श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
शरीर पर का मल भी कभी साफ नहीं करता था। मूसल की तरह स्नान करता था इसलिये उसका रंग भी
राख जैसा हो गया था। इसलिये उसे अवधूत कहते थे। इस प्रकार पृथ्वी पर संचार करते-करते वह अकस्मात
अवंती नगरी में आया। तो अत्यन्त वृद्ध संन्यासी हुए अवधूत वेष में लोगों ने उसे देखा। संन्यास लेने के बाद
एक बार मातृभूमि का दर्शन करने की पद्धति के बारे में बड़े-बड़े आचार्यों ने लिख रखा है। उसे देखते ही उस
गाँव के लोग कहने लगे, "अरे! यह तो कदर्यु ब्राह्मण है। इसका धन चला गया इसलिये अब संन्यासी बन गया
है।" यह सुनाते ही दुष्ट लोग उसके पास एकत्र होने लगे और उन्होंने एक-दूसरे को इशारा कर उसका छल
प्रारम्भ कर दिया। लेकिन कष्ट सहकर भी उसके चित्त में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। वह बिलकुल नाराज नहीं
हुआ। वह इतना अधिक विवेकी और धैर्यवान हो गया था। लोगों ने उसे दिये हुए कष्टों का वर्णन और उसकी
सहनशीलता के बारे में मैं तुम्हें अब बताऊँगा। ध्यान देकर सुनो। उसके तात्पर्य पर ध्यान देने से श्रोतागण विवेक
से चतुर बनेंगे और जो इसके अर्थ पर भक्ति करेगा, उसी सच्ची शान्ति प्राप्त होगी। हे विवेकयुक्त चित्तचकोर के
चंद्र! भगवद्भक्त के भाग्य से शुद्धस्वरूपा! हे शान्ति सौभाग्य के राजा! हे भाग्यवान उद्धव! सुनो। आत्मशान्ति
प्राप्त करने के लिये कृष्ण उद्धव की पुकार करने लगे और उसे स्वस्थचित्त कर बोले, शान्ति का स्वरूप ऐसा है।
कोई जीवन क्रम में बाधा लाये, सम्मान के बहाने अपमान करे तो भी जो नाराज नहीं होता, उसके ही पास शान्ति
रहती है। उसके बारे में सुनो।
केचित्त्रिवेणुं जगृहुरेके पात्रं कमण्डलुम्।
पीठं चैकेऽक्षसूत्रं च कन्थां चीराणि केचन॥ ३४॥
उन दुष्टों ने संन्यासी को घेर लिया और छलने के लिये उसके चरणों पर मस्तक रखने लगे। उद्देश्य यही
था कि पैरों पर मस्तक रखकर नमस्कार करने लगे सब लोग उसे छू लेंगे। किसी ने कहा- "यह बूढ़ा संन्यासी
है।" किसी ने कहा, "क्या उम्र है आपकी?" किसी ने पूछा, "आप किस सम्प्रदाय के हैं? किस गुरु ने
आपका मुण्डन किया?" किसी ने इशारा किया, "यह किस गाँव का है, यह पूछिये।" कोई बोला, "अरे, यह
पूछिये कि इसके पास कितना धन है?" किसी ने पूछा, "स्वामीजी! आप किस गाँव के हैं? आप व्यापारी हैं या
उद्यमी हैं?" कोई बोला, "इसके पास थोड़ा पैसा है। अब यह द्रव्यहीन हो गया है। इसे कष्ट न दें। वह पूर्ण
विरक्त संन्यासी है।" इस प्रकार उस पर नाना प्रकार की व्यंगोक्तियाँ कसने पर भी उस संन्यासी को जरा भी कष्ट
नहीं हुआ। मुँह से एक भी शब्द निकालने के बजाय उसने मौन रखा। किसी ने कहा, "यह त्रिदण्डी संन्यासी
मालूम होता है। उस त्रिदण्ड का कारण यह है कि यह पहले अत्यन्त धनसम्पन्न था, उसने सारा धन इस दण्ड में
भरकर रखा होगा। यही त्रिदण्ड का रहस्य है।" किसी ने कहा, "देखिये, इसने कितनी बड़ी कथरी तैयार की
है। उसमें ठूँस कर धन भरा हुआ है। उसके मुँह की ओर क्यों देख रहे हैं? इसने पूरा पाखण्ड मचा रखा है।"
इस प्रकार जब उसकी निन्दा चल रही थी, तभी किसी ने उसका दण्ड छीन लिया। किसी ने कमण्डल गायब
किया, तो किसी ने आसन पर हाथ साफ किया। एक ने रुद्राक्ष की माला गायब की और एक ने तो काषायवस्त्र
ही छीन लिया। एक ने कहा, "यह मेरा कर्जदार है। अच्छा हुआ यहाँ मिल गया।" यह कहकर उसने उसकी
कथरी में हाथ डाल और साथ ही लंगोटी भी ले ली। वे दुर्जन इस प्रकार उसका छल कर रहे थे तो भी उसका
मन विचलित नहीं हुआ। उसका धैर्य क्षमा से परिपूर्ण था। उसने मन ही मन कहा, "आना और जाना दोनों
प्रारब्ध के अधीन है।" इसलिये अपनी चीजें वापस माँगने के बजाए, वह संन्यासी आगे बढ़ गया। उसे जाता