव से भी वह संन्यासी शान्ति नहीं छोड़ रहा था। सात्त्विक धैर्य धारण करने के कारण
उसकी धर्मस्थिति ढली ही नहीं। उस भिक्षु ने जिस गाथा का गायन किया, उसे मैं अब सुनाऊँगा। उद्धव! चित्त
को अत्यन्त सावधान रखकर श्रवण करो। वह उपदेश मन में धारण करने से मन में द्वंद्व की समता दिखायी देने
लगती है, आत्मशान्ति सहज प्रकट होती है और सायुज्यमुक्ति घर में प्रवेश करती है। जिसे श्रीकृष्ण ने स्वस्थचित्त
किया उस उद्धव का भाग्य इस संसार में बहुत बड़ा था। श्रीकृष्ण ने कहा—भिक्षु ने स्वयं जो कहा, उसे सुनो।
द्विज उवाच
नायं जनो मे सुखदुःखहेतुर्न देवतात्मा ग्रहकर्मकालाः।
मनः परं कारणमामनन्ति संसारचक्रं परिवर्तयेद् यत् ॥ ४३ ॥