अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 653, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूक्त-३ देवता—स्वर्ग अग्नि
पुमान् पुंसो ऽ धि तिष्ठ चर्मेहि तत्र ह्वयस्व यतमा प्रिया ते.
यावन्तावग्रे प्रथमं समेयथुस्तद् वां वयो यमराज्ये समानम्.. (१)
हे पुरुषार्थ वाले पुरुष! तू इस पशु धर्म पर चढ़ जा. तू अपने प्रिय व्यक्तियों को भी बुला
ले. पहले जितने पतिपत्नियों ने इस कार्य को किया, उन का और तुम्हारा समान फल हो. (१)
तावद् वां चक्षुस्तति वीर्याणि तावत् तेजस्ततिधा वाजिनानि.
अग्निः शरीरं सचते यदैधो ऽ धा पक्वान्मिथुना सं भवाथः.. (२)
स्वर्ग में तुम्हारे शरीरों को यह अग्नि ही संचित करेगी. उस समय तुम पक्व ओदन के
प्रभाव से इसी रूप में स्वर्ग में होओगे. तुम से उत्पन्न शिशु को भी दर्शन शक्ति तथा उसी
प्रकार का तेज प्राप्त होगा. यह शब्दात्मक यज्ञ भी इसी प्रकार अग्नि के योग्य होगा. (२)
समस्मिंल्लोके समु देवयाने सं स्मा समेतं यमराज्येषु.
पूतौ पवित्रैरुप तद्ध्वयेथां यद्यद् रेतो अधि वां संबभूव.. (३)
इस ओदन के प्रभाव से इस लोक में तुम दोनों साथ रहो. तुम यम मार्ग में तथा यह मेरे
यज्ञ में साथ ही रहो. इन पवित्र यज्ञों को पूरा करने के कारण तुम पवित्र हो चुके हो. तुम ने
जिसजिस कार्य के लिए संकेत किया, तुम उन कर्मों के फल प्राप्त करो. (३)
आपसपुत्रासो अभि सं विशध्वमिमं जीवं जीवधन्याः समेत्य.
तासां भजध्वममृतं यमाहुर्यमोदनं पचति वां जनित्री.. (४)
हे पति और पत्नियो! तुम दीर्घरूपी जल हो. इस जीवन में धन्य होते हुए प्रवेश करो.
तुम्हारा उत्पादन जल्द ही ओदन को पकाता है. तुम उसी जल के अमृतमय अंश का सेवन
करो. (४)
यं वां पिता पचति यं च माता रिप्रान्निर्मुक्त्यै शमलाच्च वाचः.
स ओदनः शतधारः स्वर्ग उभे व्याप नभसी महित्वा.. (५)
माता और पिता यदि वाणी जन्य पाप से अथवा अन्य पाप से निवृत्त होने के लिए
ओदन पकाते हैं तो वह ओदन अपनी महिमा से स्वर्ग और द्यावा पृथ्वी में व्याप्त होता है. (५)
उभे नभसी उभयांश्च लोकान् ये यज्वनामभिजिताः स्वर्गाः.
तेषां ज्योतिष्मान् मधुमान् यो अग्रे तस्मिन् पुत्रैर्जरसि सं श्रयेथाम्.. (६)
हे पति और पत्नी! यजमान आकाश और पृथ्वी पर तथा जिन लोकों में अधिकार पाते
हैं, उन में जो प्रकाशित और मधुमय लोक है. उस लोक को अथवा पृथ्वी और स्वर्ग दोनों