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सर्वकोश
सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख, स्तम्भलेख एवं गुहालेख - मूल प्राकृत, ब्राह्मी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Inscriptions of Emperor Ashoka with Hindi Commentary

देवानांप्रिय प्रियदर्शी सम्राट अशोक (सम्पादक: जनार्दन भट्ट) द्वारा

DevanagariHindipublished80 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 80 में से

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पृष्ठ 76

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१३६ / सम्राट अशोक के अभिलेख
• अजके = बकरे। सं. -अजकः। पालि -अजो (अजः)।
• अस्सा = घोड़े। सं. -अश्वस्य। पालि -अस्सो (अश्वः)।
• लखने = दागना। सं. -लक्षणम्। (लक्ष्यते ज्ञायतऽनेनेति। विग्रहः।) लक्षणं
नामाभियोग्योः (अनेकार्थ० ३.८२०)। पालि -लक्खणं।
• अंतिक्याये = अंतराल में। सं. -अन्तरे। पालि -अन्तरे।
• पंचवीसंति = पच्चीस। सं. -पञ्चविंशतिः। 'विंशतिः द्वे दशती'।
• बंधनमोखानि = बंधन से रिहाई। सं. -बन्धनान्मोक्षाः। (बन्धनम्-
बध्यतेऽनेनेति। कारागारम्।) (मोक्षः -मोक्ष्यते दुःखमनेन। मुक्तिः।) 'मोक्षो
निःश्रेयसे वृत्तविवाहे मोचने मृतौ' (अनेकार्थ० २.५७३)। पालि -बन्धनं
(बन्धनम्) । मोक्खो (मोक्षः)।
देहली-तोपरा स्तंभ - षष्ठ अभिलेख
• दुवाडसवसअभिसितेन = अभिषेक के बारह वर्ष हो चुकने पर।
सं. -द्वादशवर्षामिषिक्तेन। द्वादशन्-पुं. द्वौ च दश च द्वयधिका वा दशा
(द्वन्द्वः)। पालि -बारस (द्वादश)। वस्सो (वर्षः)। अभिसितो (अभिक्षितः)।
• लोकसा = लोगों का। सं. -लोकस्य। (लोकः -लोक्यतेऽसौ। भुवने जनपु
च। -शब्द०) पालि -लोकस्स।
• ते = जितने। सं. -येन।
• अपहटा = प्रह्लादा न करने वाला। सं. - अप्रहर्ता। पालि -पहारे (प्रहारः)।
• धंमवढि = धर्म में प्रवृत्त। सं. -धर्मवृद्धिः। (वृद्धिः समृद्धौ अभ्युदये,
सम्पत्तौ, सङ्के चा-शब्द०)।
• पापोवा = प्राप्त करे। सं. -प्राप्नुयात्। पालि -पप्पोति (प्राप्नोति)।
• पवेखामि = ध्यान देता हूँ। सं. -प्रत्यवेक्षे। पालि -पच्चवेक्खतीति
(प्रत्यवेक्षते)।
• पतिआसंनेसु = जो निकट हैं। सं. -प्रत्यासन्नेषु। (प्रत्यासन-
आसन्निकटस्थं -शब्द०)।
• अपकठेषु = जो दूर हैं। सं. -अपकृष्टेषु पालि -अपकट्ठिति (अपकर्षीति)।
• किम् = ऐसा क्या? सं. -किम्। 'किं प्रश्ने कुत्सितेऽपि च'
(अनेकार्थ०-१.७७५)। पालि -किं।
• आवहामि = प्राप्त कराता हूँ। सं. -आवहामि। पालि -आवहती
(आवहति)।


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स्तंभ अभिलेख - शब्द-
[वि]दहामि = विधान करता हूँ। सं. -विदधामि। पालि -विदहति
(विदधातीति)।
• हेमेवा = ऐसे ही। सं. -एवमेव। 'एवोपम्ये परिभवे ईषदर्थेऽवधारणे'
(अनेकार्थ० १.८१६)। पालि -एवमेव।
• सवनिकायेसु = सभी वर्गों का। सं. -सर्वनिकायेषु। 'सर्वं समस्तममूनं
कृत्स्नं सकलं समग्रम्' (अभिधान० ६.१४३३)। निकायः -समानधर्माणिगसह।
निकायः सङ्घसङ्घयोः' (अनेकार्थ० ३.१०८९)। 'स्थानिकायः पुञ्जराशी'
(अमर० २.५३८)। पालि -सब्बो (सर्वः)। निकायो (निकायः)।
• आतना = स्वयं। सं. -आत्मना। पालि -अत्तना।
• पचूपगमने = (लोगों तक) पहुँचना। सं. -प्रत्युपगमनम्।
• मोख्यमते = मुख्य बात। सं. -मुख्यतमम्। मुख्य -त्रि. मुखे आद्ये भवः
वरः। प्रथमकल्पे, श्रेष्ठे च। (शब्द०)। 'मतं तु संमतेऽभिहिते' (अनेकार्थ०
२.१४८)। पालि -मोक्खो (मौख्यः)।
देहली-तोपरा स्तंभ - सप्तम अभिलेख
• अतिकंतं अंतरं = अतीत काल में। सं. - अतिक्रान्तम् अन्तरम्।
[अति-पूजयाम्, उत्कर्षे, अतिक्रमणे, अतिशये च।' (शब्द०)] ['अन्तरं
स्यादवकाशोशे। मध्ये विहायर्ते त्वादयों विशेषेऽवसरेऽवधौ।' (अनेकार्थ०
३.१११४-१११५)]। पालि -अतिक्कन्तो (अतिक्रान्तः)। अन्तरं (अन्तरम्)।
• हुसु = हुए। सं. -अभूवन्।
• इच्छिसु = चाहते थे। सं. -ऐषिषुः।
• धंमवडिया वढेया = धर्म की वृद्धि के साथ बढ़ें। सं. -धर्मवृद्ध्या वर्धेत।
[वृद्धिः समृद्धौ अभ्युदये, सम्पत्तौ, समूहे चा' (शब्द०)] पालि - धम्मो
(धर्मः)। बढ़ि, वृद्धि (वृद्धिः)। वड्ढि (बढ़ती)। [इसी प्रकार के पालि में
कतिपय अन्य प्रयोग -सुखेन सुखितो होति। पमज्जन पमोज्जितं। अधिहितं
अधिष्ठानं। लाभ लभामि सब्वत्थ। उपसेयं उपवसिस्स। इत्यादि।]
• अनुरुपाया = अनुरूप। सं. - अनुरूपया। पालि - अनुरूषो (अनुरूपः)।
• एतं = इस विषय में। सं. - अत्र। पालि - एत्थ।
• हुया = हुआ (अर्थात्, लगा)। सं. -अभूत्।
• किन्तू = कैसे। सं. -केनस्वित्। पालि -केन'सु।