अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
संजयन् पृतना ऊर्ध्वमायुर्गृह्या गृहणानो बहुधा वि चक्ष्व.
दैवीं वाचं दुन्दुभ आ गुरस्व वेधाः शत्रूणामुप भरस्व वेदः.. (४)
हे दुदुंभि! तू उच्च शब्द करती हुई शत्रु सेनाओं को जीत लेती है. तू उन्हें पकड़ कर युद्ध
में विजय प्राप्त करती है. तू दैवी वाणी का उच्चारण कर और शत्रुओं का धन मुझे प्राप्त करा.
(४)
दुन्दुभेर्वाचं प्रयतां वदन्तीमाशृण्वती नाथिता घोषबुद्धा.
नारी पुत्रं धावतु हस्तगृह्यामित्री भीता समरे वधानाम्.. (५)
दुदुंभि की घोर गर्जना से शत्रुओं की नारियां होश में आ जाती हैं. वे युद्ध में मारे गए
शत्रुओं को देख कर भयभीत होती हैं और अपने पुत्र का हाथ पकड़ कर भाग जाती हैं. (५)
पूर्वो दुन्दुभे प्र वदासि वाचं भूम्याः पृष्ठे वद रोचमानः.
अमित्रसेनाम्अभिजज्जभानो द्युमद् वद दुन्दुभे सूनृतावत्.. (६)
हे दुदुंभि! तेरी ध्वनि सब से पहले निकलती है, इसलिए तू शत्रु सेना का विनाश कर
तथा पृथ्वी के ऊपर सत्य वचनों का प्रचार कर. (६)
अन्तरेमे नभसी घोषो अस्तु पृथक् ते ध्वनयो यन्तु शीभम्.
अभि क्रन्द स्तनयोत्पिपानः श्लोककृन्मित्रतूर्याय स्वर्धी.. (७)
हे दुदुंभि! धरती और आकाश के मध्य तेरी ध्वनियां अनेक रूपों में व्याप्त हों तथा
शोभन प्रतीत हों. तू उच्च शब्द से समृद्ध हो तथा मित्रों में वेग व्याप्त करने के लिए उच्च स्वर
से गर्जन कर. (७)
धीभिः कृतः प्र वदाति वाचमुद्धर्षय सत्वनामायुधानि.
इन्द्रमेदी सत्वनो नि ह्वयस्व मित्रैरमित्राँ अव जङ्घनीहि.. (८)
हे दुदुंभि! कुशलतापूर्वक बजाने पर तू मोहक शब्द निकालती है. शक्तिशाली मनुष्यों के
आयुधों को ऊंचा कर के तू उन्हें प्रसन्न बना. तू वीरों का आह्वान करती हुई हमारे मित्रों द्वारा
हमारे शत्रुओं का विनाश करा, क्योंकि तू इंद्र की प्रिया है. (८)
संक्रन्दनः प्रवदो धृष्णुषेणः प्रवेदकृद् बहुधा ग्रामघोषी.
श्रेयो वन्वानो वयुनानि विद्वान् कीर्तिं बहुभ्यो वि हर द्विराजे.. (९)
हे दुदुंभि! तू गर्जन करने वाले गौवों को गुंजित करने वाली, धनदात्री और सेना को
साहस प्रदान करने वाली है. तू कल्याण करने वाली एवं उत्तम पुरुषों को जानने वाली है. तू
इन दो राजाओं के युद्ध के मध्य अनेक वीरों को कीर्ति प्रदान कर. (९)
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श्रेयःकेतो वसुजित् सहीयान्त्सङ्ग्रामजित् संशितो ब्रह्मणासि.
अंशूनिव ग्रावाधिषवणे अद्रिर्गव्यन् दुन्दुभेऽधि नृत्य वेदः.. (१०)
हे संग्राम में विजय प्राप्त करने वाली दुदुंभी! तू कल्याणी, धन जीतने वाली,
शक्तिशालिनी एवं मंत्र के द्वारा तीक्ष्ण बनाई हुई है. अधिश्श्रवण काल में पर्वत अपने पाषाण
खंडों को दबाता हुआ नृत्य करता है, उसी प्रकार तू भी शत्रुओं के धन पर अधिकार करती
हुई नृत्य कर. (१०)
शत्रुषाणीषादभिमातिषाहो गवेषणः सहमान उद्भिद्.
वाग्वीव मन्त्रं प्र भरस्व वाचं सांग्रामजित्यायैषमुद् वदेह.. (११)
हे दुदुंभि! तू ऐसा शब्द निकालती है, जो शत्रुओं की वाणी से टक्कर ले सके. तू
गवेषणा करने वाले बातूनी पुरुष के समान युद्ध जीतने के निमित्त शब्द करती हुई गूंज. (११)
अच्युतच्युत् समदो गमिष्ठो मृधो जेता पुरएतायोध्यः.
इन्द्रेण गुप्तो विदथा निचिक्यद्धृद्द्योतनो द्विषतां याहि शीघ्रम्.. (१२)
हे युद्ध में विजय प्राप्त करने वाली दुदुंभी! तू हर्ष से पूर्ण है एवं डिगती नहीं है. तू आगे
युद्ध में जा कर योद्धाओं की प्रेरक और युद्ध जीतने वाली है. इंद्र के द्वारा रक्षित तू शत्रुओं के
हृदयों को जलाती हुई उन के समीप जा. (१२)
सूक्त-२१ देवता—वानस्पत्य
विहृदयं वैमनस्यं वदामित्रेषु दुन्दुभे.
विद्वेषं कश्मशं भयममित्रेषु नि ध्मस्यवैनान् दुन्दुभे जाहि.. (१)
हे दुदुंभि! तू शत्रुओं में वैमनस्य फैला एवं उन के हृदयों में एकदूसरे के प्रति द्वेष भर दे.
हम अपने शत्रुओं में द्वेष की भावना फैलाना चाहते हैं. तू उन का तिरस्कार करती हुई उन्हें
समाप्त कर दे. (१)
उद्वेपमाना मनसा चक्षुषा हृदयेन च.
धावन्तु बिभ्यतो ऽ मित्राः प्रत्रासेनाज्ये हुते.. (२)
हमारे द्वारा होम किए गए घृत से हमारे शत्रु कंपित हों और मन, नेत्र तथा हृदय से
भयभीत हो कर भाग जाएं. (२)
वानस्पत्यः संभृत उस्रियाभिर्विश्वगोत्र्यः.
प्रत्रासममित्रेभ्यो वदाज्येनाभिघारितः.. (३)
हे वनस्पति से बनी हुई दुदुंभी! तू चमड़े से मढ़ी हुई है तथा मेघ घटा के समान घोर
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शब्द करती है. घी से चुपड़ी हुई तू शत्रुओं को भय उत्पन्न करने वाला शब्द कर. (३)
यथा मृगाः संविजन्त आरण्याः पुरुषादधि.
एवा त्वं दुन्दुभे ऽ मित्रानभि क्रन्द प्र त्रासयाथो चित्तानि मोहय.. (४)
हे दुंदुभि! वनचारी शिकारी पुरुष से जिस प्रकार वन के पशु भयभीत होते हैं, उसी
प्रकार तू अपने गर्जन से शत्रुओं को भयभीत करती हुई, उन के चित्तों को मोहित बना. (४)
यथा वृकादजावयो धावन्ति बहु बिभ्यतीः.
एवा त्वं दुन्दुभे ऽ मित्रानभि क्रन्द प्र त्रासयाथो चित्तानि मोहय.. (५)
जिस प्रकार भेड़ें और बकरियां भेड़िए के कारण अधिक भयभीत हो कर भागती हैं,
उसी प्रकार तू गड़गड़ाहट करती हुई शत्रुओं को भयभीत कर के उन का चित्त मोहित कर.
(५)
यथा श्येनात् पतत्रिणः संविजन्ते अहर्दिवि सिंहस्य स्तनथोर्यथा.
एवा त्वं दुन्दुभे ऽ मित्रानभि क्रन्द प्र त्रासयाथो चित्तानि मोहय.. (६)
हे दुंदुभि! जिस प्रकार बाज से सभी पक्षी और सिंह से सभी प्राणी भयभीत रहते हैं,
उसी प्रकार तू शत्रुओं के प्रति गड़गड़ाहट कर के उन्हें भयभीत कर के उन के चित्तों को
मोहित कर. (६)
परामित्रान् दुन्दुभिना हरिणस्याजिनेन च.
सर्वे देवा अतित्रसन् ये संग्रामस्येशते.. (७)
जो संग्राम के देवता हैं, उन्होंने हिरण के चमड़े से मढ़ी हुई दुंदुभि बजा कर शत्रुओं को
भयभीत कर के पराजित किया. (७)
यैरिन्द्रः प्रक्रीडते पद्घोषैश्छायया सह.
तैरमित्रास्त्रसन्तु नो ऽ मी ये यन्त्यनीकशः.. (८)
इंद्र जिन पदघोषों से खेलते हैं, उन से अधिक संख्या वाले शत्रु भयभीत हों. (८)
ज्याघोषा दुन्दुभयो ऽ भि क्रोशन्तु या दिशः.
सेना पराजिता यतीरमित्राणामनीकशः.. (९)
शत्रुओं की पराजित सेनाएं जिस ओर भाग रही हैं, हमारे बाणों की डोरी और दुंदुभि का
शब्द मिल कर उधर ही उन को भयभीत करें और हरा दें. (९)
आदित्य चक्षुरा दत्स्व मरीचयो ऽ नु धावत.
पत्सङ्गिनीरा सजन्तु विगते बाहुवीर्ये.. (१०)
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हे सर्प! तुम शत्रुओं के नेत्रों की देखने की शक्ति छीन लो. हे सूर्य किरणो! तुम दौड़ते
हुए शत्रुओं की पीठ पर पड़ो. भुजाओं की शक्ति क्षीण होने पर जब शत्रु भागने लगे तो उन
का साथ मत दो. (१०)
यूयमुग्रा मरुतः पृश्निमातर इन्द्रेण युजा प्र मृणीत शत्रून्.
सोमो राजा वरुणो राजा महादेव उत मृत्युुरिन्द्रः.. (११)
हे मरुतो! तुम उग्र कर्म करने वाले हो. तुम इंद्र के साथ मिल कर शत्रुओं का मर्दन करो.
सोम राजा, वरुण राजा, महादेव और मृत्युदेव इंद्र का सहयोग करें. (११)
एता देवसेनाः सूर्यकेतवः सचेतसः.
अमित्रान् नो जयन्तु स्वाहा.. (१२)
ये देव सेनाएं समान चित्त वाली हैं और इन के झंडे में सूर्य विराजमान हैं. ये सेनाएं
शत्रुओं पर विजय प्राप्त करें. मेरी यह आहुति ग्रहण करने योग्य हो. (१२)
सूक्त-२२ देवता—तक्मानाशन
अग्निस्तक्मानमप बाधतामितः सोमो ग्रावा वरुणः पूतदक्षाः.
वेदिर्बर्हिः समिधः शोशुचाना अप द्वेषांस्यमुया भवन्तु.. (१)
अग्नि देव ज्वर को बाधा पहुंचाएं. पत्थर के समान दृढ़ सौम्य, पवित्र और दक्ष वरण,
वेल्वी, कुश तथा प्रज्वलित समिधाएं ज्वर से द्वेष करने वाली हों. (१)
अयं यो विश्वान् हरितान् कृणोष्युच्छोचयन्नग्निरिवाभिदुन्वन्.
अधा हि तक्मन्नरसो हि भूया अधा न्य ङ्ङधराङ् वा परेहि.. (२)
हे देह को नष्ट कर देने वाले ज्वर! तू सभी मनुष्यों को संताप देता है. इसलिए तू
तिरस्कृत, निर्बल एवं अधम स्थान को चला जा. (२)
यः परुषः पारुषेयो ऽ वध्वंस इवारुणः.
तक्मानं विश्वधावीर्याधराज्चं परा सुवा.. (३)
हे शक्तिशाली! तुम कठोर एवं अवध्वंस के समान लाल रंग वाले ज्वर को मुझ से दूर
हटाओ. (३)
अधराज्चं प्र हिणोमि नमः कृत्वा तक्मने.
शकम्भरस्य मुष्टिहा पुनरेतु महावृषान्.. (४)
मैं ज्वर को नमस्कार कर के उसे निम्न स्थान में जाने के लिए प्रेरित करता हूं. मुक्के के
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समान प्रहार करने वाला ज्वर महावृषभ को पुनः प्राप्त हो. (४)
ओको अस्य मूजवन्त ओको अस्य महावृषा:.
यावज्जातस्तक्मंस्तावानसि बह्लिकेषु न्योचर:.. (५)
मूंज से युक्त स्थान इस ज्वर का घर है तथा वीर्य की महान वर्षा करने वाले इस के
स्थान हैं. हे तक्मा! तू बाह्लीक देश में जितना है, उतना ही उत्पन्न हुआ है. (५)
तक्मन् व्याल वि गद व्यङ्ग भूरि यावय.
दासीं निष्क्व्रीमिच्छ तां वज्रेण समर्पय.. (६)
हे जीवन को सर्प के समान कष्ट देने वाले ज्वर! तू चोरी कर ने वाली दासी से वज्र रूप
में मिल और हम से अपनेआप को दूर रख. (६)
तक्मन् मूजवतो गच्छ बह्लिकान् वा परस्तराम्.
शूद्रामिच्छ प्रफर्व्यं १ तां तक्मन् वीव धूनुहि.. (७)
हे तक्मा! तू मूंज वाले प्रदेश को अथवा बाह्लीक देश को अथवा उस से भी दूर चला
जा. तू प्रसव अवस्था वाली दासी से मिल और उसे कंपित कर. (७)
महावृषान् मूजवतो बन्ध्वद्धि परेत्य.
प्रैतानि तक्मने ब्रूमो अन्यक्षेत्राणि वा इमा.. (८)
हम मूंज वाले एवं अधिक वर्षा वाले स्थानों पर जाने के लिए ज्वर से निवेदन करते हैं
कि तू वहां जा कर अथवा अन्य स्थानों पर जा कर वहां की वस्तुओं का भक्षण कर. (८)
अन्यक्षेत्रे न रमसे वशी सन् मृडयासि न:.
अभूदु प्रार्थस्तक्मा स गमिष्यति बह्लिकान्.. (९)
हे ज्वर! तू अन्य स्थानों में क्यों रमण नहीं करता है? तू हमारे वश में हो कर हमें सुखी
बना. हम तुझ से बाह्लीक देश में जाने की प्रार्थना करते हैं. (९)
यत् त्वं शीतो ऽ थो रूर: सह कासावेपय:.
भीमास्ते तक्मन् हेतयस्ताभि: स्म परि वृङ्ग्धि न:.. (१०)
हे ज्वर! तू शीत के साथ रहता है तथा खांसी के साथ कंपित करने वाला है. तेरे आयुध
भयंकर हैं. इन के साथ तू हम से दूर चला जा. (१०)
मा स्मैतान्त्सखीन् कुरुथा बलासं कासमुद्युगम्.
मा स्मातो ऽ वर्डै: पुनस्तत् त्वा तक्मन्नुप ब्रुवे.. (११)
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हे ज्वर! तू खांसी और शक्ति क्षीण करने वाले रोगों को हमारा मित्र मत बना. मैं तुझसे
बारबार निवेदन करता हूं कि तू उस निचले स्थान से यहां मत आ. (११)
तक्मन् भ्रात्रा बलासेन स्वस्रा कासिकया सह.
पाप्मा भ्रातृव्येण सह गच्छामुमरणं जनम्.. (१२)
हे ज्वर! शक्ति क्षीण करने वाले रोग तुम्हारे भाई और खांसी तुम्हारी बहन है. पाप
तुम्हारा भतीजा है. इन सब के साथ तुम दुष्ट पुरुष के पास जाओ. (१२)
तृतीयकं वितृतीयं सदन्दिमुत शारदम्.
तक्मानं शीतं रूरं ग्रैष्मं नाशय वार्षिकम्.. (१३)
हे देव! तिजारी, चौथइया, वर्षा संबंधी, शरद, ग्रीष्मकाल में होने वाले ज्वर के साथसाथ
शीत ज्वर का विनाश करो. (१३)
गन्धारिभ्यो मूजवद्भ्यो ऽ ङ्गेभ्यो मगधेभ्यः.
प्रैष्यन् जनमिव शेवधिं तक्मानं परि दद्मसि.. (१४)
हम मूंज वाले स्थान से, अंग देश से, मध्य देश से और गांधार देश से कष्ट वाले रोग ज्वर
को भगाते हुए सुखी बनते हैं. (१४)
सूक्त-२३ देवता—इंद्र
ओते मे द्यावापृथिवी ओता देवी सरस्वती.
ओतौ म इन्द्रश्चाग्निश्च क्रिमिं जम्भयतामिति.. (१)
द्यावा पृथ्वी, सरस्वती देवी, इंद्र और अग्नि मुझ में ओतप्रोत हैं. वे कृमियों का विनाश
करें. (१)
अस्येन्द्र कुमारस्य क्रिमीन् धनपते जहि.
हता विश्वा अरातय उग्रेण वचसा मम.. (२)
हे धन के स्वामी इंद्र! इस बालक के शत्रु रूप कृमियों का विनाश करो. इन्हें मेरे उग्र
वचनों के साथ पूरी तरह नष्ट करो. (२)
यो अक्ष्यौ परिसर्पति यो नासे परिसर्पति.
दतां यो मध्यं गच्छति तं क्रिमिं जम्भयामसि.. (३)
जो कृमि आंखों में घूमते हैं जो नाखूनों में चलतेफिरते हैं तथा जो दांतों के मध्य निवास
करते हैं, उन कृमियों को हम नष्ट करते हैं. (३)
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सरूपौ द्वौ विरूपौ द्वौ कृष्णौ द्वौ रोहितौ द्वौ.
बभ्रुश्च बभ्रुकर्णश्च गृध्रः कोकश्च ते हताः.. (४)
दो समान रूप वाले, दो भिन्न रूप वाले, दो काले, दो लाल रंग के, एक खाकी रंग
वाला, एक खाकी रंग के कान वाला, एक गिद्ध और कोक—हम इन सभी कृमियों को मंत्र
की शक्ति से नष्ट करते हैं. (४)
ये क्रिमयः शितिकक्षा ये कृष्णाः शितिबाहवः.
ये के च विश्वरूपास्तान् क्रिमीन् जम्भयामसि.. (५)
जो कृमि तीखी कोख वाले हैं, जो काले हैं, जो तीखी भुजाओं वाले एवं जो अनेक रूपों
वाले हैं, उन सब को हम मंत्र की शक्ति से नष्ट करते हैं. (५)
उत् पुरस्तात् सूर्य एति विश्वदृष्टो अदृष्टहा.
दृष्टांश्च घ्नन्नदृष्टांश्च सर्वांश्च प्रमृणन् क्रिमीन्.. (६)
सभी को दिखाई देने वाले सूर्य अदृश्य कृमियों को नष्ट करते हैं. वे दृश्य और अदृश्य
कृमियों को नष्ट करते हुए पूर्व दिशा से उदय हो रहे हैं. (६)
येवाषासः कष्कषास एजत्काः शिपवित्नुकाः.
दृष्टश्च हन्यतां क्रिमिरुतादृष्टश्च हन्यताम्.. (७)
हे इंद्र! तुम शीघ्र गमन करने वाले, कष्ट देने वाले, कंपित करने वाले, तीक्ष्ण कृमि,
दिखाई देने वाले अथवा दिखाई न देने वाले सभी कृमियों को नष्ट करो. (७)
हतो येवाषः क्रिमीणां हतो नदनिमोत.
सर्वान् नि मष्मषाकरं दृषदा खल्वाँ इव.. (८)
तीव्रगामी कृमि मेरी मंत्र शक्ति से नष्ट हो गए. नदमिना नाम के कीड़ों को मैं ने इस
प्रकार पीस डाला है, जिस प्रकार चने पत्थरों से पीसे जाते हैं. (८)
त्रिशीर्षाणं त्रिककुदं क्रिमिं सारङ्गमर्जुनम्.
शृणाम्यस्य पृष्टीरपि वृश्चामि यच्छिरः.. (९)
मैं तीन सिरों वाले, तीन ककुदों वाले, चितकबरे रंग वाले और श्वेत वर्ण वाले कृमियों को
मंत्र की शक्ति से नष्ट करता हुआ, उन की पसलियों और सिरों को कुचलता हूं. (९)
अत्रिवद् वः क्रिमयो हन्मि कण्ववज्जमदग्निवत्.
अगस्त्यस्य ब्रह्मणा सं पिनष्यहं क्रिमीन्.. (१०)
मैं अत्रि ऋषि, कण्व ऋषि और जमदग्नि ऋषि के समान मंत्र बल से कृमियों का विनाश
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करता हूं. हे कृमियो! मैं अगस्त्य ऋषि के समान मंत्र शक्ति से तुम्हें मारता हूं. (१०)
हतो राजा क्रिमीणामुतैषां स्थपतिर्हतः.
हतो हतमाता क्रिमिर्हतभ्राता हतस्वसा.. (११)
हमारे मंत्रों और ओषधि की शक्ति से कृमियों के राजा और मंत्री नष्ट हो गए हैं. माता,
भाई और बहनों सहित कृमियों का पूरा कुटुंब नष्ट हो गया है. (११)
हतासो अस्य वेशसो हतासः परिवेश सः.
अथो ये क्षुल्लका इव सर्वे ते क्रिमयो हताः.. (१२)
इन कृमियों के बैठने के स्थान नष्ट हो गए और इन के आसपास के स्थान भी नष्ट हो
गए. जो कृमि बीज रूप में थे, वे भी नष्ट हो गए. (१२)
सर्वेषां च क्रिमीणां सर्वासां च क्रिमीणाम्.
भिनद्म्यश्मना शिरो दहाम्यग्निना मुखम्.. (१३)
मैं सभी नर कृमियों और मादा कृमियों को पत्थर से नष्ट करता हूं एवं उन का मुंह अग्नि
से नष्ट करता हूं. (१३)
सूक्त-२४ देवता—सविता
सविता प्रसवानामधिपतिः स मावतु.
अस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् कर्मण्यस्यां पुरोधायामस्यां प्रतिष्ठायामस्यां
चित्त्यामस्यामाकृत्यामस्यामाशिष्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा.. (१)
सविता सभी उत्पन्न पदार्थों के अधिपति हैं. वे इस ब्रह्म कर्म में, इस पुरोधा में, इस
संकल्प में, इस देवाव्हान कर्म में तथा आशीर्वाद रूप कर्म में मेरी रक्षा करें. (१)
अग्निर्वनस्पतीनमधिपतिः स मावतु.
अस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिनाकर्मण्यस्यां पुरोधायामस्यां प्रतिष्ठायामस्यां
चित्त्यामस्यामाकृत्यामस्यामाशिष्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा.. (२)
अग्नि वनस्पतियों के अधिपति हैं. वह इस वेदोक्त पौरोहित्य कर्म में, प्रतिष्ठा में, संकल्प
में, देवाव्हान कर्म में तथा आशीर्वाद रूप कर्म में मेरी रक्षा करें. (२)
द्यावापृथिवी दातॄणामधिपत्नीः ते मावताम्.
अस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् कर्मण्यस्यां पुरोधायामस्यां प्रतिष्ठायामस्यां
चित्त्यामस्यामाकृत्यामस्यामाशिष्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा.. (३)
द्यावा और पृथ्वी दाताओं के अधिपति हैं. वे इसे वेदोक्त, पौरोहित्य कर्म में, प्रतिष्ठा में,
संकल्प, देवाह्वान कर्म में तथा आशीर्वाद रूप कर्म में मेरी रक्षा करें. (३)
वरुणो ऽ पामधिपतिः स मावतु.
अस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् कर्मण्यस्यां पुरोधायामस्यां प्रतिष्ठायामस्यां
चित्त्यामस्यामाकृत्यामस्यामाशिष्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा.. (४)
वरुण जलों के अधिपति हैं. वह इस वेदोक्त पौरोहित्य कर्म में, प्रतिष्ठा में, संकल्प में,
देवाह्वान कर्म में तथा आशीर्वाद रूप कर्म में मेरी रक्षा करें. (४)
मित्रावरुणौ वृष्ट्याधिपती तौ मावताम्.
अस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् कर्मण्यस्यां पुरोधायामस्यां प्रतिष्ठायामस्यां
चित्त्यामस्यामाकृत्यामस्यामाशिष्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा.. (५)
मित्र और वरुण वर्षा के अधिपति हैं. वे इस वेदोक्त पौरोहित्य कर्म में, प्रतिष्ठा में,
संकल्प में, देवाह्वान कर्म में तथा आशीर्वाद रूप कर्म में मेरी रक्षा करें. (५)
मरुतः पर्वतानामधिपतयस्ते मावन्तु.
अस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् कर्मण्यस्यां पुरोधायामस्यां प्रतिष्ठायामस्यां
चित्त्यामस्यामाकृत्यामस्यामाशिष्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा.. (६)
मरुद्गण पर्वतों के अधिपति हैं. वे इस वेदोक्त पौरोहित्य कर्म में, प्रतिष्ठा में, संकल्प में,
देवाह्वान कर्म में तथा आशीर्वाद रूप कर्म में मेरी रक्षा करें. (६)
सोमो वीरुधामधिपतिः स मावतु.
अस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् कर्मण्यस्यां पुरोधायामस्यां प्रतिष्ठायामस्यां
चित्त्यामस्यामाकृत्यामस्यामाशिष्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा.. (७)
सोम लताओं के स्वामी हैं, वह इस वेदोक्त पौरोहित्य कर्म में, प्रतिष्ठा में, संकल्प में,
देवाह्वान कर्म में तथा आशीर्वाद रूप कर्म में मेरी रक्षा करें. (७)
वायुरन्तरिक्षस्याधिपतिः स मावतु.
अस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् कर्मण्यस्यां पुरोधायामस्यां प्रतिष्ठायामस्यां
चित्त्यामस्यामाकृत्यामस्यामाशिष्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा.. (८)
वायु देव अंतरिक्ष के अधिपति हैं. वे इस वेदोक्त पौरोहित्य कर्म में, प्रतिष्ठा में, संकल्प
में, देवाह्वान कर्म में तथा आशीर्वाद रूप कर्म में मेरी रक्षा करें. (८)
सूर्यश्चक्षुषामधिपतिः स मावतु.
अस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् कर्मण्यस्यां पुरोधायामस्यां प्रतिष्ठायामस्यां
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चित्त्यामस्यामाकूत्यामस्यामाशिष्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा.. (९)
सूर्य देव अंतरिक्ष के अधिपति अर्थात् हमारे स्वामी हैं. वह हमारी रक्षा करें. वह इस
वेदोक्त सहित कर्म में, प्रतिष्ठा में, संकल्प में, वेदों के आह्वान कर्म में तथा आशीर्वाद रूप में
हमारी रक्षा करें. (९)
चन्द्रमा नक्षत्राणामधिपतिः स मावतु.
अस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् कर्मण्यस्यां पुरोधायामस्यां प्रतिष्ठायामस्यां
चित्त्यामस्यामाकूत्यामस्यामाशिष्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा.. (१०)
चंद्रमा नक्षत्रों के अधिपति हैं. वह इस वेदोक्त पौरोहित्य कर्म में, प्रतिष्ठा में, संकल्प में,
देवाह्वान कर्म में तथा आशीर्वाद रूप कर्म में मेरी रक्षा करें. (१०)
इन्द्रो दिवो ऽ धिपतिः स मावतु.
अस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् कर्मण्यस्यां पुरोधायामस्यां प्रतिष्ठायामस्यां
चित्त्यामस्यामाकूत्यामस्यामाशिष्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा.. (११)
इंद्र स्वर्ग के राजा हैं. वह इस वेदोक्त पौरोहित्य कर्म में, प्रतिष्ठा में, संकल्प में, देवाह्वान
कर्म में तथा आशीर्वाद रूप कर्म में मेरी रक्षा करें. (११)
मरुतां पिता पशूनामधिपतिः स मावतु.
अस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् कर्मण्यस्यां पुरोधायामस्यां प्रतिष्ठायामस्यां
चित्त्यामस्यामाकूत्यामस्यामाशिष्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा.. (१२)
मरुतों के पिता पशुओं के अधिपति हैं. वह इस वेदोक्त पौरोहित्य कर्म में, प्रतिष्ठा में,
संकल्प में, देवाह्वान कर्म में तथा आशीर्वाद कर्म में मेरी रक्षा करें. (१२)
मृत्युः पितॄणामधिपतिः स मावतु.
अस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् कर्मण्यस्यां पुरोधायामस्यां प्रतिष्ठायामस्यां
चित्त्यामस्यामाकूत्यामस्यामाशिष्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा.. (१३)
मृत्यु प्रजाओं के स्वामी है. वह इस वेदोक्त पौरोहित्य कर्म में, प्रतिष्ठा में, संकल्प में,
देवाह्वान कर्म में तथा आशीर्वाद रूप कर्म में मेरी रक्षा करें. (१३)
यमः प्रजानामधिपतिः स मावतु.
अस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् कर्मण्यस्यां पुरोधायामस्यां प्रतिष्ठायामस्यां
चित्त्यामस्यामाकूत्यामस्यामाशिष्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा.. (१४)
यम पितरों के अधिपति हैं. वह मेरे इस वेदोक्त पौरोहित्य कर्म में, प्रतिष्ठा में, संकल्प में,
देवाह्वान कर्म में तथा आशीर्वाद रूप कर्म में मेरी सहायता करें. (१४)
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पितरः परे ते मावन्तु.
अस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् कर्मण्यस्यां पुरोधायामस्यां
प्रतिष्ठायामस्यां चित्त्यामस्यामाकूत्यामस्यामाशिष्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा..
(१५)
सात पीढ़ियों के ऊपर के पितर इस वेदोक्त पौरोहित्य कर्म में, संकल्प में प्रतिष्ठा में,
देवाह्वान कर्म में तथा आशीर्वाद रूप कर्म में मेरी रक्षा करें. (१५)
तता अवरे ते मावन्तु.
अस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् कर्मण्यस्यां पुरोधायामस्यां
प्रतिष्ठायामस्यां चित्त्यामस्यामाकूत्यामस्यामाशिष्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा..
(१६)
सपिंड पितर इस वेदोक्त पौरोहित्य कर्म में, संकल्प में, प्रतिष्ठा में, देवाह्वान कर्म में
तथा आशीर्वाद रूप कर्म में मेरी रक्षा करें. (१६)
ततस्ततामहास्ते मावन्तु.
अस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् कर्मण्यस्यां पुरोधायामस्यां
प्रतिष्ठायामस्यां चित्त्यामस्यामाकूत्यामस्यामाशिष्यस्यां देवहूत्यां स्वाहा..
(१७)
पितरों के पितामह मेरे इस वेदोक्त पौरोहित्य कर्म में, प्रतिष्ठा में, संकल्प में, देवाह्वान
कर्म में तथा आशीर्वाद रूप कर्म में मेरी रक्षा करें. (१७)
सूक्त-२५ देवता—योनि
पर्वताद् दिवो योनेरङ्गादङ्गात् समाभृतम्.
शेपो गर्भस्य रेतोधाः सरौ पर्वमिवा दधत्.. (१)
पर्वत की ओषधि, स्वर्ग के पुण्य और अंगों की शक्ति से पुष्ट वीर्य धारण करने वाला
पुरुष जल में पत्ते के समान गर्भाधान करता है. (१)
यथेयं पृथिवी मही भूतानां गर्भमादधे.
एवा दधामि ते गर्भं तस्मै त्वामवसे हुवे.. (२)
जिस प्रकार विशाल पृथ्वी सभी भूतों अर्थात् प्राणियों का गर्भ धारण करती हैं, उसी
प्रकार मैं तेरा गर्भ धारण करती हूं और उस की रक्षा के निमित्त तुझे बुलाती हूं. (२)
गर्भं धेहि सिनीवालि गर्भं धेहि सरस्वती.
गर्भं ते अश्विनोभा धत्तां पुष्करस्रजा.. (३)
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हे सिनीवाली एवं सरस्वती! मेरे गर्भ को पुष्ट बनाओ. फूलों की माला धारण करने वाले
अश्विनीकुमार मेरे गर्भ की रक्षा करें. (३)
गर्भं ते मित्रावरुणौ गर्भं देवो बृहस्पतिः.
गर्भं त इन्द्रश्चाग्निश्च गर्भं धाता दधातु ते.. (४)
मित्र, वरुण, बृहस्पति देव, इंद्र, अग्नि और धाता देव तेरे गर्भ को पुष्ट करें. (४)
विष्णुर्योनिं कल्पयतु त्वष्टा रूपाणि पिंशतु.
आ सिञ्चतु प्रजापतिर्धाता गर्भं दधातु ते.. (५)
विष्णु तेरी योनि की कल्पना करें, त्वष्टा तेरे रूप की रचना करें, प्रजापति तेरा सिंचन
करें और धाता तेरे गर्भ को पुष्ट करें. (५)
यद् वेद राजा वरुणो यद् वा देवी सरस्वती.
यदिन्द्रो वृत्रहा वेद तद् गर्भकरणं पिब.. (६)
राजा वरुण, देवी सरस्वती एवं वृत्र नाशक इंद्र जिस गर्भपोषक वस्तु को जानते हैं, उसे
तू पी ले. (६)
गर्भो अस्योषधीनां गर्भो वनस्पतीनाम्.
गर्भो विश्वस्य भूतस्य सो अग्ने गर्भमेह धाः.. (७)
हे अग्नि! तुम ओषधियों के, वनस्पतियों के तथा सभी प्राणियों के गर्भ हो. अतएव तुम
मेरे गर्भ को पुष्ट करो. (७)
अधि स्कन्द वीरयस्व गर्भमा धेहि योन्याम्.
वृषासि वृष्णयावन् प्रजायै त्वा नयामसि.. (८)
हे वृषणों अथवा अंडकोषों वाले! तू वर्षण अर्थात् सेचन करता है. तू योनि में गर्भ
स्थापित कर. तू ऊपर हो कर चलता हुआ वीरता का प्रदर्शन कर. हम तुझे प्रजा के निमित्त
ग्रहण करते हैं. (८)
वि जिहीष्व बार्हत्सामे गर्भस्ते योनिमा शयाम्.
अदुष्टे देवाः पुत्रं सोमपा उभयाविनम्.. (९)
हे सांत्वनामयी साध्वी! तू विशेष गति वाली हो. मैं तुझ में गर्भाधान करता हूं. सोमपान
करने वाले देवों ने इस लोक में और परलोक में रक्षा करने वाला पुत्र प्रदान किया है. (९)
धातः श्रेष्ठेन रूपेणास्या नार्या गवीन्योः.
पुमांसं पुत्रमा धेहि दशमे मासि सूतवे.. (१०)
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हे धाता! इस नारी की आंतों से निकले मूत्र को मूत्राशय में ले जाने वाली जो नालियां
दोनों पसलियों की ओर स्थित हैं, उन में स्थित पुत्र गर्भ को पुष्ट करो, जिस से यह दसवें मास
में प्रसव कर सके. (१०)
त्वष्टः श्रेष्ठेन रूपेणास्या नार्या गवीन्योः.
पुमांसं पुत्रमा धेहि दशमे मासि सूतवे.. (११)
हे त्वष्टा! इस नारी की आंतों से निकले मूत्र को मूत्राशय में ले जाने वाली जो नाड़ियां
दोनों पसलियों की ओर स्थित हैं, उन में स्थित पुत्र गर्भ को पुष्ट करो. जिस से यह दसवें मास
में प्रसव कर सके. (११)
सवितः श्रेष्ठेन रूपेणास्या नार्या गवीन्योः.
पुमांसं पुत्रमा धेहि दशमे मासि सूतवे.. (१२)
हे सविता! इस नारी की आंतों से निकले मूत्र को मूत्राशय में ले जाने वाली जो नालियां
दोनों पसलियों की ओर स्थित हैं, उन में स्थित पुत्र गर्भ को पुष्ट करो, जिस से यह दसवें मास
में प्रसव कर सके. (१२)
प्रजापते श्रेष्ठेन रूपेणास्या नार्या गवीन्योः.
पुमांसं पुत्रमा धेहि दशमे मासि सूतवे.. (१३)
हे प्रजापति! इस नारी की आंतों से निकले मूत्र को मूत्राशय तक ले जाने वाली जो
नाड़ियां दोनों पसलियों की ओर स्थित हैं, उन में स्थित पुत्र गर्भ को पुष्ट करो, जिस से यह
दसवें मास में प्रसव कर सके. (१३)
सूक्त-२६ देवता—अग्नि
यजूंषि यज्ञे समिधः स्वाहाग्निः प्रविद्वानिह वो युनक्तु.. (१)
यजुर्वेद के मंत्रो और समिधाओ! सब कुछ जानने वाले अग्नि देव इस यज्ञ में तुम से
मिलें. (१)
युनक्तु देवः सविता प्रजानन्नस्मिन् यज्ञे महिषः स्वाहा.. (२)
सब को उत्पन्न करने वाले सविता देव इस यज्ञ में तुम से मिलें. उन के लिए यह आहुति
सुंदर हो. (२)
इन्द्र उक्थामदान्यस्मिन् यज्ञे प्रविद्वान् युनक्तु सुयुजः स्वाहा.. (३)
हे उक्त कर्म करने वालो! सब कुछ जानने वाले इंद्र इस यज्ञ में तुम से मिलें. उन के
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निमित्त यह आहुति सुंदर हो. (३)
प्रैषा यज्ञे निविदः स्वाहा शिष्टाः पत्नीभिर्वहतेह युक्ताः.. (४)
हे शिष्ट मनुष्यो! तुम अपनी पत्नियों के सहित इस यज्ञ में आदेशों को धारण करो. यह
आहुति उत्तम हो. (४)
छन्दांसि यज्ञे मरुतः स्वाहा मातेव पुत्रं पिपृतेह युक्ताः.. (५)
जिस प्रकार माता पुत्र का पालन करती है, उसी प्रकार इस यज्ञ में मरुद्गण छंदों का
पालन करें. मरुद्गण के लिए यह आहुति उत्तम हो. (५)
एयमगन् बर्हिषा प्रोक्षणीभिर्यज्ञं तन्वानादितिः स्वाहा (६)
यह अदितिदेवी कुशों और प्रोक्षणियों के साथ यज्ञ का वर्णन करती हुई आई है. (६)
विष्णुर्युनक्तु बहुधा तपांस्यस्मिन् यज्ञे सुयुजः स्वाहा.. (७)
भगवान विष्णु भलीभांति किए गए तपों का फल दें. यह आहुति विष्णु के निमित्त उत्तम
हो. (७)
त्वष्टा युनक्तु बहुधा नु रूपा अस्मिन् यज्ञे सुयुजः स्वाहा.. (८)
त्वष्टा देव इस यज्ञ में भलीभांति संभाले गए रूपों को संयुक्त करें. यह आहुति त्वष्टा देव
के निमित्त हो. (८)
भगो युनक्त्वाशिषो न्व १ स्मा अस्मिन् यज्ञे प्रविद्वान् युनक्तु सुयुजः
स्वाहा.. (९)
भग देवता इस यज्ञ में सुंदर आशीर्वाद प्रदान करें. यह आहुति उन के निमित्त हो. (९)
सोमो युनक्तु बहुधा पयांस्यस्मिन् यज्ञे सुयुजः स्वाहा.. (१०)
सोमदेव इस यज्ञ में संयुक्त होने वाले जलों को मिलाएं. यह आहुति उन के निमित्त हो.
(१०)
इन्द्रो युनक्तु बहुधा वीर्याण्यस्मिन् यज्ञे सुयुजः स्वाहा.. (११)
इंद्र इस यज्ञ में यज्ञ के अनुरूप शक्तियों को संयुक्त करें. यह आहुति इंद्र के निमित्त हो.
(११)
अश्विना ब्रह्मणा यातमर्वाञ्चौ वषट्कारेण यज्ञं वर्धयन्तौ.
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सूक्त-२७ देवता—अग्नि
बृहस्पते ब्रह्मणा याह्यर्वाङ् यज्ञो अयं स्वरिदं यजमानाय स्वाहा.. (१२)
हे अश्विनीकुमारो! तुम बृहस्पति देव एवं मंत्रों के साथ इस यज्ञ की वृद्धि करते हुए हमारे
सामने आओ. यह यज्ञ यजमान के हेतु कल्याण करने वाला हो. यह आहुति अश्विनीकुमारों
एवं बृहस्पति के हेतु उत्तम हो. (१२)
सूक्त-२७ देवता—अग्नि
ऊर्ध्वा अस्य समिधो भवन्त्यूर्ध्वा शुक्रा शोचींष्यग्नेः.
द्युमत्तमा सुप्रतीकः ससूनूस्तनूनपादसूरो भूरिपाणिः.. (१)
अग्नि की समिधाएं ऊंची और वीर्य तेजयुक्त होते हैं. यह अत्यंत प्रदीप्त, सुंदर एवं सूर्य
के समान है. प्राणदाता अग्नि का यज्ञों में बहुत सहयोग रहता है. (१)
देवो देवेषु देवः पथो अनक्ति मध्वा घृतेन.. (२)
अग्नि देव सभी देवों में श्रेष्ठ हैं और मधु से मार्गों का शोधन करते हैं. (२)
मध्वा यज्ञं नक्षति प्रैणानो नराशंसो अग्निः सुकृद् देवः सविता विश्ववारः.
(३)
सुंदर कर्म करने वाले तथा सभी मनुष्यों द्वारा प्रशंसनीय सविता देव तथा संसार के
द्वारा वरण करने योग्य अग्नि देव यज्ञ को मधुयुक्त करते हुए व्याप्त होते हैं. (३)
अच्छायमेति शवसा घृता चिदीडानो वह्निर्नमसा.. (४)
घृत एवं हव्य अन्न के सहित स्तुतियों को प्राप्त करने वाले अग्नि देव सामने से आते हैं.
(४)
अग्निः स्रुचो अध्वरेषु प्रयक्षु स यक्षदस्य महिमानमग्नेः.. (५)
यज्ञों में देवों की संगति करने वाले अग्नि देव इस यज्ञ की महिमा और स्रुवों को अपने से
युक्त करें. (५)
तरी मन्द्रासु प्रयक्षु वसवश्चातिष्ठन् वसुधातरश्च.. (६)
देवों की संगति करने वाले एवं हर्ष उत्पन्न करने वाले यज्ञों में तारक और धन को बढ़ाने
वाले वरुण देवता निवास करते हैं. (६)
द्वारो देवीरन्वस्य विश्वे व्रतं रक्षन्ति विश्वहा.. (७)
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अग्नि की तेजस्विनी लपटें यजमान के व्रत की सभी प्रकार से रक्षा करती हैं. (७)
उरुव्यचसाग्नेर्धाम्ना पत्यमाने.
आ सुष्वयन्ती यजते उपाके उषासानक्तेमं यज्ञमवतामध्वरं न:.. (८)
महत्त्व वाले तथा गतिशील अग्नि देव इस यज्ञ में तेज को ऐश्वर्यपूर्ण एवं आहुति की
दीप्ति का संपादन करते हैं. (८)
दैवा होतार ऊर्ध्वमध्वरं नो ऽ ग्नेर्जिह्वयाभि गृणत गृणता नः स्विष्टये.
तिस्रो देवीर्बहिरेिदं सदन्तामिडा सरस्वती मही भारती गृणाना.. (९)
हे होताओ! यज्ञ की इस अग्नि की प्रशंसा करो. इस से हमारा कल्याण होगा. पृथ्वी,
अग्नि और सरस्वती—ये तीनों देवियां प्रशंसा करती हुई कुश पर विराजमान हों. (९)
तन्नस्तुरीपमद्भुतं पुरुक्षु.
देव त्वष्टा रायस्पोषं वि ष्य नाभिमस्य.. (१०)
हे त्वष्टा देव! हमारे जल, अन्न और धन की पुष्टि करते हुए तुम इस स्त्री की नाभि खोल
दो. (१०)
वनस्पते ऽ व सृजा रराणः. त्मना देवेभ्यो अग्निर्हव्यं शमिता स्वदयतु..
(११)
हे वनस्पति! तुम शब्द करती हुई अपनेआप को इस यज्ञ में छोड़ो तथा अग्नि इस हवि
को देवों के लिए स्वादिष्ट बनाएं. (११)
अग्ने स्वाहा कृणुहि जातवेदः.
इन्द्राय यज्ञं विश्वे देवा हविरिदं जुषन्ताम्.. (१२)
हे जन्म लेने वालों के ज्ञाता अग्नि देव! इंद्र के निमित्त इस यज्ञ को संपन्न करो. सभी देव
इस हवि को ग्रहण करें. (१२)
सूक्त-२८ देवता—त्रिवृत्त अग्नि
नव प्राणान्नवभिः सं मिमीते दीर्घायुत्वाय शतशारदाय.
हरिते त्रीणि रजते त्रीण्ययसि त्रीणि तपसाविष्ठितानि.. (१)
हम सौ वर्ष की आयु पाने के लिए नव प्राणों को इन तीन से संयुक्त करते हैं. इन नौ में
सोने, चांदी और लोहे के तीनतीन धागे अर्थात् तार हैं जो उष्णता लिए हुए हैं. (१)
अग्निः सूर्यश्चन्द्रमा भूमिरापो द्यौरन्तरिक्षं प्रदिशो दिशश्च.
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आर्तवा ऋतुभिः संविदाना अनेन मा त्रिवृता पारयन्तु.. (२)
अग्नि, चंद्र, सूर्य, पृथ्वी, जल, आकाश, अंतरिक्ष, दिशाएं और उपदिशाएं इस त्रिवृत्त
अर्थात् नौ कर्मों से मुझे ऋतुओं सहित प्राप्त हो कर पार करें. इस में ऋतुओं के अंश भी
सहायता करें. (२)
त्रयः पोषास्त्रिवृति श्रयन्तामनक्तु पूषा पयसा घृतेन.
अन्नस्य भूमा पुरुषस्य भूमा भूमा पशूनां त इह श्रयन्ताम्.. (३)
तीन पुष्टिकारक इस त्रिवृत्त के आश्रित हों. उषा देवी दूध और घी से इस यज्ञ कर्म को
बढ़ाएं. इस के आश्रय में अन्न, पुरुषों और पशुओं की अधिकता रहे. (३)
इममादित्या वसुना समुक्षतेममग्ने वर्धय वावृधानः.
इममिन्द्र सं सृज वीर्येणास्मिन् त्रिवृच्छ्रयतां पोषयिष्णू.. (४)
आदित्य इस बालक को धन से पूर्ण करें. हे अग्नि, तुम स्वयं बढ़ते हुए इस बालक की
भी वृद्धि करो. हे इंद्र! तुम इसे वीर्य युक्त करो. पोषण करने वाला त्रिवृत्त इस का आश्रित हो.
(४)
भूमिष्ट्वा पातु हरितेन विश्वभृदग्निः पिपर्त्वयसा सजोषाः.
वीरुद्भिष्टे अर्जुनं संविदानं दक्षं दधातु सुमनस्यमानम्.. (५)
पृथ्वी स्वर्ग के द्वारा तेरी रक्षा करे. विश्व का भरणपोषण करने वाले अग्नि देव लोहे के
द्वारा तेरा पालन करें तथा तुझ में लताओं से प्राप्त जल के द्वारा बल धारण करें. (५)
त्रेधा जातं जन्मनेदं हिरण्यमग्नेरेकं प्रियतमं बभूव सोमस्यैकं हिंसितस्य
परापतत्.
अपामेकं वेधसां रेत आहुस्तत् ते हिरण्यं त्रिवृदस्त्वायुषे.. (६)
जन्म से ही यह स्वर्ण तीन प्रकार से उत्पन्न हुआ है. अग्नि को उस स्वर्ण का एक जन्म
प्रिय हुआ. वह सोम के पीड़ित होने पर गिरा. विद्वान् लोग एक को जलों का वीर्य कहते थे. हे
ब्रह्मचारी! वह स्वर्ण तेरी आयु वृद्धि के हेतु त्रिवृत्त अर्थात् तिगुना हो जाए. (६)
त्र्यायुषं जमदग्नेः कश्यपस्य त्र्यायुषम्.
त्रेधामृतस्य चक्षणं त्रीण्यायूंषि ते ऽ करम्.. (७)
जमदग्नि ऋषि की तीन आयु हैं—बचपन, यौवन और वृद्धावस्था. महर्षि कश्यप की भी
यही तीन अवस्थाएं हैं. अमृत के निदर्शन रूप में तीनों आयु मैं तुझे देता हूं. (७)
त्रयः सुपर्णास्त्रिवृता यदायन्नेकाक्षरमभिसंभूय शक्राः.
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प्रत्यौहन्मृत्युममृतेन साकमन्तर्दधाना दुरितानि विश्वा.. (८)
त्रिवृत्त रूप से तीन समर्थ स्वर्ण एक अक्षर पर आकर शक्तिशाली बनते हैं. वे सभी
पापों को नष्ट कर के अमृत के द्वारा तेरी मृत्यु को समाप्त करें. (८)
दिवस्त्वा पातु हरितं मध्यात् त्वा पात्वर्जुनम्.
भूम्या अयस्मयं पातु प्रागाद् देवपुरा अयम्.. (९)
आकाश स्वर्ण के द्वारा तेरी रक्षा करे. मध्य लोक से रजत तेरी रक्षा करे. पृथ्वीलोक तेरी
रक्षा करे. ये तीनों देव नगरियों को प्राप्त होते हैं. (९)
इमास्तिस्रो देवपुरास्तास्त्वा रक्षन्तु सर्वतः.
तास्त्वं बिभ्रद् वर्चस्युत्तरो द्विषतां भव.. (१०)
ये देवताओं की जो तीन नगरियां हैं, वे सभी ओर से तेरी रक्षा करें. उन्हें धारण करता
हुआ तू अपने शत्रुओं की अपेक्षा अधिक तेजस्वी बन. (१०)
पुरं देवानामामृतं हिरण्यं य आबेधे प्रथमो देवो अग्रे.
तस्मै नमो दश प्राची: कृणोम्यनु मन्यतां त्रिवृदाबधे मे.. (११)
देवों के आगे प्रमुख देव ने स्वर्ण रूपी अमृत को बांधा था. मैं उस के लिए दस बार
नमस्कार करता हूं. वह देवता मुझे इस त्रिवृत्त को मांगने की आज्ञा दे. (११)
आ त्वा चृतत्वर्यमा पूषा बृहस्पतिः.
अहर्जातस्य यन्नाम तेन त्वाति चृतामसि.. (१२)
अर्यमा, पूषा और बृहस्पति तुझे भली प्रकार बांधें. दिन में उत्पन्न होने वाले का जो नाम
है, उस नाम से हम तुझे बांधते हैं. (१२)
ऋतुभिष्वार्तवैरायुषे वर्चसे त्वा.
संवत्सरस्य तेजसा तेन संहनु कृण्मसि.. (१३)
हे ब्रह्मचारी! आयु और तेज की प्राप्ति के लिए मैं तुझे ऋतुओं, मासों और संवत्सरों के
तेजरूप सूर्य से संबंधित करता हूं. (१३)
घृतादुल्लुप्तं मधुना समक्तं भूमिंदृंहमच्युतं पारयिष्णु.
भिन्दत् सपत्नानधरांश्च कृण्वदा मा रोह महते सौभगाय.. (१४)
घी से तर तथा शहद से सिंचा हुआ तू पृथ्वी के समान दृढ़ है. तू शत्रुओं को चीरता हुआ
एवं उन्हें तिरस्कृत करता हुआ महान सौभाग्य देने के लिए मुझ पर स्थित हो. (१४)
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सूक्त-२९ देवता—जातवेद
सूक्त-२९ देवता—जातवेद
पुरस्ताद् युक्तो वह जातवेदोऽग्ने विद्धि क्रियमाणं यथेदम्.
त्वं भिषग् भेषजस्यासि कर्ता त्वया गामश्वं पुरुषं सनेम.. (१)
हे सभी कर्मों में प्रथम नियुक्त होने वाले अग्नि देव! मेरे द्वारा किए गए इस कार्य का
भार वहन करो. तुम ओषधि प्रदान करने वाले वैद्य हो. हम तुम्हारे द्वारा गाय, अश्व एवं
मनुष्यों को रोग रहित दशा में प्राप्त करें. (१)
तथा तदग्ने कृणु जातवेदो विश्वेभिर्देवैः सह संविदानः.
यो नो दिदेव यतमो जघास यथा सो अस्य परिधिष्पताति.. (२)
हे जातवेद अग्नि देव! जो हमारे विरुद्ध खेल खेल रहा है तथा जो हमारा भक्षण करना
चाहता है, सभी देवों के साथ मिल कर उस का परकोटा गिरा दो. (२)
यथा सो अस्य परिधिष्पताति तथा तदग्ने कृणु जातवेदः.
विश्वेभिर्देवैः सह संविदानः.. (३)
हे अग्नि! तुम सभी देवों के साथ मिल कर ऐसा यत्न करो, जिस से उस का परकोटा
गिर जाए जो हमारे विरोध में खेल खेल रहा है और जो हमें खाना चाहता है. (३)
अक्ष्यौ ३ नि विध्य हृदयं नि विध्य जिह्वां नि तृन्द्धि प्र दतो मृणीहि.
पिशाचो अस्य यतमो जघासाग्ने यविष्ठ प्रति तं शृणीहि.. (४)
जो पिशाच हमें खाना चाहता है, तुम उस की आंखें फोड़ दो, जीभ काट डालो और
दांत तोड़ दो. इस प्रकार तुम उस का विनाश कर दो. (४)
यदस्य हृतं विहृतं यत् पराभृतमात्मनो जग्धं यतमत् पिशाचैः.
तदग्ने विद्वान् पुनरा भर त्वं शरीरे मांसमसुमेरयामः.. (५)
हे अग्नि देव! इस का जो मांस पिशाचों ने इस के शरीर से नोंच कर खा लिया है, उसे
इस के शरीर में पुनः स्थापित कर दो तथा मंत्र शक्ति से इस के शरीर में प्राणों का पुनः संचार
कर दो. (५)
आमे सुपक्वे शबले विपक्वे यो मा पिशाचो अशने ददम्भ.
तदात्मना प्रजया पिशाचा वि यातयन्तामगदोऽयमस्तु.. (६)
हे अग्नि! जो पिशाच कच्चे, पक्के और चितकबरे पात्र में विशेष रूप से पके हुए एवं
कच्चे, पक्के भोजन में इस पुरुष के मांस को घोल कर हमारे विनाश की इच्छा कर रहा है,
वह पिशाच अपनी संतान सहित कष्ट भोगे तथा यह पुरुष आरोग्य को प्राप्त करे. (६)
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क्षीरे मा मन्थे यतमो ददम्भाकृष्टपच्ये अशने धान्ये ३ यः.
तदात्मना प्रजया पिशाचा वि यातयन्तामगदो ३ यमस्तु.. (७)
हे अग्नि! दूध में, मट्ठे में एवं कृषि द्वारा पके हुए अन्न में प्रविष्ट हो कर जो पिशाच इस
पुरुष को नष्ट करने की इच्छा कर रहा है, वह अपनी संतान के साथ कष्ट भोगे एवं यह पुरुष
रोग रहित हो जाए. (७)
अपां मा पाने यतमो ददम्भ क्रव्याद् यातूनां शयने शयानम्.
तदात्मना प्रजया पिशाचा वि यातयन्तामगदो ३ यमस्तु.. (८)
जिस पिशाच ने मुझे जल पीने में, यात्रा करने में तथा सोते समय पीड़ित किया है, हे
अग्नि! वह संतान के सहित इसी प्रकार का कष्ट भोगे एवं यह पुरुष रोग रहित हो जाए. (८)
दिवा मा नक्तं यतमो ददम्भ क्रव्याद् यातूनां शयने शयानम्.
तदात्मना प्रजया पिशाचा वि यातयन्तामगदो३यमस्तु.. (९)
हे अग्नि! मुझे रात और दिन में यात्रा करते समय और सोते समय जिस मांस भक्षी
पिशाच ने पीड़ित किया है, वह अपनी संतान सहित कष्ट भोगे तथा यह पुरुष नीरोग हो जाए.
(९)
क्रव्यादमग्ने रुधिरं पिशाचं मनोहनं जहि जातवेदः.
तमिन्द्रो वाजी वज्रेण हन्तु च्छिनत्तु सोमः शिरो अस्य धृष्णुः.. (१०)
हे अग्नि! तुम मांसभक्षी, रुधिर पीने वाले तथा मन को कष्ट देने वाले पिशाच को नष्ट
करो. अश्व के स्वामी इंद्र उसे अपने वज्र से मारें तथा सोम उस का शीश काट लें. (१०)
सनादग्ने मृणसि यातुधानान् न त्वा रक्षांसि पृतनासु जिग्युः.
सहमूराननु दह क्रव्यादो मा ते हेत्या मुक्षत दैव्यायाः.. (११)
हे अग्नि! तुम सदा से राक्षसों का मर्दन करते आए हो, राक्षस युद्ध में तुम्हें कभी नहीं
जीत सके हैं, तुम मांस भक्षियों को जला दो. ये तुम्हारे दिव्य अस्त्र से बच न सकें. (११)
समाहर जातवेदो यद्धृतं यत् पराभृतम्.
गात्राण्यस्य वर्धन्तामंशुरिवा प्यायतामयम्.. (१२)
हे अग्नि! इस मनुष्य का जो ज्ञान और मांस नष्ट हो गया है, उसे तुम पुनः इस के शरीर
में लाओ. यह सोमलता के अंकुर के समान पुष्ट हो तथा इस के अंगप्रत्यंग पूर्ण हों. (१२)
सोमस्येव जातवेदो अंशुरा प्यायतामयम्.
अग्ने विरप्शिन् मेध्यमयक्ष्मं कृणु जीवतु.. (१३)
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