अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 154, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंअपने तेज से व्याप्त कर रहा है. (४)
स बुध्न्यादाष्ट्र जनुषो ऽ भ्यग्रं बृहस्पतिर्देवता तस्य सम्राट्.
अहर्यच्छुक्रं ज्योतिषो जनिष्ठाथ द्युमन्तो वि वसन्तु विप्राः.. (५)
प्रथम तेज के रूप में उत्पन्न परब्रह्म ने लोक के मूल अर्थात् निचले भाग से ले कर ऊपर
वाले भाग तक को व्याप्त किया. दान आदि गुणों से युक्त बृहस्पति इस लोक के अधिपति हैं.
दीप्ति वाला दिन उस प्रकाश वाले सूर्य से उत्पन्न हुआ. इस के पश्चात दीप्ति वाले एवं मेधावी
ऋत्विज् अपनेअपने व्यापारों में लग गए. (५)
नूनं तदस्य काव्यो हिनोति महो देवस्य पूर्व्यस्य धाम.
एष जज्ञे बहुभिः साकमित्था पूर्वे अर्धे विषिते ससन् नु.. (६)
ऋत्विजों का यज्ञ इस दिखाई न देने वाले और सब से पहले उत्पन्न सूर्य देव का मंडल
निश्चय ही सब को प्रेरणा देता है. यह सूर्य हजारों किरणों के साथ इस प्रकार पूर्व दिशा में
प्रकट होता है कि इन्हें हवि लक्षण अन्न शीघ्र प्राप्त हो जाता है. (६)
यो ऽ थर्वाणं पितरं देवबन्धुं बृहस्पतिं नमसाव च गच्छात्.
त्वं विश्वेषां जनिता यथासः कविर्देवो न दभायत् स्वधावान्.. (७)
बृहस्पति देव ने प्रजापति अथर्वा को लोक का उत्पन्न करने वाला और इंद्र आदि देवों
का बंधु जाना. बृहस्पति एवं अथर्वा को हमारा नमस्कार है. हवि रूप अन्न से युक्त हो कर वे
हम पर उसी प्रकार कृपा करते हैं, जिस प्रकार वे अन्न से युक्त एवं सभी प्राणियों के जन्म
दाता हैं. (७)
सूक्त-२ देवता—आत्मा
य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवाः.
यो ३स्येशे द्विपदो यश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (१)
जो प्रजापति सभी प्राणियों को प्राण एवं शांति देने वाले हैं, सभी प्राणी एवं देव भी
जिन का शासन मानते हैं तथा दो पैरों वाले मनुष्यों और चार पैरों वाले पशुओं के स्वामी हैं.
हम हवि द्वारा इस प्रकार के प्रजापति देव की पूजा करते हैं. (१)
यः प्राणतो निमिषतो महित्वैको राजा जगतो बभूव.
यस्य छायामृतं यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (२)
जो प्रजापति अपने माहात्म्य से सांस लेने वाले और पलक झपकाने वाले समस्त
गतिशील प्राणियों के एकमात्र स्वामी हैं, जीवन और मृत्यु छाया के समान जिन के अधीन हैं,
मैं हवि के द्वारा उन प्रजापति देव की पूजा करता हूं. (२)
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