श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 633, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेईसवाँ अध्याय ६१७
धूप, दीप आदि से यथासांग पूजा करें और उसकी रुचि का उत्तम अन्न उसे तृप्त होने तक खिलायें। उसे
यथाशक्ति द्रव्य दें। इसी का नाम है ऋषिपूजन। ब्राह्मण स्वयं ही महर्षि है। ब्राह्मण के योग से सनत्कुमार तृप्त
होकर ढकार देता है। भाई, सगे-सम्बन्धी, इष्टमित्र आदि की भयंकर दारिद्र्य पीड़ा उन्हें द्रव्य देकर कम करें,
यही मुख्य रूप से श्रेष्ठ धर्म है। अपने परिवार को पीड़ा देकर दूसरे को अन्न धन देना पूरी तरह अधर्म है। वह
पुण्य शुद्ध नहीं है। अपने कुटुम्ब के सभी लोगों को पूरी तरह सुखी कर, फिर जो धन बचे उसे परोपकार में खर्च
करना चाहिये। यदि कोई अतिथि आ जाय तो उसे अवश्य अन्न देना चाहिये। वह यदि विन्मुख होकर जायेगा तो
अपना सारा पुण्य नष्ट हो जाता है। सभी दानों में अन्नदान श्रेष्ठ है। दीन-गरीबों को सम्मान कर उन्हें अत्यन्त
भक्तिभाव से सुरुचि वाला भोजन देना चाहिये। जो कुटुम्ब को सुखी करता है, गरीबों को पेटभर भोजन कराता है,
लेकिन स्वयं भूखा रहता है, यह भी अधर्म है। जैसे हम गरीबों को भोजन कराते हैं, उनमें खुद को भी एक गरीब
समझ कर सबके साथ भोजन करें। पंक्ति प्रपंच (पंगत में खाना परोसने में भेदभाव करना) यह भी अन्नदान में
आने वाली बाधा है। इसलिये सबके साथ ही भोजन करें। द्रव्य का उचित व्यय अनाथों के प्रेतसंस्कार में करें,
गरीबों के उद्धार में करें अथवा अयाचित के घर भिजवा देना चाहिये। अन्धे, विकलांग, गूँगे, दीन, दुर्बल इनका
जो स्वयं संरक्षण करता है उसका ही धन सार्थक होता है और उसका ही पुण्य शुद्ध समझना चाहिये। साधु और
सज्जन की राह में आने वाले संकट को जो धनवान पुरुष नष्ट करता है, उसकी धर्मशीलता की पताका साक्षात
वैकुण्ठ में लहराती है। दुर्बल भक्त का संरक्षण जो धनवान पुरुष करता है उससे भगवान सन्तुष्ट होता है और उस
भक्त से पहले उसका उद्धार करता है। सद्गुरु के पवित्र चरण सभी मंगलों से परिपूर्ण और सभी कल्याणों में
कल्याणकारी हैं। वहाँ जिसका द्रव्य अर्पण होता है, उसके औदार्यधर्म की ध्वजा सत्यलोक में फहराती है और
वैकुण्ठ तथा कैलास में सर्वत्र उसके यश की भेरी बजती रहती है। स्वधर्म से प्राप्त किया हुआ धन जो सद्गुरु को
अर्पण करता है, वही कर्म करके भी निष्कर्मी है। परमपवित्र एक वही है जो अधिकाधिक भगवद्भक्ति से गुरु
को अपनी सम्पत्ति अर्पण करता है उसे अंगीकार कर लक्ष्मीपति तो अपनी भक्ति से उसे देता है। जिसे एकनिष्ठ
गुरुभक्ति प्राप्त होती है उसके द्वार पर चारों मुक्तियाँ दासी बनकर खड़ी रहती हैं। लक्ष्मीपति तो उससे दूर ही नहीं
होते। जिसका शरीर, मन और धन पूरी तरह गुरुचरणों में अर्पित होता है, उसे संसारभय का स्मरण कल्पांत में भी
नहीं होगा। भाग्य से जो सम्पत्ति मिली है, उसे इस प्रकार खर्च कर भाग्यवान पुरुष उस द्रव्य से निष्ठापूर्वक
परमार्थ प्राप्त कर लेते हैं। जो इस प्रकार द्रव्य खर्च न कर स्वजाति और कुटुम्ब को पीड़ा देता है और स्वयं भी
पेटभर नहीं खाता, उसका संग्रह किया हुआ धन 'यक्षधन' है। इस ढंग से अपने को कष्ट देकर जो 'यक्षधन'
एकत्र किया रहता है, वह अधःपतन का कारण होता है और उस द्रव्यलोभी को भयंकर दुःख प्राप्त होता है। उस
ब्राह्मण ने कहा, मैं भी इसी प्रकार 'यक्षधन' से कंगाल हो गया। हाथ आया हुआ लाभ व्यर्थ चला गया और हाय !
मैं मोक्ष से वंचित रह गया। यक्षवित्त एकत्र कर मैंने अपना ही अहित किया। इस प्रकार दुःखी होकर वह बड़े
कष्ट से अपना दुःख बताने लगा।
व्यर्थयार्थेहया वित्तं प्रमत्तस्य वयो बलम्।
कुशला येन सिध्यन्ति जरठः किं नु साधये॥ २५॥
स्वयं विलास का भोग न कर मैं वाणी और मन इन दोनों को कष्ट देकर उन्मत्त और अविचारी बन गया।
द्रव्यप्राप्ति के लिये प्रयास करने में यौवन, बल और आयु निकल गयी। शरीर पूरी तरह क्षीण हो गया। फिर भी