सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary
देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा
प्रारंभिक ऐतिहासिक भूमिका एवं लिपि-परिचय
सम्राट
अशोक
के
अभिलेख
सम्राट अशोक के अभिलेख
विषयानुक्रमणिका
सम्राट अशोक : संक्षिप्त परिचय ....................................................[i]
संकेतचिन्ह ............................................................................[ix]
खंड १ (शिला अभिलेख)
मूल अभिलेख + हिंदी रूपांतर
गिरनार शिला प्रथम अभिलेख .................................................... २
गिरनार शिला द्वितीय अभिलेख ................................................... २
गिरनार शिला तृतीय अभिलेख ................................................... ४
गिरनार शिला चतुर्थ अभिलेख ................................................... ४
कालसी शिला पंचम अभिलेख .................................................... ६
गिरनार शिला षष्ठ अभिलेख .................................................... ८
गिरनार शिला सप्तम अभिलेख ................................................. १०
गिरनार शिला अष्टम अभिलेख ................................................. १०
गिरनार शिला नवम अभिलेख ................................................. १२
गिरनार शिला दशम अभिलेख ................................................. १४
गिरनार शिला एकादश अभिलेख .............................................. १४
गिरनार शिला द्वादश अभिलेख ................................................. १६
शाहबाजगढ़ी शिला त्रयोदश अभिलेख ...................................... १८
गिरनार शिला चतुर्दश अभिलेख ............................................. २२
धौली शिला प्रथम पृथक अभिलेख .......................................... २२
जौगड शिला द्वितीय पृथक अभिलेख ......................................... २६
खंड २ (लघु शिला अभिलेख)
मूल अभिलेख + हिंदी रूपांतर
लघु शिला: रूपनाथ ............................................................ ३४
लघु शिला: कोलकाता-वैराट ................................................ ३६
लघु शिला: ब्रह्मगिरि ......................................................... ३६
खंड ३ (लघु स्तंभ अभिलेख)
मूल अभिलेख + हिंदी रूपांतर
लघु स्तंभः सारनाथ ........................................................... ४२
लघु स्तंभः रुम्मिनदेई ........................................................... ४४
लघु स्तंभः निगली सागर ........................................................... ४४
खंड ४ (स्तंभ अभिलेख)
मूल अभिलेख + हिंदी रूपांतर
स्तंभः देहली-टोपरा प्रथम अभिलेख ................................................. ४८
स्तंभः देहली-टोपरा द्वितीय अभिलेख ................................................ ४८
स्तंभः देहली-टोपरा तृतीय अभिलेख ................................................ ५०
स्तंभः देहली-टोपरा चतुर्थ अभिलेख ................................................. ५०
स्तंभः देहली-टोपरा पंचम अभिलेख ................................................. ५२
स्तंभः देहली-टोपरा षष्ठ अभिलेख ................................................... ५४
स्तंभः देहली-टोपरा सप्तम अभिलेख ................................................ ५६
खंड ५ (गुहा बराबर)
मूल अभिलेख + हिंदी रूपांतर
प्रथम अभिलेख ................................................................... ६४
द्वितीय अभिलेख .................................................................. ६४
तृतीय अभिलेख .
सम्राट अशोक : संक्षिप्त परिचय
भारतवर्ष के लिए यह अत्यंत गौरव की बात है कि उसकी धरती पर जन्मे
सम्राट अशोक का नाम केवल भारत ही नहीं, बल्कि विश्वभर में, बहुत ही
आदर के साथ लिया जाता है। ब्रिटेन के सुप्रसिद्ध लेखक एच. जी. वेल्स ने
अशोक की गणना विश्व इतिहास के छः महानतम व्यक्तियों में की है। यूनेस्को
कलिंग प्राईज १९८५ के लारिएट सर एग्गरमोंट ने इसके बारे में अपने उद्गार
व्यक्त करते हुए कहाः 'अशोक को आज विश्व का सम्राट होना चाहिए था।'
इसी विभूति का संक्षिप्त परिचय नीचे की चंद पंक्तियों में दिया जा रहा है।
अशोक के जीवन के बारे में मुख्य-मुख्य जानकारी निम्न स्रोतों से मिलती है -
१. दिव्यावदान (असोकावदान) २. दीपवंस ३. महावंस ४. पुराण ५.
सम्राट अशोक के शिलाओं तथा स्तंभों पर उत्कीर्ण अभिलेख
सम्राट के प्रारंभिक जीवन के बारे में अनेक दंतकथाएं भी प्रचलित हैं पर
इनमें से कितनी ही निःसार प्रतीत होती हैं। इनमें से कुछ तो भारतीय मूल की
हैं और शेष अधिकतर श्रीलंका से प्रसरित हुई हैं। एक कथा के अनुसार
अशोक पहले बड़े चंड स्वभाव का था, पर बाद में भगवान बुद्ध की शिक्षा को
अपनाने से बड़ा धार्मिक व्यक्ति बन गया। इस प्रकार वह 'चंडाशोक' से
'धम्माशोक' बन गया।
सम्राट के जीवन के घटनाक्रम के बारे में विद्वानों में मतैक्य नहीं है। फिर भी
प्रायःकर वे सभी इसका प्रामाणिक स्रोत उन अभिलेखों को तो मानते ही हैं जिन्हें
अशोक ने अपने शासनकाल में समय समय पर अपने विशाल साम्राज्य में
महत्त्वपूर्ण स्थानों पर शिलाओं तथा स्तंभों पर उत्कीर्ण करवाया था। स्वर्गीय श्री
रवींद्रनाथ टैगोर का भी चिंतन है कि सम्राट अशोक ने चट्टानों पर लेख इसीलिए
खुदवाये कि वह जो आवाज इनमें भरे वही आवाज सदियों तक लोगों के
श्रवणगोचर होती रहे। इन अभिलेखों को पढ़ते समय बहुत बार सचमुच ऐसे
लगने लगता है मानों अशोक स्वयं अपनी धर्मलिपि पढ़ कर हमें सुना रहा हो।
अशोक मौर्य वंश का तीसरा बड़ा सम्राट था। चंद्रगुप्त इसके पितामह और
बिंदुसार इसके पिता थे। शासन की बागडोर संभालने से पहले अपने पिता के
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[Left Page]
[ii] सम्राट अशोक के अभिलेख
जीवनकाल में यह अवन्ति नाम के जनपद का प्रशासक रह चुका था जिसकी
राजधानी उज्जयिनी (उज्जैन) थी। उस समय वह अठारह वर्ष का ही था। इस
प्रकार बाल्यकाल से ही इसे प्रशासन का अच्छा-खासा अनुभव हो गया था जो
बाद में इसके लिए बड़ा उपयोगी सिद्ध हुआ।
अशोक का जन्म ईसापूर्व ३०४ में हुआ था। मास्की में पाये गये अभिलेख
से इसका नाम 'अशोक' होना विदित होता है, अन्यथा अन्य अभिलेखों में इसे
'देवानांप्रिय' अथवा 'प्रियदर्शी राजा' कहा गया है। ये दोनों अशोक के नाम न
होकर उसकी मानपदवियां थीं, जैसे आजकल 'His Majesty'।
अशोक की पहली पत्नी का नाम देवी था जिससे उसे पुत्र महेंद्र और पुत्री
संघमित्रा संतान के रूप में प्राप्त हुए। दूसरी पत्नी कारुवाकी से इसे तीवर नाम
का पुत्र प्राप्त हुआ। असंधिमित्रा इसकी अग्रमहिषी मानी जाती है। दिव्यावदान
के अनुसार धर्मविवर्धन (कुणाल) नाम का पुत्र पद्मावती की को
तीनों की विद्यमानता • हाथी, बैल और घोड़े के बीचोंबीच एक 'धर्मचक्र' का अंकन [यह 'धर्मचक्र' भगवान बुद्ध द्वारा प्रदान उन चौबीस प्रत्ययों का सूचक प्रतीत होता है जिनसे यह सृष्टि का व्यापार चलता है।]`
Next section:
सम्राट अशोक की प्रसिद्धि जिन कारणों से है, वे हैं:
• कुशलतम प्रशासन
• नगरों का निर्माण
• बहुत बड़ी संख्या में विहारों, स्तंभों एवं स्तूपों का निर्माण
• प्रस्तर शिलाओं और स्तंभों पर प्रजाजन एवं अधिकारियों के निमित्त अपने आदेशों, अनुदेशों, अपेक्षाओं का उत्कीर्णन
• पत्थरों पर कलाकारी
• समाज सेवा के कार्य
• लोगों में 'विपश्यना ध्यान' की प्रवृत्ति जगाना
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[iv] सम्राट अशोक के अभिलेख
आज के एशियाई देशों में बुद्ध की शिक्षा में विश्वास रखने वाले लोग बहुत
बड़ी संख्या में मिलते हैं।
किस देश में किस स्थविर को भेजा गया, इसकी तालिका नीचे दी गयी है -
स्थविर देश
१. मज्झन्तिक कश्मीर एवं गंधार
२. महारक्षित यवन (
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठों का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण नीचे दिया गया है:
[पृष्ठ vi]
[vi] सम्राट अशोक के अभिलेख
यह ज्ञातव्य है कि अशोक ने अल्पाय काल में ही अपने साम्राज्य में यत्र
तत्र ८४,००० स्मारक खड़े करवा दिये थे। यह मान्यता है कि भगवान बुद्ध
एवं उनके प्रमुख शिष्यों के उपदेशों की संख्या इतनी ही होने के कारण उसके
द्वारा ८४,००० स्मारकों का निर्माण-कार्य हाथ में लिया गया था।
सम्राट अशोक द्वारा शिलाओं, स्तंभों, गुफाओं पर उत्कीर्ण अभिलेखों की
संख्या ४२ तक पहुँच चुकी है। इनमें से ३६ भारत में, २ नेपाल में, २
पाकिस्तान में और २ अफगानिस्तान में हैं। अफगानिस्तान में पाये गये
अभिलेख 'खरोष्ठी' लिपि में हैं। इन सभी अभिलेखों को ऐसे स्थानों पर
उत्कीर्ण किया गया था जहां पर अधिक-से-अधिक लोगों का ध्यान इनकी ओर
आकृष्ट हो सके। विद्वानों ने अभिलेखों का वर्गीकरण निम्न प्रकार से किया है:
• शिला अभिलेख (गिरनार, कालसी, मानसेहरा, धौली, जौगड़, इत्यादि)
संकेतचिन्ह
अनेकार्थसंग्रह अनेकार्थ०
अभिधानचिन्तामणि अभिधान०
अभिधानचिन्तामणिपरिशिष्ट अभिधान०परिशिष्ट
अभिधानचिन्तामणिशिलोञ्छः अभिधान०शिला
अमरकोष अमर०
अव्यय अव्य०
उपसर्गार्थचन्द्रिका उपसर्गार्थ०
एकादशीतत्त्वम् एकादशी०
कविकल्पलता कवि०
चरियापिटक चरिया०
चाणक्यशतक चाणक्य०
चुल्लनिद्देसपालि चुल्ल०
त्रिकाण्डशेष त्रिकाण्ड०
द्विरूपकोष द्विरूप०
धातुपाठ (पाणिनि) धातुपाठ०
नपुंसकलिङ्ग न०
निघण्टुशेष (हेमचन्द्रविरचित) निघण्टु०
निरुक्त नि०
पञ्चतन्त्र पञ्च०
पाराजिकपालि पाराजिक०
पुँल्लिङ्ग पुँ.
बहुवचन ब. व.
ब्रह्मपुराण ब्रह्मपु०
ब्रह्मवैवर्त ब्रह्म०
भावप्रकाश भाव०
मनुस्मृति मनु०
महाभारत महाभा०
[xi] संकेतचिह्न
धम्मपदमाधव धम्मती०
धर्मशास्त्रविषयक धर्मशा०वि०
मुद्राराक्षस मुद्रा०
मेदिनीकोष मेदिनी०
रामायण रामा०
वाशिष्ठस्मृतिवचन वशिष्ठ०
वेणीसंहार वेणी०
वैद्यकरत्नमाला वैद्यक०
शतपथब्राह्मण शतपथ०
शब्दरत्नप्रदीप शब्दरत्न०
शब्दस्तोममहानिधि शब्द०
शिष्टोपदेशः शिष्ट०
संस्कृत सं०
संस्कृतगद्यग्रंथकुसुम संस्कृत०
सङ्क्रन्तसङ्ग्रह सङ्क्रन्त०
समन्तपासादिका समन्त०
साहित्यदर्पण साहित्य०
सुनोवमङ् सुनो०
स्त्रीलिङ्ग स्त्री०
हलायुधकोष हलायुध०
हारावली हारा०
हितोपदेश हितोप०
Late Lat
खंड (१)
शिलाओं पर उत्कीर्ण अभिलेख
Here is the complete and precise transcription of the provided image containing the Prakrit text and Hindi translation of Ashoka's Major Rock Edicts (Girnar Shila: First and Second Edicts):
२ / सम्राट अशोक के अभिलेख $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ गिरनार शिला : प्रथम अभिलेख / ३
मूल अभिलेख $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ हिंदी रूपांतर
गिरनार शिला : प्रथम अभिलेख $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ गिरनार शिला : प्रथम अभिलेख
१. इयं धंमलिपी देवानंपियेन प्रियदसिना राञा ले खापिता $\qquad\qquad$ १. यह धर्मलिपि देवानंप्रिय प्रियदर्शी राजा द्वारा लिखवायी गयी है।
२. इध न किंचि जीवं आरभित्पा प्रजूहितव्यं $\qquad\qquad\qquad\qquad$ २. यहां किसी जीव को मार कर होम नहीं किया जाना चाहिए।
३. न च समाजो कतव्यो $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ ३. और न ही इन्द्रियलोलुपता को बढ़ावा देने वाला उत्सव किया जाना
४. बहुकं हि दोसं समाजम्हि पसति देवानंपियो प्रियदसि राजा $\qquad\quad$ चाहिए।
५. अस्ति पि तु एकाचा समाजा साधुमता देवानंपियस प्रियदसिनो राञो $\qquad$ ४. क्योंकि ऐसे उत्सव में देवानंप्रिय प्रियदर्शी राजा बहुत बुराई देखते हैं।
६. पुरा महानसम्हि देवानंपियस प्रियदसिनो राञो अनुदिवसं बहूनि $\qquad$ ५. फिर भी कोई-कोई उत्सव तो हैं ही, जो देवानंप्रिय प्रियदर्शी राजा के
प्राणसतसहस्रानि आरभिसु सूपाथाय $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ मत में अनिंद्य हैं।
७. से अज यदा अयं धंमलिपी लिखिता ती एव प्राणा आरभरे सूपाथाय द्वो $\quad$ ६. पहले देवानंप्रिय प्रियदर्शी राजा के रंधनागार में प्रतिदिन बहुत से,
मोरा एको मगो सो पि मगो न ध्रुवो $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\quad$ सैंकड़ों-हजारों, प्राणी सूप के प्रयोजन से मारे जाते थे।
८. एते पि त्री प्राणा पछा न आरभिसरे $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\quad$ ७. परंतु आज, जबकि यह धर्मलिपि लिखी गयी है, सूप के प्रयोजन से
$\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ तीन ही प्राणी मारे जाते हैं - दो मोर और एक पशु - और वह पशु भी
$\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ नित्यप्रति नहीं।
$\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ ८. ये तीन प्राणी भी बाद में नहीं मारे जाएंगे।
गिरनार शिला : द्वितीय अभिलेख $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ गिरनार शिला : द्वितीय अभिलेख
१. सर्वत विजितम्हि देवानंपियस पियदसिनो राञो एवमपि प्रचंतेसु यथा $\quad$ १. देवानंप्रिय प्रियदर्शी राजा के राज्य में सर्वत्र और इसी प्रकार सीमा से
चोडा पाडा सतियपुतो केतलपुतो आ तंबपंणी अंतियको योनराजा ये वा पि $\quad$ सटे हुए पड़ोसी राज्यों में - जैसे चोड, पांड्य, सत्यपुत्र, केरलपुत्र, ताम्रपर्णी
तस अंतियकस सामीपं राजानो सर्वत्र देवानंप्रियस प्रियदसिनो राञो द्वे चिकीछ $\quad$ भी, यवनराजा अंतियोक और जो भी उस अंतियोक के समीपवर्ती राजा हैं -
कता मनुसचिकीछा च पसुचिकीछा च $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ सब जगह देवानंप्रिय प्रियदर्शी राजा की (ओर से) मनुष्यों के लिए चिकित्सा
२. ओसुढानि च यानि मनुसोपगानि च पसोपगानि च यत यत नास्ति $\quad$ और पशुओं के लिए चिकित्सा - दो (प्रकार की) चिकित्सा (व्यवस्थाएं) की हुई
सर्वत्रा हारापितानि च रोपापितानि च $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\quad$ हैं।
३. मूलानि च फलानि च यत यत्र नास्ति सर्वत हारापितानि च रोपापितानि च $\quad$ २. और मनुष्यों तथा पशुओं के लिए उपयोगी जो औषधियां जहां जहां
४. पंथेसू कूपा च खानापिता व्रछा च रोपापिता परिभोगाय पसुमनुसानं $\quad$ नहीं हैं उन सब स्थानों पर मंगवायी गयी हैं और लगवा दी गयी हैं।
$\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ ३. और कंदमूल तथा फल जहां-जहां नहीं हैं उन सब स्थानों पर मंगवाये
$\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ गये हैं और लगवा दिये गये हैं।
$\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ ४. और पशुओं तथा मनुष्यों के प्रचुर उपयोग के लिए मार्गों पर कुएं
$\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad$ खुदवाये गये हैं और वृक्ष लगवाये गये हैं।
[पृष्ठ ४]
४ / सम्राट अशोक के अभिलेख
गिरनार शिला : तृतीय अभिलेख
मूल पाठ (प्राकृत)
गिरनार शिला : तृतीय अभिलेख
१. देवानंपियो पियदसि राजा एवं आह
२. द्वादसवसाभिसितेन मया इदं आज्ञापितं
३. सर्वत विजिते मम युता च राजुके च प्रादेशिके च पंचसु पंचसु वासेसु
अनुसंयान नियातु एतायेव अथाय इमथ धंमानुसस्तिय यथा अञाय पि कम्माय
४. साधु मातरि च पितरि च सुसूसा मित्रसंस्तुतज्ञातीनं बाम्हण-समणानं
साधु दानं प्राणानां साधु अनांरभो अपव्ययता अपभांडता साधु
५. परिसा पि युते आज्ञापयिसति गणनायं हेतुतो च व्यंजनतो च
गिरनार शिला : चतुर्थ अभिलेख
मूल पाठ (प्राकृत)
गिरनार शिला : चतुर्थ अभिलेख
१. अतिक्रातं अंतरं बहुनि वर्षशतानि वढितो एव प्राणालंभो विहिंसा च
भूतानं ज्ञातीसु असंमतिपती ब्राम्हणसमणानं असंप्रतिपत्ती
२. त अज्ज देवानंपियस पियदसिनो राञो धंमचरणेन भेरीघोसो अहो
धंमघोसो विमानदरंसणा च हथिदसणा च अगिखंधानि च अञानि च दिव्यानि
रूपाणि दर्सयित्वा जनं
३. यारिसे बहुहि वर्षसतेहि न भूतपुवे तारिसे अज्ज वढिते देवानंप्रियस
पियदसिनो राञो धंमानुसस्तिया अनारंभो प्राणांन अविहिंसा भूतानं ज्ञातीनं
संपटिपत्ती ब्राम्हणसमणानं संपटिपत्ती मातरि पितरि सुसूसा थेरसुसूसा
४. एस अञे च बहुविधे धंमचरणे वढिते
५. वढयिसति चेव देवानंपियो पियदसि राजा धंमचरणं इदं
६. पुता च पोता च प्रपोता च देवानंपियस पियदसिनो राञो प्रवर्धयिसंति
इदं धंमचरणं आव संवटकपा धंमंम्हि सीलम्हि चिनिट्ठाय धंमं अनुसासिसंति
[पृष्ठ ५]
गिरनार शिला : तृतीय अभिलेख / ५
गिरनार शिला : तृतीय अभिलेख
हिन्दी अनुवाद
गिरनार शिला : तृतीय अभिलेख
१. देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा ऐसा कहते हैं।
२. अभिषेक के बारह वर्ष हो चुकने पर मेरे द्वारा यह आज्ञा जारी की गयी
है।
३. मेरे राज्य में सब जगह युक्त, रज्जुक और प्रादेशिक यह जो धर्म का
अनुशासन है- इसी प्रयोजन के लिए हर पांच वर्षों में (अपने-अपने
क्षेत्राधिकार में) सम्यक् प्रकार से दौरा करने के लिए नियमपूर्वक जाएं जैसे कि
दूसरे कामों के लिए भी जाया करते हैं।
४. माता-पिता की सेवा करना उत्तम है; मित्रों, परिचितों, ज्ञाति-भाइयों,
ब्राह्मणों और श्रमणों को दान देना उत्तम है; प्राणियों की हत्या न करना उत्तम
है; कम खर्च करना और कम संचय करना उत्तम है।
५. संक्षेप में और विस्तार के साथ योग रखने के लिए युक्तों को परिषदें
भी आदेश देंगी।
गिरनार शिला : चतुर्थ अभिलेख
हिन्दी अनुवाद
गिरनार शिला : चतुर्थ अभिलेख
१. कितने ही सैकड़ों वर्षों का अंतराल हो गया है जब से प्राणियों की बलि,
जीवों की विहिंसा तथा ज्ञाति-भाइयों, ब्राह्मणों और श्रमणों के प्रति अनादर का
भाव बढ़ता ही गया गया है।
२. परंतु आज लोगों को देवयान दिखाया कर, हाथी दिखाया कर, अग्नि की
मशालों और अन्य अलौकिक दृश्यों को दिखाया कर देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा
के धर्माचरण से भेरी का नाद धर्म का नाद हो गया है।
३. जैसा कि कितने ही सैकड़ों वर्षों में पहले कभी नहीं हुआ वैसा आज
देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा के धर्मानुशासन से प्राणियों का अ-वध, जीवों की
अविहिंसा, ज्ञाति-भाइयों, ब्राह्मणों और श्रमणों के प्रति आदर का भाव और
माता-पिता तथा वृद्धजनों के प्रति सेवा का भाव बढ़ने लगा है।
४. यह और अन्य बहुत प्रकार से धर्म का आचरण बढ़ गया है।
५. और बढ़ना ही रहेगा। देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा का यह धर्माचरण।
६. देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा के पुत्र, पौत्र और प्रपौत्र सृष्टि के विनाश
तक इस धर्मचरण को बढ़ाते चले जाएंगे और धर्म तथा शील में प्रतिष्ठित
हुए-हुए वे धर्म का अनुशासन करेंगे।
[पृष्ठ ६ : बायाँ स्तम्भ]
६ / सम्राट अशोक के अभिलेख
७. एस हि सेटं कंमं य धंमानुसासनं
८. धंमचरणे पि न भवति असीलस
९. त इमानि अयठि वधी च अहिनी च साधु
१०. एताय अथाय इदं लेखापितं इमस अथस वधि युजुंतु हीनि च ने
लोचेतव्या
११. द्वादसवासाभिसितेन देवानंपियेन पियदसिना राजा इदं लेखापितं
कालसी शिला : पंचम अभिलेख
१. देवानंपिये पियदसि लाजा अहा
२. कल्यानं दुकरं
३. ए आदिकले कल्यानस से दुकरं करोति
४. से ममया बहु कल्याने कटे
५. ता ममा पुता चा नताले चा परं चा तेहि ये अपतिये मे आवकप तथा
अनुवतिसंति से सुकटं कछंति
६. ए चु हेता देसं पि हापयिसति से दुकटं कछति
७. पापे हि नामा सुपदालये
८. से अतिक्रंतं अंतरं नो हुतुपूल धंममहामाता नामा
९. तेदसवसाभिसितेना ममया धंममहामाता कटा
१०. ते सवपासंडेसु वियापटा धंमाधियानंये वा धंमावढिया हिदसुखाये वा
धंमयुतसा योनकंबोजगंधालनं ए वा पि अंने अपलंता
[पृष्ठ ७ : दायाँ स्तम्भ]
कालसी शिला : पंचम अभिलेख / ७
७. क्योंकि यह जो धर्मानुशासन है, यह श्रेष्ठ कर्म है।
८. शील-हीन (व्यक्ति) द्वारा धर्म का आचरण संभव नहीं होता है।
९. तो इस प्रयोजन के उत्कर्ष का होना और अपकर्ष का न होना अच्छा है।
१०. इस उद्देश्य से यह लिखवाया गया है कि वे (अर्थात, मेरे उत्तराधिकारी)
इस प्रयोजन के उत्कर्ष में लगे रहें और इसके अपकर्ष में रुचि न लें।
११. अभिषेक के बारह वर्ष हो चुकने पर देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा द्वारा
यह लिखवाया गया है।
[स्पष्टीकरण पंक्ति (२) : डा. भंडारकर ने 'विमानवत्थु' का उद्धरण दिया
है जिसके अनुसार धार्मिक मनुष्य को परलोक में स्वर्ग का सुख मिलता है जहां
(१) चलता-फिरता महल, (२) हस्ती=ऐरावत की सवारी, और (३) सितारों
की तरह भास्वर रूप की प्राप्ति होती है। अशोक ने इनके प्रदर्शन से लोगों का
ध्यान धार्मिक जीवन बिताने की ओर आकृष्ट किया प्रतीत होता है।]
कालसी शिला : पंचम अभिलेख
१. देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा कहते हैं।
२. भलाई का काम करना कठिन होता है।
३. जो भलाई के काम में पहल करता है वह कठिन काम करता है।
४. तो मेरे द्वारा बहुत से भलाई के काम किये गये हैं।
५. यदि मेरे पुत्र, नाती और उनसे आगे जो संतान होगी कल्पांत तक वैसा
ही अनुवर्तन करेंगे तो सुकृत (अर्थात्, पुण्य का कार्य) करेंगे।
६. और जो इसका तनिक भी अपकर्ष करेगा वह दुष्कृत (अर्थात, पाप का
कार्य) करेगा।
७. वस्तुतः पाप का तो खूब दलन किया जाना चाहिए।
८. तो एक अंतराल हो गया है जबकि पहले 'धर्ममहामात्र' नाम के
(अधिकारी) नहीं हुआ करते थे।
९. अभिषेक के तेरह वर्ष हो चुकने पर मेरे द्वारा धर्ममहामात्र (नियुक्त)
किये गये हैं।
१०. वे सब संप्रदायों में धर्म की स्थापना और धर्म की वृद्धि के लिए और
यवनों, कंबोजों, गंधारों और जो भी अन्य अपरांत (पश्चिमी सीमा पर रहने
वाले लोग) हैं उनमें जो धर्मपरायण हैं उनके हित-सुख के लिए लगाये गये हैं।
पृष्ठ ८
८ / सम्राट अशोक के अभिलेख
११. भटमयेसु वंभनेसु अनथेसु वुधेसु हितसुखाये धंमयुताये
अपलिबोधाये वियापटा ते
१२. बंधनबधसा पटिविधानाये अपलिबोधाये मोखाये चा एष अनुबधं
पजाव ति वा कताभिकाले ति वा महालके ति वा वियापटा ते
१३. हिदा बाहिरेसु चा नगरेसु सवेसु ओरोधनेसु भातिनं च ने भगिनिना
ए वा पि अंने नातिक्ये सवता वियापटा
१४. ए इयं धंमनिसितो ति वा दानयुतो ति वा सवता विजितम्हि ममा
धंमयुतासि वियापटा ते धंममहामाता
१५. एताये अठाये इयं धंमलिपि लेखिता चिरठितीक्या होतु तथा च मे
पजा अनुवततु
गिरनार शिला : षष्ठ अभिलेख
१. देवा........................ सि राजा एवं आह............
२. अतिक्रांतं अंतर
or stha written as sra). In the text: "उस्रानम्हि" - yes, उ, स, ्र, ा, न, म्, ह, ि.
- "अथसंतीरणाय व" - yes.
- "कतव्यमते हि मे सर्वलोकहितं" - yes.
- "तस च पुन एस मूले उस्रानं च अथसंतीरणा च" - yes.
- "नास्ति हि कम्मतं सर्वलोकहितत्या" - wait, is it सर्वलोकहितत्या or सर्वलोकहितत्पा?
Text has: "सर्वलोकहितत्या" (त, ्, य, ा or त, ्, प, ा - looks like तत्या). - "य च किंचि पराक्रमामि अहं किति भूर्तानं आनणं गछेयं इध च नानि" - wait, भूर्तानं or भूतानं?
Text: "भूर्तानं" - wait, looks like "भूर्तानं" (भ, ू with repha on त? No, भूतानं with a mark or भूर्तानं). Let's look closely: "भूतानं" - actually it looks like भूतानं, but wait, there is a repha? No, it's just भूतानं. Wait, look at: "भूतानं आनणं गछेयं". - "सुखापयामि परत्रा च स्वर्गं आराधयंतु त" - wait, "आराधयंतु त" or
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४२ / सम्राट अशोक के अभिलेख
४. तेनेसा धंमयात्रा
५. एतयं होति बाम्हणसमणानं दसणे च दाने च थेरानं दसणे च
हिरंणपटीविधानो च जानपदस च जनस दसनं धंमानुसस्टी च धंमपरीपुछा च
तदोपया
६. एसा भुये रति भवति देवानामपियस प्रियदसिनो राजो भागे अंजे
गिरनार शिला : नवम अभिलेख
१. देवानंपियो पियदसि राजा एव आह
२. अस्ति जनो उचावचं मंगले करोते आबाधेषु वा आवाहवीवाहेसु वा
पुजनलाभेसु वा प्रवासासि वा एतम्हि च अञम्हि च जनो उचावचं मंगले करोते
३. एत तु महिडायो बहुकं च बहुविधं च छुदं च निरथं च मंगले करोते
४. त कतव्यमेव तु मंगले
५. अप्फले तु खो एतारिसं मंगले
६. अयं तु महाफले मंगले य धंममंगले
७. ततेत दासभतकम्हि सम्याप्रतीपती गुरूनां अपचिति साधु पाणेसु सयमो
साधु बम्हणसमणानं साधु दानं एत च अञ च एतारिसं धंममंगले नाम
८. त वतव्यं पिता व पुतेन वा भात्रा वा स्वामिकेन वा इदं साधु इदं कतव्य
मंगलं आव तस अथस निस्टानाय
९. अस्ति च पि वुतं साधु दान इति
१०. न तु एतारिसं अस्ता दानं व अनुगहो व यारिसं धंमदानं व अम्रनुगहो व
११. त तु खो मित्रेन व सुहृदयेन वा ज्ञातिकेन व सहायन व ओवादितव्यं
तंम्हि तंम्हि पकरणे इदं कतं इदं साध्व इति इमिना सक स्वर्गे आराधेतु इति
१२. कि व इमिना कतव्वतरं यथा स्वर्गारधी
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गिरनार शिला : नवम अभिलेख / ५३
४. उससे यह धर्म-यात्रा (का चलन आरंभ हुआ)।
५. इसमें होता है - ब्राह्मणों तथा श्रमणों का दर्शन और (उनके निमित्त)
दान, वयोवृद्धों का दर्शन और (उनका) सुवर्ण से पोषण, जनपद के लोगों का
दर्शन, धर्मदेशना और इस (अवसर) के अनुकूल धर्म के बारे में परिप्रश्न
(विस्तृत पूछताछ)।
६. यह आनन्दातिरेक देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा के (शासन-काल के) अपर
भाग में प्राप्त होता है।
गिरनार शिला : नवम अभिलेख
१. देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा ऐसा कहते हैं।
२. ऐसे लोग हैं जो विपत्ति के समय, पुत्र-पुत्री के परिणय के समय,
पुत्र-जन्म के समय अथवा प्रवास-काल में नाना प्रकार के मंगलाचार करते हैं।
इन और इसी प्रकार के अन्य (अवसरों) पर लोग भिन्न-भिन्न प्रकार के
मंगलाचरण करते हैं।
३. परंतु इनमें महिलाएं बहुदें और अनेक प्रकार के ओछे और निरर्थक
मंगलाचार करती हैं।
४. तो भी, मंगलाचार तो करने ही चाहिएं।
५. परंतु इस प्रकार के मंगलाचार निश्चय ही अल्प फल देने वाले होते हैं।
६. यह जो "धर्ममंगल" है वह मंगलाचार बहुत फल देने वाला होता है।
७. उसमें होता है-दासों तथा भृत्यों के प्रति शिष्ट व्यवहार, बड़ों के प्रति
आदर का भाव, प्राणियों के प्रति संयम (और) ब्राह्मणों तथा श्रमणों के निमित्त
दान-दक्षिणा। ये और इसी प्रकार के अन्य (आचरण) 'धर्ममंगल' कहलाते हैं।
८. तो पिता, पुत्र, भाई अथवा भर्तार को कहना चाहिए कि यह उत्तम है,
उस (अर्थात्, अभीष्ट) प्रयोजन की सिद्धि-पर्यंत यह मंगल करना चाहिए।
९. और कहा भी गया है: "दान देना उत्तम है।"
१०. ऐसा कोई दान अथवा उपकार नहीं होता है जैसा कि धर्म का दान
अथवा धर्म का उपकार।
११. इसलिए मित्र, सुहृद, ज्ञाति-भाई अथवा सहायी द्वारा दृढ़तापूर्वक कहा
जाना चाहिए कि ऐसे-ऐसे प्रसंग में यह करना चाहिए, यह उत्तम है, इससे स्वर्ग
की प्राप्ति संभव है।
१२. और इससे बढ़ कर करने के लिए रखा ही क्या है कि स्वर्ग मिल
जाय।