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सर्वकोश
सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary

देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा

DevanagariHindipublished80 पृष्ठ

पृष्ठ 58, कुल 80 में से

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पृष्ठ 58

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बायाँ स्तम्भ (पृष्ठ ९८):

९८ / सम्राट अशोक के अभिलेख
• परं = परे। सं.-परम्। पालि-परं।
• चतुरे ४ रञो = चार (४) राजा। सं.-चत्वारः ४ राजानः।
पालि-चत्तारो (चत्वारः)।
• तुरमये नाम = तुरमय नाम का। सं.-तुरमयः नाम। (नाम-नामयतीति
वा, नम्यते नायतेनेन वा। 'एवं नामाङ्कः।' प्रकाशस्यम्।
उदाहरण- 'हिमालयो नाम नगाधिराजः' (हिमालयः प्रकाशोऽग्निरूपैस्तैः
इत्यर्थः।) पालि-नाम। तुरमय = Ptolemy II Philadelphos of Egypt
(B.C. 285-247)
• अंतिकिनि = अंतोकिन। सं.-अन्तीकिनः। Antigonos II Gonatas,
King of Macedonia (B.C. 278-7 to 242 or 239), grandson of
Antigonos I.
• मक = मक। सं.-मकः। Magas, King of Cyrene in North Africa,
west of Egypt (c. B.C. 285-258).
• अलिकसुदरो = अलिकसुन्दर। सं.-अलिकसुन्दरः। (अलिकम्-अल्पं
भूयते इति। छलञ्चम्) (सुन्दरः-सुष्ठु उनत्ति आर्द्रीकरोति विनामति
मनोहरम्। मनोरमम्। अभिरामम्।) Alexander, King of Epirus, son of
Pyrrhus (c.B.C. 272-255) or Alexander of Corinth (c.B.C.
252-244).
• निच = नीचे (दक्षिण में)। सं.-नीचाः। (नीच-नीचेर्निचितं भवति-नि०
४.२४)। 'नीच - निकृष्टर्मी लक्ष्मीं चमति पामरे निमं वामने च।' (शब्द०)
'च्युडूणीचवर्हह्रस्वाः' (अमर० ३.१०८८)।
• चोडपंड = चोल और पाण्ड्य। 'चोडः कञ्चुकवेशयोः' (अनेकार्थ०
२.१३३२)। 'चोल-चोला इति ख्याते पुंसो वस्तभेदे च द्राविड़क्षोणिपयोश्च
देशभेदे पु.।' (शब्द०)। सं.-चोलपाण्ड्याः।
• अव = तक। सं.-यावत्। 'यावत्-त्रि. यसरीमाणमय्या । यत्परिमाणे।
यावती। (शब्द०)
• रज़िविषविस = राजा के राज्य में। सं.-राज्ञविषये। विषय आश्रये'
(अमर० ३.२१४२)। 'विषयः-इन्द्रियगोचरे शब्दादौ, देशे च।' (शब्द०)
पालि - विसयो (विषयः)।


दायाँ स्तम्भ (पृष्ठ ९९):

शिला अभिलेख - शब्द-विवेचन / ९९
• योनकंपोजेषु = यवनों और कम्बोजों में। सं.-यवन-कम्बोजेषु।
'यवन-पु. देशभेदे, तद्देशस्थे जने व.व.।' (शब्द०)। कम्बोज-'पञ्चनदं
समाश्रय देशदक्षिणपूर्वतः कम्बोजदेश' इत्युक्तदेशे च। (शब्द०)।
नाभकमनाभिपंतिष = नाभकों और नाभपंक्तियों में। सं.-नाभकनाभपंक्तिषु।
भोजपितिनिकेषु = भोजों तथा पितिनिकों में। सं.-भोजपिनितनिकेषु।
• अंध्रपालिदेषु = आंध्रों एवं पुलिंदों में। सं.-अन्ध्रपुलिन्देषु। अन्ध्रः-
देशभेदे, तन्त्य-लोके, जातिभेदे च। (शब्द०)। 'पुलिन्दः-चाण्डालभेदे।'
(शब्द०)। 'पुलिन्दा नाहला निष्ट्याः शबरा बर्बरा भटाः। मल्ला भिल्लाः
किराताश्च सर्वोऽपि म्लेच्छजातयः' ॥ (अभिधान० ३.९३४)
• अनुवदंति = अनुवर्तन करते हैं। सं.-अनुवर्तन्ते (=अविच्छेदेन
प्रवर्तयन्ति। अनुः सात्ये।) पालि-अनुवत्तति (अनुवर्तते)।
• दुत = दूत। सं.-दूताः। (दूतः-दूतो जवेनैर्वा, द्रवतेर्वा, वार्यतेर्वा-नि०
५.२)। 'दूतः सन्देशहरे वार्ताहरे' (शब्द०)। पालि-दूतो (दूतः)।
• व्रजंति = जाते हैं। सं.-व्रजन्ति। पालि-वजन्ति (व्रजन्ति)।
• श्रुतु = सुनकर। सं.-श्रुत्वा। पालि-सुत्वा, सुत्वान, सुणित्वान, सुणिय।
• धंमवुटं = धर्मवृत्त। सं.-धर्मवृतम्। पालि-वतं (वृत्तम्)।
• विधानं = विधान। सं.-विधानम्। 'विधानं हस्तिकवचे प्रेरणेऽध्वर्युने धने।
चेतोपायविधेषु प्रकारे वैरकमिणि'॥ (अनेकार्थ० ३.१०१६- १०१७)।
पालि-विधानं।
• अनुविधिर्यंति = अनुसरण करते हैं। सं.-अनुविध्यन्ति। 'उपत्तिष्ठति
तिष्ठन्तं गच्छन्तमनुगच्छति। करोति कुर्वतः कर्मच्छायानुरोधीयते ॥'
(महाभा० ६. ७५३)
• प्रितिरसो = तृप्ति का आस्वादन। सं.-प्रीतिरसः। 'प्रीतिः हर्षे, आमोदे,
तृप्तौ च' (शब्द०)। 'रसः-रस्यते इति। आस्वाद्ये।' (शब्द०)। परायत्तः प्रीतिः
कस्येव सं सेतुः पुरुकृः (मुद्रा० ३.४)। पालि-पीति (प्रीतिः)। रसो (रसः)।
• परात्रिकम् = पारलौकिक। सं.-पारत्रिकम्। पारत्रिकं - परत्र भवं।
पारलोक-हितकारके कम्मणि परलोकभवे च। (शब्द०)। पालि-परत्थ (परत्र)।
• मंञति = मानता है। सं.-मन्यते। पालि-मञ्जति।
• एताये च अटये = और इस प्रयोजन के लिए। सं.-एतस्मै च अर्थाय।
'अर्थो हेतौ प्रयोजने' (अनेकार्थ० २.२२४)।