सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary
देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा
९६ / सम्राट अशोक के अभिलेख
९६ / सम्राट अशोक के अभिलेख
• व्यसन = विपत्ति। सं.-व्यसनम्। 'स सुहृद् व्यसने यः स्यात्' (पञ्च०
१.३३७)। 'व्यसनं विपत्तौ, भ्रंशे, कामजाते, कोपजाते च स्त्रीसम्भवापन्नादौ
दोषे, दैवादिकृते उपद्रवे च' (शब्द०)। पालि -व्यसनं, व्यसन।
• अपग्रथो = आयातः। सं.-अपग्रथः।
• प्रतिभागं = भागीदारी। सं.-प्रतिभागः। पालि -पटिभागो (परंतु इसका
अर्थ भिन्न है। संज्ञा होने पर -'शत्रु'। विशेषण होने पर -'समान, सदृश')।
• सवमनुशानं = सब मनुष्यों की। सं.-सर्वमनुष्याणाम्। (मनुष्यः मानवे
जातिभेदे' -शब्द०)। पालि-सब्वो (सर्वः)। मनुस्सो (मनुष्यः)।
• एकतरे पि प्रपडसि = किसी न किसी संप्रदाय में। सं.-एकतरे अपि
पाषण्डे।
• यमत्रे = जितने भी। सं.-यन्मात्रः।
• अपकरेति = अपकार करे। सं.-अपकुर्यात्। पालि -अपकरोति
(अपकरोतीति)।
• खमितवियमते = (देवानांप्रिय के) मत में क्षमा कर देना चाहिए।
सं.-क्षन्तव्यमेतन्मते। पालि-खमितब्बो (क्षन्तव्यः)। मतं (मतम्)।
• शक्यं = शक्य। सं.-शक्यम्। 'शक्य - समर्थनीये, साधयितुं योग्ये'
(शब्द०)।
• क्षमनवे = क्षमा करने के लिए। सं.-क्षमणाय। (क्षमा - 'वादो यद्यद्यालिके
चैव दुःखे चोत्पादिते क्वचित्। न क्रुध्यति न वा हन्ति सा क्षमा
परिकीर्तिता ॥ - एकादशी०)। पालि -खमनं (क्षमणम्)।
• अटवि = अटवी-निवासी। वनवासी। सं.-अटव्याः (=अटवीवासिनः)।
'अटव्यरण्यं विपिनं गहनं काननं वनम्' (अमर० २.३२७)। पालि-अटवी
(अटवी)।
• अनुनेति = अनुग्रह करता है। सं.-अनुगृह्णाति (=अनुकूल्याय प्रेरयति)।
पालि-अनुनेओ (अनुनेयः)।
• अनुनिजपेति = (अपने विचारों में) ढालता है। सं.-अनुध्यापयति।
• अनुतपे पि = संतप्तित होने पर भी। सं.-अनुतापे अपि। पालि-अनुतापो
(अनुतापः)।
• प्रभवे = प्रभाव। शक्ति। सं.-प्रभावः। 'प्रभावस्तेजसि शक्तौ'
(अनेकार्थ० ३.१३०४)। पालि-प्पभावो।
शिला अभिलेख : शब्द-विवेचन / ९७
शिला अभिलेख : शब्द-विवेचन / ९७
• वुचति तेषु = उनको कहा जाता है। सं.-उच्यते तेभ्यः। पालि -वुच्चति
(उच्यते)। तेसं (तेभ्यः)।
• अवत्रपेयु = लज्जित हों। सं.-अवत्रपेरन्। [अथवा, अपत्रपेरन्
(अप - √त्रप् से निष्पन्न) = लज्जा के मारे सिर झुका लेना। 'न चात्मनापत्रपते
नृशंसः न सः सर्वलोकस्य गुरुर्भवत्युत' (महाभा०)।
• हंञेयुं = मारे जायें। सं.-हन्येरन्। पालि-हन्ति (हन्ति)।
• समाचरियं = शांति का जीवन। सं.-शमचर्याम्। (तुलना करें - व्रतचर्या,
तपश्चर्या)। पालि-समाचरिया (शमचर्या)।
• रमसिये = जोर-जबरदस्ती होने पर (भी)। सं.-रभस्ये। 'रमसो
वेगाद्ययोः (अनेकार्थ० ३.१३५४)। पालि-रभस (रभस) [तुलना करें - Lat.
'rabies' (=madness, anger).
• अयि = यह। सं.-अयम्। (अयम् एतत्तदोऽसुम्भात् -नि० ३.१६)।
पालि-अयं।
• मुख्यत = मतानुसार मुख्य। सं.-मुख्यमतः। (मुख्यः-मुखे आदौ भवः।
श्रेष्ठः। अग्रमः। प्रधानः।) 'प्रधानमुत्तमं रव्यं श्रेष्ठं मुख्यमनुत्तमम्। वरं वरेण्यं
प्रमुखं पार्यं प्रवरं तथा॥' (वैद्यक०)। 'मतं तु संमतेऽभिहिते' (अनेकार्थ०
२.१९८)। पालि-मोक्खो (मुख्यो)।
• धर्मविजयो = धर्मविजय। सं.-धर्मविजयः। 'विजयो जयः' (अभिधान०
३.८०३)। पालि-विजयेति (विजयः)।
• अंतेषु = सीमावर्ती राज्यों में। सं.-अन्तेषु। (अन्तोऽन्तेः-नि० १.६)।
'अन्तोऽवसानं सीमा च' (अभिधान० ४.९६२)।
• अ षु पि योजनशतेषु = छः सौ योजन (दूरी तक) भी। सं.-आ षड्भ्यः
अपि योजनशतेभ्यः। 'षड्भ्यश्चिः स्याद्बहुष्ठ एतैर्दशाभिश्चेति॥ वितस्तिः
स्यात्ततो द्वाभ्यां हस्तः स्यात्तच्चतुष्टयम्। दण्डो धन्वन्तरं तस्य सहस्रद्वितयेन तु॥
क्रोशात्स्यात्तु गव्युतिस्तद्द्वयं योजनं मतम्।' (त्रिकाण्ड० २.२०२-२०४)।
'चतुष्क्रोशं तु योजनम्' (अभिधान० ३.८८८)। षट्-षट् पुनः सहतेः-नि०
४.२७)। (योजनं - √युज् से। A measure of distance equal to four
krośas or eight or nine miles - V.S.Apte) (600 योजन = about 1,500
miles - Romila Thapar). पालि -आ (आ)। योजनं (योजनम्)। 'I look
upon the yōjan as about equivalent to 12 miles.' (Childers)
यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण प्रस्तुत है:
बायाँ स्तम्भ (पृष्ठ ९८):
९८ / सम्राट अशोक के अभिलेख
• परं = परे। सं.-परम्। पालि-परं।
• चतुरे ४ रञो = चार (४) राजा। सं.-चत्वारः ४ राजानः।
पालि-चत्तारो (चत्वारः)।
• तुरमये नाम = तुरमय नाम का। सं.-तुरमयः नाम। (नाम-नामयतीति
वा, नम्यते नायतेनेन वा। 'एवं नामाङ्कः।' प्रकाशस्यम्।
उदाहरण- 'हिमालयो नाम नगाधिराजः' (हिमालयः प्रकाशोऽग्निरूपैस्तैः
इत्यर्थः।) पालि-नाम। तुरमय = Ptolemy II Philadelphos of Egypt
(B.C. 285-247)
• अंतिकिनि = अंतोकिन। सं.-अन्तीकिनः। Antigonos II Gonatas,
King of Macedonia (B.C. 278-7 to 242 or 239), grandson of
Antigonos I.
• मक = मक। सं.-मकः। Magas, King of Cyrene in North Africa,
west of Egypt (c. B.C. 285-258).
• अलिकसुदरो = अलिकसुन्दर। सं.-अलिकसुन्दरः। (अलिकम्-अल्पं
भूयते इति। छलञ्चम्) (सुन्दरः-सुष्ठु उनत्ति आर्द्रीकरोति विनामति
मनोहरम्। मनोरमम्। अभिरामम्।) Alexander, King of Epirus, son of
Pyrrhus (c.B.C. 272-255) or Alexander of Corinth (c.B.C.
252-244).
• निच = नीचे (दक्षिण में)। सं.-नीचाः। (नीच-नीचेर्निचितं भवति-नि०
४.२४)। 'नीच - निकृष्टर्मी लक्ष्मीं चमति पामरे निमं वामने च।' (शब्द०)
'च्युडूणीचवर्हह्रस्वाः' (अमर० ३.१०८८)।
• चोडपंड = चोल और पाण्ड्य। 'चोडः कञ्चुकवेशयोः' (अनेकार्थ०
२.१३३२)। 'चोल-चोला इति ख्याते पुंसो वस्तभेदे च द्राविड़क्षोणिपयोश्च
देशभेदे पु.।' (शब्द०)। सं.-चोलपाण्ड्याः।
• अव = तक। सं.-यावत्। 'यावत्-त्रि. यसरीमाणमय्या । यत्परिमाणे।
यावती। (शब्द०)
• रज़िविषविस = राजा के राज्य में। सं.-राज्ञविषये। विषय आश्रये'
(अमर० ३.२१४२)। 'विषयः-इन्द्रियगोचरे शब्दादौ, देशे च।' (शब्द०)
पालि - विसयो (विषयः)।
दायाँ स्तम्भ (पृष्ठ ९९):
शिला अभिलेख - शब्द-विवेचन / ९९
• योनकंपोजेषु = यवनों और कम्बोजों में। सं.-यवन-कम्बोजेषु।
'यवन-पु. देशभेदे, तद्देशस्थे जने व.व.।' (शब्द०)। कम्बोज-'पञ्चनदं
समाश्रय देशदक्षिणपूर्वतः कम्बोजदेश' इत्युक्तदेशे च। (शब्द०)।
नाभकमनाभिपंतिष = नाभकों और नाभपंक्तियों में। सं.-नाभकनाभपंक्तिषु।
भोजपितिनिकेषु = भोजों तथा पितिनिकों में। सं.-भोजपिनितनिकेषु।
• अंध्रपालिदेषु = आंध्रों एवं पुलिंदों में। सं.-अन्ध्रपुलिन्देषु। अन्ध्रः-
देशभेदे, तन्त्य-लोके, जातिभेदे च। (शब्द०)। 'पुलिन्दः-चाण्डालभेदे।'
(शब्द०)। 'पुलिन्दा नाहला निष्ट्याः शबरा बर्बरा भटाः। मल्ला भिल्लाः
किराताश्च सर्वोऽपि म्लेच्छजातयः' ॥ (अभिधान० ३.९३४)
• अनुवदंति = अनुवर्तन करते हैं। सं.-अनुवर्तन्ते (=अविच्छेदेन
प्रवर्तयन्ति। अनुः सात्ये।) पालि-अनुवत्तति (अनुवर्तते)।
• दुत = दूत। सं.-दूताः। (दूतः-दूतो जवेनैर्वा, द्रवतेर्वा, वार्यतेर्वा-नि०
५.२)। 'दूतः सन्देशहरे वार्ताहरे' (शब्द०)। पालि-दूतो (दूतः)।
• व्रजंति = जाते हैं। सं.-व्रजन्ति। पालि-वजन्ति (व्रजन्ति)।
• श्रुतु = सुनकर। सं.-श्रुत्वा। पालि-सुत्वा, सुत्वान, सुणित्वान, सुणिय।
• धंमवुटं = धर्मवृत्त। सं.-धर्मवृतम्। पालि-वतं (वृत्तम्)।
• विधानं = विधान। सं.-विधानम्। 'विधानं हस्तिकवचे प्रेरणेऽध्वर्युने धने।
चेतोपायविधेषु प्रकारे वैरकमिणि'॥ (अनेकार्थ० ३.१०१६- १०१७)।
पालि-विधानं।
• अनुविधिर्यंति = अनुसरण करते हैं। सं.-अनुविध्यन्ति। 'उपत्तिष्ठति
तिष्ठन्तं गच्छन्तमनुगच्छति। करोति कुर्वतः कर्मच्छायानुरोधीयते ॥'
(महाभा० ६. ७५३)
• प्रितिरसो = तृप्ति का आस्वादन। सं.-प्रीतिरसः। 'प्रीतिः हर्षे, आमोदे,
तृप्तौ च' (शब्द०)। 'रसः-रस्यते इति। आस्वाद्ये।' (शब्द०)। परायत्तः प्रीतिः
कस्येव सं सेतुः पुरुकृः (मुद्रा० ३.४)। पालि-पीति (प्रीतिः)। रसो (रसः)।
• परात्रिकम् = पारलौकिक। सं.-पारत्रिकम्। पारत्रिकं - परत्र भवं।
पारलोक-हितकारके कम्मणि परलोकभवे च। (शब्द०)। पालि-परत्थ (परत्र)।
• मंञति = मानता है। सं.-मन्यते। पालि-मञ्जति।
• एताये च अटये = और इस प्रयोजन के लिए। सं.-एतस्मै च अर्थाय।
'अर्थो हेतौ प्रयोजने' (अनेकार्थ० २.२२४)।
यहाँ प्रस्तुत चित्र के दोनों पृष्ठों (पृष्ठ १०२ एवं १०३) का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण है:
[पृष्ठ १०२]
१०२ / सम्राट अशोक के अभिलेख
धौली शिला : प्रथम पृथक् अभिलेख
• वचनेन = आज्ञा से। हवाले से। सं.-वचनेन। 'व्याहार उक्तिर्लपितं
भाषितं वचनं वचः।' (अमर० १.२५७)। पालि - वचनेन (वचनम्)।
• तोसलियं = तोसली में। सं.-तोसल्याम्।
• नगरव्योवहालका = नगर व्यवहाराध्यक्ष। सं.-नगरव्यवहारकाः। (नगरम्
पञ्च हस्व प्रासादादयः सन्ति यत्र। बहुलो जनसम्पन्नश्च। पुः। पुरम्।) पुरका वा
पौरव्यवहारिक (कीथेल)। पालि-नगरे (नगरम्) वोहारिक
(व्यावहारिक) = A royal officer skilled in the law, a magistrate
(Childers).
• अं किछि = जो कुछ। सं.-यत्किञ्चित्। पालि-यं किञ्चि।
• दखामि = (उचित) समझता हूँ। सं.-पश्यामि। पालि-पस्सति (पश्यति)।
• हकं = मैं। सं.-अहम्। पालि-अहं।
• कंम = कर्म द्वारा। सं.-कर्मणा। (कर्म कश्यायः क्रियते इति सतः-सि०
३.१)। पालि-कम्मन, कम्मना।
• दुवालते = (उचित) उपायों से। सं.-द्वारतः। 'उपाये निर्गमे द्वारा'
(त्रिकाण्ड० ३.३०४)। पालि-द्वारं। दुवारं (द्वारम्)।
• आलभेहं = मैं आरंभ करूँ। सं.-आरभे अहम्। पालि-आरभति
(आरभते)।
• तुफेसु = आप में। सं.-युष्मासु। पालि-तुम्हेसु।
• आयत = स्थापित हैं। सं.-आयताः। आयमय उपशमय स्थापयेत्यर्थः
(उपसर्गार्थ०-खंड ३-पृ. ४९०)। पालि-आयतो (आयतः)।
• पनेयं = प्रणय। सं.-प्रणयम्। (प्रणयः-प्रणयनम्। प्रश्रयः। प्रेम)। 'प्रणयः
प्रेम्ण्युपचये।' (अनेकार्थ० ३.१०५२)। पालि-प्पणेयो (प्रणयः)।
• सु = (अत्यधिक)। सं.-स्वित्। 'स्वित् प्रश्ने च वितर्के च तथैव पादपूरणे'
(मेदिनी०)। पालि-सु।
• पजा = संतान। सं.-प्रजा। (प्रजाता इति। सन्ततिः।) 'प्रजा लोके सन्ततौ
च'। (अनेकार्थ० २.८७)। पालि-पजा।
• अथा = जैसा।
Based on the provided image, here is the complete transcription of both pages:
[पृष्ठ १०४]
१०४ / सम्राट अशोक के अभिलेख
• निठुलियेन = निष्ठुरता (विह्मी) से। सं. -नैष्ठुर्येण। 'निष्ठुरः कष्टदः
क्रूरः परुषः कर्कशः खरः' (अमरको० ६.३२८६)। पालि -निट्ठुरो (निट्ठुर)।
• तूलनाय = त्वरा (जल्दबाजी से)। सं. -त्वरणेन। 'त्वरा वेगो
रंहीऽभित्वरार्था विल्मसाहनं च।' (शब्द०)। पालि -तूर (वैदिक-तूर) का
प्रयोग अन्य शब्दों के साथ ही होता है, यथा तुरगो, तुरङ्गो, तुरङ्गी (तुरगः,
तुरङ्गः, तुरङ्गमः = घोड़ा)।
• अनवुतिय = अनवृत्ति (अर्थात, अभ्यास छूट जाने) से। सं. -अनावृत्त्या
• आलसियेन = आलस्य से। सं. -आलस्येन। (आलस्यम् – अलसस्य
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का लिप्यन्तरण (Transcription) दिया जा रहा है:
[बायाँ पृष्ठ]
११४ | सम्राट अशोक के अभिलेख
• परिवेखेसं = देखूँगा। सं. -परीक्षामि। पालि -परिक्खेसं। (It is probably the
aorist of a denominative stem from परिवेक्ष and परीक्षाम, Or it may
represent the a potential variety of परिपश्येयम्) (Childers)।
• पंचसु पंचसु वसेसु = पाँच पाँच वर्षों में। सं. -पञ्चसु पञ्चसु वर्षेषु। यह
महामात्रोंका समय होता (अभि०भा० २.१५४)। पालि -पञ्चसु (पञ्चसु)।
वसेसु, वस्सेसु (वर्षेषु, वर्षेषु)।
• निक्खामयिसामि = भेजूँगा। सं.-निष्कामयिष्यामि। पालि -निक्खामेस्सं
(निक्खामयिस्सति)।
• अचण्डाने = अचण्डोंको। सं. -अचण्डान्। (कर्कश = कठोरा अस्पृष्णं क्रूरा
निष्ठुरा।) 'कर्कशं कठिनं क्रूरं कठोरं निष्ठुरं दृढम्' (अमर० ३.१७५३)
'कर्कशः पृष्ठ-शूलङ्गे पुरुषानृशंसयोरप्यसत्सहाययोः' (अभि०भा० ६.२३८७)
पालि -कक्कसो (कर्कश)।
• मोगले = शांत स्वभाव वाला। सं. -अमृण्डुकः। (राण्ड = चण्डस्ते हृदौ
भवन्तीति रौवराताविशीण्डुः। असंगतोऽल्पक्रोधः।) 'खरश्चण्डः' - त्रिकाण्ड
३.६.६५। पालि -गण्डो (गण्डः)।
• सचिनारंभ = वधरों को काम में लेने वाला। सं.-श्लक्ष्णारम्भः। (श्लक्ष्ण-
$\sqrt{रिस्}$ से निष्पन्न)। श्लक्ष्ण = अल्प, चिकणो, छोटे या (शब्द०)
(अमरम् = आ$\sqrt{रभ्}$ से निष्पन्न)। 'आरम्भः संप्रसारणम्' (अमर०
३.१.१५६)। युद्धम् करो = 'रणारम्भः समीरः (हेम० २.४८)। पालि -सण्हे
(श्लक्ष्णः)। आरब्भो (आरम्भः)।
• होसति = होगा। सं. -भविष्यति। पालि -हेस्सति, भविस्सति।
• उजेनिते = उज्जयिनी से। सं.-उज्जयिनीतः। (उज्जयिनी,
उज्जायली-जेय उत्+ जयः उत्ति अस्याः अथवा उज्जयन्तीति। विशाल
नगरी। अवन्ती। विक्रमादित्य राजधानी।) 'विशालोज्जयिनी समे' (त्रिकाण्ड०
२.१.९५)। पालि -उज्जेनी (उज्जयनी)।
• कुमाले = कुमार। सं.-कुमारः। (स्त्री पुरियता मारयति दृष्टान्
राजकुमारः।) 'कुमारो मर्तुदारकः' (अमर० १.११५४)।
• हेदिसामेव = ऐसे ही। सं.-ईदृशमेव। ईदृश (श) = अस्येव दर्शनमस्य
(शब्द०)। पालि -एदिसो, परिसो (ईदृशः)।
[दायाँ पृष्ठ]
शिला अभिलेख - शब्द-विश्लेषण / १०७
• वगं = ... (अहिंसाकारी) क्या को। सं. -वर्गावः। (वर्गः = यूध्यते इति।
...अभिधानचिन्तामणिः।) पालि -वग्गो (वर्गः)।
• अतिकामयिसति = अतिक्रमण होंगे देगा। बीतने देगा।
सं.-अतिक्रामयिष्यति। पालि =अतिक्कमयिस्सति (अतिकामयति)।
• तथालोचते = तथारोचना। सं. =तथाभिजाततः। तथारीशा -शिण्युद्देशे
शरीरोद्देशे (शब्द०)। पालि -तथारोचना (तथाशीला)।
• आगपयितु = आगलेका किये बिना। सं. =अज्ञापयित्वा। पालि -अाणापेत्वा
(अज्ञापयित्वा)।
• आसने = अपना। सं. - आत्मनः। पालि -अत्तनो (आत्मनः)।
• जानिसंति = जानकारी करेंगे। सं. - ज्ञास्यन्ति। पालि -जाणिस्सन्ति
(ज्ञास्यति)।
जौगड शिला : द्वितीय पृथक अभिलेख
• समापाथं = समापा में (स्थित)। सं. - समापायाम्। समापः-सम्यक् आपो
यत्र। सेकननगरम्कारे। (शब्द०)।
• लाजनवचनेनक = राजा के संदेश के रूप में। सं. -राजवचनानिकम्।
(लाजवचनेन = राजोन निर्देशम्)।
• लग पखाये हुखनि किति मे सयेण किसलेन युजेयु -लिपिकर की भूल से
इन पदों की पुनरावृत्ति होना प्रतीत होता है।
• अंतानं = सीमावर्ती लोगों की। सं. -अन्तानाम्। 'अन्त्याश्यान्तः' (द्विरूप०
७)। 'अन्तोऽवसाने सीमा च' (अभिधान० ४.१६२)।
• किछंदे = क्या सोचने वाला। सं. -किञ्छन्दः। 'छन्दः अभिलाषे,
वशतायाम्, विपश्चिते धा' (शब्द०)। पालि -छन्दो (छन्दः)।
• अपेसु = हमारे बारे में। सं. -अस्मासु। पालि -अम्हेसु।
• एताका = इतनी। सं. -एतावती। पालि -एत्तको (पुं.)।
• अनुविजिन = अनुद्विग्न। सं. -अनुद्विग्नाः। उद्विग्न = उद्वेगयुक्तो,
दुःखपरिहारातस्तथा व्याकुलचित्ते, क्षुभितो च। (शब्द०)। पालि -उब्विग्गो
(उद्विन्नः)।
• हेयू = होवें। सं. -भवेयुः।
• ममियाये = मेरे में। सं. -मयि। पालि -मयि।
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Line 1: "व्यापारिते, ईषद्युक्तौ, नियुक्ते, कर्माध्यक्षे, कुशले च। (शब्द०)। पालि-सकलो"
Line 2: "(सकलः)। देसो (देशः)। आयुक्तको (आयुक्तकः)।"
Line 3: "• अलं = समर्थ। सं. -अलम्। 'अलं निवारणे।"
Line 4: "अलन्पर्याप्तसमर्थयोर्निवारणे।' (अनेकार्थ० १८०४-१८०५)।"
Line 5: "पालि-अलं।"
Line 6: "• अनुचातुमासं = प्रत्येक चातुर्मास में। सं. -अनुचातुर्मासम्।"
Line 7: "(चातुर्मासः-चतुर्षु मासेषु भवः।) पालि-अनु (अनु)। चतुमासं (चातुर्मासम्)।"
And then look: to the right of that, there is the header:
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[पृष्ठ ११०]
लघु शिला अभिलेख - शब्द-विवेचन
लघु शिला : रूपनाथ अभिलेख
• सातिरेकानि - (से) कुछ अधिक। सं. - सातिरेकाणि। 'अतिरेकः - अतिशये, भेदे, प्राधान्ये आधिक्ये चा' (शब्द०)। पालि - सातिरेको (सातिरेकः।)
• अनतियनि - अढ़ाई। सं. - अर्धतृतीयानि। [अर्धतृतीयम् - containing two and the third only half, i.e., two-and-a-half (V.S.Apte)] पालि - अड्ढतेय्यो, अड्डतियो (अर्धतृतियः)।
• व - वर्ष। सं. - वर्षाणि। पालि - वस्सानि।
• व - जो। सं. - यत्।
• सुमि - हूँ। सं. - अस्मि। पालि - अस्मि।
• प्रकास - प्रकट रूप से। सं. - प्रकाशम्। [
अभिलेखों के इस पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यन्तरण नीचे दिया गया है:
[पृष्ठ ११२]
११२ / सम्राट अशोक के अभिलेख
• पवतिसु - चट्टानों पर। सँ. - पर्वतेषु। ['पर्वतः पर्ववान्' (सि० १.२.२०)।
'पर्वतो गिरिरेष्वर्थः' (अनेकार्थ० ३.८७५)।] पालि - पब्बतो (पर्वतः)।
• लेखापेत - लिखा गया है। सँ. - लिखा गया है। पालि - लेखेति, लिखापेति।
• वालत - सुयोग (उपस्थित) होने पर। सँ. - वालतः। ['निवहवसतो वालो'
(अमर० ३.२३३५)।] पालि - वालो।
• हद - यहाँ। सँ. - इह। पालि - इध।
• अथि - है। सँ. - अस्ति। पालि - अत्थि।
• सालावचे त - लिखवाया (अर्थात् उत्कीर्ण करवाया) जाना चाहिए।
सँ. - लेखयितव्यः इति।
• एतेना - इस। सँ. - एते
११४ / सम्राट अशोक के अभिलेख
• सुभासिते = सुभाषित। सङ्कन। सं. -सुभाषितम्। पालि-सुभासितं (सुभासितानि)।
• हमियाये = मेरे द्वारा। सं. -मया। पालि-मया।
• दिसेया = देखा जाता है (अर्थात्, उचित समझा जाता है)। सं. -दृश्येत। पालि-दिस्सेत, दिस्सति।
• सधम्मे = सद्धर्म। सं. -सद्धर्मः। पालि-सद्धम्मो।
• अलहाति = योग्य हों। सं. -अर्हन्ति। पालि-अरहंति (अर्हति)।
• वातवे = बखान करने के लिए। सं. -वक्तुम्। पालि-वत्तुं।
• धंमपलियायानि = धर्म-पर्याय। सं. - धर्मपर्यायाः। 'पर्यायोऽवसरे क्रमे। निम्नांगौ द्रव्यधर्मे चा' (अनेकार्थ० ३.१०९३)। पर्यायः-अनुक्रम, प्रकारे, अवसरे, निम्नांगे, द्रव्यधर्मभेदे समानार्थीयके शब्दे चा' (शब्द०)। पालि-धम्मो (धर्मः)। परियायो (पर्यायः)।
• विनयसमुकसे = विनयसमुत्कर्ष। सं. -विनयसमुत्कर्षः। पालि-विनयो (विनयः)। समुक्कंसो (समुत्कर्षः)।
• अलियवसानि = अलियवसानी। सं. -आर्यवासाः। पालि-आरियवसो।
• अनागतभयानि = अनागतभयानि। सं. -अनागतभयानि। पालि-अनागतो (अनागतः)। भयं (भयम्)।
• मुनिगाथा = मुनिगाथा। सं. -मुनिगाथा। पालि-मुनि (मुनिः)। गाथा (गाथा)।
• मोनेयसूते = मोनेयसूत। सं. -मौनेयसूत्रम्। पालि-मोनेय्यं (मौनेयम्) सूतं (सूत्रम्)।
• उपतिसपसिने = उपतिष्यप्रश्न। सं. -उपतिष्यप्रश्नः। पालि-उपतिस्सो (उपतिष्यः = सारिपुत्र को नाम)।
• लाघुलोवादे = राहुल को उपदेश। सं. -राहुलोवादः। 'अववादस्तु निर्देशो निदेशः शासनं च सः।' (अमरो २.१७६२)। 'अववादस्तु निर्देशे निन्दाद्विद्यप्रभयोपि' (अनेकार्थ० ४.२५०९)। 'अववादः- निन्दायाम्, विश्वासे, आज्ञायाम्, अवलम्बने चा' (शब्द०)। पालि-राहुलो। ओवादो (अववादः)।
लघु शिला अभिलेख - शब्द-विवेचन / ११५
• मुसावादे = मुसावाद। सं. -मृषावादम्। 'मृषा मिथ्या च वितथे' (अमरो १.४.२३)। (मृषा-मृषयत इति। मिथ्या।)। मृषावादः -'मिथ्यावाक्ये यथा दर्शितनास्तित्वादिकवाक्यम्' (शब्द०)। पालि-मुसा (मृषा)। वादो (वादः)।
• अधिगिच्य = के बारे में। सं. -अधिकृत्य। पालि-अधिकिच्च।
• भिखुपांये = भिक्षु। सं. -भिक्षुपादाः। पालि-भिक्खु (भिक्षुः)।
• भिखुनिये = भिक्षुणियां। सं. -भिक्षुक्यः (अथवा भिक्षुण्यः)। भिक्षुक-पु. स्त्रियां ङीप् इति (शब्द०)। पालि-भिक्खुनी (भिक्षुणी)।
• अभिसिनं = बार-बार। सं. -अभीक्ष्णम्। (अभीक्ष्णम् अभिक्षणं भवति। डा. बनारसीसेनः प्रद्युतः कालः।-नि० २.२५)। 'अभीक्ष्णं तु भृशं नित्यम्' (अनेकार्थ० ३.७८१)। 'अभीक्ष्णं पुनः पुनः। असकृन्मुहुः।' (अभिधान० ६.१४३.१)। पालि-अभिक्खणं।
• सुणेयु = सुनें। सं. -शृणुयुः। पालि-सुणन्तु।
• उपधालयेयु = धारण करें। सं. -उपधारयेयुः। पालि-उपधारेति। (उपधारयति)।
• उपासिका = उपासिकाएं। सं. -उपासिकाः। पालि-उपासिका (उपासिका)।
• एतेनि = इस। सं. -एतेन। पालि-एतेन।
• अभिप्रेतं = अभिप्राय को। सं. -अभिप्रेतम्।
• जानंतु = जानें। सं. -जानन्तु। पालि-जानेय्य।
लघु शिला : ब्राम्ही अभिलेख
• सुवर्णगिरीते = सुवर्णगिरि से। सं. -सुवर्णगिरितः। (गिरिः पर्वतः समुद्रौर्णो भवति - नि० १.२०)। 'सुवर्णं-सुष्ठु वर्णोऽस्य। स्नानामख्याते धातुभेदे।' (शब्द०)। 'स्वर्णं सुवर्णं कनकं हिरण्यं हेम हाटकम्। तपनीयं शातकुम्भं गाङ्गेयं भर्म कर्वुरम्॥' (अमरो २.९५१)। पालि-सुवण्णो (सुवर्णः)। गिरि (गिरिः)।
• अयपुतस = कुमार के। सं. -आर्यपुत्रस्य। पालि-अय्यपुत्त (Woolner) अथवा अय्यो (आर्यः), पुत्तो (पुत्रः)।
• महामाताणं = महामात्रों के। सं. -महामात्राणाम्। (महामात्राः-महती मात्रा मर्यादा परिमाणं यस्य। प्रधानः।) 'महामात्राः प्रधानानि' (अमरो २.७४२)।
महामात्र-पुं. '........ मात्रा तु महती येषां महामात्रास्तु ते स्मृताः।' प्रधानमात्ये।
Here is the complete, line-by-line transcription of both pages from the text:
[पृष्ठ ११६]
११६ / सम्राट अशोक के अभिलेख
(शब्द०)। पालि - महामत्तो (महामात्रः) = A king's minister or companion, a great noble at court (Childers).
• वचनेन = वचन से (अर्थात्, हवाले से)। 'वचनं तु व्याहारो भाषितं वचः (अभिधान० २.२४१)। पालि - वचनेन (= in the name of) (Childers).
• इतिलिसि = इतिस्म (ऋषिस्म) में। सं. - ऋषौ।
• आरोगियं = स्वास्थ्य (के बारे में)। सं. - आरोग्यम्। (आरोग्य-आरोग्यस्य भावः। रोगरहितं अनामयं । - शब्द०)। पालि - आरोग्यो (आरोग्यम्)।
• ......सके = [उपा] सके। सं. - उपासकः।
• संवछरे = वर्ष। सं.-संवत्सरः। (संवसन्ति ऋतवो यत्र। संवत्सरः। वत्सरः।)। पालि - संवच्छरो, संवच्छरं।
• **
closely at "दीर्घमायुसम्":
'दी', 'र्घ', 'म', 'ा', 'य', 'ु', 'स' or 'ष'?
It looks like 'स', with 'म' halanta or anusvara: "दीर्घमायुसम्" (or "दीर्घमायुषम्").
Wait, in Rigveda: "दीर्घमायुः"? In Rigveda 3.x:
Wait, look at the citation: "(ऋग्वेद० ३.१०८६)" or "(ऋग० ३.१०८६)" or "(ऋ० ३.१०८६)"?
Let's read:
(
ऋ
ग
वे
द
०
३
.
१
०
८
६
)
Wait, Rigveda doesn't have 1086 hymns in Mandala 3. But some editions number verses continuously, or it's (ऋ० ३.५३.७)?
No, look at the characters:
(
ऋ
म
०? No, ( ऋ ग्वे द ०?
Wait, look at the word before ३.१०८६:
( अ म र ० ३ . १ ० ८ ६ ) !
YES! AMAR
[पृष्ठ १२०]
१२० / सम्राट अशोक के अभिलेख
• उपासकानंतिकं = उपासकों के पास (लिए)। सं.-उपासकानाम् अन्तिकं। पालि -उपासको (उपासकः) । अनिकं (अन्तिकम्) ।
• निक्षिपाय = रखो। सं.-निक्षिपत । पालि-निक्खिपति (निक्षिपति) ।
• अनुपोसंथं = प्रत्येक उपवास के दिन। सं.-अनुपवसथम्। पालि-अनु (अनु)। उपोसथ (उपवसथः) ।
• यावु = आवें। सं.-यायुः।
• विवंसयितवे = विश्वास प्राप्त करने के लिए। सं.-विश्वासयितुम्। पालि-विस्संसति (विश्वसिति) ।
• इकिके = प्रत्येक । सं.-एकैकः। 'एकोऽन्यः केवलः श्रेष्ठः संख्या' (अनेकार्थ० २.४८) । पालि-एककं (एकैकः)=प्रत्येक । एकको (एककः)= alone, solitary (Childers)
• आजानितवे = पूरी तरह समझने के लिए। सं.-आज्ञातुम्। पालि-आञ्ञातुं ।
• आवते = जितना। सं-यावकः। यावद् - यत्परिमाणमस्य । यत्परिमाणे यावति । (शब्द०)। पालि-यावतको ।
• आहाले = अधिकार-क्षेत्र । सं.-आहारः।
• विवासयाथ = (संबोधकों को) (उनके आवास से) बाहर निकालवा दो। सं.-विवासयत ।
• विवंजनैन = स्पष्ट लिखावट (के आधार पर)। सं.-व्यञ्जनेन। व्यञ्जनं-विशेषणीयाङ्गौ (शब्द०)। 'व्यञ्जनं लञ्छनं स्पष्टनिष्ठानावयवेष्वपि' (अमर० ३.१२८९) । 'व्यञ्जनं श्मश्रुचिह्नाङ्कः' (अनेकार्थ० ३.१००८) । 'व्यञ्जयति प्रकटान् कुर्वन्त्यनेनेति व्यञ्जनानि' (उव्वट) । पालि-व्यञ्जनं, वञ्जनं (व्यञ्जनम्) ।
• कोठाविषवेषु = किलों (अर्थात्, किलेबंदी किए हुए नगरों) में तथा जिलों में। सं.-कोष्ठविषयेषु। 'कोष्ठोऽन्तं पुरः समं' (अभिधान० ४.९७३) । 'विषय आश्चर्य' (अमर० ३.११४१) । 'विषयः- इन्द्रियांगोचरे
सूसाया = (उत्कृष्ट) सेवा (आज्ञापालन) से। सं.-शुश्रूषायाः। 'शुश्रूषा श्रवणं चैव ग्रहणं धारणं तथा' (अभिधान० २.३१०)। पालि-सुस्सूसा (शुश्रूषा)।"
Wait, let's look at the Prakrit headword:
It is: "• सूसूसया" or "• सुसूसाया"?
Let's look at the first letter:
'स' with 'ू': 'सू'
'सू'
'सा'
'या'
Wait, let's look at the image:
"• सूसूसया" or "• सुसूसाया"?
The first 'स' has an u-matra:
Is it 'सु' (short) or 'सू' (long)?
It has a curve down: 'सु' or 'सू'? It looks like 'सु' or 'सू'.
Wait, the second 'स' has 'ू': 'सू'.
The third 'स' has 'ा': 'सा'.
Then 'या': 'या'.
Wait, look at: "• सुसूसाया" or "• सूसूसाया"?
Let's check the glyph:
The first character is 'स' with a loop below, wait, it has a horizontal-ish loop: 'सू'?
Wait, look at the Pali at the end:
"पालि-सुस्सूसा (शुश्रूषा
पृष्ठ १२४
१२४ / सम्राट अशोक के अभिलेख
- भयेना = (भिकर) भय से। सं.-भयात्। (भयम् = बिभेत्यस्मात् तद् भयम् । त्रासः । भीतिः । आशङ्का ।) 'भयं भीभीतिस्त्रासः आशङ्का साध्वसं भयम्' (अभिधान० २.३०१)। पालि-भयं (भयम्)।
- उसाहेना = (परम) उत्साह से। सं.-उत्साहात्। 'उत्साहो अध्यवसायः स्यात्' (अमरो० १.२.११)। पालि-उस्साहो (उत्साहः)।
- धंमापेखा = धर्म की आवश्यकता। सं.-धर्मापेक्षा। पालि-अपेक्खा, उपेक्खा (अपेक्षा)।
- सुवे सुवे = दिन प्रतिदिन। सं.-श्वः श्वः। पालि-सुवे सुवे।
- वोढिता = बढ़ा है। सं.-वर्द्धिता। 'वर्द्धितं छिन्नपूणयोः' (अनेकार्थ० ३.८८१)। पालि-वड्ढितो (वर्द्धितः)।
- पुलिसा = (राज-)पुरुष। सं.-पुरुषाः। पालि-पुरिसो (पुरुषः)।
- उकसा = उच्च (श्रेणी के)। सं.-उत्कृष्टतः। पालि-उक्कट्ठो (उत्कृष्टः)।
- गेवया = निम्न (श्रेणी के)। (शाब्दिक अर्थ -दीन। कातर।) सं.-गेप्याः, गेह्याः। ($\sqrt{}$गेप्, $\sqrt{}$गेप् = tremble, be miserable) 'गेप् गेपे (धातुपाठ०) (३६६)। अथवा 'गेषु (५०२) -गेषु (५०२)...सेवे' (= to serve)।
- मधिमा = मध्यम (श्रेणी के)। सं.-मध्यमाः। मध्यम - मध्यमे (शब्द०)। पालि-मज्झिमो (मध्यमः)।
- अनुविधियंती = अनुसरण करते हैं। सं.-अनुविदधति। पालि-अनुविधीयति (अनुविधीयते)।
- चपलं = चंचल (व्यक्ति) को। सं.-चपलम्। (चपलः = चोपति मन्दं मन्दं गच्छति । तरलः । चञ्चलः ।) चपल-तरले, चञ्चले, क्षणिके, विकले, दुर्विनीते च। (शब्द०)। पालि-चपलो (चपलः)।
- समादपयितवे = प्रोत्साहित करने के लिए। सं.-समादापयितुम्। पालि-समादपेति (समादापयति)।
- अंतमहामाता = अंतमहामात्रा। सं.-अन्तर्महामात्राः।
- पालना = पालन-पोषण। सं.-पालनम्। पालि-पालनं (पालनम्)।
- विधाने = व्यवस्था करना। सं.-विधानम्। 'विधानं हस्तिकवचे प्रेरणऽश्वेत्थे धने। चेतनोपायविधिषु प्रकारे वैक्रमोऽपि।' (अनेकार्थ० ३.२००७-२००८)। पालि-विधानं (विधानम्)।
पृष्ठ १२५
स्तंभ अभिलेख - शब्द-विश्लेषण / १२५
- सुखियना = सुख पहुँचाना। सं.-सुखीयनम्। पालि-सुखेति (सुखयति)।
- गोती = रक्षा करना। सं.-गुप्तिः। 'गुप्तं रक्षितगूह्ययोः' (द्विरूप० ३.७००)। पालि-गुत्ति।
देहली-तोपरा स्तंभ - द्वितीय अभिलेख
- कियं चु = परंतु क्या (शाब्दिक अर्थ-'कितना')। सं.-कियन् नु!
- अपासिनवे = पाप से दूर रहना। सं.-अपास्रवः। (अप-न पालि रखति पातयन्तं।) (अपास्रवः = आ-$\sqrt{}$स्रु से)। पालि-आसवो (आस्रवः)।
- कयाने = सत्कर्म करना। सं.-कल्याणम्। (कल्याणं कमनीयं भवति - नि० २.३)। 'कल्याणं हेम्नि मङ्गले' (अनेकार्थ० ३.७९३)। पालि-कल्याणो, कल्याणी।
- दया = दया (करना)। सं.-दया। 'यलादपि परक्लेशं हर्तुं या हृदि जायते। इच्छा भूमिसुतेष्टा सा दया परिकीर्त्तिता।' (शब्द०)। पालि-दया।
- दाने = दान (देना)। सं.-दानम्। (दीयते इति। दत्तम्। उत्सर्गः। विश्राणनम्।) 'दानमुत्सर्जिने त्यागः' (अभिधान० ३.३८६)। पालि-दानं।
- सचे = सच (बोलना)। सं.-सत्यम्। (सत्यं कस्मात् । सत्सु तायते। सतं समाभवं भवति-नि० ३.१३)। अथवा, सते हितं यत्। (शब्द०)। 'सत्यं सत्यमसमीचीनममृतं तथ्यं यथातथम्' (अभिधान० २.२६४)। पालि-सच्चं।
- सोचेये = पवित्रता। सं.-शौचम् (शुचेर्भावः)। पालि-सोचेय्यं।
- चखुदाने = चक्षुदान। सं.-चक्षुर्दानम्। (चक्षुः-चष्टे पश्यत्यनेनेति । दर्शनेन्द्रियम्। ज्योतिः।) पालि-चक्खु (चक्षुः)।
- दिने = दिया है। सं.-दत्तम्। पालि-दिनं।
- दुपदबहुपदेसु = दो पैर वालों (दोपायों) और चार पैर वालों (चौपायों) पर। सं.-द्विपदचतुष्पदेषु। द्विपदः =मनुष्ये, देवे, यक्षिणि, राक्षसे च। (शब्द०)। द्विपदं नाम मनुस्सा, पक्खजाता। चतुप्पदं नाम हत्थी अस्सा ओट्ठा गोणा गद्दभा पसुका। (पराजिक० १.२.९३-९३)। चतुष्पदः =चत्वारि पदानि चरणा यस्य। गवादी पशौ। पादसद्बस्य पदभावे चतुष्पादश्च। (शब्द०)। 'चतुष्पदो गवादिषु' (अनेकार्थ० ४.१५२२)। पालि-द्विपदो (द्विपदः)। चतुप्पदो (चतुष्पदः)।
Here is the complete, line-by-line transcription of the text from both pages shown in the image:
[पृष्ठ १२६]
१२६ / सम्राट अशोक के अभिलेख
• पदिसंवालिचेलेसु = पक्षियों और जलचरों पर। सं.-पक्षिप्राणिचेलेषु।
वारिचरः-वारिषु चरति। मत्स्ये जन्तुमात्रे। (शब्द०)। पालि-पक्खी (पक्षी)।
वारि (वारि)।
• विविधे = नाना प्रकार के। सं.-विविधः। (विभिन्ना विधा यस्य।)
'विविधेषु बहुविधो नानापक्षः पृथग्विधः' (अभिधान० ६.१४६६)।
पालि-विविधो।
• अनुगहे = उपकार। कृपा। सं.-अनुग्रहः। 'अनुग्रहोऽभ्युपपत्तिः'
(अभिधान० ६.१५०८)। 'अनुग्रहः अनुकम्प्यं' (शब्द०)। पालि-अनुग्गहो
(अनुग्रहः)।
• आ पानदीनाये = प्राणदान देने तक। सं.-आ प्राणदीक्षायाः।
[L1
... wait, is there an au matra? "सं.-पारलौकिकाय।" or "सं.-पारलिकाय।"?
Look at the text: "सं.-पारलिकाय।" - wait, look above 'ल': there is an 'ि' matra!
Ah, "पारलिकाय"? Wait, is it "पारत्रिकाय"?
Wait, look at the next line:
"[पारित्रिकं-परत्र भवं, हितं वा। परलोकहितकारके कर्मणि पारलोक्यं च।
(शब्द०)]। पालि-परत्थ (पत्थ)।"
Wait, "[पारित्रिकं-परत्र भवं..." or "[पारत्रिकं-"?
It is "[पारित्रिकं-"!
• ल्हुका = रज्जुक (नाम के उच्च अधिकारी)। सं.-रज्जुकाः।
Wait, is it "ल्हुका" or "लजुक"?
Wait! Look at the Prakrit word in the edict:
In the Pillar Edict IV: "लजूका मे..."
Let's look at the letter:
It's 'ल', then 'जू', then 'का' -> "लजूका" or "रजूका"?
Wait, look closely:
The first letter is 'ल', then 'जू' (ज with ū-matra), then 'का' -> "• लजूका = रज्जुक..."
Wait, why did I think 'ल्हुका'? Ah
योग्यम्) । 'अवध्यमवधाहार्ये स्यादनर्थक्यवार्ययोः'`
Line 13:
(अनेकार्थ० ३.२०७६) ।
Line 14:
• संतया = वे हैं, जैसे- 1 सं.-तानि यथा । पालि-सेय्यथा (तथ्यथा) ।
Line 15:
• सुके = शुक । सं.-शुकः । (√शुच् दीप्तौ से) पक्षिविशेषः । कीरः ।
Line 16:
पालि-सुको, सुवो । प्रियदर्शिनः । 'शुको व्याससुतकीरयोः' (अनेकार्थ० २.२३४)।
Line 17:
वडचगुण्डः । विशि० ।
Wait, look at line 17:
Wait, let's look at the line above • सारिका =:
पालि-सुको, सुवो । प्रियदर्शिनः । 'शुको व्याससुतकीरयोः' (अनेकार्थ० २.२३४)।
Wait, does it have वडचगुण्डः । विशि० ।?
Wait! Look closely at the word after (अनेकार्थ० २.२३४)।:
Wait, does it have वडचगुण्डः? No!
Wait, look below `(अनेकार्थ० २.
Here is the complete transcription of both pages:
[पृष्ठ १३२]
१३२ / सम्राट अशोक के अभिलेख
- जलुका = जलूका। सं. -जलूका। 'जलूका चर्मरक्तपा' (अनेकार्थ० ३.६.४४)। पालि -जलुका।
- अंबकपिलिका = अंबकपिलीका। सं. -अम्बापीपिलिका। (अम्बा- ✔ अम्ब से) (पिपीलिका - पिपीलिकामयः। नि० ७.२३)। 'अम्बा मताद् बाला स्यात्' (अमर० १.४९६)। 'पिपीलिका तु हीनाङ्गी' (अभिधान० ४.१२०८)। पालि -अम्मा (अम्बा)। किपिल्लिका (पिपीलिका)।
- बढी = कच्छपी। सं. -डुडिः। डुणिः। (डोलयति। कमठो कच्छपो। 'कन्टो डुलिः' (अमर० १.२५४)। 'कच्छपी डुली' (अभिधान० ४.१३५६)। 'डुली कूर्म्याम्' (अनेकार्थ० २.१५४)।
- अनाठिकमच्छे = अस्थिहीन मत्स्य। सं. -अनास्थिकमत्स्यः। अस्थि - न० अनस्थि। मांसमस्थ्न्यस्थं हाड़ इति। (शब्द०)। (मत्स्यः-माद्यन्ति लोके अनेनेति। जन्यनुविशेपः। झषः। मद्यः।) 'मत्स्यो मीनो विसारस्य शकुलो वैसारिपोऽण्डजः। शलुकः पृथुरोमा च स तुदर्शन इत्यपि। रोहिताद्यास्तु ये जीवन्ते मत्स्याः परिकीर्तिताः।' (भावप्र०)। पालि -अट्ठि । (अस्थि)। मच्छो (मत्स्यः)।
- वेदवेयक = वेद-वेदयक। सं. -वेदव्यकः।
- गंगापुपुटक = गंगापुप्पुटक। सं. -गङ्गापुप्पुटकः।
- संकुजमच्छ = संकुज मत्स्य। सं. -शंकुमत्स्यः (मत्स्यः - माद्यन्तेऽनेनान्थे भक्षपाच - नि० ६.२७)। [शंकुलः - मत्स्यभेदे (श०क०) -शब्द०] ।।
- कफटसय्यक = कछुआ तथा साही मछली। सं. -कमठशल्यकौ (कमठः- के जले मयति वसतीति। कच्छपः। कूर्मः। 'कूर्मे कमठकच्छपौ' (अमर० १.२५६)। पालि -सल्लको (शल्यकः)।
- पंनससे = एक प्रकार की गिलहरी। सं. -पर्णशशः।
- सिमले = बादरसिंया। सं. -सुमरः। सुगमेरु।
- संडके = सांड। सं. -षण्डकः। 'षण्डो गोपतिः' (अमर० २.९९४)। 'षण्डः पण्डस्ताख्यावान् सण्डेोपि घितियो मतः।' (विश्वप० ४)।
- ओकपिण्डे = ओकपिण्ड। सं. -ओकपिण्डः। (ओकः पक्षी)। ओके पिण्डी येषां ते (जानवर जो घरों में अपना भोजन पाते हैं) (जैसे, बिल्ली, चूहा, गौह और नेवल) (बिल्वाल-मूषिक-गोधा-मुगुसाः वृद्धोय के अनुसार)।
- पलासते = गैंडा। सं. -पलगण्डः। पालि -पलासदो।
[पृष्ठ १३३]
स्तम्भ अभिलेख - शब्द-विवेचन / १३३
- सेतकपोते = श्वेत कपोत। सं. -श्वेतकपोतः। (श्वेतः -श्वेयते इति। कपोतः।) पालि -सेतो (श्वेतः)। कपोतो (कपोतः)। (कपोतः-को वायुः तद्विद्याधराः। पारावतः।)
- गामकपोते = ग्राम कपोत। सं. -ग्रामकपोतः। (ग्रामः- विश्रादिवर्णेप्राया जनवसतिः विश्रामसहिता बहुजनवसतिः। संवसथः। हट्ट्यादिसंवसतीः।) 'ग्रामः संवसथे घोपस्तद्विशेहिता बहुजनवसतिः (२.८०८)। पालि -गामो (ग्रामः)। कपोतो (कपोतः)।
- बडुपदे = चौपाये। सं. -चतुष्पदः। 'चतुष्पदो गवादिषु' (अनेकार्थ० ३.१५४.२)। पालि -चतुप्पदो।
- परिवोगं नो एति = उपयोग में नहीं आते। सं. -परिभोगं नैति। पालि -परिभोगं (परिभोगम्)। नो (न)। एति (एति)।
- खादियती = खाये जाते। सं. -खाद्यते। पालि -खज्जति।
- एडका = भेड़। सं. -एडका। (एडः-इल्लतीति। यद्वा आ सर्वतः इंड्यते। अहिरैः। एडकः। मेषः।) 'मेढ्रोरोरभ्रोर्णिमुखेवृष्णय एडके' (अमर० २.९.३३)। पालि -एलको (एडकः)।
- सूकली = सूकरी। सं. -सूकरी। (सू-इत्यव्यक्तं शब्दं करोति। वराहे। वाराहायमिति स्त्री।) 'शूकः सूकरोऽपि च' (विश्वप० ३)। पालि -सूकरो (सूकरः)।
- गभिनी = गाभिन। सं. -गर्भिणी। (गर्भोऽस्त्यस्याम् इति। गर्भवती (सगर्भा)। [गर्भः-गर्भः गुणेः तृणार्थत्वं, गिरत्यनर्थानिति वा-नि० १०.२३)। पालि -गब्भिनी।
- पायमीना = दूध पिलाने वाली। सं. -पाययन्ती (पयस्विनी इत्यर्थः)।
- अवधिय - प - तके = अवध्य हैं। (इनके) बच्चे। सं. -अवध्याः। 'अवध्यमवध्यं स्यान्नधर्वधक्रवदस्यपि'। (अनेकार्थ० ३.२७६)। पोतकाः। पालि -पोतको (पोतकः)।
- आसांमासिके = छः महीने तक के। सं. -आषण्मासिकाः। षाण्मासिक-न० षष्ठे मासे भवः। (शब्द०)। (मासा मानात् - नि० ४.२७)
- वधियाकुकुटे = मुर्गों को बधिया करना। सं. -वधिक्रुकुटः। (कुक्कुटः-कुक्वा आत्तानन कुटतीति। पक्षिविशेषः। कुक्कवाकुः। ताम्रचूडः। चरणायुधः।) 'कुक्कुटश्चरणायुधः' (अमर० २.५१३)। 'कुलाले कुक्कुटं प्राहुः' (हार० ८६)। उव्ट का निर्वचन -'कुत्सिते शब्दमसमुत्सृगानां तनोतीति
िथिषे तिथौ'?
Let's check Anekarthasangraha (अनेकार्थ० ३.६२५):
In Hemachandra's Anekarthasangraha 3.625:
"प्रतिपद् विशिखा-तिथ्योः"?
No, in Anekarthasangraha, words with 3 syllables ending in d:
"प्रतिपत् तिथिविद्..."
Let's read what's printed:
'प्रतिपत्तित्थिये तिथौ' or 'प्रतिपत्तित्थिषे'?
Looks like: 'प्रतिपत्तित्थिये तिथौ' (अनेकार्थ० ३.६२५)।
Line 26: "३.६२५)। पालि-पटिपदा (प्रतिपद्, प्रतिपदा)।"
Line 27: "• ध्रुवाये = निश्चित रूप से । सं.-ध्रुवम् । (ध्रुवति स्थिरीभवतीति ।"
Line 28: "निर्दिष्टनम्।) । पालि-धुवं (ध्रुवम्)।"
Wait, "निर्दिष्टनम्"? Or "निश्चेष्टनम्"?
न, ि, र, ्, द, ि, ष, ्, ट, न, म, ् -> "निर्दिष्टनम्" or "निर्दिष्टम्"? Looks like "निर्दिष्टनम्" or "निश्चेष्टनम्".
Line 29: "• अनुपोसथं = उपवास के दिना
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१३६ / सम्राट अशोक के अभिलेख
• अजके = बकरे। सं. -अजकः। पालि -अजो (अजः)।
• अस्सा = घोड़े। सं. -अश्वस्य। पालि -अस्सो (अश्वः)।
• लखने = दागना। सं. -लक्षणम्। (लक्ष्यते ज्ञायतऽनेनेति। विग्रहः।) लक्षणं
नामाभियोग्योः (अनेकार्थ० ३.८२०)। पालि -लक्खणं।
• अंतिक्याये = अंतराल में। सं. -अन्तरे। पालि -अन्तरे।
• पंचवीसंति = पच्चीस। सं. -पञ्चविंशतिः। 'विंशतिः द्वे दशती'।
• बंधनमोखानि = बंधन से रिहाई। सं. -बन्धनान्मोक्षाः। (बन्धनम्-
बध्यतेऽनेनेति। कारागारम्।) (मोक्षः -मोक्ष्यते दुःखमनेन। मुक्तिः।) 'मोक्षो
निःश्रेयसे वृत्तविवाहे मोचने मृतौ' (अनेकार्थ० २.५७३)। पालि -बन्धनं
(बन्धनम्) । मोक्खो (मोक्षः)।
देहली-तोपरा स्तंभ - षष्ठ अभिलेख
• दुवाडसवसअभिसितेन = अभिषेक के बारह वर्ष हो चुकने पर।
सं. -द्वादशवर्षामिषिक्तेन। द्वादशन्-पुं. द्वौ च दश च द्वयधिका वा दशा
(द्वन्द्वः)। पालि -बारस (द्वादश)। वस्सो (वर्षः)। अभिसितो (अभिक्षितः)।
• लोकसा = लोगों का। सं. -लोकस्य। (लोकः -लोक्यतेऽसौ। भुवने जनपु
च। -शब्द०) पालि -लोकस्स।
• ते = जितने। सं. -येन।
• अपहटा = प्रह्लादा न करने वाला। सं. - अप्रहर्ता। पालि -पहारे (प्रहारः)।
• धंमवढि = धर्म में प्रवृत्त। सं. -धर्मवृद्धिः। (वृद्धिः समृद्धौ अभ्युदये,
सम्पत्तौ, सङ्के चा-शब्द०)।
• पापोवा = प्राप्त करे। सं. -प्राप्नुयात्। पालि -पप्पोति (प्राप्नोति)।
• पवेखामि = ध्यान देता हूँ। सं. -प्रत्यवेक्षे। पालि -पच्चवेक्खतीति
(प्रत्यवेक्षते)।
• पतिआसंनेसु = जो निकट हैं। सं. -प्रत्यासन्नेषु। (प्रत्यासन-
आसन्निकटस्थं -शब्द०)।
• अपकठेषु = जो दूर हैं। सं. -अपकृष्टेषु पालि -अपकट्ठिति (अपकर्षीति)।
• किम् = ऐसा क्या? सं. -किम्। 'किं प्रश्ने कुत्सितेऽपि च'
(अनेकार्थ०-१.७७५)। पालि -किं।
• आवहामि = प्राप्त कराता हूँ। सं. -आवहामि। पालि -आवहती
(आवहति)।
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स्तंभ अभिलेख - शब्द-
[वि]दहामि = विधान करता हूँ। सं. -विदधामि। पालि -विदहति
(विदधातीति)।
• हेमेवा = ऐसे ही। सं. -एवमेव। 'एवोपम्ये परिभवे ईषदर्थेऽवधारणे'
(अनेकार्थ० १.८१६)। पालि -एवमेव।
• सवनिकायेसु = सभी वर्गों का। सं. -सर्वनिकायेषु। 'सर्वं समस्तममूनं
कृत्स्नं सकलं समग्रम्' (अभिधान० ६.१४३३)। निकायः -समानधर्माणिगसह।
निकायः सङ्घसङ्घयोः' (अनेकार्थ० ३.१०८९)। 'स्थानिकायः पुञ्जराशी'
(अमर० २.५३८)। पालि -सब्बो (सर्वः)। निकायो (निकायः)।
• आतना = स्वयं। सं. -आत्मना। पालि -अत्तना।
• पचूपगमने = (लोगों तक) पहुँचना। सं. -प्रत्युपगमनम्।
• मोख्यमते = मुख्य बात। सं. -मुख्यतमम्। मुख्य -त्रि. मुखे आद्ये भवः
वरः। प्रथमकल्पे, श्रेष्ठे च। (शब्द०)। 'मतं तु संमतेऽभिहिते' (अनेकार्थ०
२.१४८)। पालि -मोक्खो (मौख्यः)।
देहली-तोपरा स्तंभ - सप्तम अभिलेख
• अतिकंतं अंतरं = अतीत काल में। सं. - अतिक्रान्तम् अन्तरम्।
[अति-पूजयाम्, उत्कर्षे, अतिक्रमणे, अतिशये च।' (शब्द०)] ['अन्तरं
स्यादवकाशोशे। मध्ये विहायर्ते त्वादयों विशेषेऽवसरेऽवधौ।' (अनेकार्थ०
३.१११४-१११५)]। पालि -अतिक्कन्तो (अतिक्रान्तः)। अन्तरं (अन्तरम्)।
• हुसु = हुए। सं. -अभूवन्।
• इच्छिसु = चाहते थे। सं. -ऐषिषुः।
• धंमवडिया वढेया = धर्म की वृद्धि के साथ बढ़ें। सं. -धर्मवृद्ध्या वर्धेत।
[वृद्धिः समृद्धौ अभ्युदये, सम्पत्तौ, समूहे चा' (शब्द०)] पालि - धम्मो
(धर्मः)। बढ़ि, वृद्धि (वृद्धिः)। वड्ढि (बढ़ती)। [इसी प्रकार के पालि में
कतिपय अन्य प्रयोग -सुखेन सुखितो होति। पमज्जन पमोज्जितं। अधिहितं
अधिष्ठानं। लाभ लभामि सब्वत्थ। उपसेयं उपवसिस्स। इत्यादि।]
• अनुरुपाया = अनुरूप। सं. - अनुरूपया। पालि - अनुरूषो (अनुरूपः)।
• एतं = इस विषय में। सं. - अत्र। पालि - एत्थ।
• हुया = हुआ (अर्थात्, लगा)। सं. -अभूत्।
• किन्तू = कैसे। सं. -केनस्वित्। पालि -केन'सु।