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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

सूक्त-७१            देवता—सरस्वती

सूक्त-७१            देवता—सरस्वती
शिवाः न शंतमा भव सुमृडीका सरस्वति. मा ते युयोम संदृशः.. (१)
हे सरस्वती! तुम हमारे निमित्त सभी सुख देने वाली, रोगनिवारण में अत्यधिक समर्थ
एवं शोभन सुख देने वाली बनो. हम तुम्हारे यथार्थ रूप के ज्ञान से अलग न हों. (१)
सूक्त-७२            देवता—सुख
शं नो वातो वातु शं नस्तपतु सूर्यः.
अहानि शं भवन्तु नः शं रात्री प्रति धीयतां शमुषा नो व्युच्छतु.. (१)
बाहर चलती हुई वायु हमारे लिए सुख देती हुई बहे. सब के प्रेरक सूर्य हमारे लिए सुख
देते हुए तपें. दिन हमारे लिए सुख देने वाले हों तथा रात भी हमें सुख प्रदान करे. उषाकाल
इस प्रकार विकसित हों, जिस से हमें सुख मिल सके. (१)
सूक्त-७३            देवता—श्येन आदि मंत्र में उक्त
यत् किं चासौ मनसा यच्च वाचा यज्ञैर्जुहोति हविषा यजुषा.
तन्मृत्युना निर्ऋतिः संविदाना पुरा सत्यादाहुतिं हन्त्वस्य.. (१)
दूर स्थित मेरा शत्रु मेरी हत्या करने की इच्छा से जो कर्म करने का विचार करता है तथा
वचन से जो कर्म करने की बात कहता है, अभिचार कर्मों अर्थात् जादूटोने के द्वारा उस के
लिए उचित द्रव्य के द्वारा तथा मंत्र के द्वारा जो होम करता है, उस कर्म को सफल होने से
पहले ही पाप देवता निर्ऋति मृत्यु के साथ मिल कर नष्ट करें. (१)
यातुधाना निर्ऋतिरादु रक्षस्ते अस्य घ्नन्त्वनृतेन सत्यम्.
इन्द्रेषिता देवा आज्यमस्य मथ्नन्तु मा तत् सं पादि यदसौ जुहोति.. (२)
दूसरों को पीड़ा देने वाली पाप की देवी निर्ऋति एवं राक्षस मेरे इस शत्रु के यथार्थ कर्म
फल को असत्य फल के द्वारा समाप्त करें. तात्पर्य यह है कि मेरे शत्रु के द्वारा किया हुआ
अभिचार कर्म फल देने वाला न हो. उस का फल विपरीत हो. इंद्र के द्वारा प्रेरित देव इस शत्रु
का होम कर्म नष्ट करें. यह शत्रु हमारे वध के लिए जो कर्म करता है, वह संपन्न एवं
फलदायक न हो. (२)
अजिराधिराजौ श्येनौ संपातिनाविव.
आज्यं पृतन्यतो हतां यो नः कश्चाभ्यघायति.. (३)
अजिर और अधिराज नामक मृत्यु दूत मुझ से संग्राम करने के इच्छुक पुरुष के घृत से
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पूर्ण होने वाले होम कर्म का उसी प्रकार विनाश करें, जिस प्रकार पक्षियों के ऊपर बाज
आकाश मार्ग से गिरता है. जो शत्रु हमारे विपरीत हिंसा कर्म करने की इच्छा करता है, उस
का आज्य नष्ट हो जाए. (३)
अपाञ्चौ त उभौ बाहू अपि नह्याम्यास्यम्.
अग्नेर्देवस्य मन्युना तेन ते ऽ वधिषं हविः.. (४)
हे हमारे निमित्त अभिचार कर्म करने वाले मनुष्य! होम कर्म में लगे हुए तेरे दोनों हाथों
को मैं पीछे की ओर बांधता हूं, जिस से वे होम करने में समर्थ न हो सकें. मंत्र का उच्चारण
करने में समर्थ तेरे मुख को भी मैं बंद करता हूं. तेरे हाथों और मुख को बांधने से अग्नि देव के
क्रोध के कारण तेरे हवि को मैं नष्ट करूंगा. (४)
अपि नह्यामि ते बाहू अपि नह्याम्यास्यम्.
अग्नेर्घोरस्य मन्युना तेन ते ऽ वधिषं हविः.. (५)
मैं अभिचार कर्म में संलग्न तेरे दोनों हाथों और मुख को बांधता हूं, जिस से तेरे हाथ
आहुति न दे सकें और मुख मंत्र का उच्चारण न कर सके. इस प्रकार अग्नि देव के भयानक
क्रोध के द्वारा मैं तेरे हवि एवं उस से सिद्ध होने वाले कर्म का विनाश करता हूं. (५)
सूक्त-७४ देवता—अग्नि
परि त्वा ऽ ग्ने पुरं वयं विप्रं सहस्य धीमहि.
धृषद्वर्णं दिवेदिवे हन्तारं भंगुरावतः.. (१)
हे अरणि मंथन से उत्तम अग्नि! तुम कर्म फलों को पूर्ण करने वाले एवं मेधावी हो. हम
राक्षसों का हनन करने के लिए तुम्हें चारों ओर धारण करते हैं. तुम घर्षक रूप वाले एवं
राक्षसों का प्रतिदिन विनाश करने वाले हो. (१)
सूक्त-७५ देवता—इंद्र
उत् तिष्ठता ऽ व पश्यतेन्द्रस्य भागमृत्वियम्.
यदि श्वातं जुहोतन यद्यश्वातं ममत्तन.. (१)
ऋत्विजो! उठो, अर्थात् अपने आसनों पर बैठे मत रहो. वसंत आदि ऋतुओं में इंद्र को
देने के लिए पकाए जाने वाले हवि के भाग को देखो. यदि वह हवि पक गया है तो उसे इंद्र के
निमित्त अग्नि में हवन कर दो. यदि वह नहीं पका है तो उसे पकाओ. (१)
श्वातं हविरो ष्विन्द्र प्र याहि जगाम सूरो अध्वनो वि मध्यम्.
परि त्वासते निधिभिः सखायः कुलपा न व्राजपतिं चरन्तम्.. (२)
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