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सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary

देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा

DevanagariHindipublished80 पृष्ठ

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[header] १३८ / सम्राट अशोक के अभिलेख

▪ अनुपटीपजेया = (धर्म का) अनुसरण करें। सं. - अनुप्रतिपद्येत। पालि -
पटिपज्जति (प्रतिपद्यते)।
▪ कानि = किनको। सं. - कान्।
▪ अभ्युनमयेहं = अभ्युन्नत करूं। ऊंचा उठाऊं। सं. - अभ्युन्नमयेयम्।
▪ धंमसावनानि = धर्मोपदेश। सं. - धर्मश्रावणानि।
▪ सावयामि = सुनवाता हूं। सं. - श्रावयामि। पालि - सावेति, सुणापेति
(श्रावयति)। ['परियत्ति']
▪ धंमानुसथिनि = धर्मानुशासन। सं. - धर्मानुशिष्टीः। [अनुशिष्टिः - आदेश,
शिक्षा, आज्ञा, विचारपूर्वक कर्तव्याकर्तव्य का निरूपण। (संस्कृत०)।। पालि

  • धम्मो (धर्मः)। अनुसिट्ठि (अनुशिट्ठिः)।
    ▪ अनुसासामि = सिखलाता हूं। सं. - अनुशास्मि। पालि - अनुसासति
    (अनुशास्ति)। ['पटिपत्ति']
    ▪ सुतु = सुन कर। सं. - श्रुत्वा। पालि - सुत्वा।
    ▪ आनपयितंसि = आज्ञात हैं। सं. - आज्ञाताः।
    ▪ य....सा (=यथा पुलिसा)। सं. - य(था पु)रुषाः।
    ▪ पलिगोवदिसंति = प्रचार (प्रेरित) करेंगे। सं. - पर्यवगोदिष्यन्ति।
    ['परि-अव-✓वद्' से निष्पन्न]। पालि - ओवदति।
    ▪ पोथविसंति = प्रसार करेंगे। सं. - प्रवितारयिष्यन्ति। पालि -
    वित्थारिस्सन्ति (विस्तारयिष्यन्ति)।
    ▪ अनुवेखमाने = देखते हुए। सं. - अनुवीक्षमाणेन।
    ▪ धंमथंभाणि = धर्मस्तंभ। सं. - धर्मस्तम्भाः। [स्तम्भः स्थूणायाम्
    (शब्द०)]। पालि - थम्भो (स्तम्भः)।
    ▪ मगेसु = मार्गों पर। सं. - मार्गेषु। ['मार्गः मार्ग्यते संस्क्रियते पादेन, मृग्यते
    गमनान्विष्यते इति वा' उणा०।]। पालि - मग्गो (मार्गः)।
    ▪ निगोहानि = वट-वृक्ष। सं. - न्यग्रोधाः। ['न्यग्रोधः - न्यक् रोहतीति' इति।'
    वटवृक्षः। 'न्यग्रोधो वटपादपे' (अनेकार्थ० ३.९८५)]। पालि - निग्रोधो
    (न्यग्रोधः)।
    ▪ रोपापितानि = लगवाये हैं। सं. - रोपिताः। [रोपित - वृक्षदर्शनार्थाय
    कृताङ्कुरारोपणे। (शब्द०)। पालि - रोपितो (रोपितः)। रोपापेति (= to cause to
    be planted or sown - Childers)

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[header] स्तंभ अभिलेख - शब्द-विवरण

▪ छायोपगानि = छाया देने वाले। सं. - छायोपगाः। ['छाया सूर्याप्रिया
कान्तिः प्रतिबिम्बमनातपः'। (अमर० ३.१३३२)]। पालि - छाया (छाया)।
उपगो (उपगः)।
▪ होसंति = होंगे। सं. - भविष्यन्ति। पालि - हेस्सति (भविष्यति)।
▪ अंबावडिक्या = आम के बाग। सं. - आम्रवाटिकाः। आम्रे रसालो माकन्दः
कामाङ्गः पिकबान्धवः। वनपूगो शवश्चूतः परपुष्टमहोत्सवः॥ मधूदूतो मधुफलः
सूफलो मदिरासखः। वसन्तपीडोऽसौ तु सहकारोऽतिसौरभः॥ (निघण्टु०
१.१२०-१२२)। 'वाटीपुष्पाह्वयान्त्येतो क्षुद्रारामः प्रसीदिका' (अभिधान०
४.११२३)। [वाटीशब्दः पुष्पवृक्षाश्यामन्येति।]। पालि - अम्बो (आम्रः)।
▪ अढकोसिक्यानि = आधे-आधे कोस पर (अवस्थित)। सं. -
अर्द्धक्रोशकानि। क्रोश - पुं. अष्टसहसहस्तमाने। मतान्तरे सहस्रद्वयमाने।
(शब्द०)। पालि - अद्धो, अड्ढो (अर्द्धः)। कोसो (क्रोशः)।
▪ उदुपानानि = कुएँ। सं.

(अनेकार्थ० ३.८२३)। पालि - ब्राह्मणे (ब्राह्मणः)।13.• आजीविकेसु = आजीविकों में। सं. - आजीविकेषु। पालि - आजीविको, अजीवको (आजीवकः, अजीवक्कः)।14.• निगिंथिसु = निर्ग्रन्थों में। सं.- निर्ग्रन्थेषु। निर्ग्रन्थः - निर्गतो ग्रन्थेभ्यः। क्षपणकः, दिगम्बरः, बौद्धभेद, मुनिसंघे, मुनिभेदे च। निर्ग्रन्थि, मूर्खे, निःकवचम्, Wait:मुनिसंघेorमुनिभेदे? Let's read character by character: क्षपणकः, दिगम्बरः, बौद्धभेद, मुनिसंघे, मुनिभेदे च। निर्ग्रन्थि, मूर्खे, निःकवचम्, Wait, look at: क्षपणकः, दिगम्बरः, बौद्धभेद, मुनिसंघे, मुनिभेदे च। निर्ग्रन्थि, मूर्ख, निःकवचम्, निर्गते गते वा' (शब्द०)। 'नग्नाटकोनिर्ग्रन्थककम्बलीश्यापथा नग्ने' (

? Let's zoom in: पि [यद] सि? No, पि [य] दसि- wait, between [य] and सि, is there a letter? It saysपि [य] दसि.Wait, no:पि [य] सि? No, Ashok's name is पियदसि. Wait, look at: प.......स = पि [य] दसि। सं. - प्रि [यद] श्शी।Wait, after 'पि', there is '[य] दसि' or '[य] सि'? It looks like[य] दसि. Wait, let's check: प.......स = पि [य] दसि? No, wait, look at line 14: देवानंपिय......वदसि = देवानंपिये [पि] यदसि। सं. - देवानांप्रियः [प्रि] यदर्शी।In line 4:• प.......स = पि [य] दसि। सं. - प्रि [यद] र्शी।Wait, look at[यद] र्शी: प्रि [यद] र्शीwith repha on 'शी'? No,प्रि [यद] श्शी- wait,प्रि [यद] र्शी? It has a repha on 'शी': प्रि [यद] र्शीorप्रि [यद] श

गुहा अभिलेख - शब्द-विवेचन
गुहा अभिलेख - बराबर गुहा
प्रथम अभिलेख
▪ निगोहकुभा = न्यग्रोध गुफा। सँ.-न्यग्रोधगुहा। (न्यग्रोधः -न्यक् रुणद्धि
इति। वटवृक्षः।) 'वटे वैश्रवणावासो न्यग्रोधो बहुपादध्रुवः।' (निघण्टु० ४१)
[वैश्रवण=कुबेर]। (गुहा - √ गुह् से) पर्वतादेर्गह्वरम्। बिलम्। पालि -निग्रोधो
(न्यग्रोधः)। गुहा (गुहा)।
▪ दिना = (दान में) दी गयी। सँ.-दत्ता। पालि -दिन्नो (दत्तः)।
▪ आजीविकेहि = आजीविकों को। सँ. -आजीविकेभ्यः। पालि -आजीवको
(आजीवकः)।
द्वितीय अभिलेख
▪ खलतिकपवतसि = खलतिक पर्वत पर। सँ.-खलतिकपर्वते। [खलतिक -
√ स्खल् से। पालि - खलति=to stumble (Childers)]। पब्बतो (पर्वतः)।
तृतीय अभिलेख
▪ एकुनवीसतिवसाभिसिते = अभिषेक के उन्नीस वर्ष हो चुकने पर।
सँ.-एकोनविंशतिवर्षाभिषिक्तः। पालि -एकूनवीसं, एकूनवीसति
(एकोनविंशतिः)।
▪ जलघोसागमथात = वर्षा (से बचाव) के लिए। सँ.-जलघोषागमार्थतः।
'घोषः शब्दाभीरनिवासयोः' (त्रिकाण्ड० ३.९९१)। 'घोषः कांस्ये स्वने
गोपघोषकाभीरपल्लिषु' (अनेकार्थ० २.५६५) 'घोषः-घोषन्ति गावोऽत्र।
आभीरपल्ल्याम्। ध्वनौ, अम्बुदनादे च। (शब्द०)। 'आगमस्त्वागतौ शास्त्रे'
(अनेकार्थ० ३.१०६०)। (जलम्-जलति जीवयति लोकान्। जलति
आच्छादयति भूम्यादीनिति वा। पानीयम्।) (घोषः-घोषन्ति शब्दायन्ते गावो
यस्मिन्। ध्वनिः।)। पालि -जलं (जलम्)। घोसो (घोषः)। आगमो (आगमः)।
अत्थाय (अर्थाय)।
▪ सुपिये = अति सुंदर। सँ.-सुप्रिया। (प्रियः-प्रीणातीति। हृद्यः।)
▪ ख..... = ख [लतिकपवतसि]। सँ. -खलतिकपर्वते।