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सर्वकोश
सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary

देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा

DevanagariHindipublished80 पृष्ठ

पृष्ठ 74, कुल 80 में से

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पृष्ठ 74

Here is the complete transcription of both pages:


[पृष्ठ १३२]

१३२ / सम्राट अशोक के अभिलेख

  • जलुका = जलूका। सं. -जलूका। 'जलूका चर्मरक्तपा' (अनेकार्थ० ३.६.४४)। पालि -जलुका।
  • अंबकपिलिका = अंबकपिलीका। सं. -अम्बापीपिलिका। (अम्बा- ✔ अम्ब से) (पिपीलिका - पिपीलिकामयः। नि० ७.२३)। 'अम्बा मताद् बाला स्यात्' (अमर० १.४९६)। 'पिपीलिका तु हीनाङ्गी' (अभिधान० ४.१२०८)। पालि -अम्मा (अम्बा)। किपिल्लिका (पिपीलिका)।
  • बढी = कच्छपी। सं. -डुडिः। डुणिः। (डोलयति। कमठो कच्छपो। 'कन्टो डुलिः' (अमर० १.२५४)। 'कच्छपी डुली' (अभिधान० ४.१३५६)। 'डुली कूर्म्याम्' (अनेकार्थ० २.१५४)।
  • अनाठिकमच्छे = अस्थिहीन मत्स्य। सं. -अनास्थिकमत्स्यः। अस्थि - न० अनस्थि। मांसमस्थ्न्यस्थं हाड़ इति। (शब्द०)। (मत्स्यः-माद्यन्ति लोके अनेनेति। जन्यनुविशेपः। झषः। मद्यः।) 'मत्स्यो मीनो विसारस्य शकुलो वैसारिपोऽण्डजः। शलुकः पृथुरोमा च स तुदर्शन इत्यपि। रोहिताद्यास्तु ये जीवन्ते मत्स्याः परिकीर्तिताः।' (भावप्र०)। पालि -अट्ठि । (अस्थि)। मच्छो (मत्स्यः)।
  • वेदवेयक = वेद-वेदयक। सं. -वेदव्यकः।
  • गंगापुपुटक = गंगापुप्पुटक। सं. -गङ्गापुप्पुटकः।
  • संकुजमच्छ = संकुज मत्स्य। सं. -शंकुमत्स्यः (मत्स्यः - माद्यन्तेऽनेनान्थे भक्षपाच - नि० ६.२७)। [शंकुलः - मत्स्यभेदे (श०क०) -शब्द०] ।।
  • कफटसय्यक = कछुआ तथा साही मछली। सं. -कमठशल्यकौ (कमठः- के जले मयति वसतीति। कच्छपः। कूर्मः। 'कूर्मे कमठकच्छपौ' (अमर० १.२५६)। पालि -सल्लको (शल्यकः)।
  • पंनससे = एक प्रकार की गिलहरी। सं. -पर्णशशः।
  • सिमले = बादरसिंया। सं. -सुमरः। सुगमेरु।
  • संडके = सांड। सं. -षण्डकः। 'षण्डो गोपतिः' (अमर० २.९९४)। 'षण्डः पण्डस्ताख्यावान् सण्डेोपि घितियो मतः।' (विश्वप० ४)।
  • ओकपिण्डे = ओकपिण्ड। सं. -ओकपिण्डः। (ओकः पक्षी)। ओके पिण्डी येषां ते (जानवर जो घरों में अपना भोजन पाते हैं) (जैसे, बिल्ली, चूहा, गौह और नेवल) (बिल्वाल-मूषिक-गोधा-मुगुसाः वृद्धोय के अनुसार)।
  • पलासते = गैंडा। सं. -पलगण्डः। पालि -पलासदो।

[पृष्ठ १३३]

स्तम्भ अभिलेख - शब्द-विवेचन / १३३

  • सेतकपोते = श्वेत कपोत। सं. -श्वेतकपोतः। (श्वेतः -श्वेयते इति। कपोतः।) पालि -सेतो (श्वेतः)। कपोतो (कपोतः)। (कपोतः-को वायुः तद्विद्याधराः। पारावतः।)
  • गामकपोते = ग्राम कपोत। सं. -ग्रामकपोतः। (ग्रामः- विश्रादिवर्णेप्राया जनवसतिः विश्रामसहिता बहुजनवसतिः। संवसथः। हट्ट्यादिसंवसतीः।) 'ग्रामः संवसथे घोपस्तद्विशेहिता बहुजनवसतिः (२.८०८)। पालि -गामो (ग्रामः)। कपोतो (कपोतः)।
  • बडुपदे = चौपाये। सं. -चतुष्पदः। 'चतुष्पदो गवादिषु' (अनेकार्थ० ३.१५४.२)। पालि -चतुप्पदो।
  • परिवोगं नो एति = उपयोग में नहीं आते। सं. -परिभोगं नैति। पालि -परिभोगं (परिभोगम्)। नो (न)। एति (एति)।
  • खादियती = खाये जाते। सं. -खाद्यते। पालि -खज्जति।
  • एडका = भेड़। सं. -एडका। (एडः-इल्लतीति। यद्वा आ सर्वतः इंड्यते। अहिरैः। एडकः। मेषः।) 'मेढ्रोरोरभ्रोर्णिमुखेवृष्णय एडके' (अमर० २.९.३३)। पालि -एलको (एडकः)।
  • सूकली = सूकरी। सं. -सूकरी। (सू-इत्यव्यक्तं शब्दं करोति। वराहे। वाराहायमिति स्त्री।) 'शूकः सूकरोऽपि च' (विश्वप० ३)। पालि -सूकरो (सूकरः)।
  • गभिनी = गाभिन। सं. -गर्भिणी। (गर्भोऽस्त्यस्याम् इति। गर्भवती (सगर्भा)। [गर्भः-गर्भः गुणेः तृणार्थत्वं, गिरत्यनर्थानिति वा-नि० १०.२३)। पालि -गब्भिनी।
  • पायमीना = दूध पिलाने वाली। सं. -पाययन्ती (पयस्विनी इत्यर्थः)।
  • अवधिय - प - तके = अवध्य हैं। (इनके) बच्चे। सं. -अवध्याः। 'अवध्यमवध्यं स्यान्नधर्वधक्रवदस्यपि'। (अनेकार्थ० ३.२७६)। पोतकाः। पालि -पोतको (पोतकः)।
  • आसांमासिके = छः महीने तक के। सं. -आषण्मासिकाः। षाण्मासिक-न० षष्ठे मासे भवः। (शब्द०)। (मासा मानात् - नि० ४.२७)
  • वधियाकुकुटे = मुर्गों को बधिया करना। सं. -वधिक्रुकुटः। (कुक्कुटः-कुक्वा आत्तानन कुटतीति। पक्षिविशेषः। कुक्कवाकुः। ताम्रचूडः। चरणायुधः।) 'कुक्कुटश्चरणायुधः' (अमर० २.५१३)। 'कुलाले कुक्कुटं प्राहुः' (हार० ८६)। उव्ट का निर्वचन -'कुत्सिते शब्दमसमुत्सृगानां तनोतीति