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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 634, कुल 869 में से

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पृष्ठ 634

६१८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
द्रव्य की लालच कम नहीं होती। धन की वृद्धि करने में चिन्ता असीम बढ़ गयी। इससे मैं अपना हित भूल गया
और द्रव्यलोभ में कंजूस बन गया। जिस द्रव्य से और जिस जन्म से विवेकशील लोग भूतदया और परोपकार कर
संसार सागर तर गये, वहाँ मुझ अभागे का द्रव्य व्यर्थ गया, जीवन व्यर्थ हुआ, आयु व्यर्थ गयी और मेरा स्वार्थ
डूब गया। आप शायद यह कहेंगे कि जब तक जान में जान है तब तक अपना स्वार्थ सिद्ध कर लिया जाय।
लेकिन अब ऐसी स्थिति में वह भी नहीं हो पायेगा क्योंकि अब द्रव्य और सामर्थ्य दोनों ही नहीं रहे। अधर्म के
कारण सारा धन नष्ट हो गया और वृद्धावस्था ने शक्ति छीन ली। अब मैं केवल जीर्ण-शीर्ण वृद्ध और अभागा
होकर रह गया हूँ। हाय! पैसा प्राप्त करने में सब लोग फँस गये, यह बात कंजूस ब्राह्मण स्वयं बता रहा है।
कस्मात् संक्लिश्यते विद्वान् व्यर्थयार्थेहयासकृत्।
कस्यचिन्मायया नूनं लोकोऽयं सुविमोहितः॥ २६॥
ऐसे द्रव्यलोभ के सम्बन्ध में अज्ञानी लोगों की दशा का क्या वर्णन किया जाय? जो अर्थ को अनर्थकारी
कहते हैं, वे भी द्रव्यलोभी हो जाते हैं इस भ्रम में जो ज्ञाता रहते हैं, वे भी द्रव्य प्राप्त करने के लिये अच्छे-बुरे प्रयास
स्वयं करते रहते हैं इसे याद रखो। ज्ञाताओं के भ्रम के कारण, पूर्णरूप से ईश्वर की माया ही है। अघटित घटना
जिसका लक्षण है उस माया के मोह में सज्ञान धनिक फँस गये। विद्वान लोग कृष्ण की माया में मुग्ध हो गये ऐसा
कहोगे तो यह वस्तुस्थिति का वर्णन नहीं है। वास्तव में वे अपने सुख और विलास के लिये धन कमाते हैं। लेकिन
जो लोग कहते हैं कि विषयोपभोग में सुख है, वे निहायत मूर्ख हैं। यही बात कंजूस ब्राह्मण बता रहे हैं।
किं धनैर्धनदैर्वा किं कामैर्वा कामदैरूत।
मृत्युना ग्रस्यमानस्य कर्मभिर्वोत जन्मदैः॥ २७॥
हाय, हाय! जरा देखिये। सभी वर्गों में पूज्य वह ब्राह्मण भी माया के मोह में फँस जाता है। लेकिन जो देह
नाना प्रकार के उपभोगों से सजाया जाता है, वही नश्वर है। जिस देह को नाना प्रकार के उपभोग लेने हैं उसे
क्षयरोग हो जाता है और अधिक धन प्राप्त करना ही दारिद्र्य का मार्ग है। द्रव्य अनायास मिलता है, इसलिये
श्रीमान् गृहस्थ उसकी उपासना करता है। लेकिन अत्यन्त कष्ट से द्रव्य प्राप्त कर कामवासना का उपभोग लेने में
क्या सचमुच सुख है? कामसुख स्त्री की संगत में लिया जाता है इसलिये वह स्त्री को पालता-पोसता है। लेकिन
वह स्त्री नाना प्रकार से उसका छल करने लगती है और किसी तरह नहीं छूटती है। स्त्री, पुत्र, कामभोग आदि से
देह को सुख दें तो वह देह ही मृत्यु की ओर अग्रसर है। उसका पीछा काल कर रहा है। हर पल काल आयु को
कम करता रहता है। ऐसी स्थिति में सुख की मिठास भी क्या है? लेकिन द्रव्य की इच्छा ने ज्ञाताओं को भी
पागल बना दिया। मेंढ़क साँप के मुँह में जा रहा है, फिर भी वह मछली खाता रहता है और इससे उसका साँप
के मुँह से छुटकारा होता है, उसी प्रकार नाना प्रकार के भोग भोगने से मृत्यु पीछे नहीं हटता। यह सब जानकर
भी ज्ञानी लोग द्रव्य के पीछे अन्धे हो जाते हैं। जो स्वयं कर्त्ता है, उसी के पीछे मृत्यु लगा हुआ है। उसका
समाधान किस भोग से हो पायेगा? यह केवल माया का भ्रम है। उस भ्रम से बड़े-बड़े सिद्ध भी भ्रमित हो गये
हैं। द्रव्य के योग ने यज्ञायाग कर स्वर्गलोक प्राप्त होगा, लेकिन वह स्वर्गभोग भी दुःखदायी है। कर्म से अज्ञानी
बने हुए लोगों का उस भोग का क्षय होने के बाद अधःपतन होता है या, भोग भेजने के लिये सकाम कर्म करो तो
पुनः मरण और पुनः जन्म यही अखण्ड भोगना पड़ता है। द्रव्यलोभी का यह बहुत बड़ा दुःख है, उसे सुख है ही
नहीं। मैं भी ऐसा ही मूर्ख था। लेकिन सौभाग्य से मेरा द्रव्य चला गया।