श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 635, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेईसवाँ अध्याय ६१९
नूनं मे भगवांस्तुष्टः सर्वदेवमयो हरिः।
येन नोतो दशामेतां निर्वेदश्चात्मनः प्लवः ॥ २८ ॥
पहले मैं बहुत अभागा था लेकिन अब बहुत भाग्यवान हो गया हूँ। मुझ पर श्रीकृष्ण प्रसन्न हो गये, मुझे
विवेक और वैराग्य प्राप्त हो गया। मैंने एकत्र किया हुआ धन ही मेरा एकमात्र अज्ञान था। उसे पूरी तरह नष्ट कर
श्रीहरि ने मुझ पर बहुत बड़ी कृपा की है। वह भक्तों का अज्ञान हरण करता है इसीलिये उसका नाम श्रीहरि है।
उसने ही मुझ पर पूर्ण कृपा कर मेरे अंतःकरण में विवेक उत्पन्न किया। वैराग्य विवेक के बिना अन्धा रहता है
और विवेक वैराग्य के बिना लंगड़ा रहता है। मैंने अपने हृदय में ये दोनों एक ही साथ उत्पन्न किये। श्रीहरि ने
कृपा की और द्रव्य के साथ मेरा अज्ञान हरण किया और वैराग्य और विवेक इन दोनों को मेरे हृदय मन्दिर में
प्रकाशित किया। लेकिन कब, कहाँ और किस प्रसंग में श्रीहरि ऐसी कृपा करते हैं, यह किसी को नहीं मालूम
होता। भक्तों का चित्त हरण करने के लिये श्रीहरि पहले उनका द्रव्य हरण करता है और द्रव्यनाश से उनका चित्त
शुद्ध कर उन्हें विवेक युक्त वैराग्य प्रदान करता है। इस प्रकार के लेनदेन की कला ब्रह्मादिकों के लिये भी अतर्क्य
है, ऐसा समझ लो। इसलिये वह भगवंत-पूर्ण भाग्यवान है। छह गुण उसके वश में रहते हैं। उसका स्वरूप
अचिंत्य और अनंत है। लेकिन मेरे लिये वह कृपालु बन गया और मेरे लिये मेरे पाप द्रव्य के साथ नष्ट कर
ज्ञानदीप जलाया। भगवान की कृपा हुई यह सच है, लेकिन मैंने यज्ञदेवताओं को फँसाया है, वे नाराज हो जाएँ
तो मुझ पर आघात करेंगे ऐसा कहें तो वह कभी नहीं होगा। हाथ में देदीप्यमान चक्र धारण करने वाला श्रीहरि
जिसका रखवाला है उसके पास विघ्न की हवा भी नहीं आ पायेगी। भगवान उसका वंदन करेंगे। भगवान ने ही
प्रह्लाद को वन्दन कर नृसिंह को शान्त कराया। वह नरहरि ही जिसका रखवाला है, उसके पास विघ्न कैसे
आयेगा। उसने कोटि-कोटि देवताओं को क्षणमात्र में बंदिवास से छुड़ाया है, उसके भक्त का बाल यज्ञादि
देवतागण कैसे टेढ़ा कर पायेंगे? जो समस्त देवताओं का नियामक है जिसके चरण देवतागण भी वंदन करते हैं,
वह भगवान ही जब सहायक है तो उसे विघ्नों की कोई पीड़ा नहीं होगी। जिसके बल से देवता इतने महान हुए
हैं, देवता ही जिसके अवयव हैं, वह श्रीहरि ही जब प्रसन्न हो जाय तो किस विघ्न का वहाँ आना सम्भव है?
श्रीहरि सर्वदेवस्वरूप ही हैं। इन्द्र और चन्द्र मेरे श्रीहरि ही हैं। मुझ दीन पर संसार में कोई विघ्न नहीं आयेगा।
भगवान की इस कृपा का कारण यदि देखा जाय तो मैंने तो कोई साधन नहीं किया। समझ लो कि यह मेरा
पूर्वजन्मों का ऋण भगवान के पास सुरक्षित था। पहले किस जन्म में, किस देश में, किस तीर्थक्षेत्र में, किस वंश
में, मैंने सत्कर्म किया था कि जिसके योग से परमेश्वर मुझ पर प्रसन्न हुआ? या मुझे दुःखी देखकर कृपासागर
श्रीहरि मुझ पर सन्तुष्ट हुए और मुझ पर कृपा की जिससे मैं विवेकसम्पन्न हो गया। जरा देखिये! मुझे दुःख हुआ
जिससे मुझे आत्मसुख का लाभ हुआ। इस संसार सागर को पार करने के लिये वैराग्ययुक्त विवेक यही मजबूत
जहाज है। इस प्रकार वह ब्राह्मण हर्ष से बोला— अब शेष जीवन में मैं एक क्षण भी व्यर्थ नहीं जाने दूँगा। सुख-
दुःखों का निर्मूलन कर डालूँगा।
सोऽहं कालावशेषेण शोषयिष्येऽङ्गमात्मनः।
अप्रमत्तोऽखिलस्वार्थे यदि स्यात् सिद्ध आत्मनि ॥ २९ ॥
संसारभय की किसे परवाह है? कोटि-कोटि जन्मों का बदला लूँगा। जो जीवन व्यर्थ गया है उसकी इसी
देह से पूर्ति करूँगा। शरीर अवश्य वृद्ध हो गया है लेकिन मेरा अंतःकरण वृद्ध नहीं हुआ है। इसलिये इसी