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सर्वकोश
सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary

देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा

DevanagariHindipublished80 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 80 में से

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पृष्ठ 59

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[पृष्ठ १०२]

१०२ / सम्राट अशोक के अभिलेख
धौली शिला : प्रथम पृथक् अभिलेख
• वचनेन = आज्ञा से। हवाले से। सं.-वचनेन। 'व्याहार उक्तिर्लपितं
भाषितं वचनं वचः।' (अमर० १.२५७)। पालि - वचनेन (वचनम्)।
• तोसलियं = तोसली में। सं.-तोसल्याम्।
• नगरव्योवहालका = नगर व्यवहाराध्यक्ष। सं.-नगरव्यवहारकाः। (नगरम्
पञ्च हस्व प्रासादादयः सन्ति यत्र। बहुलो जनसम्पन्नश्च। पुः। पुरम्।) पुरका वा
पौरव्यवहारिक (कीथेल)। पालि-नगरे (नगरम्) वोहारिक
(व्यावहारिक) = A royal officer skilled in the law, a magistrate
(Childers).
• अं किछि = जो कुछ। सं.-यत्किञ्चित्। पालि-यं किञ्चि।
• दखामि = (उचित) समझता हूँ। सं.-पश्यामि। पालि-पस्सति (पश्यति)।
• हकं = मैं। सं.-अहम्। पालि-अहं।
• कंम = कर्म द्वारा। सं.-कर्मणा। (कर्म कश्यायः क्रियते इति सतः-सि०
३.१)। पालि-कम्मन, कम्मना।
• दुवालते = (उचित) उपायों से। सं.-द्वारतः। 'उपाये निर्गमे द्वारा'
(त्रिकाण्ड० ३.३०४)। पालि-द्वारं। दुवारं (द्वारम्)।
• आलभेहं = मैं आरंभ करूँ। सं.-आरभे अहम्। पालि-आरभति
(आरभते)।
• तुफेसु = आप में। सं.-युष्मासु। पालि-तुम्हेसु।
• आयत = स्थापित हैं। सं.-आयताः। आयमय उपशमय स्थापयेत्यर्थः
(उपसर्गार्थ०-खंड ३-पृ. ४९०)। पालि-आयतो (आयतः)।
• पनेयं = प्रणय। सं.-प्रणयम्। (प्रणयः-प्रणयनम्। प्रश्रयः। प्रेम)। 'प्रणयः
प्रेम्ण्युपचये।' (अनेकार्थ० ३.१०५२)। पालि-प्पणेयो (प्रणयः)।
• सु = (अत्यधिक)। सं.-स्वित्। 'स्वित् प्रश्ने च वितर्के च तथैव पादपूरणे'
(मेदिनी०)। पालि-सु।
• पजा = संतान। सं.-प्रजा। (प्रजाता इति। सन्ततिः।) 'प्रजा लोके सन्ततौ
च'। (अनेकार्थ० २.८७)। पालि-पजा।
• अथा = जैसा।