सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary
देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठों का पूर्ण एवं शुद्ध लिप्यंतरण दिया गया है:
[पृष्ठ ५६]
५६ / सम्राट अशोक के अभिलेख
[स्तंभ-लेख ६ (अवशेष)]
४. हेमेवा सवानिकायेसु पटिवेखामि
५. सवपासंडा पि मे पूजिता विविथाय पूजाय।
६. ए चु इयं अतना पचूपगमने से मे मोख्यमते
७. सडुवीसतिवसअभिसितेन मे इयं धंमलिपि लिखापिता
स्तंभ देहली-टोपरा : सप्तम अभिलेख
१. देवानांपिये पियदसि लाजा हेवं आहा
२. ये अतिक्कतं अंतरं लाजाने हुसु हेव इच्छिसु कथं जने धंमवडिया वढेया
नो चु जुने अनुवुपया धंमवडिया वढिथा
३. एतं देवानांपिये पियदसि लाजा हेवं आहा
४. एस मे हुथा
५. अतिक्कतं च अंतरं हेव इच्छिसु लाजाने कथं जने अनुपथाया धंमवडिया
वढेया ति नो च
पृष्ठ ५८
५८ / सम्राट अशोक के अभिलेख
१७. देवानंपिये पियदसि लाजा हेवं आहा
१८. मंगुसु पि मे निगोहानि लोपापितानि छायोपगानि होसंति पसुमुनिसानं
अंबावडिक्या लोपापिता
१९. अड्ढकोसिक्यानि पि मे उदुपानानि खानापितानि निसिढिया च
कालापिता
२०. आपानानि मे बहुकानि तत तत कालापितानि पटीभोगाये पसुमुनिसानं
२१. ल.... एस पटीभोगे नाम
२२. विविधाया हि सुखायनाया पुलिमेहि पि लाजीहि ममया च सुखीयिते
लोके
२३. इमं चु धंमानुपटीपती अनुपटीपजंतु ति एतदथा मे एस कटे
२४. देवानंपिये पियदसि हेवं आहा
२५. धंममहामाता पि मे ते बहुविधेसु अठेसु आनुगहिकेसु वियापटासे
पवजीतानं चेव गिहिथानं च सव... डेसु पि च वियापटासे
२६. संघठसि पि मे कटे इमे वियापटा होहंति ति हेवेव बाभनेसु
आजीविकेसु पि मे कटे इमे वियापटा होहंति ति निगंठेसु पि मे कटे इमं
वियापटा होहंति नानापासंडेसु पि मे कटे इमे वियापटा होहंति ति पटीविसिटं
पटीविसिटं तेसु तेषु ते.... माता
२७. धंममहामाता चु मे एतेसु चेव वियापटा सवेसु च अंनेसु पासंडेसु
२८. देवानंपिये पियदसि लाजा हेवं आहा
२९. एते च अंने च बहुका मुखा दानविसगसि वियापटासे मम चेव देविनं
च सवसि च मे ओलोधनसि ते बहुविधेन आकारेन तानि तानि तुठायतनानि
पटी..... हिद चेव दिसासु च
३०. दालकानं पि च मे कटे अंनानं च देविंकुमालानं इमे दानविसगेसु
वियापटा होहंति ति धंमापदानठाये धंमानुपटिपतिये
पृष्ठ ५९
स्तंभ देहली-टोपरा : सप्तम अभिलेख / ५९
१७. देवानंप्रिय प्रियदर्शी राजा ऐसा कहते हैं -
१८. मार्गों पर भी मेरे द्वारा वट-वृक्ष लगवाये गये हैं जिससे वे पशुओं
और मनुष्यों को छाया दे सकें (और) आम के बगीचे (भी) लगवाये गये हैं।
१९. आधे-आधे कोस पर मेरे द्वारा कुएं खुदवाये गये हैं (और)
विश्राम-स्थल बनवाये गये हैं।
२०. पशुओं और मनुष्यों के उपभोग के लिए मेरे द्वारा जहां-तहां बहुत से
प्याऊ बनवाये गये हैं।
२१. (परंतु) यह तथाकथित 'उपभोग' तुच्छ है।
२२. क्योंकि (मेरे) पूर्ववर्ती राजाओं ने और मैंने भी विविध प्रकार से
(सांसारिक) सुख पहुँचाने वाले कार्यों से लोगों को सुखी बनाया था।
२३. इस धर्मचरण का लोग अनुसरण करें - इस प्रयोजन से यह (कार्य)
मैंने (ही) किया है।
२४. देवानंप्रिय प्रियदर्शी ऐसा कहते हैं -
२५. मैंने वे धर्ममहामात्र भी गृह-त्यागियों तथा गृहस्थों के अनेक प्रकार के
कल्याणकारी कार्यों में लगे हुए हैं और सब संप्रदायों में भी व्याप्त हैं।
२६. मेरे द्वारा (ऐसी) व्यवस्था की गयी है कि वे संघ के कार्यों के लिए भी
व्यापृत रहेंगे; इसी प्रकार मेरे द्वारा व्यवस्था की गयी है कि वे ब्राह्मणों तथा
आजीविकों में भी व्यापृत रहेंगे; मेरे द्वारा व्यवस्था की गयी है कि वे निर्ग्रन्थों में
भी व्यापृत रहेंगे; मेरे द्वारा व्यवस्था की गयी है कि वे विभिन्न संप्रदायों में भी
व्यापृत रहेंगे- (इस प्रकार) प्रत्येक प्रकार की विशेषता के अनुसार उन-उन
(वर्गों) में वे महामात्र (व्यापृत रहेंगे)।
२७. और मेरे धर्ममहामात्र इनमें तथा अन्य सब संप्रदायों में व्याप्त हैं।
२८. देवानंप्रिय प्रियदर्शी राजा ऐसा कहते हैं -
२९. ये तथा अन्य बहुत से मुख्य (अधिकारी) मेरा तथा रानियों का दान
बांटने में लगे रहते हैं और यहां तथा प्रांतों में, मेरे समूचे रनिवास में अनेक
विधियों से भिन्न-भिन्न प्रकार के तुष्टि प्रदान करने वाले कार्य करते रहते हैं।
३०. और मेरे द्वारा व्यवस्था की गयी है कि वे धर्म-संबंधी उत्तम कार्यों
(की बढ़ोत्तरी) के लिए और धर्मचरण के लिए (मेरे) लड़कों और अन्य
रानियों के लड़कों का दान बांटने में भी लगे रहें।
पृष्ठ ६०
६० / सम्राट अशोक के अभिलेख
३१. एस हि धंमपदाने धंमपटीपति च या इयं दया दाने सचे सोचवे मदवे साधवे च लोकस हेव वढिसति ति
३२. देवानंपिये प.....स लाजा हेव आहा
३३. यानि हि कानिचि ममिया साधवानि कटानि तं लोके अनूपटीपने तं च अनुविधीयंति
३४. तेन वढिता च वढिसति च मातापितिसु सुसुसाया गुरुसु सुसुसाया वयोमहालकानं अनुपटीपतीया बाभनसमनेसु कपनवलकेसु आव दासभटकसु संपटीपतीया
३५. देवानंपिय.... यदति लाजा हेव आहा
३६. मुनिसानं चु या इयं धंमवढि वढिता दुवीहि येव आकालेहि धंमनियमेन च निझतिया च
३७. तत चु लघु से धंमनियमे निझतिया व भूये
३८. धंमनियमे चु खो एस ये मे इयं कटे इमानि च इमानि जातानि अवधियानि
३९. अंनानि पि चु बहुक.... धंमनियमानि यानि मे कटानि
४०. निझतिया व चु भूये मुनिसानं धंमवढि वढिता अविहिंसाये भूतानं अनालंभाये पानानं
४१. से एताये अथाये इयं कटे पुतापपोतिके चंदमसुलियिके होतु ति तथा च अनूपटीपजंतु ति
४२. हेवं हि अनूपटीपजंतं हिदतपालते आलधे होति
४३. सतविसतिवसाभिसितेन मे इयं धंमलिपि लिखापापिता ति
४४. एतं देवानंपिये आहा
४५. इयं धंमलिपि अत अथि सिलाथंभानि वा सिलाफलकानि वा तत कटविया एन एस चिलठितीके सिया
पृष्ठ ६१
स्तंभ देहली-टोपरा : सप्तम अभिलेख / ६१
३१. क्योंकि धर्म-संबंधी उत्तम कार्य और धर्माचरण यह है जो ये दया, दान, सत्य, पवित्रता, मृदुता और साधुता इस विधि से लोगों में बढ़ेंगी।
३२. देवानंप्रिय (प्रियदर्शी) राजा ऐसा कहते हैं-
३३. मेरे द्वारा जो कोई भले काम किये गये हैं लोगों ने उनका अनुसरण किया है और (आगे भी) करते रहेंगे।
३४. इससे (उनकी) बढ़ोतरी हुई है और माता-पिता की सेवा, गुरुजनों की सेवा, वयोवृद्धों के अनुसरण, ब्राह्मणों, श्रमणों, दीन-हीनों - यहां तक कि दासों और भृत्यों - के प्रति सम्यक व्यवहार से (और) बढ़ोतरी होगी।
३५. देवानंप्रिय (प्रि)यदर्शी राजा ऐसा कहते हैं-
३६. मनुष्यों में जो यह धर्म की बढ़ोतरी हुई है वह दो प्रकार से हुई है- धर्म के नियमों से और (विपश्यना) ध्यान करने से।
३७. और इनमें भी धर्म के नियमों से कम और (विपश्यना) ध्यान करने से कहीं अधिक (हुई है।)
३८. धर्म के नियम तो यह हैं जो मैंने यह (विधान) किया कि अमुक-अमुक प्राणी अवध्य हैं।
३९. और दूसरे भी अनेकानेक धर्म के नियम हैं जिनका मैंने (विधान) किया है।
४०. परंतु (विपश्यना) ध्यान करने से मनुष्यों की धर्म में खूब बढ़ोतरी हुई है (क्योंकि) इससे जीवों की अ-विहिंसा और प्राणियों का अ-वध होता है।
४१. तो इस उद्देश्य से यह किया गया है जिससे कि यह (मेरे) बेटों-पोतों (के शासनकाल) तक (और) चंद्रमा या सूर्य (के भासमान रहने) तक टिकने वाली हो और (लोग) इसका अनुसरण करें।
४२. क्योंकि इस प्रकार अनुसरण करने वाले को इहलोक तथा परलोक (का सुख) प्राप्त होता है।
४३. मेरे अभिषेक के २७ वर्ष हो चुकने पर मेरे द्वारा यह धर्मलिपि लिखवायी गयी है।
४४. इस बारे में देवानंप्रिय कहते हैं-
४५. यह धर्मलिपि जहां शिला-स्तंभ अथवा शिला-फलक हों वहां लिखवायी जानी चाहिए जिससे कि यह चिर-स्थायी हो।
खंड (५)
गुहा पर उत्कीर्ण अभिलेख
६४ / सम्राट अशोक के अभिलेख
गुहा : बराबर / ६५
मूल अभिलेख
हिंदी रूपांतर
गुहा : बराबर
गुहा : बराबर
प्रथम मूल अभिलेख
प्रथम अभिलेख
लाजिना पियदसिना दुवाडसवसाभिसितेना
अभिषेक के बारह वर्ष हो चुकने पर राजा प्रियदर्शी द्वारा यह न्यग्रोध-गुहा
इयं निगोहकुभा दिना आजीविकेहि
आजीविकों को दी गयी।
द्वितीय मूल अभिलेख
द्वितीय अभिलेख
लाजिना पियदसिना दुवाडसवसाभिसितेना इयं
अभिषेक के बारह वर्ष हो चुकने पर राजा प्रियदर्शी द्वारा खलतिक पर्वत
कुभा खलतिकपवतसि
पर यह गुफा आजीविकों को दी गयी।
दिना आजीविकेहि
तृतीय अभिलेख
तृतीय मूल अभिलेख
राजा प्रियदर्शी के अभिषेक के उन्नीस वर्ष हो चुकने पर अतीव मनोहारी
लाज पियदसी एकुनवी-
खलतिक पर्वत पर) यह गुफा वर्षा (से बचाव) के लिए दी गयी।
सतिवसाभिसिते जलघो-
सागमथात मे इयं कुभा
सुपिये ख........ दिना
शब्द-विवेचन
स्पष्टीकरण
शब्दों के विवेचन का क्रम प्रायःकर निम्न प्रकार से रखा गया है –
१. अभिलेख में प्रयुक्त हुए शब्द-विशेष
२. उनका हिंदी में अर्थ
३. इन शब्दों का सँस्कृत स्वरूप
४. सँस्कृत पदों का विश्लेषण (यथासंभव शब्दकोषों की सहायता से)
५. पालि शब्द अपने सामान्य रूप में (कोष्ठक में तत्सम सँस्कृत शब्द
सहित)
उदाहरण -
गिरनार शिला : प्रथम अभिलेख
(पृष्ठ ६९-७०)
१. समाजो
२. समाज (अर्थात इंद्रियलोलुपता को बढ़ाने वाले जमघट अथवा उत्सव)
३. समाजः (संवीयते अत्रेति)।
४. ‘पशुभिन्नानां सङ्घः’ (हलायुध०)। ‘समजस्तु पशूनां स्यात्
समाजस्त्वन्यदेहिनाम्’ (अभिधान० ३.४८१)। समाजः- ‘पशुभिन्नानां
समूहे, सभायाम्, हस्तिनि च’ (शब्द०)।
५. समज्ज समज्जा। [सँ.- √अज् (हांकना)]
[नोट - संदर्भ-ग्रंथों के लिए कृपया देखें संदर्भ-सूची पृष्ठ सं (ix) पर]
शिला अभिलेख - शब्द-विवेचन
गिरनार शिला : प्रथम अभिलेख
▪ इयं = यह।
▪ धंमलिपी = धर्म से संसिक्त अक्षररचना (अथवा अक्षरसंस्थान)। सँ.-
धर्मलिपी। 'धर्म:'-'ध्रियते लोकोऽनेन, धरति लोकं वा। 'लिपी', 'लिपि:'-
√लिप् से। इनके अन्य रूप 'लिबी', 'लिबि:' भी देखने को मिलते हैं।
'अक्षरन्यासे लिपिर्लिबि:' (अभिधान० ४८४)।
▪ देवानंप्रियेन प्रियदसिना राजा = देवानांप्रिय प्रियदर्शी राजा द्वारा।
'देवानांप्रिय'-मौर्य राजाओं की उपाधि। 'प्रियदर्शी'-राजा अशोक का
विशेषण। 'देव:'-दीपनात्, द्योतनात्, दानात् (नि० ७.१५)।
'प्रिय:'-प्रीणातीति। मनोरम, मञ्जुल, हृद्य। 'राजा'-राजतेः (नि० २.३)।
Lat. 'Rex' (a king)
▪ लेखापिता = लिखवायी गयी।
▪ इध = यहां (अर्थात, मेरे साम्राज्य में)। सँ.-'इह'। पालि-'इध'। (हिंदी
का 'इधर' शब्द इसी से निष्पन्न हुआ प्रतीत होता है।)
▪ किंचि = कोई। सँ.- किञ्चित्।
▪ जीवं = प्राणी को। सँ.- जीवः (जीवतीति 'जीव् प्राणधारणे')। 'जीवः
पुरुषपुद्गलौ' (त्रिकाण्ड० ११९)।
▪ आरभित्पा = मार कर। सँ.- आलभ्य। आलम्भः, आलम्भनं -पकड़ना,
स्पर्श करना, चीरना, फाड़ना, यज्ञ में बलिदान के लिए पशु का वध करना,
यथा 'अश्वालम्भं, गवाल्म्भं'। (सँस्कृत०)। ('प्रातर्वै पशूनालभन्ते।' शतपथ०
३.७.२.४)
▪ प्रजूहितव्यं = होम किया जाय। (प्र - √हु से)।
▪ च = और। सँ.- च। पालि = च। 'च पादपूरणे पक्षान्तरे हेतौ विनिश्चये'
(त्रिकाण्ड० १०१८)
▪ समाजो = समाज (अर्थात, इंद्रियलोलुपता बढ़ाने वाले जमघट अथवा
उत्सव)। सँ.- समाजः (संवीयतेऽत्रेति)। 'पशुभिन्ननां सङ्घ:' (हलायुध०)।
'समजस्तु पशूनां स्यात् समाजस्त्वन्यदेहिनाम्' (अभिधान० ३.४८१)।
७० / सम्राट अशोक के अभिलेख
समाजः - 'पशुमित्राणां समूहे, समभ्यायाम्, हस्तिनि च।' (शब्द०)। पालि-
समज्ज, समज्जा। [सं.- $\sqrt{अज्}$ (हांकना)।]
• कतव्यो = किया जाना चाहिए। सं.- कर्तव्यः। पालि-कतब्बो।
• बहुकं = बहुत। ('बहु' से)। सं.- बहु (वंहुते इति)। 'प्रभूतं प्रचुरं
प्राज्यमदभ्रं बहुलं बहु' (अमर० ३.१०८०)।
• हि = क्योंकि। (वाक्य के आरंभ में इसका प्रयोग वर्जित है)। 'हि
हेताववधारणे' (अमर० ३.१४३१)।
• दोसं = दोष। सं.- दोषः (दूष्यते इति दूषणम् अथवा दुष्यत्यनेनेति
पापम्)। 'दोष आर्त्तितवौ मतः' (हाला०-१९८)। 'दोषः दूषणे पापे च'
(शब्द०)।
• समाजम्हि = समाज में।
• पसति = देखता है। सं.- पश्यति। पालि-पस्सति।
• अस्ति = (इस प्रकरण में) 'हैं' (अन्यथा 'है')।
• पि = भी। सं.- अपि। पालि-पि।
• एकुचा = कोई-कोई। पालि-एकच्चे।
• साधुमत्ता = अनिन्द्य माने गये। सं.- साधु (साध्नोति परकार्यमिति)
'साध्वनिन्दिते' (त्रिकाण्ड० ५२०)। 'मतं तु संमतेऽभिहिते' (अनेकार्थ०
२.१९८)।
• पुरा = पूर्व काल में। सं.- पुरा (पुरति अग्रे गच्छतीति)।
• महानसम्हि = पाकशाला में। सं.- महानसम् (महत्त्वं तदनश्वरीतीति
'महदनः। पाकस्थानम्।' (शब्द०) (महत्-महति पूज्येऽसन्निविते)। (महता
मंहनीयो भवतीति-नि० ३.१३)। 'सूदशाला रसवती पाकस्थानं महानसम्'
(अभिधान० १९८)।
• अनुदिवसं = प्रतिदिन। सं.- दिवसः (दीव्यत्यत्रेति)।
• बहूनि = बहुत से। सं.- बहु (प्रभवतिती सतः-नि० ३.१३)। 'प्रभूतं
प्रचुरं प्राज्यमदभ्रं बहुलं बहु' (अमर० ३.१०८०)।
• पाणसतसहसानि = सैकड़ों-हजारों प्राणी। सं.- शतं (शतं दशदशतः-
नि० ३.१०)। सं.- सहस्रं (सहस्रं सहदन्-नि० ३.१०)। 'प्राणात्तु जीवितेन्द्रियं'
(अनेकार्थ० २.१६३)। 'दशशतसंख्यायां, बहुसंख्यायां, तरुसख्यान्विते च'
(शब्द०)
शिला अभिलेख - शब्द-विवेचन / ७१
• आरभिंसु = मारे जाते थे। (आ-$\sqrt{रभ्}$ से लुङ् लकार में। कर्मवाच्य,
प्रथम पुरुष, बहुवचन)।
• सूपथाय = सूप के लिए। सं.- सूपः (सुखेन पीयते)।
• ते = परंतु। सं.- तुद्।
• अज = अब। सं.- अद्य। (अस्मिन्नहनि इदंशब्दस्य निपातः सप्तम्यर्थे)
(शब्द०)। पालि - अज्ज।
• ती = तीन। सं.- त्रि।
• पाणा = प्राणी।
• आरभरे = मारे जाते हैं।
• द्वे = दो। सं.- द्वौ।
• मोरा = मोर। सं.- मयूरः (मयूरिव रौति शब्दायते इति। यद्वा मिनाति
हन्ति सर्पानिती1) 'छत्रमांसी मयूरस्तु' (त्रिकाण्ड० २.२८७)।
• एको = एक। सं.- एक (एक इता सङ्ख्या-नि० ३.१०)। Persian yak.
• मगो = मृग। सं.- मृगः (मार्गयन्तिकर्मिणः-नि० १.२०)। (मृग्यते
अन्वेष्यति तृणादिकम्। यद्वा मृग्यते अन्विष्यतेऽसौ व्याधैः)। मृगः कुरङ्गः
सारङ्गो वातायुर्हरिणोऽपि (अभिधान० ४.१२९३)। 'पशु'-मात्र को भी 'मृग'
कहते हैं, देखिए अमर० ३.११९३) - 'पशवोऽपि मृगाः' (३.११९३)।
• धुवो = निश्चित। सं.- ध्रुव (ध्रु गतियेर्थे। यद्वा ध्रुवति स्थिरीभवतीति।)
'ध्रुवो निश्चितनित्ययोः' (शब्दरत्न० III.२०)।
• पछा = पीछे, उत्तर काल में। वैदिक रूप-पश्चा, पश्चात्। 'पश्चात्ततीच्यां
चरमे' (अनेकार्थ० १७९२)। पालि-पच्छा।
• आरभिंसरे = मारे जायेंगे।
गिरनार शिला : द्वितीय अभिलेख
• सर्वत = सर्वत्र। सब स्थानों पर।
• विजितम्हि = राज्य में।
• एवमपि = इसी प्रकार।
• प्रचंतेसु = सीमा से सटे हुए पड़ोसी राज्यों में। सं.- प्रत्यन्तेषु। 'प्रत्यन्तो
म्लेच्छदेशः' (अमर० २८७) म्लेच्छदेशे।
... wait! Is that नहीं-जड़ियाँorयहाँ-जड़ियाँ? Wait! Look at नहीं: Letters: न ह ीं? Wait! Look at the first letter: Is it त थ ा? तथा? Wait! Look at: ओसुढानि = ओषधियाँ।Then:[...] तथा जड़ियाँ।? NO! Let's read very carefully: ओ स ु ढा नि = ओ ष धि याँ ।Next word:गं ध म ा द क? No. Wait, let's look at the letters: Is it संस्कृत नहीं? No. Let's look at: ओसुढानि = ओषधियाँ।Then:[ ? ] नहीं-जड़ियाँ।Wait, look at the word beforeनहीं: Could it be दवाइयां नहीं-जड़ियाँ? No. Wait, let's look at the third word: नहींhasनandहwithी? Wait! The word is तथा! Look at it: It's त(ta),थwithा(thaa)!तथा! WAIT! Is it तथा`?
No
सप्त स्तम्भलेख, लघु शिलालेख (मास्की, भाब्रू), गुहालेख व उपसंहार
.
Line 17:
(अन्यो नानार्थो भवति-नि० १.६) (कर्म कस्मात्, क्रियत इति सतः-नि०
Line 18:
३.१)। पालि-अञ्ञो। कम्मं।
Line 19:
• सूस्रूसा = आराधना। कहना मानना। सं.- शुश्रूषा
Line 20:
'शुश्रूषापारचर्यानोपवित्तिव्यासपारीत्ययः' (अभिधान० ३.४१७)। 'शुश्रूषा श्रोतु
Line 21:
चैव ग्रहणं धारणं तथा' (अभिधान० २.३९०)। पालि - सुस्सूसा।
Line 22:
• मितसंस्तुतज्ञातीनं बाम्हणसमणानं = मित्रों, परिचितों, संबंधियों और
Line 23:
ब्राह्मणों तथा श्रमणों को। सं.- मित्रम् (मेद्यति खिद्यति इति)। मित्र-निधीयते
Wait, look at line 23-24:
मित्रम् (मेद्यति खिद्यति इति)। 'मित्र-निधीयते
Wait, does line 23 have a quote?
मित्रम् (मेद्यति खिद्यति इति)। 'मित्र-निधीयते or मित्र-निधीयते?
In line 23: `सं.- मित्रम् (मेद्यति खिद्यति
Here is the complete, line-by-line transcription of both pages from the image:
[पृष्ठ ७६]
७६ / सम्राट अशोक के अभिलेख
• विमानदसणा = देवयान दिखलाने से। सं. - विमानदर्शनात्। (विमानं-
विगतं मानमुपमा यस्य। देवयानम्।)
• हस्तिदसणा = हाथी दिखलाने से। सं. - हस्तिदर्शनात्। पालि-हत्थी-
दस्सनं।
• अगिखंधानि = आग की मशालों को। सं. - अग्निस्कन्धान्। 'स्कन्धाग्निः
स्थूलशाखानिश्रिताग्निस्तु भवेत्समः' (हारा० २०४)। 'स्कन्धः-प्रकाण्डे
आरुहत्तंसं। अंसे, वृक्षस्य काण्डे, नृपे, व्यूहे, युद्धे, समूहे, इत्यादि
(शब्द०)। (अग्निः - अञ्चति ऊर्ध्वं गच्छतीति) (स्कन्धः - स्कन्दते
आरुह्यतेऽसौ सुखेन शाखया वा)। पालि-अग्गिक्खन्धो।
• रुपानि = दृश्य। सं. - रूपाणि। (रूपं रोच
७८ / सम्राट अशोक के अभिलेख
• आदिकरे = पहल करने वाला। सं.-आदिकरः। पालि-आदि (प्रथम्-आदिकम्)।
• कचंति = करता है। सं.-करोति। पालि-करोति।
• ममया = मेरे द्वारा। सं.-मया। पालि-मया।
• ममा = मेरे। सं.-मम। पालि-मम।
• नतानं = नाती। सं.-नप्तारः। 'नप्ता पौत्रः सुपुत्रयः' (अनेकार्थ० ३.३९९)।
• पलं = परा। आगे। सं.-परम्। पालि-परं।
• अपतिये = संतान। सं.-अपत्यम्। (न पतति वंशो यस्मात्)। 'अपत्यं पततिने पित्तुरंगजेन। पुत्रदुहितृभ्ये सन्ताने' (शब्द०)।
• आवकपं = कल्पान्त तक। सं.-यावत्कल्पम्।
• अनुवत्तिसंति = अनुवर्तन करेंगे। सं.-अनुवर्त्तिष्यन्ते।
• सुकटं = पुण्य का काम। सं.-सुकृतम्। 'सुकृतं पुण्ये, धर्मे, शुभे
द्धम्-बध्यते स्म इति। बन्धयुक्तं, नियमितम्। पालि-बन्धनां।)"
Wait, let's look at the first word of L17:
"(बद्धम्-बध्यते स्म इति। बन्धयुक्तं, नियमितम्। पालि-बन्धनं।)"
Wait, is it "पालि-बन्धनां" or "पालि-बन्धनं"?
In L18: "पालि-बन्धनं।"
Check L21:
"• मोखाये = रिहाई के लिए। सं.- मोक्षाय। (मोक्षः-मोक्ष्यते दुःखमनेनेति।"
Wait, look at end of L21:
"दुःखमनेनेति।" - yes, 'दुः' 'ख' 'म' 'ने' 'ने' 'ति'।
Check L22:
"'मोक्षो निःश्रेयसे वृक्षाद्विशेषे मोचने मृता' (अनेकार्थ० २.५७३)।"
Wait, is it "मृता" or "स्मृतः"?
Look at L22: "मोचने" then "मृ" "तौ"? No, "स्मृतः"!
'स्' 'मृ' 'तः'!
"मोचने स्मृतः" - in Sanskrit lexicons: '...मोचने स्मृतः'।
Yes, 'स्मृतः'!
Check L24:
"• एवं अनुबंधा = इस
).
Let's transcribe every single word and line accurately.
Let's read Page 82 in detail:
Header:
८२ / सम्राट अशोक के अभिलेख
Lines on Page 82:
• वयसि = पशुशाला में। सं.- व्रजे। (व्रजः-व्रजन्ति सहोभूय गावश्चा
गोष्ठम् ।) । 'व्रजः समूहे, गोष्ठे, पथि, मधुरासमीपस्थे देशभेदे च' (शब्द०)।
'प्रजन्त्यस्माद् गाव इति व्रजो घोषः गोवाटो वा उच्यते।' (उद्ग) [or (उद्व) / (उद्ग०)]
Let's look closely at '(उद्ग)' or '(उद्द)' or '(उद्ध)'?
It looks like '(उद्द)' or '(उद्ध)' or '(उ०)'?
Wait, "उज्ज्वलदत्तः"? "उणादिसूत्रवृत्ति" by Ujjvaladatta: (उज्ज्व०) or (उद्ग)?
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८४ / सम्राट् अशोक के अभिलेख
भवेत्। स भावः कथ्यते सद्भिस् तस्योत्कर्षः रसः स्मृतः' (हल्युध० १०)।
पालि-भावो (भावः)। सुद्धि (शुद्धिः)।
• उचावचछंदो = नाना प्रकार की इच्छाओं वाले। सं.- उच्चावच्छन्दाः
(उच्चावचः -उदक् च अवाक् च। अनेकप्रकारः)। 'उच्चावचं विघेमद्गदं
(अमर० ३.१.१००)। 'छन्दोऽभिप्राय आकूतं मतमन्वाशया अपि।
(अभिधान० ६.१३८२)। पालि-उच्चावचो (उच्चावचः)। छन्दो (छन्दः)।
• उचावचरागो = नाना प्रकार की आसक्तियों वाले। सं.- उच्चावचरागः।
'रागोऽनुरागोऽनुरक्तिः' (अभिधान० २.२९६)। पालि -रागो (रागः)।
• कासंति = करेंगे। सं.- करिष्यन्ति।
• कतज्ञता = कृतज्ञता। सं.- कृतज्ञता। 'कृतज्ञः -कृतं कृतोपकारं जानाति'
(शब्द०)। पालि-कतञ्ञुता।
• दढभत्तिता = निश्चल भक्ति। सं.- दृढभक्तित्ता। दृढ= 'प्रगाढं 'दृढः शक्तो
भृशो स्थूले' (अनेकार्थ० २.१४४)। 'भक्तिः -सेवायाम् आराधनेयाम्
तदेकाग्रचित्तवृत्तिविशेषे।' (शब्द०)। (भक्तिः -भज्यते इति। अनुरागविशेषः
श्रद्धा।)। पालि-दळ्हो (दृढ)। भत्ति (भक्तिः)।
• निचा = नीचा। सं.- नीचाः। निचः - निकृष्टमों लक्ष्मीं चमति। प्रमने,
निमे, वासमे च। (शब्द०)। 'नीचः पामरखर्वयोः' (अनेकार्थ० २.७३)
(नीचः -निकृष्टतमों शोभां चिनोती)।
• बाढं = निश्चय ही। सं.- बाढम्। 'बाढं प्रगाढं भृशकृच्छ्रयोः' (अमर०
३.११.११७)। पालि-बाळ्हं (=exceedingly) [Childers]
गिरनार शिला : अष्टम अभिलेख
• विहारयातां = विहारयात्रा पर। सं.- विहारयात्राम्। विहारस्तु जिनालयै,
लीलयां भ्रमणं स्कन्धै।' (अनेकार्थ० ३.२२०३)। 'गमत्तोसव्योद्योर्यात्रा
(त्रिकाण्ड० ३.१२२)। पालि -विहारो (विहारः)। यात्रा (यात्रा)।
• अयासु = जाया करते थे। सं.- न्ययासुः, नियायिपुः। (लुङ् लकार)।
• मगया = आखेट। सं.- मृगया (मृग्यन्ते पश्वोऽस्यामिति)। 'मृगया-मृग
याट्यन्था। (शिकार)। पशुवध्यच्छले व्यापारं आखेटकं। (शब्द०)।
पालि-मिगवं (मृगवः)।
• अभीरमकनि = आमोद-प्रमोद। सं.- आभिरमकाणि। पालि-अभिरमणं
(अभिरम्यः)।
शिला अभिलेख - शब्द-विवेचन / ८५
• अभुंसु = होते थे। सं.- अभूवन्।
• संतो = हुआ हुआ। सं.- सन्। पालि-संतो (सन्)।
• अयाय = गया। सं.- इयाय।
• संबोधिं = बोधगया को। सं.- सम्बोधिम्। पालि-संबोधि (=perfect
knowledge or enlightenment) (Childers).
• धंमयाता = धर्मयात्रा। सं.- धर्मयात्रा।
• हिरण्यपटिविधानो = सुवर्ण से पोषण। सं.- हिरण्यप्रतिविधानम्।
(हिरण्यम् - ध्रियत आयम्यमानमिति वा, ह्रियते जनैरुज्ज्वलमिति वा, हर्यतेर्वा
स्यात्तन्नामकरणैः। हिरण्यं हितरमणं युम्मर्म्य-वैभवम्वा अपि' (अमर० २.९४७)।
२.१०)। 'हिरण्यं द्रविणं द्युम्नमह्रै-वैभवम्वा अपि' (अमर० २.९.४७)।
'प्रतिविधानं प्रतीकारः' (शब्द०)। पालि-हिरञ्ञं (हिरण्यम्)।
• जानपदस य जनस = जनपद के लोगों का। सं.- जानपदस्य च जनस्य।
जनपद - जनपदे भवः, तत आगतो वा। देशे। (शब्द०)। (जानपदः -जानेन
जनपदः -जनाः पद्यन्ते गच्छन्ति यत्र। देशे। (शब्द०)। (जानपदः -जानेन
उत्पन्ना पद्यते, जनपदे भवः इति वा।)। 'त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं
त्यजेत्। ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥' (चाणक्य० ३१)।
पालि-जानपदो (जनपदः)। जनपदो (जनपदः)।
• धंमपरिपुछा = धर्म-संबंधी परिप्रश्ना सं.-धर्मपरिपृच्छा। पालि-परिपुच्छा
(परिपृच्छा)।
• तदोपया = इस (अवसर) के अनुकूल। सं.- तदुपगा।
• भूय रती = अधिक आनंद। सं.- भूयः रतिः। 'भूयः-अतिशयेन बहुः।
बहूतरं।' 'रतिः रागं' (शब्द०)। (भूयः-अतिशयेन बहु)। (रतिः -रम्यते अनया
इति। प्रीतिः।)। सब्वदानं धम्मदानं जिनाति। सब्बं रसं धम्मरसो जिनाति॥ सब्वं
रतिं धम्मरती जिनाति। तण्हक्खयो सब्वदुक्खं जिनाति॥ (सद्धम्म० Ch.
XI.२०)। पालि-रति (रतिः)।
• भागे = भाग। सं.-भागः (भज्यते इति। अंशः।) (अथवा) ऐश्वर्य-समूह।
सं.-भागः (भगनाम् ऐश्वर्यानाम् समूहः इति।)
गिरनार शिला : नवम अभिलेख
• एव = ऐसा। सं.- एवम्। पालि-एवं।
पृष्ठ ८६
८६ / सम्राट अशोक के अभिलेख
• मंगले = मङ्गल (मङ्गलाचार)। सं.- मङ्गलम्। (मङ्गं नितरामशुभमर्द्दति,
गिरत्यपनयतीति वा -नि० ९.१४। (अथवा, मङ्गति विस्तार्य सर्पति, पद्यतेऽनेन
दुष्टदुर्मनस्तन्नाशयतीति आरेष्टम् । कुलकम्।) । 'मङ्गलं शुभे' (त्रिकाण्ड०
३.२५८)। 'मङ्गलम् अभीष्टार्थसिद्धिं' (शब्द०)। 'कल्याणं मङ्गलं श्रेमं क्षेमं शातं शुभं
शिवं शुभम्' (वैजय०)। पालि-मङ्गलं।
• आवाधेषु = रोगों के समय। सं.- आबाधेषु। आबाधः -क्लेश, कष्ट।
छड्छाड, हानि। (शब्द०)। पालि -आबाधो (आबाधः)।
• आवाहविवाहेसु = पुत्रो, पुत्रियों के परिणय के समय। (आवाह-कन्या
संस्कार करना। विवाह-कन्या-दान करना।) सं.- आवाहविवाहेषु।
'आवाहविवाहाभ्यां वा कृत्वा स्वांगमसंतोषयुतान् नयेत्।' (कौटिल्य -१.६)।
पालि-आवाहो (आवाहः)। विवाहो (विवाहः)।
• पुतालाभेसु = पुत्र-प्राप्ति के समय। सं. - पुत्रलाभेषु। पालि-लाभो (लाभः)।
• पवासासि = परदेस जाते समय। सं.- प्रवासे। (प्रवसत्यस्मिन्निति प्रवाशो
देशान्तरम्। प्रपूर्वाद्विच्प्रत्ययौ ।-उपसर्गगणो, प्रथम खंड, पृ.४४) । 'प्रवासः
विदेशवासं' (शब्द०)। पालि-पवासो (प्रवासः)।
• एत तु = पर इन (अवसरों) पर। सं.- अत्र तु। पालि -अत्र। अथवा [तु]
• महिडायो = महिलाएँ। सं.- महिलाः। (महिला - मह्यते इती। स्त्रीमात्रम्)
'महिला मार्या मुग्धायाम्' (अनेकार्थ० ३.१२७७)। 'महिला, महुला -योषिति'
(शब्द०)। पालि-महिला (महिला)।
• बहुविधं = बहुत प्रकार के। सं.- बहुविधम्। पालि-बहुविधो (बहुविधः)।
• खुदं = तुच्छ। घटिया। सं.- क्षुद्रम्। 'क्षुद्रो दरिद्र कृपणे
निकृष्टेऽल्पशत्रुसंज्ञयोः' (अनेकार्थ० २.४१०)। पालि-खुद्दो (क्षुद्रः)।
• निरथं = निरर्थक। सं.- निरर्थकम्। (निर्गताऽर्थो यस्मात्)। पालि-निरत्थो
(निरर्थः)।
• अपफलं = अल्प फल देने वाला। सं.- अल्पफलम्।
• खो = निश्चय ही। सं.- खलु। 'खलु प्रगे, सान्वने, वीप्सायां, माने,
निषेधे, अनुनये, वाक्यस्य भूषापूरणयोः, निश्चये, हेतौ च।' (शब्द०)।
पालि-खलु।
• एतारिसं = ऐसा। सं.- एतादृशम्। पालि -एतादिसो। एतारिसो।
(एतादृशः)।
पृष्ठ ८७
शिला अभिलेख - शब्द-विवेचन / ८७
• ततेत = उसमें यह होता है। सं.- तत्रैतत्। पालि-तत्र। तथा। एतद्
(एतत्)।
• दासभतकम्हि = दासों और भृत्यों के प्रति । सं.- दासभृतकेषु। (दासो
ह्यस्तने, उपास्यतेति कर्माणि - नि० २.१७)। (अथवा, दायन्ते दीयते
भृत्यैर्भृत्यादिकं यस्मै सः।) 'दासः प्रेष्यः परिकरन्डो भुजिष्यपरिकर्मिणौ परावः
पराणपुत्रादः परगाजः परेषितः॥' (अभिधान० ३.३६०-३६१)। 'भृतको
भृतिभुक्कन्करों वेतनोपजीवि सः।' (अमर० २.९८३)। पालि-दासो (दासः)।
भतको (भृतकः)।
• सम्मप्रतिपत्ती = शिष्ट व्यवहार। सं.- सम्यक्प्रतिपत्तिः। (सम्यक्-अर्यन सह
सम्प्रतिपत्ति सङ्खच्यते इति। सङ्गतः।) । (प्रतिपत्तिः-प्रतिपद्यनमिति। प्राप्तव्यम्।
'प्रवृत्तियाम्' प्रत्यर्थो यदि तं प्रतिपद्यते सा तु सम्प्रतिपत्तिः स्यात्' । (शब्द०)।
पालि-सम्मा (सम्यक्)। पटिपत्ति (प्रतिपत्तिः)।
• गुरुनं = गुरुजनों के प्रति। सं.- गुरूणाम्। (गुरुः-गीयते सूयते
देवाग्न्यर्चनगुर्वादयभिः, गुणाति उपदिशति वा।) 'गुरुः-नितरत्यानं गुणाति
उपदिशति वा धर्मम्' (शब्द०)। 'गुख्यमोंपदेशकः' (अभिधान० १.७७)।
'मातामही मातुलानी तथा मातृष्व सोदरा। श्वश्रूः पितामही ज्येष्ठा धात्री च
गुरवः स्त्रियः॥' पालि-गुरु (गुरुः)।
• अपचिति = आदर का भाव। सं.-अपचितिः। 'अपचितिः -पूजायां, हानी
व्ययाप्याञ्च' (शब्द०)। पालि-अपचिती।
• वतव्यं = कहना चाहिए। सं.- वक्तव्यम्। पालि-वत्तब्बं।
• स्वामिकेन = स्वामी से। सं.- स्वामिकेन। 'स्वामी प्रभौ गृहे।' (अनेकार्थ०
२.३०२)। 'स्वामी अधिपतौ, ईश्वरे च' (शब्द०)। पालि-सामिको
(स्वामिकः)।
• निव्तानय = सिद्धि। सं.- निष्ठानम्। 'निष्ठानं तु तेमनं स्यात्'
(अभिधान० ३.३९९)। (निष्ठा-नितरां स्थितिः)। पालि-निट्ठानं (निष्ठानम्)
=accomplishment, completion (Childers).
• अस्ता = है। सं.- अस्ति। पालि-अत्थि।
• अनुग्रहो = अनुग्रह। सं.- अनुग्रहः। 'अनुग्रहोऽभ्युपपत्तिः' (अभिधान०
६.१५०८)। 'अनुग्रहोः अभीष्टसम्पादनलक्षणे प्रसादे, आनुकूल्ये।' (शब्द०)।
पालि-अनुग्गहो (अनुग्रहः)।
८८ / सम्राट अशोक के अभिलेख
• सुहृदयेन = सहानुभूति रखने वाले के द्वारा। सं.- सुहृदयेन। 'सुहृदयः-
सुष्ठु हृदयं यस्य। प्रयत्नसम्पन्नः।' (शब्द०)। पालि-सुहृदयो (सुहृदयः)।
• सहायेन = सहायक द्वारा। सं.- सहायेन। (सहायः-सह एति इति
सहायः। अनुकूलः।) पालि-सहाये (सहायः)।
• ओवादितव्य = दृढ़तापूर्वक कहना चाहिए। सं.- अववदितव्यम्।
(कार्यमवलम्ब्य वादो वदनं कथनमुपवादः)। 'अववादः-निन्यायाम्, विश्वस्ते,
आज्ञायाम्, अववचने च।' (शब्द०)। 'अववादस्तु निर्देशो निदेशः शासनं च
तत्' (अमर०)। 'अवः सान्त्वन इति षड्गविणयः' (उपसर्गार्थ-द्वितीय
खंड, पृ.३०१)। पालि-ओवदति (अववदति)।
• पकरणे = मामले में। सं.- प्रकरणे। 'प्रकथं स्यात्सत्त्वार्थे' (अनेकार्थ०
[L
..."
Wait, what is that word? Let's check "गृहस्थ" definition:
"गृहस्थः-गृहे वसन् तिष्ठति"?
Look at the characters:
ग, ृ, हे
then:
र / स / व ?
There is a matra 'ा' and then 'स'?
Wait, "गृहे वास तिष्ठति"? No, "गृहे वा स तिष्ठति" or "गृहे रात्रौ तिष्ठति"?
Wait, look at "रापु":
First letter: looks like 'र' with 'ा' -> 'रा' or 'स' with 'ा' -> 'सा' or 'ग' with 'ा' -> 'गा'?
Second letter: 'र' or 'ध' or 'प'? It has 'ु' below: 'तु' or 'धु' or 'पु'?
Wait! Could it be "गृहे साधु तिष्ठति"?
Wait, in Sanskrit: "गृहे साधु तिष्ठतीति गृहस्थः"? No, "साधु" is used in etymologies when forming words with affixes, but गृहस्थ is from 'सुपि स्थः' (क प्रत्यय).
Wait, look at: "गृहे दारैः सह तिष्ठति"? No.
Could it be "गृहे रतः तिष्ठति"?
Wait, let's look at the next line:
"अभिसम्पद्यते । (छान्दो०) । पालि-घरवासा (गृहवासः)।"
- is itनिक्षीयतेorनिचीयते? "निचीयते इति" -> grammatically निकायः = नि + चि + घञ्, so "निचीयते इति"! Look at the text: निचीयते! Yes, चwith dirgha ee!निचीयते इति।`
Next heading:
शाहबाजगढ़ी शिला : त्रयोदश अभिलेख
• कलिङ्गा = कलिंग देश (अथवा कलिंग देश के निवासी)। सं.-कलिङ्गाः।
'कलिङ्गु -पु. जगन्नाथात् पूर्वनिणे कृष्णातीरान्तरं शिले! कलिङ्गदेशः सप्रोक्तः'
इन्दुप्रतंदर्शी। (शब्द०)। [तंत्रों में कलिंग देश का वर्णन इस प्रकार से किया गया
है-'जगन्नाथात्समाभ्य कृष्णातीरान्तः प्रिये। कलिङ्गदेशः समाख्यातो
वाममार्गपरायणः॥'] पालि-कलिङ्गा (कलिङ्गाः, कलिङ्गः)।
Wait, let's look at:
'कलिङ्गु -पु. -> कलिङ्गः -पु. or कलिङ्ग -पु.? Looks like कलिङ्ग -पु.
पूर्वनिणे -> पूर्वनिणे or पूर्वभागे? Looks like पूर्वभागे or पूर्वनिणे? Let's check:
"
Here is the complete and accurate transcription of the text from both pages (Page 94 and Page 95) of the book सम्राट अशोक के अभिलेख:
[पृष्ठ ९४]
९४ / सम्राट अशोक के अभिलेख
• हते = मारे गये। सं.-हतम्। (हत - 'नाशितो। प्रतिहते, प्रतिरुद्धे, आशारहिते, गुणिते चा' (शब्द०)। पालि-हतो (हतः)।
• बहुतवकं = (उससे) कई गुना। सं.-बहुतावकम्। पालि-बहु (बहु)। तावतकं (तावकः)।
• मृटे = मर गये। सं.-मृताम्। 'मृतं मृतौ याचिते च' (अनेकार्थ० २.२०१)। पालि-मतो (मृतः)।
• ततो पच = उसके पश्चात। सं.-ततः पश्चात्। 'पश्चात् प्रतीच्यां चरमे' (अनेकार्थ० १७९२)। पालि-ततो (ततः)। पच्छा (पश्चात्)।
• अधुन = अब। सं.-अधुना (अस्मिन्काले)। 'साम्प्रतमधुनेदानीं सम्प्रति' (अभिधान० ६.१५३०)। पालि-अधुना