अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 122, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे एकाष्टक वृक्षों से बने ऊखल! मूसल आदि ने तथा पत्थरों ने संवत्सर में तैयार होने
वाले जौ, धान आदि कूटतेपीटते हुए शब्द किया है. तुम्हारी कृपा से हम उत्तम पुत्र, पौत्रों,
शक्तिशाली सेवकों तथा धनों के स्वामी बनें. (५)
इडायास्पदं घृतवत् सरीसृपं जातवेदः प्रति हव्या गृभाय.
ये ग्राम्याः पशवो विश्वरूपास्तेषां सप्तानां मयि रन्तिर्स्तु.. (६)
हे जातवेद अग्नि! तुम हव्य ग्रहण करो. तुम्हारी कृपा से दूध, घी देने वाली गाएं, तेज
दौड़ने वाले घोड़े तथा गांव में होने वाले बकरी, भेड़, गधा, ऊंट आदि नाना आकार वाले सात
प्रकार के पशु मुझ से प्रेम रखें. (६)
आ मा पुष्टे च पोषे च रात्रि देवानां सुमतौ स्याम.
पूर्णा दर्वे परा पत सुपूर्णा पुनरा पत.
सर्वान् यज्ञान्त्संभुञ्जतीषमूर्जं न आ भर.. (७)
हे रात्रि! मुझे समृद्ध धन और पुत्र, पौत्र आदि का स्वामी बनाओ. तुम्हारी कृपा से मैं
देवों का भी कृपापात्र बनूं. हे दर्वी अर्थात् हवन के साधन पात्र! तू हवि से पूर्ण हो कर देवों के
पास जा और वहां से हमारे मन चाहे फल ले कर हमारे समीप आ. तू हवि से सभी यज्ञों का
पालन करता हुआ देवों के पास से अन्न और बल ला कर हमें प्रदान कर. (७)
आयमगन्त्संवत्सरः पतिरेकाष्टके तव.
सा न आयुष्मतीं प्रजां रायस्पोषेण सं सृज.. (८)
हे एकाष्टका! यह संवत्सर आ गया है. यह तेरा पति है. तू अपने पति संवत्सर के सहित
हमारी संतान को अधिक आयु वाली करती हुई हमें धन संपन्न बना. (८)
ऋतून् यज ऋतुपतीनार्तवानुत हायनान्.
समाः संवत्सरान् मासान् भूतस्य पतये यजे.. (९)
हे एकाष्टका! मैं वसंत आदि ऋतुओं को और उन के अधिष्ठाता देवों को हृदय के द्वारा
प्रसन्न करता हूं. मैं ऋतु संबंधी, दिनरात संबंधी और बारह मासों से संबंधित यज्ञ करता हूं. मैं
चराचर प्राणियों के स्वामी काल के निमित्त भी तेरे द्वारा यज्ञ करता हूं. (९)
ऋतुभ्यष्ट्वार्तवेभ्यो माद्भ्यः संवत्सरेभ्यः.
धात्रे विधात्रे समृद्धे भूतस्य पतये यजे.. (१०)
हे एकाष्टका! मैं वसंत आदि ऋतुओं, ऋतु संबंधी दिनरात, बारह मासों, संवत्सर के
धाता विधाता देवों और सभी चराचर प्राणियों के स्वामी काल के निमित्त तेरा यज्ञ करता हूं.
(१०)
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