श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 643, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेईसवाँ अध्याय ६२७
है। मन की शंका से ही काल प्रबल हो उठता है। जो स्वयं निर्विकल्प है, उसके पास काल कभी नहीं आता
क्योंकि उसके पास नश्वर कुछ भी नहीं होता। अतः काल कहाँ जायेगा? इस प्रकार काल सुख-दुःख देने वाला
नहीं है, इसे ध्यान में रखो। सुख-दुःख उत्पन्न करने वाला एक मन ही है, इसे निश्चित जान लो। संसार भी मनः
कल्पित ही है यह समझ लो। मन ने ही जन्म-मरण की कल्पना की है। संसार चक्र में बार-बार जो परिक्रमा
करनी पड़ती है वह भी मन के ही कारण। ये छह प्रकार ही सुख-दुःख का कारण है, ऐसा कुछ लोग कहते हैं।
विचार करने पर यह भी असत्य मालूम होता है क्योंकि सुख-दुःख मन से ही उत्पन्न होते हैं। वह मन कितने
आश्चर्यकारक ढंग से मोहित करने वाला है कि वह 'मैं' का भान उत्पन्न कर तथा शुद्ध ब्रह्मस्वरूप आत्मा की ओर
प्रीति लगाकर सुख-दुःख भोगने को बाध्य करता है। आँख में छोटा-सा भी कण क्यों न चला जाय लेकिन वह
बहुत कष्ट देता है। उसी प्रकार मन भी वासना के बहाने भयंकर सुख-दुःख देता है। अब शायद आप यह कहेंगे
कि अविद्या ही सुख-दुःख देने वाली है। लेकिन अविद्या ब्रह्मस्वरूप होने के कारण, मन के सिवा सुख-दुःख
कभी नहीं होगा। अविद्या ब्रह्मस्वरूप होने के कारण मन सुषुप्ति में लीन रहता है। उस समय तो सुख-दुःख
रहता ही नहीं है। इसलिये किसी को वहाँ भोग दिखायी ही नहीं देता। मन जब निश्चित नहीं रहता तभी देह का
सुख-दुःख हमें नहीं मालूम होता। यह अनुभव हमें स्वयं अपने देह में अनुभव करना चाहिये। इसलिये हमारे
सुख-दुःख का कारण स्वयं हमारा मन ही है। उसी ने जन्म-मरण का चक्र मनुष्य के पीछे लगा दिया है और
मन उसे उस चक्र में घुमाता रहता है। वह कैसे घुमाता है उसी का निरूपण भिक्षु स्वयं सुना रहा है।
मनो गुणान् वै सृजते बलीयस्ततश्च कर्माणि विलक्षणानि।
शुक्लानि कृष्णान्यथ लोहितानि तेभ्यः सवर्णाः सृतयो भवन्ति ॥ ४४ ॥
मन ही अपनी सत्ता से कल्पना कर अनेक प्रकार की वृत्ति उत्पन्न करता है। यही वृत्ति बाद में त्रिगुणात्मक
हो जाती हैं और गुणों के प्रकारों के अनुसार उनकी वृत्ति बनती हैं। उन्हीं सत्त्व, रज, तमादि गुणों से देवता,
मनुष्य और पशु-पक्षी आदि योनि, मन से ही त्रिभुवन की सृष्टि उत्पन्न कर संसार सदन में विचरण करते हैं। उस
मन का सामर्थ्य विचित्र है। वह एक क्षण में कोई व्यूह रचना करता है और दूसरे ही क्षण उसे गिरा देता है। मन
ब्रह्मादि देवताओं पर भी अपनी मोहिनी चलाता है फिर औरों की क्या बिसात है? मन का प्रभाव इतना विचित्र है
कि वह निर्गुण को गुणों के पाश में फँसाता है। उसे जीवन की तंद्रा में लगा कर संसार के चक्र में घूमने के लिये
छोड़ देता है। विचार करने पर मालूम होता है कि मन, जड़, मूढ़ और अचेतन है। उसकी उत्पत्ति कैसे होगी?
उसी का वर्णन श्रीकृष्ण कर रहे हैं।
अनीह आत्मा मनसा समीहता हिरण्मयो मत्सख उद्द्विचष्टे।
मनः स्वलिङ्गं परिगृह्य कामान् जुषन् निबद्धो गुणसङ्गतोऽसौ ॥ ४५ ॥
आत्मा ज्ञानस्वरूप होने के कारण परिपूर्ण है। वह निःसंग, निर्विकार और निर्गुण है। उसे संसारबन्धन की
बाधा नहीं होती। जो आत्मा स्वयं प्रकाश से ही प्रकाशित है, स्वतेज से ही सुशोभित है और जो आत्मा परिपूर्ण
है, उसे क्रियाचरण कभी नहीं घटता। अपनी कल्पना से विचार करने से मन जड़ मालूम होता है, अतः उसे भी
संसार घटना सम्भव नहीं है। अब, यह संसार का बन्धन किसे होता है, सुनिये। मन का कौशल आश्चर्यजनक
है। वह शुद्ध आत्मा में 'मैं' का भाव उत्पन्न करता है और उसी ब्रह्म में जीवभाव लाकर स्वयं ही उसे सगुण
स्वरूप में ले आता है। मन के संकल्प का सामर्थ्य इतना अधिक है कि वह शुद्ध ब्रह्म को अविद्यात्मक कर देता