श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 637, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेईसवाँ अध्याय ६२१
बच्चों का मोह मैंने ही किया था लेकिन देखो, उन्होंने ही मुझे घर से बाहर निकाला। जाति का अभिमान करूँ तो
मैं अपने जाति भाइयों से भी दूर हो गया। मेरे सगे-सम्बन्धी भी मुझसे विमुख हो गये। इसलिये उनका भी लोभ
मैं क्यों करूँ? पत्नी, बच्चे, सगे-संबंधी, धन आदि के लोभ का मुख्य कारण मुझे हुआ मेरा देहाभिमान ही है।
उस देहाभिमान को ही मैं अब साष्टांग नमस्कार करता हूँ। पत्नी, बच्चे और द्रव्य को नमस्कार करता हूँ। जाति
भाइयों और सगे-संबंधियों को नमस्कार करता हूँ। अब मेरा आप से कोई संबंध नहीं रहा। पानी और उसमें
प्रतिबिम्बित होने वाला चन्द्रमा ये दोनों एक साथ रहते दिखायी देते हैं, लेकिन चन्द्रमा पानी से बिलकुल अलग
रहता है। उसी प्रकार तुमसे अब मेरा कोई संबंध नहीं है। जिस प्रकार छाया दिन-रात लगी रहती है, फिर भी
पदार्थ छाया से चिपक कर नहीं रहता, उसी प्रकार मेरा आपसे कोई संबंध नहीं है अथवा जिस प्रकार देह के
पास यौवन आता है और उस यौवन से देह खिल उठता है, लेकिन अन्त में यौवन देह को छोड़कर चला जाता
है, उसी प्रकार मैंने आपका त्याग किया है। वन में बसन्त ऋतु का प्रवेश होने पर वनश्री की शोभा निखर उठती
है। लेकिन जब वसन्त अपना काल समाप्त होते ही वन को छोड़कर चला जाता है, उसी प्रकार मैं ममता का
अहंकार छोड़ रहा हूँ। वैराग्य के साथ विवेक का सामर्थ्य आश्चर्यजनक है। उसने मुझसे कैसा अलौकिक त्याग
कराया इससे मैंने देहाभिमान और ममता को तिलांजलि दे दी। जिस प्रकार पिता अपने भ्रष्ट पुत्र से सम्बन्ध
विच्छेद कर देता है, उसी प्रकार देहाभिमान त्याग कर वह संन्यासी बन गया। फल जब पक जाता है तो वह
अपने पूर्वदेह का त्याग करता है, डंठल भी फल को पकड़कर नहीं रखता और फल भी डंठल से चिपका नहीं
रहता, उसीप्रकार यह अहंता के पास नहीं रहता और अहंता भी इसके पास नहीं आती। यह भी सद्भावना से
देहाभिमान का स्पर्श नहीं करता। जिस प्रकार पानी में रहते हुए भी कमलपत्र उससे अलिप्त रहता है, उसी प्रकार
देहाभिमान का स्पर्श किये बिना उसने विधिपूर्वक संन्यास ग्रहण किया। अन्य संन्यासी होम करते हैं और क्रोध
और काम को जलाने की बात करते हैं लेकिन अंत में तिल और घी का तो भस्म हो जाता है और काम-क्रोध
जैसे के तैसे रह जाते हैं। इसका होम उस प्रकार का नहीं था। उसने विकल्प की वृत्तियाँ जला डाली थीं और
अहंकार के साथ कामक्रोध की पूर्णाहुति कर दी थी। अपने मूल स्वभाव का होम कर वह त्रिदंडी स्वामी हो गया
और गुरु से आज्ञा लेकर सुखपूर्वक विचरण करने लगा।
स चचार महीमेतां संयतात्मेन्द्रियानिलः ।
भिक्षार्थं नगरग्रामानसङ्गोऽलक्षितोऽविशत् ॥ ३२॥
मन और प्राण को जीत कर, मानाभिमान छोड़कर परमानन्द से परिपूर्ण होकर वह पृथ्वी पर संचार करने
लगा। देह की संगति जिसे नहीं भाती, उसे साथ में किसी को रखना कैसे अच्छा लगेगा? वह आत्मज्ञान से
आत्मास्वरूप में मग्न होकर पृथ्वी पर अकेला ही घूम रहा था। निरन्तर अरण्य में रहता था। भिक्षा के लिये
अवश्य गाँव में आता था और जहाँ बाजार लगता था ऐसी शहर या गाँव से जो भी भिक्षा मिलती थी, उसे ग्रहण
करता था। मैं भिक्षा के लिये आने वाला हूँ, ऐसा कोई नियम वह नहीं बनाता था। गाँव में बिना किसी के देखे
चला जाता था और हाथ में जो भी आ जाये उसमें संतोष मानता था। पाँच सात घरों में जाकर भिक्षा माँगने का
उसने कोई नियम नहीं बनाया था। किसी भी बात का थोड़ा भी अहंकार उसके मन में नहीं था।
तं वै प्रवयसं भिक्षुमवधूतमसज्जनाः ।
दृष्ट्वा पर्यभवन् भद्र बह्वीभिः परिभूतिभिः ॥ ३३ ॥