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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

सूक्त-३ देवता—आदित्य

तू ऋषियों का पाषाण है. तुझ देवरूप पाषाण को मैं नमस्कार करता हूं. (६)
सूक्त-३ देवता—आदित्य
मूर्धाहं रयीणां मूर्धा समानानां भूयासम्.. (१)
मैं धनों का शीर्ष रूप रहूं. जो व्यक्ति मेरे समान हैं, उन में मैं मस्तक के समान उच्च रहूं.
(१)
रुजश्च मा वेनश्च मा हासिष्टां मूर्धा च मा विधर्मा च मा हासिष्टाम्.. (२)
रज, यज्ञ, मूर्धा अर्थात् शीश और विशेष धर्म मेरा त्याग न करें. (२)
उर्वश्च मा चमसश्च मा हासिष्टां धर्ता च मा धरुणश्च मा हासिष्टाम्.. (३)
उर्व अर्थात् पकाने वाला पात्र, चमस अर्थात् चमचा धारण करने वाले और आधार मुझ
से अलग न हों. (३)
विमोकश्च मार्द्रपविश्च मा हासिष्टामार्द्रदानुश्च मा मातरिश्वा च मा
हासिष्टाम्.. (४)
मुक्त करने वाला तथा गीला आयुध, आर्द्रदानु और मातरिश्वा अर्थात् पवन मुझ से
अलग न हो. (४)
बृहस्पतिर्म आत्मा नृमणा नाम हृद्यः.. (५)
हर्ष देने वाले, अनुग्रह करने वाले तथा मन को लगाने वाले बृहस्पति मेरी आत्मा हैं. (५)
असंतापं मे हृदयमुत्रीं गव्यूतिः समुद्रो अस्मि विधर्मणा.. (६)
दो कोस तक की भूमि मेरे अधिकार में हो. मेरा हृदय कभी संतप्त न रहे. मैं धारण
करने की शक्ति के द्वारा सागर के समान गंभीर बनूं. (६)
सूक्त-४ देवता—आदित्य
नाभिरहं रयीणां नाभिः समानानां भूयासम्.. (१)
मैं धनों की नाभि के समान बनूं. जो पुरुष मेरे समान हैं, उन में भी मैं नाभि रूप बनूं.
(१)
स्वासदसि सूषा अमृतो मर्त्येष्विा.. (२)
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श्रेष्ठ उषा मरण धर्मा मनुष्यों में अमृत से युक्त है तथा सुंदरता के साथ प्रतिष्ठित होती है.
(२)
मा मां प्राणो हासीन्मो अपानो ऽ वहाय परा गात्.. (३)
प्राण वायु मेरा त्याग न करे. अपान वायु भी मुझे छोड़ कर न जाए. (३)
सूर्यो माह्नः पात्वग्निः पृथिव्या वायुरन्तरिक्षाद् यमो मनुष्येभ्यः सरस्वती
पार्थिवेभ्यः.. (४)
सूर्य दिन में मेरी रक्षा करें. अग्नि पृथ्वी पर मेरी रक्षा करे. वायु अंतरिक्ष में, यम मनुष्यों
से तथा सरस्वती पार्थिव पदार्थों से मेरी रक्षा करने वाली हैं. (४)
प्राणापानौ मा मा हासिष्टं मा जने प्र मेषि.. (५)
प्राण और अपान वायु मेरा त्याग न करें. मैं सदा प्रसन्न रहूं. (५)
स्वस्त्य १ द्योषसो दोषसश्च सर्व आपः सर्वगणो अशीय. (६)
उषा काल और रात्रि के द्वारा मंगल हो. मैं सभी गणों और जलों का उपयोग करने वाला
बनूं. (६)
शक्वरी स्थ पशवो मोप स्थेषुर्मित्रावरुणौ मे प्राणापानावग्निर्मे दक्षं
दधातु.. (७)
हे पशुओ! तुम भुजाओं वाले बनो तथा मेरे पास स्थित रहो. वरुण देव मेरी प्राण और
अपान वायु को पोषित करें. अग्नि देव मेरे बल को दृढ़ करें. (७)
सूक्त-५ देवता—दुःस्वप्ननाशन
विद्म ते स्वप्न जनित्रं ग्राह्याः पुत्रो ऽ सि यमस्य करणः.. (१)
हे स्वप्न! तू ग्राह्य पिशाचों से उत्पन्न हुआ है तथा यम को प्राप्त करने वाला है. मैं तेरी
उत्पत्ति जानता हूं. (१)
अन्तको ऽ सि मृत्युरसि.. (२)
हे स्वप्न! तू जीवन का अंत करने वाली मृत्यु है. (२)
तं त्वा स्वप्न तथा सं विद्म स नः स्वप्न दुष्षप्न्यात् पाहि.. (३)
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हे प्रश्न! हम तुम्हें भलीभांति जानते हैं. तुम हमें बुरे स्वप्नों से बचाओ. (३)
विद्म ते स्वप्न जनित्रं निर्ऋत्याः पुत्रो ऽ सि यमस्य करणः.
अन्तको ऽ सि मृत्युरसि. तं त्वा स्वप्न तथा सं विद्म स नः स्वप्न दुष्ष्वप्न्यात्
पाहि.. (४)
हे स्वप्न! हम तुम्हारे जन्म को जानते हैं. तुम निर्ऋति अर्थात् पाप देवता के पुत्र हो तथा
यम देव के साधन हो. तुम जीवन का अंत करने वाली मृत्यु हो. हम तुम्हारे इस रूप को
जानते हैं. तुम हमें बुरे स्वप्न से बचाओ. (४)
विद्म ते स्वप्न जनित्रमभूत्याः पुत्रो ऽ सि यमस्य करणः.
अन्तको ऽ सि मृत्युरसि. तं त्वा स्वप्न तथा सं विद्म स नः स्वप्न दुष्ष्वप्न्यात्
पाहि.. (५)
हे स्वप्न! हम तुम्हारी उत्पत्ति को जानते हैं. तुम मृत्यु और अभूति अर्थात् दरिद्रता के पुत्र
हो. हे स्वप्न! हम तुम्हें भलिभांति जानते हैं. तुम हमारी बुरे स्वप्नों से रक्षा करो. (५)
विद्म ते स्वप्न जनित्रं निर्भूत्याः पुत्रो ऽ सि यमस्य करणः.
अन्तको ऽ सि मृत्युरसि. तं त्वा स्वप्न तथा सं विद्म स नः स्वप्न दुष्ष्वप्न्यात्
पाहि.. (६)
हे स्वप्न! हम तुम्हारी उत्पत्ति को जानते हैं. तुम निर्भूति अर्थात् निर्धनता के पुत्र और
यमराज के साधन हो. हम तुम्हें भलीभांति जानते हैं, इसलिए तुम हमें बुरे स्वप्न से बचाओ.
(६)
विद्म ते स्वप्न जनित्रं पराभूत्याः पुत्रो ऽ सि यमस्य करणः.
अन्तको ऽ सि मृत्युरसि. तं त्वा स्वप्न तथा सं विद्म स नः स्वप्न दुष्ष्वप्न्यात्
पाहि.. (७)
हे स्वप्न! हम तुम्हारी उत्पत्ति को जानते हैं. तुम पराभूति अर्थात् पराजय के पुत्र और
यमराज के साधन हो. तुम यमराज के साधन और मृत्यु हो. हम तुम्हारे स्वरूप को भलीभांति
जानते हैं. तुम हमें बुरे स्वप्नों से बचाओ. (७)
विद्म ते स्वप्न जनित्रं देवजामीनां पुत्रो ऽ सि यमस्य करणः.. (८)
हे स्वप्न! हम तुम्हारे जन्म को जानते हैं. तुम इंद्रिय विकारों के पुत्र और यम के साधन
हो. तुम जीवन का अंत करने वाली मृत्यु हो. हम तुम्हें भलीभांति जानते हैं. तुम हमें बुरे स्वप्न
से बचाओ. (८)
अन्तको ऽ सि मृत्युरसि.. (९)
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