सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary
देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा
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११४ | सम्राट अशोक के अभिलेख
• परिवेखेसं = देखूँगा। सं. -परीक्षामि। पालि -परिक्खेसं। (It is probably the
aorist of a denominative stem from परिवेक्ष and परीक्षाम, Or it may
represent the a potential variety of परिपश्येयम्) (Childers)।
• पंचसु पंचसु वसेसु = पाँच पाँच वर्षों में। सं. -पञ्चसु पञ्चसु वर्षेषु। यह
महामात्रोंका समय होता (अभि०भा० २.१५४)। पालि -पञ्चसु (पञ्चसु)।
वसेसु, वस्सेसु (वर्षेषु, वर्षेषु)।
• निक्खामयिसामि = भेजूँगा। सं.-निष्कामयिष्यामि। पालि -निक्खामेस्सं
(निक्खामयिस्सति)।
• अचण्डाने = अचण्डोंको। सं. -अचण्डान्। (कर्कश = कठोरा अस्पृष्णं क्रूरा
निष्ठुरा।) 'कर्कशं कठिनं क्रूरं कठोरं निष्ठुरं दृढम्' (अमर० ३.१७५३)
'कर्कशः पृष्ठ-शूलङ्गे पुरुषानृशंसयोरप्यसत्सहाययोः' (अभि०भा० ६.२३८७)
पालि -कक्कसो (कर्कश)।
• मोगले = शांत स्वभाव वाला। सं. -अमृण्डुकः। (राण्ड = चण्डस्ते हृदौ
भवन्तीति रौवराताविशीण्डुः। असंगतोऽल्पक्रोधः।) 'खरश्चण्डः' - त्रिकाण्ड
३.६.६५। पालि -गण्डो (गण्डः)।
• सचिनारंभ = वधरों को काम में लेने वाला। सं.-श्लक्ष्णारम्भः। (श्लक्ष्ण-
$\sqrt{रिस्}$ से निष्पन्न)। श्लक्ष्ण = अल्प, चिकणो, छोटे या (शब्द०)
(अमरम् = आ$\sqrt{रभ्}$ से निष्पन्न)। 'आरम्भः संप्रसारणम्' (अमर०
३.१.१५६)। युद्धम् करो = 'रणारम्भः समीरः (हेम० २.४८)। पालि -सण्हे
(श्लक्ष्णः)। आरब्भो (आरम्भः)।
• होसति = होगा। सं. -भविष्यति। पालि -हेस्सति, भविस्सति।
• उजेनिते = उज्जयिनी से। सं.-उज्जयिनीतः। (उज्जयिनी,
उज्जायली-जेय उत्+ जयः उत्ति अस्याः अथवा उज्जयन्तीति। विशाल
नगरी। अवन्ती। विक्रमादित्य राजधानी।) 'विशालोज्जयिनी समे' (त्रिकाण्ड०
२.१.९५)। पालि -उज्जेनी (उज्जयनी)।
• कुमाले = कुमार। सं.-कुमारः। (स्त्री पुरियता मारयति दृष्टान्
राजकुमारः।) 'कुमारो मर्तुदारकः' (अमर० १.११५४)।
• हेदिसामेव = ऐसे ही। सं.-ईदृशमेव। ईदृश (श) = अस्येव दर्शनमस्य
(शब्द०)। पालि -एदिसो, परिसो (ईदृशः)।
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शिला अभिलेख - शब्द-विश्लेषण / १०७
• वगं = ... (अहिंसाकारी) क्या को। सं. -वर्गावः। (वर्गः = यूध्यते इति।
...अभिधानचिन्तामणिः।) पालि -वग्गो (वर्गः)।
• अतिकामयिसति = अतिक्रमण होंगे देगा। बीतने देगा।
सं.-अतिक्रामयिष्यति। पालि =अतिक्कमयिस्सति (अतिकामयति)।
• तथालोचते = तथारोचना। सं. =तथाभिजाततः। तथारीशा -शिण्युद्देशे
शरीरोद्देशे (शब्द०)। पालि -तथारोचना (तथाशीला)।
• आगपयितु = आगलेका किये बिना। सं. =अज्ञापयित्वा। पालि -अाणापेत्वा
(अज्ञापयित्वा)।
• आसने = अपना। सं. - आत्मनः। पालि -अत्तनो (आत्मनः)।
• जानिसंति = जानकारी करेंगे। सं. - ज्ञास्यन्ति। पालि -जाणिस्सन्ति
(ज्ञास्यति)।
जौगड शिला : द्वितीय पृथक अभिलेख
• समापाथं = समापा में (स्थित)। सं. - समापायाम्। समापः-सम्यक् आपो
यत्र। सेकननगरम्कारे। (शब्द०)।
• लाजनवचनेनक = राजा के संदेश के रूप में। सं. -राजवचनानिकम्।
(लाजवचनेन = राजोन निर्देशम्)।
• लग पखाये हुखनि किति मे सयेण किसलेन युजेयु -लिपिकर की भूल से
इन पदों की पुनरावृत्ति होना प्रतीत होता है।
• अंतानं = सीमावर्ती लोगों की। सं. -अन्तानाम्। 'अन्त्याश्यान्तः' (द्विरूप०
७)। 'अन्तोऽवसाने सीमा च' (अभिधान० ४.१६२)।
• किछंदे = क्या सोचने वाला। सं. -किञ्छन्दः। 'छन्दः अभिलाषे,
वशतायाम्, विपश्चिते धा' (शब्द०)। पालि -छन्दो (छन्दः)।
• अपेसु = हमारे बारे में। सं. -अस्मासु। पालि -अम्हेसु।
• एताका = इतनी। सं. -एतावती। पालि -एत्तको (पुं.)।
• अनुविजिन = अनुद्विग्न। सं. -अनुद्विग्नाः। उद्विग्न = उद्वेगयुक्तो,
दुःखपरिहारातस्तथा व्याकुलचित्ते, क्षुभितो च। (शब्द०)। पालि -उब्विग्गो
(उद्विन्नः)।
• हेयू = होवें। सं. -भवेयुः।
• ममियाये = मेरे में। सं. -मयि। पालि -मयि।