श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 642, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ें६२६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
वह भिक्षु बोला, सज्जन, दुर्जन और साधारण ये जो तीन प्रकार के लोग होते हैं, वे मेरे सुख या दुःख के
लिये बिलकुल कारणीभूत नहीं होते। जितने भी प्रकार के लोग हैं वे सब पंचमहाभूतों से ही उत्पन्न हुए हैं। मेरा
भी देह वैसा ही है। इसलिये सारे लोगों में और मुझमें एक प्रकार का ऐक्य है। सुख-दुःख केवल मन में ही
उत्पन्न होता है। सुख-दुःख देने वाले देवता हैं, यदि ऐसा कहा जाय तो देवता मन की कल्पना हैं। अतः उनके
सुख-दुःख का भी मुझ पर कोई प्रभाव नहीं होगा। देवता रूप हमारा मन ही है और उस मन ने ही समस्त
देवताओं की कल्पना की है। अर्थात् देवता जब सुख-दुःख देते हैं तो इसका कारण मन ही रहता है। जैसा मन
का सद्भाव होता है, वहीं उसी के अनुसार उस स्वरूप में देवी या देवता का आभास होता है। जहाँ मन में
अश्रद्धा रहती है वहाँ देव भी नहीं दिखाई देता। इसलिये जो समस्त देवतागण हैं, वे मन से कल्पित ही हैं। अतः
यदि उनसे सुख-दुःख की व्यथा होती है तो वह मन के कारण ही है, यह जान लो और यदि आत्मा का सुख या
दुःख का कारण मान लें तो वह भी गलत है। आत्मा में द्वैत की भावना बिलकुल नहीं होती। मैं सुख-दुःख देने
वाला हूँ और यह सुख-दुःख का भोक्ता है ऐसी भावना आत्मा में नहीं होती। जन्म के समय के क्रूर ग्रह सुख-
दुःख का कारण है ऐसा यदि कहें तो वास्तव में हमारा मन ही सारे ग्रहों का ग्रह है। वह जन्म-मरण का भोग
कराता है। ग्रहों की ग्रहदशा देह रहने तक होती है, लेकिन मन की ग्रहदशा उससे भी अधिक है। वह नाना
प्रकार का भोग कराती है और जन्म जन्मान्तर में भी नहीं छोड़ती। दुष्ट ग्रह थोड़े ही समय के लिये पीड़ा देता है
लेकिन मन की पीड़ा कोटि-कोटि जन्मों तक रहती है। दुष्ट ग्रह अपनी भोगदशा पूरी होने के बाद छोड़ देता है
लेकिन मन कल्पांत में भी नहीं छोड़ता। मन यदि देहाभिमान धारणा न करे तो ग्रहों की पीड़ा की कौन चिन्ता
करता है? इसलिये सुख-दुःख के लिये कारणीभूत होने वाला मन, यही एक महाग्रह है। अब हम अपने कर्म
को ही दुखदायक नहीं कह सकते क्योंकि कर्म ही कर्मबन्धन से छुड़ाता है। वह दुःखदायक कैसे हो सकता है?
अपना कर्म स्वाभाविक और पवित्र होने पर मन ही उसे सकाम बनाता है और उसे अनेक प्रकार के दुःख देकर
उसे अनेक योनियों का भोग भोगने को बाध्य करता है। जब कर्म की क्रिया के सम्बन्ध में मन का संकल्प कर्म
पर लागू नहीं होता तो सुख-दुःख कितने ही क्यों न हो, लेकिन अपना कर्म ही उनका नाश करता है। देह को
सुख-दुःख का क्या ज्ञान होगा? आत्मा तो सुख-दुःख बिलकुल नहीं जानता। इसलिये सुख-दुःखों का खजाना
बनाना और फिर उसे भोगना यह सब मन के आदेश से ही होता है। सुख-दुःख देने वाला काल है यह कहना
भी सर्वथा सच नहीं है। मन का संकल्प जैसा संकेत देता है, उसी प्रकार काल की सत्ता चलती है। अजर-अमर
रहते हुए यदि कोई अपने लिये मृत्यु की कल्पना कर ले तो काल उसके पीछे लग जाता है और क्षण-प्रतिक्षण
उसकी आयु कम करता है। जैसे बिस्तर में कोई सुआ चुभो कर रख दे और रात को सोने पर वह शरीर में घुसते
ही, साँप ने काटा इस भय से मर जाय। वास्तव में साँप ने उसे काटा ही नहीं था फिर उस पर विष का असर
कैसे होगा? वह केवल शंका से ही मर गया। उसी प्रकार काल लोगों के पीछे लगा हुआ है। एक आदमी की
पीठ में साँप ने काट लिया था। उसने अपने मित्र से पूछा, "मेरी पीठ में क्या घुस गया था?" उसने कहा,
"कुछ नहीं। एक काँटा गड़ गया था, जिसे मैंने खींच कर निकाल दिया।" इससे उसे साँप की शंका ही नहीं हुई
और विष की बाधा भी नहीं हुई। बहुत दिनों के बाद जब मित्र ने बताया कि उसे साँप ने ही काटा था और उसे
पीठ पर साँप को काटने का निशान भी दिखाया तो पुरानी याद आते ही तत्काल विष का प्रभाव हो गया और
उसने प्राण त्याग दिये। उसी प्रकार निर्विकल्प पुरुष को संकल्प की शंका होती है, उसी समय उसके विनाश के
लिये काल तैयार हो जाता है। लेकिन जिसका मन निःसंकोच 'मैं अमर हूँ' कहता है, उसका घर काल छोड़ देता