अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
वीरसूर्देवृकामा स त्वयैधिषीमहि सुमनस्यमाना.. (१७)
हे वधू! तू स्निग्ध दृष्टि रखती हुई तथा पति को क्षीण न करने वाली हो. तू वीर पुत्रों को
प्रसन्न करती हुई तथा अपने मन में प्रसन्न होती हुई सब को सुखी करने वाली हो. तू इस घर
को प्राप्त हो तथा हम भी तेरे द्वारा वृद्धि प्राप्त करें. (१७)
अदेवृघ्न्यपतिघ्नीहैधि शिवा पशुभ्यः सुयमा सुवर्चाः.
प्रजावती वीरसूर्देवृकामा स्योनेममग्निं गार्हपत्यं सपर्ये.. (१८)
हे वधू! तू अपने पति और देवर को हानि न पहुंचाने वाली, पशुओं का हित करने वाली,
प्रजावती, शोभन कांति से युक्त तथा सुख देने वाली होती हुई पति और देवर को कष्ट मत
पहुंचाए. तू अग्नि का पूजन कर. (१८)
उत्तिष्ठेतः किमिच्छन्तीदमागा अहं त्वेडे अभिभूः स्वाद् गृहात्.
शून्यैषी निर्ऋते याजगन्धोत्तिष्ठाराते प्र पत मेह संस्थाः.. (१९)
हे निर्ऋति! तू यहां से उठ कर भाग. तू किसी वस्तु की इच्छा से यहां उपस्थित हुई है. मैं
तुझे अपने घर से भगाता हुआ तेरा सत्कार करता हूं. तू शुभ रूपिणी है तथा शून्य बनाने की
इच्छा से यहां आई है, परंतु तू यहां विहार मत कर. (१९)
यदा गार्हपत्यमसपर्यैत् पूर्वमग्निं वधूरियम्.
अधा सरस्वत्यै नारि पितृभ्यश्च नमस्कुरु.. (२०)
गृहस्थ रूप आश्रम में प्रवेश करने से पहले यह वधू अग्नि का पूजन कर रही है. हे स्त्री!
अब तू सरस्वती को तथा पितरों को नमस्कार कर. (२०)
शर्म वर्मैतदा हरास्यै नार्या उपस्तिरे.
सिनीवालि प्र जायतां भगस्य सुमतावसत्.. (२१)
इस स्त्री के लिए मृगचर्म रूप आसन मंगल और रक्षा को प्राप्त कराए. ये भग देवता
प्रसन्न रहें. हे सिनीवाली! यह स्त्री संतानोत्पत्ति करती रहे. (२१)
यं बल्बजं न्यस्यथ चर्म चोपस्तृणीथन.
तदा रोहतु सुप्रजा या कन्या विन्दते पतिम्.. (२२)
यह प्रजावती और पति की कामना करने वाली कन्या तुम्हारे द्वारा रखे गए तृण और
मृगचर्म पर आसीन हो. (२२)
उप स्तृणीहि बल्बजमधि चर्मणि रोहिते.
तत्रोपविश्य सुप्रजा इममग्निं सपर्येतु.. (२३)
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पहले चटाई फैला दो. इस के बाद मृगचर्म के ऊपर उत्तम प्रजा उत्पन्न करने वाली यह
स्त्री अग्नि की उपासना करे. (२३)
आ रोह चर्मोप सीदाग्निमेष देवो हन्ति रक्षांसि सर्वा.
इह प्रजां जनय पतये अस्मै सुज्यैष्ठ्यो भवत् पुत्रस्त एष:.. (२४)
हे स्त्री! तू इस मृगचर्म पर चढ़ कर अग्नि देव के पास बैठ. ये देवता सभी राक्षसों को
मारने में समर्थ हैं. तू इस घर में अपनी प्रथम संतान को उत्पन्न कर. यह तेरा ज्येष्ठ पुत्र
कहलाएगा. (२४)
वि तिष्ठन्तां मातुरस्या उपस्थान्नानारूपाः पशवो जायमानाः.
सुमङ्गल्युप सीदेममग्निं संपत्नी प्रति भूषेह देवान्.. (२५)
इस माता से अनेक पुत्र प्रकट हो कर इस की गोद में बैठें. हे सुंदर कल्याण वाली स्त्री!
तू अग्नि के पास बैठ कर इन सब देवताओं को सुशोभित कर. (२५)
सुमङ्गली प्रतरणी गृहाणां सुशेवा पत्ये श्वशुराय शंभूः.
स्योना श्वश्र्वै प्र गृहान् विशेमान्.. (२६)
तू कल्याणकारी, पति को सुख देने वाली, घर का काम करने वाली ससुर और सास के
लिए सुखकारिणी होती हुई घर में प्रवेश कर. (२६)
स्योना भव श्वशुरेभ्यः स्योना पत्ये गृहेभ्यः.
स्योनास्यै सर्वस्यै विशे स्योना पुष्टायैषां भव.. (२७)
तू पति को सुख देने वाली तथा घर के लिए मंगलमयी हो. तू श्वसुर का कल्याण करने
वाली तथा संतानों को सुख देती हुई उन का पालन पोषण कर. (२७)
सुमङ्गलीरियं वधूरिमां समेत पश्यत.
सौभाग्यमस्मै दत्त्वा दौर्भाग्येर्विपरेतन.. (२८)
यह वधू कल्याणमयी है. सब मिल कर इसे देखो. तुम सब इस के दुर्भाग्य को दूर करते
हुए इसे भाग्य प्रदान करो. (२८)
या दुर्हार्दो युवतयो याश्चेह जरतीरपि.
वर्चो न्व १ स्यै सं दत्ताथास्तं विपरेतन.. (२९)
जो स्त्रियां दूषित हृदय वाली तथा वृद्धाएं हों, वे इसे तेज प्रदान करती हुई यहां से चली
जाएं. (२९)
रुक्मप्रस्तरणं वह्यं विश्वा रूपाणि बिभ्रतम्.
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आरोहत् सूर्या सावित्री बृहते सौभाग्य कम्.. (३०)
सूर्या सुख देने के लिए इस पलंग पर चढ़ी थी जिस पर मन को अच्छा लगने वाला
बिछौना बिछा था. (३०)
आ रोह तल्पं सुमनस्यमानेह प्रजां जनय पत्ये अस्मै.
इन्द्राणीव सुबुधा बुध्यमाना ज्योतिरग्रा उषसः प्रति जागरासि.. (३१)
हे स्त्री! तू प्रसन्न होती हुई इस पलंग पर चढ़ तथा पति हेतु संतान उत्पन्न कर. तू अपने
पति के समान बुद्धि से संपन्न बन तथा नित्य उषाकाल में जागने वाली बन. (३१)
देवा अग्रे न्य पद्यन्त पत्नीः समस्पृशन्त तन्व स्तनूभिः.
सूर्येव नारि विश्वरूपा महित्वा प्रजावती पत्या सं भवेह.. (३२)
प्राचीन काल में देवताओं ने भी पलंग पर चढ़ कर अपने अंगों से अपनी पत्नियों के
अंगों का स्पर्श किया था. हे स्त्री! तू सूर्या के समान ही पति के साथ निवास करती हुई
संतानवती बन. (३२)
उत्तिष्ठेतो विश्वावसो नमसेडामहे त्वा.
जामिमिच्छ पितृषदं न्यक्तां स ते भागो जनुषा तस्य विद्धि.. (३३)
हे विश्वावसु! यहां से उठो. हम तुम्हें नमस्कार करते हैं. तू पिता के घर रहने वाली
सुशोभित वधू को प्राप्त करने की इच्छा कर. यह तेरा भाग है. जन्म से उस का ज्ञान प्राप्त
कर. (३३)
अप्सरसः सधमादं मदन्ति हविर्धानमन्तरा सूर्यं च.
तास्ते जनित्रमभि ताः परेहि नमस्ते गन्धर्वर्तुना कृणोमि.. (३४)
हविर्धान और सूर्य के मध्य में अप्सराएं साथसाथ मिल कर आनंदित होने वाले कर्म में
हर्षित होती हैं. वह तेरा जन्म स्थान है. तू उन के समीप जा. गंधर्व तथा ऋतुओं के साथ मैं
तुझे नमन करता हूं. (३४)
नमो गन्धर्वस्य नमसे नमो भामाय चक्षुषे च कृण्मः.
विश्वावसो ब्रह्मणा ते नमोऽभि जाया अप्सरसः परेहि.. (३५)
गंधर्व के नमस्कार को हमारा नमस्कार है. उस की तेजस्वी आंखों के लिए हम नमस्कार
करते हैं. हे सभी प्रकार के धनों के स्वामी! तुझे हम ज्ञानपूर्वक नमन करते हैं. तुम अप्सराओं
के समान हमारी पत्नियों से दूर रहो. (३५)
राया वयं सुमनसः स्यामोदितो गन्धर्वमावीवृताम.
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अगन्त्स देवः परमं सधस्थमगन्म यत्र प्रतिरन्त आयुः.. (३६)
हम लोग धन के साथ उत्तम मन वाले हैं. हम यहां रहते हुए गंधर्वों को घेरें. वे हमारा
नमस्कार स्वीकार करें. हम उन की कृपा प्राप्त करें. वह देव उस परम श्रेष्ठ स्थान को प्राप्त
हुआ है, जहां अपनी आयु को दीर्घ बनाते हुए हम भी पहुंचते हैं. (३६)
सं पितरावृत्विये सृजेथां माता पिता च रेतसो भवाथः.
मर्य इव योषामधिरोहयैनां प्रजां कृण्वाथामिह पुष्यतं रयिम्.. (३७)
तुम दोनों ऋतुकाल में मातापिता बनने के लिए संयुक्त होओ. वीर्य के योग से तुम माता
और पिता बनो. हे पति! मानवोचित निर्णय से पलंग पर चढ़ो. इस प्रकार तुम संतान को
जन्म दो तथा अपने धन की वृद्धि करो. (३७)
तां पूषञ्छिवतमामेरयस्व यस्यां बीजं मनुष्या ३ वपन्ति.
या न ऊरू उशती विश्रयाति यस्यामुशन्तः प्रहरेम शेपः.. (३८)
हे पूषा देव! तुम उस कल्याणमयी स्त्री को प्राप्त करो, जिस में बीज बोया जाता है. जो
इच्छा करती हुई हमें अपना शरीर समर्पित करती है, हम उस के साथ इंद्रिय सुख प्राप्त करें.
(३८)
आ रोहोरुम उप धत्स्व हस्तं परि ष्वजस्व जायां सुमनस्यमानः.
प्रजां कृण्वाथामिह मोदमानौ दीर्घं वामायुः सविता कृणोतु.. (३९)
हे पति! तू अपनी पत्नी को स्पर्श कर. प्रसन्न होते हुए तुम दोनों संतान को उत्पन्न करो.
सविता देव तुम्हारी आयु में वृद्धि करें. (३९)
आ वां प्रजां जनयतु प्रजापतिरहोरत्राभ्यां समनक्त्वर्यमा.
अदुर्मङ्गली पतिलोकमा विशेमं शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे.. (४०)
प्रजापति तुम दोनों की संतान को जन्म दें. अर्यमादेव तुम दोनों को रातदिन संयुक्त करें.
हे वधू! तू अमंगलों से अलग रहती हुई इस घर में प्रवेश कर और दो पैरों वाले मनुष्यों तथा
चार पैरों वाले पशुओं को सुख देने वाली बन. (४०)
देवैर्दत्तं मनुना साकमेतद् वाधुयं वासो वध्वश्च वस्त्रम्.
यो ब्रह्मणे चिकितुषे ददाति स इद् रक्षांसि तल्पानि हन्ति. (४१)
मनु के साथसाथ देवों द्वारा दिया हुआ विवाह के समय का यह वस्त्र वधू का वस्त्र है.
यह निश्चित रूपसे पलंग पर रहने वाले राक्षसों का विनाश करता है. (४१)
यं मे दत्तो ब्रह्मभागं वधूयोर्वाधूयं वासो वध्वश्च वस्त्रम्.
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युवं ब्रह्मणे ऽ नुमन्यमानौ बृहस्पते साकमिन्द्रश्च दत्तम्.. (४२)
हे बृहस्पति देव! तुम इंद्र के साथ मिल कर वधू का विवाह के समय पहना जाने वाला
वस्त्र इस वधू को प्रदान करो. जो ब्राह्मण का भाग है, तुम दोनों वह वस्त्र मुझे प्रदान करते हो.
तुम दोनों ब्राह्मण की अनुमति से यह वस्त्र मुझे देते हो. (४२)
स्योनाद्योनेरधि बुध्यमानौ हसामुदौ महसा मोदमानौ.
सुगू सुपुत्रौ सुगृहौ तराथो जीवावुषसो विभाती:.. (४३)
हम दोनों हंसते हुए प्रसन्नता को तथा सुखपूर्वक ज्ञान को प्राप्त करें. हम सुंदर गति वाले
हों तथा पुत्र आदि से संपन्न रहते हुए उषाओं को पार करें. (४३)
नवं वसानः सुरभिः सुवासा उदागां जीव उषसो विभाती:.
आण्डात् पत्रीवामुक्षि विश्वस्मादेनसस्परि.. (४४)
मैं नवीन वस्त्र धारण करता हूं. सुगंध धारण कर के उत्तम वस्त्र पहनने वाला मैं
जीवधारी मनुष्यों के समान उषा काल में उठता हूं. जिस प्रकार पक्षी अंडे से निकलता है,
उसी प्रकार मैं भी सब पापों से छूट जाऊं. (४४)
शुम्भनी द्यावापृथिवी अन्तिसुम्ने महिव्रते.
आपः सप्त सुस्रुवुर्देवीस्ता नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (४५)
सुशोभित पृथ्वी और आकाश के मध्य चेतन और अचेतन दोनों प्रकार के प्राणी निवास
करते हैं. विशाल कर्म वाले आकाश और पृथ्वी तथा ये प्रवाहित होने वाले सात प्रकार के
जल हमें पापों से मुक्त करें. (४५)
सूर्यायै देवेभ्यो मित्राय वरुणाय च.
ये भूतस्य प्रचेतसस्तेभ्य इदमकरं नम:.. (४६)
जो सूर्या को, देवगण को, मित्र और वरुण को तथा सभी प्राणियों को जानने वाले हैं,
उन्हें मैं नमस्कार करता हूं. (४६)
य ऋते चिदभिश्रिषः पुरा जत्रुभ्य आतृदः.
संधाता संधिं मघवा पुरूवसुर्निष्कर्ता विह्रुतं पुनः.. (४७)
जो चिपके बिना तथा छेद किए बिना इन हड्डियों को जोड़ देता है, जो फटे हुए को
पुनः जोड़ता है तथा उत्तम और पर्याप्त धन प्रदान करता है, वही ईश्वर है. (४७)
अपास्मत् तम उच्छतु नीलं पिशङ्गमनुत लोहितं यत्.
निर्दहनी या पृषातक्य १स्मिन् तां स्थाणावध्या सजामि.. (४८)
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जो नीला, पीला तथा लाल रंग का अंधकार है, वह हम से दूर रहे. जो जलाने वाली दोष
की स्थिति इस में है, मैं उसे इस स्तंभ में लगा देता हूं. (४८)
यावतीः कृत्या उपवासने यावन्तो राज्ञो वरुणस्य पाशाः.
व्यृद्धयो या असमृद्धयो या अस्मिन् ता स्थाणावधि सादयामि.. (४९)
उपवस्त्रों में हिंसा करने वाली जो कृत्याएं हैं, राजा वरुण के जितने पाश हैं तथा जो
दरिद्रताएं और बुरी अवस्थाएं हैं, उन सब को मैं इस खंभे में स्थापित करता हूं. (४९)
या मे प्रियतमा तनूः सा मे बिभाय वाससः.
तस्याग्रे त्वं वनस्पते नीविं कृणुष्व मा वयं रिषाम.. (५०)
मेरा प्रिय शरीर मेरे वस्त्र में भयभीत होता है, इसलिए हे वनस्पति! पहले तुम इस की
गांठ बांध दो जिस से हम दुखी न हों. (५०)
ये अन्ता यावतीः सिचो य ओतवो ये च तन्तवः.
वासो यत् पत्नीभिरुतं तन्नः स्योनमुप स्पृशात्.. (५१)
इस वस्त्र में जो झालरें और किनारियां हैं, जो ताने और बाने हैं तथा जो वस्त्र स्त्रियों ने
बुना है, वह हमारे शरीर का सुखपूर्वक स्पर्श करने वाला हो. (५१)
उशतीः कन्यला इमाः पितृलोकात् पतिं यतीः.
अव दीक्षामसृक्षत स्वाहा.. (५२)
पति की इच्छा करने वाली ये कन्याएं पिता के घर से पति के घर जाती हुई दीक्षा का
व्रत धारण करें. यही उत्तम उपदेश है. (५२)
बृहस्पतिनावसृष्टां विश्वे देवा अधारयन्.
वर्चो गोषु प्रविष्टं यत् तेनेमां सं सृजामसि.. (५३)
बृहस्पति की यह ओषधि विश्वे देवों के द्वारा पुष्ट की गई है. हम इसे गायों के तेज से
मिलाते हैं. (५३)
बृहस्पतिनावसृष्टां विश्वे देवा अधारयन्.
तेजो गोषु प्रविष्टं यत् तेनेमां सं सृजामसि.. (५४)
बृहस्पति की रची हुई इस ओषधि को विश्वे देवों ने पुष्ट किया है. हम इसे उस तेज से
संयुक्त करते हैं जो गायों में प्रवेश कर गया है. (५४)
बृहस्पतिनावसृष्टां विश्वे देवा अधारयन्.
भगो गोषु प्रविष्टो यस्तेनेमां सं सृजामसि.. (५५)
बृहस्पति द्वारा विरचित इस ओषधि को विश्वे देवों ने धारण किया था. जो भग गायों में
प्रवेश कर चुका है, हम इस ओषधि को उस भग से संपन्न करते हैं. (५५)
बृहस्पतिनावसृष्टां विश्वे देवा अधारयन्.
यशो गोषु प्रविष्टं यत् तेनेमां सं सृजामसि.. (५६)
बृहस्पति देव द्वारा इस ओषधि का सृजन हुआ है. गायों में जो यज्ञ प्रवेश कर गया है, मैं
उस यज्ञ से इसे संयुक्त करता हूं. (५६)
बृहस्पतिनावसृष्टां विश्वे देवा अधारयन्.
पयो गोषु प्रविष्टं यत् तेनेमां सं सृजामसि.. (५७)
बृहस्पति द्वारा यह ओषधि विश्वे देवों के हेतु पुष्ट हुई है. गायों में जो दूध स्थित है, हम
इस ओषधि को उस से संयुक्त करते हैं. (५७)
बृहस्पतिनावसृष्टां विश्वे देवा अधारयन्.
रसो गोषु प्रविष्टो यस्तेनेमां सं सृजामसि.. (५८)
बृहस्पति के द्वारा निर्मित इस ओषधि को सभी देवों ने पुष्ट किया है. गायों में जो रस
प्रविष्ट है, हम उस रस से इस ओषधि को संयुक्त करते हैं. (५८)
यदीमे केशिनो जना गृहे ते समनर्तिषू रोदेन कृण्वन्तो ३ घम्.
अग्निष्ट्वा तस्मादेनसः सविता च प्र मुञ्चताम्.. (५९)
लंबे केशों वाले ये लोग तेरे घर में नाचते रहे हैं तथा रोके से पाप करते रहे हैं, अग्नि देव
तुझे उस पाप से मुक्त कराएं. (५९)
यदीयं दुहिता तव विकेश्यरुदद् गृहे रोदेन कृण्वत्य् १ घम्.
अग्निष्ट्वा तस्मादेनसः सविता च प्र मुञ्चताम्.. (६०)
तेरी पुत्री अपने केशों को फैला कर रोती रही है, तेरे घर में हुए इस पाप से सविता और
अग्नि तुझे छुड़ाएं. (६०)
यज्जामयो यद्युवतयो गृहे ते समनर्तिषू रोदेन कृणवतीरघम्.
अग्निष्ट्वा तस्मादेनसः सविता च प्र मुञ्चताम्.. (६१)
तेरी बहन तथा अन्य स्त्रियां दुःखी हुईं और रोती हुई तेरे घर में घूमती रही हैं. सविता
और अग्नि तुझे उस पाप से मुक्त करें. (६१)
यत् ते प्रजायां पशुषु यद्वा गृहेषु निष्ठितमघकृद्भिर्घं कृतम्.
अग्निष्ट्वा तस्मादेनसः सविता च प्र मुञ्चताम्.. (६२)
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संतान और पशुओं को दुःखी करने वालों ने तेरे घर में जिस दुःख का विस्तार किया है.
उस पाप से सविता और अग्नि तुझे छुड़ाएं. (६२)
इयं नार्युप ब्रूते पूल्यान्यावपन्तिका.
दीर्घायुरस्तु मे पतिर्जीवाति शरदः शतम्.. (६३)
अग्नि में खीलों की आहुति देती हुई यह वधू कामना करती है कि मेरा पति दीर्घ आयु
वाला हो और सौ वर्ष तक जीवित रहे. (६३)
इहेमाविन्द्र सं नुद चक्रवाकेव दम्पती.
प्रजयैनौ स्वस्तकौ विश्वमायुर्व्य श्रुताम्.. (६४)
हे इंद्र! इन पति और पत्नी को ऐसा प्रेम दो, जैसे चकवी और चकवे में होता है. इन्हें
सुंदर घर और संतानों से युक्त रखो. ये दोनों जीवनभर भांतिभांति के सुख भोगते रहें. (६४)
यदासन्द्यामुपधाने यद् वोपवासने कृतम्.
विवाहे कृत्यां यां चक्रूरास्नाने तां नि दध्मसि.. (६५)
हम ने असंदी अर्थात् कुरसी पर, बिस्तर पर, सिरहाने तथा उपवस्त्र पर जो पाप किया
और अपने विवाह में जो हिंसक प्रयोग किया, उसे हम स्नान के द्वारा धो डालते हैं. (६५)
यद् दुष्कृतं यच्छमलं विवाहे वहतौ च यत्.
तत् संभलस्य कम्बले मृज्महे दुरितं वयम्.. (६६)
हम ने विवाह में तथा बरात के रथ में जो दुष्ट और मलिन कर्म किया, उसे हम मधुर
भाषी पुरुष के कंबलों से युक्त करते हैं. (६६)
संभले मलं सादयित्वा कम्बले दुरितं वयम्.
अभूम यज्ञियाः शुद्धाः प्र ण आयूंषि तारिषत्.. (६७)
संभल अर्थात् दूत में मन को तथा कंबल में पाप को स्थित कर के हम यज्ञ करने योग्य
शुद्ध हो जाएं. वह शुद्धि हमारी आयु को शुद्ध बनाए. (६७)
कृत्रिमः कण्टकः शतदन् य एषः.
अपास्याः केश्यं मलमप शीर्षण्यां लिखात्.. (६८)
यह सैकड़ों दांतों वाला कंघा कृत्रिम रूप से बनाया गया है. यह हमारे शीश पर पहुंच
कर हमारे शीश के मैल को छुड़ाए. (६८)
अङ्गादङ्गाद् वयमस्या अप यक्ष्मं नि दध्मसि.
तन्मा प्रापत् पृथिवीं मोत देवान् दिवं मा प्रापदुर्व १ न्तरिक्षम्.
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अपो मा प्रापन्मलमेतदग्ने यमं मा प्रापत् पितॄंश्च सर्वान्.. (६९)
मैं इस कंघे से अपने शरीर के संहारक दोषों को दूर करता हूं. यह दोष मुझे न लगे,
पृथ्वी को, आकाश को, अंतरिक्ष को, देवों को तथा जल को भी वह दोष न लगे. हे अग्नि!
यह दोष पितरों तथा उन के अधिष्ठाता देव यमराज को भी न लगे. (६९)
सं त्वा नह्यामि पयसा पृथिव्याः सं त्व नह्यामि पयसौषधीनाम्.
सं त्वा नह्यामि प्रजसा धनेन सा संनद्धा सनुहि वाजमेमम्.. (७०)
हे पत्नी! मैं पृथ्वी के जल के समान सारतत्त्व से तथा ओषधियों के सारतत्त्व से तुझे
बांधता हूं. तू प्रजा और धन से संपन्न होती हुई मुझे धन देने वाली हो. (७०)
अमो ऽ हमस्मि सा त्वं सामाहमस्म्यृक् त्वं द्यौरहं पृथिवी त्वम्.
ताविह सं भवाव प्रजामा जनयावहै.. (७१)
हे पत्नी! मैं साम हूं और तू ऋचा है. मैं आकाश हूं और तू पृथ्वी है. मैं विष्णु रूप हूं और
तू मेरी लक्ष्मी है. हम इस लोक में साथसाथ निवास करते हुए संतान को उत्पन्न करें. (७१)
जनियन्ति नावग्रवः पुत्रियन्ति सुदानवः.
अरिष्टासू सचेवहि बृहते वाजसातये.. (७२)
हे पत्नी! अविवाहित लोग हम लोगों के समान विवाह करने की इच्छा करते हैं. दाता
लोग पुत्र की कामना करते हैं. जब तक हमारे शरीरों में प्राण रहें, तब तक हम दोनों एकत्र हों
तथा बल प्राप्ति के लिए मिल कर रहें. (७२)
ये पितरो वधूददर्शा इमं वहतुमागजन्.
ते अस्यै वध्वै संपत्न्यै प्रजावच्छर्म यच्छन्तु.. (७३)
नव वधू को देखने की इच्छा वाले बहुत से लोग इस बरात को देखेंगे. वे इस वधू के
लिए उत्तम सुख प्रदान करें. (७३)
येदं पूर्वागन् रशनायमाना प्रजामस्यै द्रविणं चेह दत्त्वा.
तां वहन्त्वगतस्यानु पन्थां विराडियं सुप्रजा अत्यजैषीत्.. (७४)
रस्सी के समान बांधने वाली जो नारी पहले इस स्थान को प्राप्त हुई थी, हम संतान और
धन के द्वारा उस वधू को उस मार्ग से ले जाएं, जिस पर अब तक कोई नहीं चला है. (७४)
प्र बुध्यस्व सुबुधा बुध्यमाना दीर्घायुत्वाय शतशारदाय.
गृहान् गच्छ गृहपत्नी यथासो दीर्घं त आयुः सविता कृणोतु.. (७५)
हे उत्तम बुद्धि वाली! जगाई जाने पर तू सौ वर्ष की दीर्घायु प्राप्त करने के लिए जाग. तू
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गृहपत्नी बनने के लिए घर चल. सविता देव तुझे दीर्घ जीवन प्रदान करें. (७५)
सूक्त-१ देवता—अध्यात्म, व्रात्य
पंद्रहवां कांड
सूक्त-१ देवता—अध्यात्म, व्रात्य
व्रात्य आसीदीयमान एव स प्रजापतिं समैरयत्.. (१)
व्रात्य अर्थात् समूहों का हित करने वाला समूहपति सब का प्रेरक था. भग ने
प्रजापालक को उत्तम प्रेरणा दी. (१)
स प्रजापतिः सुवर्णमात्मन्नपश्यत् तत् प्राजनयत्.. (२)
उस प्रजापति ने आत्मा को उत्तम तेज से युक्त किया तथा उस ने सब को उत्पन्न किया.
(२)
तदेकमभवत् तल्ललाममभवत् तन्महदभवत् तज्ज्येष्ठमभवत् तद्
ब्रह्माभवत् तत् तपो ऽ भवत् तत् सत्यमभवत् तेन प्राजायत.. (३)
वह विलक्षण तथा विशाल हुआ. वह श्रेष्ठ ब्रह्म हुआ. वह तपाने वाला तथा सत्य हुआ.
उस के द्वारा यह विश्व प्रकट हुआ. (३)
सो ऽ वर्धत स महानभवत् स महादेवो ऽ भवत्.. (४)
वह वृद्धि को प्राप्त हुआ. वही महान और महादेव हुआ. (४)
स देवानामीशां पर्यैत् स ईशानो ऽ भवत्.. (५)
वह देवों का स्वामी एवं ईशान हुआ. (५)
स एकव्रात्यो ऽ भवत् स धनुऱादत्त तदेवेन्द्रधनुः.. (६)
वह एक व्रात्य अर्थात् समूहों का स्वामी हुआ. उस ने धनुष उठाया और वह इंद्रधनुष
बन गया. (६)
नीलमस्योदरं लोहितं पृष्ठम्.. (७)
उस का पेट नीला और पीठ लाल है. (७)
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सूक्त-२ देवता—अध्यात्म, व्रात्य
नीलेनैवाप्रियं भ्रातृव्यं प्रोर्णोति लोहितेन द्विषन्तं विध्यतीति ब्रह्मवादिनो
वदन्ति.. (८)
वह नीले भाग से अप्रिय शत्रु को घेरता है तथा अपने लाल भाग से द्वेष करने वालों को
वेधता है. ऐसा ब्रह्मवादी जन कहते हैं. (८)
सूक्त-२ देवता—अध्यात्म, व्रात्य
स उदतिष्ठत् स प्राचीं दिशमनुव्यचलत्.. (१)
वह उठ कर पूर्व दिशा में चल दिया. (१)
तं बृहच्च रथन्तरं चादित्याश्च विश्वे च देवा अनुव्य चलन्.. (२)
बृहत् साम, रथंतर साम, सूर्य तथा सभी देवता उस के पीछेपीछे चले. (२)
बृहते च वै स रथन्तराय चादित्येभ्यश्च विश्वेभ्यश्च देवेभ्य आ वृश्चते य एवं
विद्वांसं व्रात्यमुपवदति.. (३)
उस का सत्कार करने वाला बृहत् साम, रथंतर, सूर्य और सब देवताओं की प्रिय पूर्व
दिशा में अपना प्रिय धाम बनाता है. (३)
बृहतश्च वै स रथन्तरस्य चादित्यानां च विश्वेषां च देवानां प्रियं धाम भवति
तस्य प्राच्यां दिशि.. (४)
जो ऐसे विद्वान् व्रतचारी को अपशब्द कहता है, वह बृहत्, रथंतर, आदित्य और विश्वे
देवों का अपराधी होता है. (४)
श्रद्धा पुंश्चली मित्रो मागधो विज्ञानं वासोऽहरुष्णीषं रात्री केशा हरितौ
प्रवर्त्तौ कल्मलिर्मणिः.. (५)
श्रद्धा पुंश्चली, मित्र अर्थात सूर्य स्तुति करने वाला, विज्ञान वस्त्र, दिन पगड़ी, रात्रि केश,
किरणें कुंडल तथा तारे मणि के समान होते हैं. (५)
भूतं च भविष्यच्च परिष्कन्दौ मनो विपथम्.. (६)
भूत और भविष्यत्—ये दोनों काल उस के रक्षक हैं तथा मन उस का युद्ध संबंधी रथ
है. (६)
मातरिश्वा च पवमानश्च विपथवाहौ वातः सारथी रेष्मा प्रतोदः.. (७)
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श्वास और उच्छ्वास उस के रथ के घोड़े हैं. प्राण उस का सारथी है और वायु उस
सारथी का चाबुक है. (७)
कीर्तिश्च यशश्च पुरःसरावैनं कीर्तिर्गच्छत्या यशो गच्छति य एवं वेद.. (८)
कीर्ति और यश उस के आगे चलने वाले हैं. कीर्ति उस के समीप आती है तथा यश उस
के पास आता है. जो इस प्रकार जानता है, उसे कीर्ति और यश प्राप्त होते हैं. (८)
स उदतिष्ठत् स दक्षिणां दिशमनु व्य चलत्.. (९)
वह उठा और दक्षिण दिशा की ओर चला. (९)
तं यज्ञायज्ञियं च वामदेव्यं च यज्ञश्च यजमानश्च पशवश्चानुव्यचलन्.. (१०)
यज्ञ करने वाले और न करने वाले, वामदेव से संबंधित, यज्ञ, यजमान उस के अत्यधिक
अनुकूल हुए और पीछेपीछे चले. (१०)
यज्ञायज्ञियाय च वै स वामदेव्याय च यज्ञाय च यजमानाय च पशुभ्यश्च
वृश्चते य एवं विद्वांसं व्रात्यमुपवदति.. (११)
जो इस प्रकार के विद्वान् और व्रत का आचरण करने वाले का उपहास करता है, वह
यज्ञ करने वाले तथा न करने वाले, वामदेव संबंधी का, यज्ञ का, यजमान का और पशुओं का
अपराधी बनता है. (११)
यज्ञायज्ञियस्य च वै स वामदेव्यस्य च यज्ञस्य च यजमानस्य च पशूनां च
प्रियं धाम भवति तस्य दक्षिणायां दिशि.. (१२)
जो उस का सत्कार करता है, वह यज्ञाज्ञिय, वामदेव्य, यज्ञ, यजमान और पशुओं का
प्रिय होता है. उस का स्थान दक्षिण दिशा में होता है. (१२)
उषाः पुंश्चली मन्त्रो मागधो विज्ञानं वासो ऽ हरुष्णीषं रात्री केशा हरितौ
प्रवर्त्तौ कल्मलिर्मणिः.. (१३)
उस की उषा स्त्री, मंत्र प्रशंसक, विज्ञान वस्त्र, दिन पगड़ी, रात्रि केश, किरण कुंडल
तथा तारे मणि के समान होते हैं. (१३)
अमावास्या च पौर्णमासी च परिष्कन्दौ मनो विपथम्. मातरिश्वा च
पवमानश्च विपथवाहौ वातः सारथी रेष्मा प्रतोदः. कीर्तिश्च यशश्च
पुरःसरावैनं कीर्तिर्गच्छत्या यशो गच्छति य एवं वेद.. (१४)
अमावस्या और पूर्णमासी उस की रक्षा करने वाली होती हैं. मन उस का युद्ध संबंधी रथ
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होता है. श्वास एवं उच्छवाए उस के रथ के घोड़े हैं. प्राण उस का सारथी है. कीर्ति उस के
निकट आती है तथा उस के पास यश मिलते हैं उसे कीर्ति एवं यश मिलते हैं. (१४)
स उदतिष्ठत् स प्रतीचीं दिशमनु व्यचलत्.. (१५)
वह उठा और पूर्व दिशा में चल दिया. (१५)
तं वैरुपं च वैराजं चापश्च वरुणश्च राजानुव्यचलन्.. (१६)
जल, वरुण, वैरूप और वैराज उस के पीछेपीछे चले. (१६)
वैरूपाय च वै स वैराजाय चाद्भ्यश्च वरुणाय च राज्ञ आ वृश्चते य एवं
विद्वांसं व्रात्यमुपवदति.. (१७)
जो इस प्रकार जानने वाले और व्रतधारी का अपमान करता है, वह वैरूप, वैराज, जल
और राजा वरुण का अपराधी होता है. (१७)
वैरूपस्य च वै स वैराजस्य चापां च वरुणस्य च राज्ञः प्रियं धाम भवति
तस्य प्रतीच्यां दिशि.. (१८)
जो यह बात जानता है, वह वैरूप, वैराज, जल और राजा वरुण का प्रिय धाम बनता
है. (१८)
इरा पुंश्चली हसो मागधो विज्ञानं वासो ऽ हरुष्णीषं रात्री केशा हरितौ
प्रवर्तौ कल्मलिर्मणिः.. (१९)
ऐसे व्यक्ति के लिए पश्चिम दिशा में भूमि स्त्री, हास्य प्रशंसा करने वाला, विज्ञान वस्त्र,
दिन पगड़ी, रात्रि केश, किरण कुंडल तथा तारे मणि होते हैं. (१९)
अहश्च रात्री च परिष्कन्दौ मनो विपथम्.
मातरिश्वा च पवमानश्च विपथवाहौ वातः सारथी रेष्मा प्रतोदः. कीर्तिश्च
यशश्च
पुरःसरावैनं कीर्तिर्गच्छत्या यशो गच्छति य एवं वेद.. (२०)
दिन और रात उस के रक्षक होते हैं. श्वेसोच्छ्वास क्रम से उस के रथ के अश्व हैं. प्राण
उस का सारथी है. वायु उस सारथी का चाबुक है. कीर्ति एवं यश उस के आगे चलने वाले हैं.
कीर्ति तथा यश उस के समीप हैं जो यह जानता है, उसे यश और कीर्ति मिलते हैं. (२०)
स उदतिष्ठत् स उदीचीं दिशमनु व्यचलत्.. (२१)
वह उठा और उत्तर दिशा की ओर चलने लगा. (२१)
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तं श्यैतं च नौधसं च सप्तर्षयश्च सोमश्च राजानुव्यचलन्.. (२२)
श्येत, नौधस, सप्तर्षि और राजा सोम उस के पीछे चलने लगे. (२२)
श्यैताय च वै स नौधसाय च सप्तर्षिभ्यश्च सोमाय च राज्ञ आ वृश्चते य एवं
विद्वांसं व्रात्यमुपवदति.. (२३)
जो इस प्रकार जानने वाले व्रात्य का अपमान करता है, वह श्येत, नौधस, सप्तर्षि और
राजा सोम का अपराधी बनता है. (२३)
श्यैतस्य च वै स नौधसस्य च सप्तर्षीणां च सोमस्य च राज्ञः प्रियं धाम
भवति तस्योदीच्यां दिशि.. (२४)
जो यह बात जान लेता है वह श्येत, नौधस, सप्तर्षि और राजा वरुण का प्रिय बनता है.
उत्तर दिशा में उस का प्रिय स्थान होता है. (२४)
विद्युत् पुंश्चली स्तनयित्नुर्मागधो विज्ञानं वासो ऽ हरुष्णीषं रात्री केशा
हरितौ प्रवतौ कल्मलिर्मणिः.. (२५)
उस के लिए बिजली स्त्री, गरजने वाला मेघ प्रशंसक, विज्ञान वस्त्र, दिन पगड़ी, रात
केश, किरणें, कुंडल तथा तारे मणि बन जाते हैं. (२५)
श्रुतं च विश्रुतं च परिष्कन्दौ मनो विपथम्.. (२६)
ज्ञान और विज्ञान उस के रक्षक होते हैं तथा मन उस का युद्ध संबंधी रथ होता है. (२६)
मातरिश्वा च पवमानश्च विपथवाहौ वातः सारथी रेष्मा प्रतोदः.. (२७)
श्वास और उच्छ्वास उस के रथ के घोड़े, प्राण सारथी और वायु उस का चाबुक बनता
है. (२७)
कीर्तिश्च यशश्च पुरःसरावैनं कीर्तिर्गच्छत्या यशो गच्छति य एवं वेद.. (२८)
जो इस बात को जानता है कीर्ति और यश उस के आगे चलने वाले होते हैं. कीर्ति उस
के पास आती है और यश उस के समीप आता है. (२८)
सूक्त-३ देवता—अध्यात्म, व्रात्य
सं संवत्सरमूर्ध्वो ऽ तिष्ठत् तं देवा अब्रुवन् व्रात्य किं नु तिष्ठसीति.. (१)
वह एक वर्ष तक खड़ा रहा, तब देवताओं ने उस से पूछा—"हे व्रात्य! यह तप क्यों कर
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रहे हो?” (१)
सो ऽ ब्रवीदासन्दीं मे सं भरन्त्विति.. (२)
उस ने उत्तर दिया— “मेरे लिए आसंदी और बैठने की चौकी बनाओ.” (२)
तस्मै व्रात्यायासन्दीं समभरन्.. (३)
तब देवताओं ने उस के लिए आसंदी बनाई. (३)
तस्या ग्रीष्मश्च वसन्तश्च द्वौ पादावास्तां शरच्च वर्षाश्च द्वौ.. (४)
उस के दो पाए ग्रीष्म और वसंत ऋतुएं तथा शेष दो पाए शरद और वर्षा नामक ऋतुएं
हुईं. (४)
बृहच्च रथन्तरं चानूच्ये ३ आस्तां यज्ञायज्ञियं च वामदेव्यं च तिरश्च्ये.. (५)
बृहत् और रथंतर उस चौकी के बाजू अर्थात् अगलबगल के फलक या तख्ते थे.
यज्ञायज्ञिय और वामदेव्य उस के तिरछे फलक अर्थात् तख्ते थे. (५)
ऋचः प्राञ्चस्तन्तवो यजूंषि तिर्यञ्चः.. (६)
ऋग्वेद के मंत्र उसे बुनने के लिए लंबाई के तंतु और यजुर्वेद के मंत्र तिरछे तंतु थे. (६)
वेद आस्तरणं ब्रह्मोपबर्हणम्.. (७)
वेद उस का बिछौना था और ब्रह्म उस के ओढ़ने का वस्त्र था. (७)
सामासाद उद्गीथो ऽ पश्रयः.. (८)
सामवेद के मंत्र उस का गद्दा था और उद्गीथ उस का तकिया था. (८)
तामासन्दीं व्रात्य आरोहत्.. (९)
व्रात्य इस प्रकार की ज्ञानमयी चौकी पर चढ़ा. (९)
तस्य देवजनाः परिष्कन्दा आसन्संकल्पाः प्रहाख्या ३ विश्वानि
भूतान्युपसदः.. (१०)
संकल्प उस के दूत बने तथा सभी प्राणी उस के साथ बैठने वाले हुए. (१०)
विश्वान्येवास्य भूतान्युपसदो भवन्ति य एवं वेद.. (११)
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सूक्त-४ देवता—अध्यात्म, व्रात्य
जो इस बात को जानता है, सभी प्राणी उस के मित्र हो जाते हैं। (११)
सूक्त-४ देवता—अध्यात्म, व्रात्य
तस्मै प्राच्या दिशः.
वासन्तौ मासौ गोप्तारावकुर्वन् बृहच्च रथन्तरं चानुष्ठातारौ.. (१-२)
देवताओं ने उस के लिए वसंत ऋतु के दो महीनों को पूर्व दिशा में रक्षक नियुक्त किया.
बृहत्साम और रथंतर को उस का अनुष्ठान करने वाला बनाया। (१-२)
वासन्तावेनं मासौ प्राच्या दिशो गोपायतो बृहच्च
रथन्तरं चानु तिष्ठतो य एवं वेद.. (३)
जो यह बात जानता है, वसंत ऋतु के दो महीने, पूर्व दिशा की ओर से उस की रक्षा
करते हैं. बृहत् साम और रथंतर उस के अनुकूल हो जाते हैं. (३)
तस्मै दक्षिणाया दिशः
ग्रैष्मौ मासौ गोप्तारावकुर्वन् यज्ञायज्ञियं च वामदेव्यं चानुष्ठातारौ.. (४-५)
दक्षिण दिशा की ओर देवताओं ने ग्रीष्म ऋतु के दो महीनों को उस का रक्षक बनाया
तथा यज्ञायज्ञिय और वामदेव्य को उस का अनुष्ठान करने वाला नियुक्त किया. (४-५)
ग्रैष्मावेनं मासौ दक्षिणाया दिशो गोपायतो यज्ञायज्ञियं च वामदेव्यं चानु
तिष्ठतो य एवं वेद.. (६)
जो इस बात को जानता है, दक्षिण दिशा की ओर से ग्रीष्म ऋतु के दो महीने उस की
रक्षा करते हैं तथा यज्ञायज्ञिय और वामदेव उस के अनुकूल होते हैं. (६)
तस्मै प्रतीच्या दिशः.. (७)
वार्षिकौ मासौ गोप्तारावकुर्वन् वैरूपं च वैराजं चानुष्ठातारौ.. (८)
देवताओं ने पश्चिम दिशा में वर्षा ऋतु के दो महीनों को उस का रक्षक नियुक्त किया
तथा वैरूप और वैराज को उस का अनुष्ठान करने वाला नियुक्त किया. (७-८)
वार्षिकावेनं मासौ प्रतीच्या दिशो गोपायतो वैरूपं च वैराजं चानु तिष्ठतो य
एवं वेद.. (९)
जो इस बात को जानता है, वह पश्चिम दिशा की ओर से वर्षा ऋतु के दो महीनों द्वारा
रक्षित रहता है तथा वैरूप और वैराज उस के अनुकूल रहते हैं. (९)
तस्मा उदीच्या दिशः.. (१०)
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शारदौ मासौ गोप्तारावकुर्वञ्छ्यैतं च नौधसं चानुष्ठातारौ.. (११)
देवताओं ने उत्तर दिशा की ओर से शरद ऋतु के दो महीनों को उस का रक्षक नियुक्त
किया तथा श्येत और नौधस को उस का अनुष्ठान करने वाला बनाया. (१०-११)
शारदावेनं मासावुदीच्या दिशो गोपायतः श्यैतं च नौधसं चानु तिष्ठतो य
एवं वेद.. (१२)
जो यह बात जानता है, उत्तर दिशा की ओर से उस की रक्षा शरद ऋतु के दो महीने
करते हैं तथा नौधस और श्येत उस के अनुकूल बन जाते हैं. (१२)
तस्मै ध्रुवाया दिशः.. (१३)
हैमनौ मासौ गोप्तारावकुर्वन् भूमिं चाग्निं चानुष्ठातारौ.. (१४)
देवताओं ने ध्रुव दिशा अर्थात् पृथ्वी की अथवा नीचे की ओर से हेमंत ऋतु के दो महीनों
को उस का रक्षक नियुक्त किया तथा पृथ्वी और अग्नि को उस का अनुष्ठान करने वाला
बनाया. (१३-१४)
हैमनावेनं मासौ ध्रुवाया दिशो गोपायतो भूमिश्चाग्निश्चानु तिष्ठतो य एवं
वेद.. (१५)
जो इस बात को जानता है, ध्रुव दिशा की ओर से हेमंत ऋतु के दो महीने उस पुरुष की
रक्षा करते हैं. पृथ्वी और अग्नि उस के अनुकूल हो जाते हैं. (१५)
तस्मा ऊर्ध्वाया दिशः.. (१६)
शैशिरौ मासौ गोप्तारावकुर्वन् दिवं चादित्यं चानुष्ठातारौ... (१७)
देवताओं ने ऊर्ध्व दिशा अर्थात् ऊपर की ओर से शिशिर ऋतु के दो महीनों को उस का
रक्षक नियुक्त किया और आकाश तथा सूर्य को उस का अनुष्ठान करने वाला बनाया.
(१६-१७)
शैशिरावेनं मासावूर्ध्वाया दिशो गोपायतो द्यौश्चादित्यश्चानु तिष्ठतो य एवं
वेद.. (१८)
जो इस बात को जानता है. वह ऊपर की दिशा की ओर से शिशिर ऋतु के दो महीनों
के द्वारा रक्षित होता है. आकाश तथा सूर्य उस के अनुकूल हो जाते हैं. (१८)
सूक्त-५ देवता—रुद्र
तस्मै प्राच्या दिशो अन्तर्देशाद् भवमिष्वासमनुष्ठातारमकुर्वन्.. (१)
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देवताओं ने पूर्व दिशा के कोने से उस की रक्षा के लिए धनुष धारण करने वाले भव
अर्थात् महादेव को उस का अनुष्ठान करने वाला बनाया. (१)
भव एनमिष्वासः प्राच्या दिशो अन्तर्देशादनुष्ठातानु तिष्ठति.
नैनं शर्वो न भवो नेशानः.. (२)
जो इस बात को जानता है, धनुष धारण करने वाले भव अर्थात् महादेव, शर्व, ईशान
उस के अनुकूल रहते हैं. (२)
नास्य पशून् न समानान् हिनस्ति य एवं वेद.. (३)
जो इसे जानता है, उस के अनुकूल रहने वाले पुरुषों और पशुओं की वे हिंसा नहीं
करते. (३)
तस्मै दक्षिणाया दिशो अन्तर्देशाच्छर्वमिष्वासमनुष्ठातारमकुर्वन्.. (४)
देवताओं ने दक्षिण दिशा की ओर से बाण चलाने वाले शर्व अर्थात् शिव को उस का
अनुष्ठान करने वाला बनाया. (४)
शर्व एनमिष्वासो दक्षिणाया दिशो अन्तर्देशादनुष्ठातानु तिष्ठति.
नैनं शर्वो न भवो नेशानः
नास्य पशून् न समानान् हिनस्ति य एवं वेद.. (५)
जो इस बात को जानता है, दक्षिण दिशा के कोण से शर्व, भव और ईशान उस के
अनुकूल रहते हैं. जो पुरुष और पशु उस के अनुकूल होते हैं. शर्व उन की हिंसा नहीं करते.
(५)
तस्मै प्रतीच्या दिशो अन्तर्देशात् पशुपतिमिष्वासमनुष्ठातारमकुर्वन्.. (६)
देवताओं ने पश्चिम दिशा के कोने से बाण फेंकने वाले पशुपति को उस का अनुष्ठान
करने वाला नियुक्त किया. (६)
पशुपतिरेनमिष्वासः प्रतीच्या दिशो अन्तर्देशादनुष्ठातानु तिष्ठति.
नैनं शर्वो न भवो नेशानः.
नास्य पशून् समानान् हिनस्ति य एवं वेद.. (७)
जो इस बात को जानता है, पशुपति पश्चिम दिशा के कोने से उस के अनुकूल रहते हैं.
जो पुरुष और पशु उस के अनुकूल होते हैं, पशुपति उन की हिंसा नहीं करते हैं. (७)
तस्मा उदीच्या दिशो अन्तर्देशादुग्रं देवमिष्वासमनुष्ठातारमकुर्वन्.. (८)
देवों ने पश्चिम दिशा के कोने से धनुष धारण करने वाले पशुपति को इस का अनुष्ठान
करने वाला बनाया. (८)
उग्र एनं देव इष्वास उदीच्या दिशो अन्तर्देशादनुष्ठातानु तिष्ठति
नैनं शर्वो न भवो नेशानः.
नास्य पशून् न समानान् हिनस्ति य एवं वेद.. (९)
देवों ने उत्तर दिशा के कोने से धनुष धारण करने वाले उग्रदेव को इस का अनुष्ठान करने
वाला बनाया. (९)
तस्मै ध्रुवाया दिशो अन्तर्देशाद् रुद्रमिष्वासमनुष्ठातारमकुर्वन्.. (१०)
जो इस बात को जानता है, धनुष धारण करने वाले उग्रदेव उत्तर दिशा के कोने से इस
के पक्ष में रहते हैं, शर्व, भव और ईशान उसे हानि नहीं पहुंचाते. जो पुरुष और पशु इस के
अनुकूल होते हैं, उग्रदेव उन की हिंसा नहीं करते. (१०)
रुद्र एनमिष्वासो ध्रुवाया दिशो अन्तर्देशादनुष्ठातानु तिष्ठति
नैनं शर्वो न भवो नेशानः
नास्य पशून् न समानान् हिनस्ति य एवं वेद.. (११)
ध्रुव दिशा के कोने से देवों ने धनुष धारण करने वाले रुद्र को इस का अनुष्ठान करने
वाला बनाया है. (११)
तस्मा ऊर्ध्वाया दिशो अन्तर्देशान्महादेवमिष्वासमनुष्ठातारमकुर्वन्.. (१२)
बाण धारण करने वाले रुद्र ध्रुव दिशा में इस की रक्षा करते हैं. जो इस बात को जानता
है, शर्व, भव और ईशान उसे हानि नहीं पहुंचाते. जो मनुष्य और पशु इस के अनुकूल होते हैं.
रुद्र उन की हिंसा नहीं करते. (१२)
महादेव एनमिष्वास ऊर्ध्वाया दिशो अन्तर्देशादनुष्ठातानु तिष्ठति.
नैनं शर्वो न भवो नेशानः.
नास्य पशून् न समानान् हिनस्ति य एवं वेद.. (१३)
देवताओं ने ऊपर की दिशा के कोने से धनुष धारण करने वाले महादेव को तेरा
अनुष्ठान करने वाला नियुक्त किया. जो इस बात को जानता है, महादेव ऊपर की दिशा के
कोने से उस की रक्षा करते हैं. जो पुरुष और पशु इस के अनुकूल होते हैं, उन की महादेव
हिंसा नहीं करते हैं. (१३)
तस्मै सर्वेभ्यो अन्तर्देशेभ्य ईशानमिष्वासमनुष्ठातारमकुर्वन्.. (१४)
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