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सर्वकोश
सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary

देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा

DevanagariHindipublished80 पृष्ठ

पृष्ठ 70, कुल 80 में से

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पृष्ठ 70

पृष्ठ १२४

१२४ / सम्राट अशोक के अभिलेख

  • भयेना = (भिकर) भय से। सं.-भयात्। (भयम् = बिभेत्यस्मात् तद् भयम् । त्रासः । भीतिः । आशङ्का ।) 'भयं भीभीतिस्त्रासः आशङ्का साध्वसं भयम्' (अभिधान० २.३०१)। पालि-भयं (भयम्)।
  • उसाहेना = (परम) उत्साह से। सं.-उत्साहात्। 'उत्साहो अध्यवसायः स्यात्' (अमरो० १.२.११)। पालि-उस्साहो (उत्साहः)।
  • धंमापेखा = धर्म की आवश्यकता। सं.-धर्मापेक्षा। पालि-अपेक्खा, उपेक्खा (अपेक्षा)।
  • सुवे सुवे = दिन प्रतिदिन। सं.-श्वः श्वः। पालि-सुवे सुवे।
  • वोढिता = बढ़ा है। सं.-वर्द्धिता। 'वर्द्धितं छिन्नपूणयोः' (अनेकार्थ० ३.८८१)। पालि-वड्ढितो (वर्द्धितः)।
  • पुलिसा = (राज-)पुरुष। सं.-पुरुषाः। पालि-पुरिसो (पुरुषः)।
  • उकसा = उच्च (श्रेणी के)। सं.-उत्कृष्टतः। पालि-उक्कट्ठो (उत्कृष्टः)।
  • गेवया = निम्न (श्रेणी के)। (शाब्दिक अर्थ -दीन। कातर।) सं.-गेप्याः, गेह्याः। ($\sqrt{}$गेप्, $\sqrt{}$गेप् = tremble, be miserable) 'गेप् गेपे (धातुपाठ०) (३६६)। अथवा 'गेषु (५०२) -गेषु (५०२)...सेवे' (= to serve)।
  • मधिमा = मध्यम (श्रेणी के)। सं.-मध्यमाः। मध्यम - मध्यमे (शब्द०)। पालि-मज्झिमो (मध्यमः)।
  • अनुविधियंती = अनुसरण करते हैं। सं.-अनुविदधति। पालि-अनुविधीयति (अनुविधीयते)।
  • चपलं = चंचल (व्यक्ति) को। सं.-चपलम्। (चपलः = चोपति मन्दं मन्दं गच्छति । तरलः । चञ्चलः ।) चपल-तरले, चञ्चले, क्षणिके, विकले, दुर्विनीते च। (शब्द०)। पालि-चपलो (चपलः)।
  • समादपयितवे = प्रोत्साहित करने के लिए। सं.-समादापयितुम्। पालि-समादपेति (समादापयति)।
  • अंतमहामाता = अंतमहामात्रा। सं.-अन्तर्महामात्राः।
  • पालना = पालन-पोषण। सं.-पालनम्। पालि-पालनं (पालनम्)।
  • विधाने = व्यवस्था करना। सं.-विधानम्। 'विधानं हस्तिकवचे प्रेरणऽश्वेत्थे धने। चेतनोपायविधिषु प्रकारे वैक्रमोऽपि।' (अनेकार्थ० ३.२००७-२००८)। पालि-विधानं (विधानम्)।

पृष्ठ १२५

स्तंभ अभिलेख - शब्द-विश्लेषण / १२५

  • सुखियना = सुख पहुँचाना। सं.-सुखीयनम्। पालि-सुखेति (सुखयति)।
  • गोती = रक्षा करना। सं.-गुप्तिः। 'गुप्तं रक्षितगूह्ययोः' (द्विरूप० ३.७००)। पालि-गुत्ति।

देहली-तोपरा स्तंभ - द्वितीय अभिलेख

  • कियं चु = परंतु क्या (शाब्दिक अर्थ-'कितना')। सं.-कियन् नु!
  • अपासिनवे = पाप से दूर रहना। सं.-अपास्रवः। (अप-न पालि रखति पातयन्तं।) (अपास्रवः = आ-$\sqrt{}$स्रु से)। पालि-आसवो (आस्रवः)।
  • कयाने = सत्कर्म करना। सं.-कल्याणम्। (कल्याणं कमनीयं भवति - नि० २.३)। 'कल्याणं हेम्नि मङ्गले' (अनेकार्थ० ३.७९३)। पालि-कल्याणो, कल्याणी।
  • दया = दया (करना)। सं.-दया। 'यलादपि परक्लेशं हर्तुं या हृदि जायते। इच्छा भूमिसुतेष्टा सा दया परिकीर्त्तिता।' (शब्द०)। पालि-दया।
  • दाने = दान (देना)। सं.-दानम्। (दीयते इति। दत्तम्। उत्सर्गः। विश्राणनम्।) 'दानमुत्सर्जिने त्यागः' (अभिधान० ३.३८६)। पालि-दानं।
  • सचे = सच (बोलना)। सं.-सत्यम्। (सत्यं कस्मात् । सत्सु तायते। सतं समाभवं भवति-नि० ३.१३)। अथवा, सते हितं यत्। (शब्द०)। 'सत्यं सत्यमसमीचीनममृतं तथ्यं यथातथम्' (अभिधान० २.२६४)। पालि-सच्चं।
  • सोचेये = पवित्रता। सं.-शौचम् (शुचेर्भावः)। पालि-सोचेय्यं।
  • चखुदाने = चक्षुदान। सं.-चक्षुर्दानम्। (चक्षुः-चष्टे पश्यत्यनेनेति । दर्शनेन्द्रियम्। ज्योतिः।) पालि-चक्खु (चक्षुः)।
  • दिने = दिया है। सं.-दत्तम्। पालि-दिनं।
  • दुपदबहुपदेसु = दो पैर वालों (दोपायों) और चार पैर वालों (चौपायों) पर। सं.-द्विपदचतुष्पदेषु। द्विपदः =मनुष्ये, देवे, यक्षिणि, राक्षसे च। (शब्द०)। द्विपदं नाम मनुस्सा, पक्खजाता। चतुप्पदं नाम हत्थी अस्सा ओट्ठा गोणा गद्दभा पसुका। (पराजिक० १.२.९३-९३)। चतुष्पदः =चत्वारि पदानि चरणा यस्य। गवादी पशौ। पादसद्बस्य पदभावे चतुष्पादश्च। (शब्द०)। 'चतुष्पदो गवादिषु' (अनेकार्थ० ४.१५२२)। पालि-द्विपदो (द्विपदः)। चतुप्पदो (चतुष्पदः)।