अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त-९ देवता—अध्यात्म, व्रात्य
वह प्रजाओं के, बंधुओं के अन्न के और खानपान के अनुकूल व्यवहार करने लगा. (२)
विशां च वै स सबन्धूनां चान्नस्य चान्नाद्यस्य च प्रियं धाम भवति य एवं
वेद.. (३)
जो पुरुष इस प्रकार जानता है, वह प्रजाओं, अन्नों और खानपान का प्रिय धाम होता है.
(३)
सूक्त-९ देवता—अध्यात्म, व्रात्य
स विशो ऽ नु व्य चलत्.. (१)
उस ने प्रजाओं के अनुकूल व्यवहार किया. (१)
तं सभा च समितिश्च सेना च सुरा चानुव्यचलन्.. (२)
इस से समिति, सभा, सेना और सुख उस के अनुकूल हुए. (२)
सभायाश्च वै स समितेश्च सेनायाश्च सुरायाश्च प्रियं धाम भवति य एवं वेद..
(३)
इस बात को जानने वाला सभा, समिति, सेनाओं की सुरानुकूलता प्राप्त करता है. (३)
सूक्त-१० देवता—अध्यात्म, व्रात्य
तद् यस्यैवं विद्वान् व्रात्यो राज्ञो ऽ तिथिर्गृहानागच्छेत्.. (१)
श्रेयांसमेनमात्मनो मानयेत् तथा क्षत्राय ना वृश्चते तथा राष्ट्राय ना वृश्चते..
(२)
ऐसा विशेष ज्ञानी व्रात्य जिस राजा का अतिथि हो, राजा उस का सम्मान करे. ऐसा
करने से व्रात्य राष्ट्र को तथा क्षत्र शक्ति को नष्ट नहीं करता. (१-२)
अतो वै ब्रह्म च क्षत्रं चोदतिष्ठतां ते अब्रूतां कं प्र विशावेति.. (३)
इस के बाद ब्रह्म बल और क्षात्र शक्ति को हम किस में प्रवेश करें. (३)
अतो वै बृहस्पतिमेव ब्रह्म प्रा विशत्विन्द्रं क्षत्रं तथा वा इति.. (४)
ब्रह्मबल बृहस्पति में और क्षात्र बल इंद्र में प्रवेश करे. (४)
अतो वै बृहस्पतिमेव ब्रह्म प्राविशदिन्द्रं क्षत्रम्.. (५)
तब ब्रह्म बल बृहस्पति में और क्षात्र बल इंद्र में प्रविष्ट हुए. (५)
इयं वा उ पृथिवी बृहस्पतिर्द्यौरिवेन्द्रः.. (६)
आकाश ही इंद्र है और पृथ्वी ही बृहस्पति है. (६)
अयं वा उ अग्निर्ब्रह्मासावादित्यः क्षत्रम्.. (७)
आदित्य क्षत्र बल है और अग्नि ब्रह्म बल है. (७)
ऐनं ब्रह्म गच्छति ब्रह्मवर्चसी भवति.. (८)
यः पृथिवीं बृहस्पतिमग्निं ब्रह्म वेद.. (९)
जो पृथ्वी, बृहस्पति और अग्नि को ब्रह्म जानता है, वह ब्रह्म बल और ब्रह्मवर्चस को
प्राप्त करता है. (८-९)
ऐनमिन्द्रियं गच्छतीन्द्रियवान् भवति.. (१०)
य आदित्यं क्षत्रं दिवमिन्द्रं वेद.. (११)
जो आदित्य को क्षत्र और द्युलोक को इंद्र जानता है, उसे इंद्रियां प्राप्त होती हैं.
(१०-११)
सूक्त-११ देवता—अध्यात्म, व्रात्य
तद् यस्यैवं विद्वान् व्रात्यो ऽ तिथिर्गृहानागच्छेत्.. (१)
स्वयमेनमभ्युदेत्य ब्रूयाद् व्रात्य क्वा ऽ वात्सीर्व्रात्योदकं व्रात्य तर्पयन्तु
व्रात्य यथा ते
प्रियं तथास्तु व्रात्य यथा ते वशस्तथास्तु व्रात्य यथा ते
निकामस्तथास्त्विति.. (२)
इस प्रकार का विशेष ज्ञानी व्रात्य जिस घर में अतिथि हो, उसे स्वयं आसन दे कर कहे
—हे व्रात्य! तुम कहां निवास करते हो? यह जल है. हमारे घर के व्यक्ति तुम्हें संतुष्ट करें. तुम्हें
जो प्रिय हो, जैसा तुम्हारा वश हो और जैसा तुम्हारा काम हो उसी प्रकार का रहे. (१-२)
यदेनमाह व्रात्य क्वा ऽ वात्सीरिति पथ एव तेन देवयानानव रुन्ध्धे.. (३)
यह कहने पर कि हे व्रात्य! तुम कहां रहोगे? देवयान मार्ग ही खुल जाता है. (३)
यदेनमाह व्रात्योदकमित्यप एव तेनाव रुन्ध्धे.. (४)
व्रात्य से यह कहने वाला कि हे व्रात्य! यह जल है, अपने लिए जल को ही खोल लेता
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है. (४)
यदेनमाह व्रात्य तर्पयन्विति प्राणमेव तेन वर्षीयांसं कुरुते.. (५)
यह कहने वाला कि हमारे व्यक्ति तुम्हें तृप्त करें, अपने ही प्राणों को सींचता है. (५)
यदेनमाह व्रात्य यथा ते प्रियं तथास्त्विति प्रियमेव तेनाव रुन्द्धे.. (६)
ऐसा जानने वाला व्यक्ति प्रिय पुरुष को प्राप्त होता हुआ प्रिय पुरुष का भी प्रिय हो
जाता है. (६)
ऐनं प्रियं गच्छति प्रियः प्रियस्य भवति य एवं वेद.. (७)
यह कहने वाला कि जैसा तुम्हारा वक्ष है वैसा ही हो, अपने हेतु वक्ष को खोल लेता है.
(७)
यदेनमाह व्रात्य यथा ते वशस्तथास्त्विति वशमेव तेनाव रुन्द्धे.. (८)
यह कहने वाला कि जैसा तुम्हारी इच्छा है, वैसा ही हो, अपने लिए इच्छाओं को ही
खोल लेता है. (८)
ऐनं वशो गच्छति वशी वशिनां भवति य एवं वेद.. (९)
इस बात को जानने वाला वश को प्राप्त करता है. वह वश में करने वालों को भी वश में
कर लेता है. (९)
यदेनमाह व्रात्य यथा ते निकामस्तथास्त्विति निकाममेव तेनाव रुन्द्धे..
(१०)
यह कहने वाला कि तुम्हारा निवास जैसा है, वैसा ही हो, अपने लिए कामनाओं का द्वार
खोल लेता है. (१०)
ऐनं निकामो गच्छति निकामे निकामस्य भवति य एवं वेद.. (११)
इस प्रकार जानने वाला अभीष्ट को प्राप्त करता है. (११)
सूक्त-१२ देवता—अध्यात्म, व्रात्य
तद् यस्यैवं विद्वान् व्रात्य उद्धृतेष्वग्निष्वाधिश्रिते ऽ ग्निहोत्रे ऽ
तिथिर्गृहानागच्छेत्.. (१)
स्वयमेनमभ्युदेत्य ब्रूयाद् व्रात्याति सृज होष्यामीति.. (२)
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जिस के घर में ऐसा विद्वान् व्रतधारी अतिथि बन कर उस समय आए, जब अग्नियां
प्रदीप्त हो गई हों और अग्निहोम चल रहा हो तो गृहस्थ स्वयं उस के सामने जा कर कहे कि
हे व्रती! तुम आज्ञा दो, मैं हवन करूंगा. (१-२)
स चातिसृजेज्जुहुयान्न चातिसृजेन्न जुहुयात्.. (३)
अतिथि विद्वान् आज्ञा दे, तभी हवन करे. यदि वह आज्ञा न दे तो हवन न करे. (३)
स य एवं विदुषा व्रात्येनातिसृष्टो जुहोति.. (४)
प्र पितृयाणं पन्थां जानाति प्र देवयानम्.. (५)
जो इस प्रकार के विद्वान् व्रतधारी की आज्ञा से हवन करता है, वह पितृयान और
देवयान मार्ग पर जाता है. (४-५)
न देवेष्वा वृश्चते हुतमस्य भवति.. (६)
पर्यस्यास्मिंल्लोक आयतनं शिष्यते य एवं विदुषा व्रात्येनातिसृष्टो जुहोति..
(७)
जो इस प्रकार के विद्वान् व्रतधारी की आज्ञा से हवन करता है, उस का अग्नि होम
सफल होता है तथा देवों इस का कोई दोष नहीं होता. इस लोक के उस गृहस्थ का आश्रम
सुरक्षित रहता है. (६-७)
अथ य एवं विदुषा व्रात्येनानतिसृष्टो जुहोति.. (८)
न पितृयाणं पन्थां जानाति न देवयानम्.. (९)
जो इस प्रकार के विद्वान् व्रतधारी की आज्ञा के बिना हवन करता है, वह न पितृयान
मार्ग को जानता है और न देवयान मार्ग का उसे ज्ञान होता है. (८-९)
आ देवेषु वृश्चते अहुतमस्य भवति.. (१०)
उस का हवन विफल होता है और वह देवों का अपराधी होता है. (१०)
नास्यास्मिंल्लोक आयतनं शिष्यते य एवं विदुषा व्रात्येनानतिसृष्टो
जुहोति.. (११)
इस लोक में उस का आधार नहीं रहता, जो ऐसे विद्वान् की आज्ञा के बिना हवन करता
है. (११)
सूक्त-१३ देवता—अध्यात्म, व्रात्य
तद् यस्यैवं विद्वान् व्रात्य एकां रात्रिमतिथिर्गृहे वसति.. (१)
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ये पृथिव्यां पुण्या लोकास्तानेव तेनाव रुन्द्धे.. (२)
जिस के घर में ऐसा विद्वान् व्रात्य रात्रि में अतिथि होता है, वह उस के आने के फल से
पृथ्वी के सभी पुण्य लोकों पर विजय प्राप्त करता है. (१-२)
तद् यस्यैवं विद्वान् व्रात्यो द्वितीयां रात्रिमतिथिर्गृहे वसति.. (३)
ये३न्तरिक्षे पुण्या लोकास्तानेव तेनाव रुन्द्धे.. (४)
जिस गृहस्थ के घर में ऐसा विद्वान् व्रात्य रात्रि में निवास करता है, वह गृहस्थ उस के
फल के रूप में अंत में स्थित सभी पुण्य लोकों को जीत लेता है. (३-४)
तद् यस्यैवं विद्वान् व्रात्यस्तृतीयां रात्रिमतिथिर्गृहे वसति.. (५)
ये दिवि पुण्या लोकास्तानेव तेनाव रुन्द्धे.. (६)
यदि ऐसा विद्वान् व्रात्य अतिथि के रूप में गृहस्थ के घर में तीसरी रात्रि में भी निवास
करता है तो उस के फल से वह गृहस्थ आकाश में स्थित समस्त पुण्य लोकों को अपने लिए
मुक्त कर लेता है. (५-६)
तद् यस्यैवं विद्वान् व्रात्यश्चतुर्थीं रात्रिमतिथिर्गृहे वसति.. (७)
ये पुण्यानां पुण्या लोकास्तानेव तेनाव रुन्द्धे. (८)
जिस गृहस्थ के घर में ऐसा व्रात्य चौथी रात निवास करता है तो उस के फल के रूप में
वह गृहस्थ पुण्यात्माओं के सभी लोकों को अपने लिए मुक्त कर लेता है. (७-८)
तद् यस्यैवं विद्वान् व्रात्यो ऽ परिमिता रात्रीरतिथिर्गृहे वसति.. (९)
य एवापरिमिताः पुण्या लोकास्तानेव तेनाव रुन्द्धे.. (१०)
जिस गृहस्थ के घर में ऐसा विद्वान् व्रात्य अनेक रातों तक निवास करता है तो उस के
फल के रूप में वह गृहस्थ अनेक पुण्य लोकों को अपने लिए मुक्त कर लेता है. (९-१०)
अथ यस्याव्रात्यो व्रात्यब्रुवो नामबिभ्रत्यतिथिर्गृहानागच्छेत्.. (११)
कर्षेदेनं न चैनं कर्षेत्.. (१२)
जिस के घर अपनेआप को व्रात्य बताने वाला कोई अव्रात्य आए तो क्या गृहस्थ उसे
अपने घर से भगा दे. नहीं, उस को भी भगाना नहीं चाहिए. (११-१२)
अस्यै देवताया उदकं याचामीमां देवतां वासय इमामिमां
देवतां परि वेवेष्मीत्येनं परि वेविष्यात्.. (१३)
मैं इस देवता को अपने घर में निवास देता हूं. मैं इस से जल ग्रहण करने की प्रार्थना
करता हूं. मैं इस देवता के लिए भोजन परोसता हूं. ऐसा स्वीकार करता हुआ उस के लिए
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