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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 631, कुल 869 में से

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पृष्ठ 631

तेईसवाँ अध्याय ६१५
खटमल तेल के पास नहीं जाता, अथवा दीमक अग्नि को नहीं लगती, उसी प्रकार वह द्रव्य को स्पर्श नहीं
करता अथवा जिस प्रकार अग्नि में पड़ा लवण तड़तड़ कर बाहर आ जाता है, उसी प्रकार मोक्ष की इच्छा से
जो अपना द्रव्य तत्काल फेंक देता है वही स्वहितेच्छु हरिभक्त है। बचनाग विष क्षण भर के लिये मधुर लगता
है लेकिन उसका परिणाम मृत्यु ही होता है। उसी प्रकार अर्थ अनर्थ का कारण बनता है। इसलिये जो मोक्ष की
आकांक्षा करता है उसे हाथ में धन नहीं लेना चाहिये। काया, वाचा तथा मन से सचमुच ही द्रव्य का त्याग
करें। सारे भेद अर्थ के कारण उत्पन्न होते हैं यह पहले भी बताया गया है। किन्तु श्रीकृष्ण वही बात बार-बार
स्पष्ट करके बताते हैं।
भिद्यन्ते भ्रातरो दारा पितरः सुहृदस्तथा।
एका स्निग्धाःकाकिणिना सद्यः सर्वेऽरयःकृताः ॥ २० ॥
एक कौड़ी भी इष्टमित्रों की मित्रता तोड़ देती है। भाइयों का स्नेह बिगाड़ती है और सहृदों का सौजन्य नष्ट
करती है। पितापुत्र में जो विरोध, स्त्री पुत्र में जो कलह होता है उसका सम्बन्ध इस अर्थ से है, यह जान लो। वह
इष्टमित्रों का प्रेम ही नष्ट करता है। 'काकिनी', यानी बीस कौड़ी लेकिन वह आप्तों का सम्बन्ध तोड़ देती हैं।
इतना ही नहीं, उनमें से एक फूटी कौड़ी भी इष्टमित्रों में भेद उत्पन्न करती है।
अर्थेनाल्पीयसा ह्येते संरब्धा दीप्तमन्यवः।
त्यजन्त्याशु स्पृधो घ्नन्ति सहसोत्सृज्य सौहृदम् ॥ २१॥
द्रव्य का लोभी मनुष्य अल्प द्रव्य के लिये भी अंतःकरण का मित्रत्त्व छोड़कर क्रोध से संतप्त होकर एक-
दूसरे से धोखा करते हैं। अर्थ मनुष्य को अनर्थ में डालकर उसका प्राणान्त भी कराता है। इस प्रकार अर्थ अपने
स्वार्थ पर भी आघात करता है। जब तक मनुष्य जीवित है, तब तक यह द्रव्य अनर्थ करता है और मृत्यु के बाद
नरक के द्वार पर ले जाता है। अब यह द्रव्य किस प्रकार उत्तम देह को नष्ट कर देता है, यह भी सुनो।
लब्ध्वा जन्मामरप्रार्थ्यं मानुष्यं तद् द्विजाग्यताम्।
तदनादृत्य ये स्वार्थं घ्नन्ति यान्त्यशुभां गतिम् ॥ २२ ॥
कोटि-कोटि जन्मों का पुण्य हो, तभी इस कर्मभूमि में ( भरतखण्ड में) मनुष्यदेह प्राप्त होता है। उसमें भी
सारे वर्णों में अग्रगण्य, सामर्थ्यवान् ब्राह्मण वर्ण में जन्म और ब्राह्मणों में भी उत्तम कुल में जन्म इस मृत्युलोक में
प्राप्त करने के लिये देवता भी मृत्यु की कामना करते हैं। स्वर्ग के इन्द्रादि जो देवता हैं वे भी ऐसे जन्म की इच्छा
करते हैं। सत्यलोक तक का अद्भुत ऐश्वर्य जिन्हें प्राप्त हुआ है वे भी इस जन्म की इच्छा करते हैं। इतना ही
नहीं, बल्कि दिन-रात उसकी उत्कंठा करते रहते हैं। ऐसे इस जन्म में यदि भगवद्भक्ति करें तो चारों मुक्तियाँ
कदमों पर गिरती हैं इसलिये देवता भी ऐसे जन्म प्राप्ति की कामना करते हैं। ऐसा उत्तम जन्म प्राप्त होने पर भी,
मैं त्रिभुवन में अत्यन्त अभागा रहा और अपने स्वार्थ की उपेक्षा कर द्रव्यलोभ में द्रव्य के ही मोह में फँस गया।
द्रव्यलोभ से भ्रान्त होकर अथवा लोगों में प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिये जो भगवद्भक्ति की उपेक्षा करता है, उसे
दुर्गति प्राप्त होती है। वह दुर्गति कैसी ? तो द्रव्यलोभियों को नरकवास प्राप्त होता है और वे चौरासी लाख
योनियों में अत्यन्त दुःख से गर्भवास भोगते रहते हैं। जिस ब्राह्मण जन्म में स्वर्ग और मोक्ष सहज प्राप्त होते हैं,
उसी अर्थ का रहस्य वह द्रव्यलोभी स्वयं बता रहा है।