अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त-१ देवता—बृहस्पति
चौथा कांड
सूक्त-१ देवता—बृहस्पति
ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद् वि सीमतः सुरुचो वेन आवः.
स बुध्न्या उपमा अस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसतश्च वि वः.. (१)
सत्, चित, आनंद और सारे विश्व का कारण ब्रह्म सब से पहले सूर्य रूप में प्रकट हुआ
जो पूर्व दिशा में उत्पन्न होता है तथा अपने तेज से सारे जगत् को व्याप्त करता है. यह प्रकाश
और वर्षा का कारण सूर्यात्मक तेज सभी दिशाओं से आरंभ हो कर अपने शोभन प्रकाश को
फैलाता है. सत् और असत् के उत्पत्ति स्थान के ज्ञान का तथा धरती, आकाश आदि का ज्ञान
प्रकट करने वाला वही सूर्यात्मक तेज है. (१)
इयं पित्र्या राष्ट्र्येत्वग्रे प्रथमाय जनुषे भुवनेष्ठाः.
तस्मा एतं सुरुचं ह्वारमह्यं घर्मं श्रीणन्तु प्रथमाय धास्यवे.. (२)
संपूर्ण जगत् को उत्पन्न करने वाले पिता प्रजापति ब्रह्मा हैं. उन से प्राप्त और नाद रूप
में सभी प्राणियों में व्याप्त वाणी सारे संसार के व्यवहारों की स्वामिनी है. ये प्रथम शब्द से
वाच्य सूर्यात्मक तेज अर्थात् ब्रह्म को स्तुति रूप में प्राप्त हों. (२)
प्र यो जज्ञे विद्वानस्य बन्धुर्विश्वा देवानां जनिमा विवक्ति.
ब्रह्म ब्रह्मण उज्जभार मध्यान्नीचैरुच्चैः स्वधा अभि प्र तस्थौ.. (३)
इस प्रपंच के कारण, हितकारी एवं निरावरण ज्ञान से सारे जगत् को जानते हुए जो देव
सर्वप्रथम उत्पन्न हुए, वे इंद्र आदि सभी देवों के जन्मों का वर्णन करते हैं. प्रथम उत्पन्न देव ने
सब के कारण रूप ब्रह्म के मध्य भाग से, नीचे वाले भाग से और ऊपर वाले भाग से वेदों का
उद्धार किया. इस के पश्चात देवों को हवि के रूप में अन्न मिला. (३)
स हि दिवः स पृथिव्या ऋतस्था मही क्षेमं रोदसी अस्कभायत्.
महान् मही अस्कभायद् वि जातो द्यां सद्म पार्थिवं च रजः.. (४)
सूर्य के रूप में सर्वप्रथम उत्पन्न हुए देव आकाश में कारण रूप में तथा पृथ्वी में सत्य
रूप में स्थित हैं एवं उन्होंने धरती व आकाश को अविनाशी रूप में स्थापित किया. धरती
और आकाश को व्याप्त कर के वर्तमान उस प्रथम देव ने धरती और आकाश को स्थापित
किया है. वह इन दोनों के मध्य में सूर्य के रूप में उत्पन्न हुआ है तथा आकाश और पृथ्वी को
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अपने तेज से व्याप्त कर रहा है. (४)
स बुध्न्यादाष्ट्र जनुषो ऽ भ्यग्रं बृहस्पतिर्देवता तस्य सम्राट्.
अहर्यच्छुक्रं ज्योतिषो जनिष्ठाथ द्युमन्तो वि वसन्तु विप्राः.. (५)
प्रथम तेज के रूप में उत्पन्न परब्रह्म ने लोक के मूल अर्थात् निचले भाग से ले कर ऊपर
वाले भाग तक को व्याप्त किया. दान आदि गुणों से युक्त बृहस्पति इस लोक के अधिपति हैं.
दीप्ति वाला दिन उस प्रकाश वाले सूर्य से उत्पन्न हुआ. इस के पश्चात दीप्ति वाले एवं मेधावी
ऋत्विज् अपनेअपने व्यापारों में लग गए. (५)
नूनं तदस्य काव्यो हिनोति महो देवस्य पूर्व्यस्य धाम.
एष जज्ञे बहुभिः साकमित्था पूर्वे अर्धे विषिते ससन् नु.. (६)
ऋत्विजों का यज्ञ इस दिखाई न देने वाले और सब से पहले उत्पन्न सूर्य देव का मंडल
निश्चय ही सब को प्रेरणा देता है. यह सूर्य हजारों किरणों के साथ इस प्रकार पूर्व दिशा में
प्रकट होता है कि इन्हें हवि लक्षण अन्न शीघ्र प्राप्त हो जाता है. (६)
यो ऽ थर्वाणं पितरं देवबन्धुं बृहस्पतिं नमसाव च गच्छात्.
त्वं विश्वेषां जनिता यथासः कविर्देवो न दभायत् स्वधावान्.. (७)
बृहस्पति देव ने प्रजापति अथर्वा को लोक का उत्पन्न करने वाला और इंद्र आदि देवों
का बंधु जाना. बृहस्पति एवं अथर्वा को हमारा नमस्कार है. हवि रूप अन्न से युक्त हो कर वे
हम पर उसी प्रकार कृपा करते हैं, जिस प्रकार वे अन्न से युक्त एवं सभी प्राणियों के जन्म
दाता हैं. (७)
सूक्त-२ देवता—आत्मा
य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवाः.
यो ३स्येशे द्विपदो यश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (१)
जो प्रजापति सभी प्राणियों को प्राण एवं शांति देने वाले हैं, सभी प्राणी एवं देव भी
जिन का शासन मानते हैं तथा दो पैरों वाले मनुष्यों और चार पैरों वाले पशुओं के स्वामी हैं.
हम हवि द्वारा इस प्रकार के प्रजापति देव की पूजा करते हैं. (१)
यः प्राणतो निमिषतो महित्वैको राजा जगतो बभूव.
यस्य छायामृतं यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (२)
जो प्रजापति अपने माहात्म्य से सांस लेने वाले और पलक झपकाने वाले समस्त
गतिशील प्राणियों के एकमात्र स्वामी हैं, जीवन और मृत्यु छाया के समान जिन के अधीन हैं,
मैं हवि के द्वारा उन प्रजापति देव की पूजा करता हूं. (२)
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यं क्रन्दसी अवतश्श्वस्कभाने भियसाने रोदसी अह्वयेथाम्.
यस्यासौ पन्था रजसो विमानः कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (३)
संसार की रक्षा के लिए धरती और आकाश अपने स्थान पर स्थिर हैं. प्रजापति ने उन्हें
निराधार प्रदेश में धारण किया है. नीचे गिरने की आशंका से भयभीत धरती और आकाश के
मध्य विद्यमान वे प्रजापति रोए थे, इसलिए इन दोनों का नाम रोदसी हुआ. जिस प्रजापति
का आकाश में स्थित मार्ग वर्षा के जल का निर्माण करता है, हम हवि द्वारा उन प्रजापति की
पूजा करते हैं. (३)
यस्य द्यौरुर्वी पृथिवी च मही यस्याद उर्व १न्तरिक्षम्.
यस्यासौ सूरो विततो महित्वा कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (४)
जिन प्रजापति की महिमा से आकाश विस्तीर्ण और पृथ्वी विस्तृत हुई है, जिन की
महिमा से अंतरिक्ष अर्थात् आकाश और पृथ्वी के मध्यवर्ती भाग का विस्तार हुआ है तथा
आकाश में प्रत्यक्ष दिखाई देने वाला सूर्य विस्तीर्ण हुआ है, हम हव्य द्वारा उस प्रजापति की
पूजा करते हैं. (४)
यस्य विश्वे हिमवन्तो महित्वा समुद्रे यस्य रसामिदाहुः.
इमाश्च प्रदिशो यस्य बाहू कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (५)
जिस प्रजापति देव की महिमा से हिमालय आदि सभी पर्वत उत्पन्न हुए हैं, सागर में
सभी सरिताएं जिस की महिमा से समा जाती हैं—पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण चार दिशाएं
जिस प्रजापति की भुजाएं हैं, हम हवि के द्वारा उस की पूजा करते हैं. (५)
आपो अग्रे विश्वमावन् गर्भं दधाना अमृता ऋतज्ञाः.
यासु देवीष्वधि देव आसीत् कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (६)
सृष्टि के आदि में जिन बलों ने सारे जगत् की रक्षा की, अविनाशी और जगत् के कारण
हिरण्यगर्भ को जिन दिव्य जलों ने गर्भ के रूप में धारण किया, उन जलों को अपने मध्य
धारण करने वाले प्रजापति की हम हवि के द्वारा पूजा करते हैं. (६)
हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्.
स दाधार पृथिवीमुत द्यां कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (७)
सृष्टि के आदि में हिरण्यगर्भ उत्पन्न हुए तथा उत्पन्न होते ही सभी प्राणियों के स्वामी हो
गए. उन्होंने इस धरती और आकाश को धारण किया. हम हवि द्वारा उन प्रजापति की पूजा
करते हैं. (७)
आपो वत्सं जनयन्तीर्गर्भमग्रे समैरयन्.
तस्योत जायमानस्योल्ब आसीद्धिरण्मयः कस्मै देवाय हविषा विधेम..
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