सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 644, कुल 869 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 644

६२८ श्रीमद् एकनाथी भागवत

है और त्रिगुणों की माला से स्वयं ही संसाररूपी जाल तैयार करता है। जिस प्रकार घट का पानी अलिप्त
चन्द्रबिम्ब का अपने में आकलन कराता है, उसी प्रकार केवल मन के संकल्प ने ज्ञानस्वरूप आत्मा को
अविद्यात्मक बनाया है। घट का पानी हिलने पर चन्द्रबिम्ब को भी कंपित करता है, उसी प्रकार मन के कारण
शुद्ध ब्रह्म को जन्म-मरण और सुख-दुःख उत्पन्न हुए हैं। आत्मा स्वयंप्रकाश और ज्ञानस्वरूप है। मन जड़ है तथा
कल्पनारूप है। लेकिन उसी को अपना स्वरूप मानकर यह जीवात्मा उसका पाप-पुण्य भोगता है। जीव का
सच्चा आत्मीय, सुहृद और मित्र केवल परमात्मा है। वही मन का और जीव का नियामक तथा साक्षी के रूप में
प्रेक्षक है। जो जीव अविद्या के रोग से स्पष्ट रूप से प्रतिबिम्बित होता है वही मेरा मित्र है। वही मन के भ्रम से
भ्रमण कर मन से उत्पन्न होने वाले सुख-दुःख भोग रहा है। मन की एकात्मता विलक्षण है। इससे जीव भ्रम में
पड़ जाता है और स्वयं निष्कर्म होते हुए भी कर्माकर्म भोगता है। वास्तव में देखा जाय तो जीव मन का नियंता है
लेकिन वह मन से एकरूप होकर मन के व्यर्थ के सुख-दुःखों को सहन करता है। जिस प्रकार पड़ोस का
रिश्तेदार यदि राजा का प्रधान हो तो वह राजा को ही अपनी मुट्ठी में रखता है और राजा गरीब हो जाता है और
प्रधान की इच्छा से सुख-दुःख भोगता रहता है। वही स्थिति जीव की है। मन ने उसे सांसारिक बना दिया है
इसलिये वह अनेक जन्म-मरण तथा दिन-रात अनेक सुख-दुःख भोगता रहता है। उस मन का यदि निग्रह न
किया जाय तो जीव का दुःख भी नहीं टलेगा। मन की इच्छा से ही चलने पर सारे साधन व्यर्थ हो जाते हैं।
दानं स्वधर्मो नियमो यमश्च श्रुतं च कर्माणि च सद्व्रतानि।
सर्वे मनोनिग्रहलक्षणान्ताः परो हि योगो मनसः समाधिः ॥ ४६ ॥
मनोनिग्रह पर ध्यान न देकर यदि सर्वस्व का भी दान कर दिया जाय तो 'मैं ही एक दाता हूँ' यह अहंभाव
उत्पन्न होता है और मन गर्व से उन्मत्त हो जाता है अथवा मनोनिग्रह को भूलकर वर्णाश्रम धर्म का आचरण किया
जाय तो उससे मनोधर्म आनन्द से प्रबल हो उठता है और 'मेरा स्वकर्म ही अत्यन्त श्रेष्ठ है' ऐसा लगने लगता
है। त्रिभुवन में एक मैं ही आचारसम्पन्न, मैं ही अपना स्वयं पाकी हूँ, इस प्रकार स्वधर्म का आचरण करने से मन
और भी क्षुब्ध हो उठता है। मन पर नियंत्रण करने की बुद्धि न हो तो यम-नियम भी एक विकार ही है क्योंकि
उसके कारण 'सच्चा साधक मैं ही हूँ' यही मनोधर्म बताता रहता है। वेदशास्त्र श्रवण करने से घमण्ड बढ़ जाता
है, पांडित्य के प्रति अभिमान बढ़ने लगता है। फिर मन पर नियंत्रण कैसे होगा? अपना ही कर्म करने जाओ तो
कर्मक्रिया अत्यन्त कठिन है। उस कर्मठता का ही भ्रम जब बढ़ता जाता है तो मन का नियमन कैसे होगा? कर्म
केवल देह में है। आत्मा देह में होने पर भी विदेह स्थिति में है। कर्म से उसे कर्मबद्धता प्राप्त होती है, ऐसा
कर्मठ लोग मूर्खतावश मानते हैं। असंख्य व्रत कर व्रतस्थ होते हुए वे उसके बदले धनधान्य की अपेक्षा करते हैं
क्योंकि उनके मन में मनोनिग्रह नहीं होता। अच्छे-अच्छे व्रत भी इस प्रकार व्यर्थ हो जाते हैं। व्रत, दान, स्वधर्म
आदि जो सब है उनके लिये मनोनिग्रह ही सबसे बड़ा फल है। उसके बिना सारे साधक दुर्बल और साधकों के
लिये निष्फल हैं। दान आदि सात साधन ज्ञान के ही अन्तर्गत हैं, वे सभी साधन निष्फल हैं यह कैसे कह सकते
हैं? इसका उत्तर यह है कि यहाँ दानादिक जो साधन हैं, उन्हें इस लोक में और परलोक में फल आता है,
लेकिन वह फल ही यहाँ निष्फल होता है और जन्म-मरण को बढ़ाता है। इसमें यदि साधक ज्ञानसम्पन्न हो तो
वह फल की आशा पूरी तरह त्याग कर दान आदि स्वधर्म का आचरण करेगा और वह केवल उसकी चित्तशुद्धि
के लिये उपयोगी होगा। लेकिन चित्तशुद्धि होने के लिये पहले भगवान की कृपा होनी चाहिये। सभी साधनों में