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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (९३)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (९३)

यह चन्द्र सूर्यको ग्रहण कर कंदुकलीला कर सकता है तथा कुलाचल पर्वतोंको लेकर कंदुकक्रीडा करता है ॥ ४५ ॥ जो मानस सरोवरके उत्तर चारों ओर पुर हैं उनको छेदनकर महात्मा दिक्पालोंको ग्रहण किया है ॥ ४६ ॥

तत्रैव रमते राजा मातामहकुलैः सह ॥ तत्रेंद्री या पुरी रम्या स स्वयं तत्र तिष्ठति ॥ ४७ ॥ अन्यान्यन्येभ्य एवादान्मंत्रिभ्यो राक्षसाधिपः ॥ विशेषतोऽलंकृता सा पुरी परमदुर्लभा ॥ ४८ ॥

वहां वह राजा मातामहके कुलसहित रमण करता है वहां एक इंद्रकी पुरी है जहां वह स्वयं स्थित हो रमता है ॥ ४७ ॥ उस राक्षसराजने अनेकोंको मंत्रिपद प्रदान किया है, विशेष करके वह पुरीं प्राणियोंको परम दुर्लभ है । ४८ ।

जगतां सारमाकृष्य यथास्थानं सुमंडिता ॥ चंपकाशोकमन्दारकदलीप्रियकार्जुनैः ॥ ४९ ॥ पाटलाशोकजंबूभिः कोविदारैश्च चंदनैः ॥ पनसैः सालतालैश्च तमालैर्देवदारुभिः ॥ ५० ॥

जगत्के सार खेंचकर उसको निर्माण किया है, चम्पक अशोक मन्दार कदली प्रिय अर्जुन ॥ ४९ ॥ पाटल अशोक जम्बू कोविदार चन्दन पनस साल तमाल ताल देवदारु ॥ ५० ॥

बकुलैः पारिजातैश्च कल्पवृक्षैरलंकृता ॥ अन्यैश्च विविधैर्वृक्षैः सर्वर्तुकुसुस्मोज्ज्वलैः ॥ ५१ ॥ दिव्यगन्धरसैर्दिव्यैः सर्वर्तुफलसंयुतैः ॥ भ्रमरैः कोकिलैर्नानावर्णपक्षिभिरुज्ज्वला ॥ ५२ ॥

वकुल पारिजात तथा कल्पवृक्षोंसे अलंकृत और भी सब ऋतुओंके फूलोंसे युक्त ॥ ५१ ॥ दिव्य गन्धरसोंसे युक्त सम्पूर्ण ऋतुओंके फलसे संयुक्त भौंरे कोयल और जहां नाना पक्षी बोल रहे हैं ॥ ५२ ॥

शातकौंभमयैः कैश्चित्कैश्चिदग्निशिखोपमैः ॥ नीलांजलनिभैश्चान्यैः शोभिता वरपादपैः ॥ ५३ ॥ दीर्घिकाः संति बह्व्योऽत्र जल पूर्णा महोदयाः ॥ महार्हमणिसोपानाः स्फाटिकांतर्कुट्तिमाः ५४

कहीं सुवर्णके बने कहीं अग्निके शिखाके समान कहीं नीलांजन पर्वत उज्ज्वल पर्वतोंसे शोभित हैं ॥ ५३ ॥ जहां जलसे अनेक बावडी शोभित हैं जहां महा महामणियोंकी जटिल सीढी बनी हैं ॥ ५४ ॥

फुल्लपद्मोत्पलवनाश्चक्रवाकोपशो-भिताः दात्यूहगणसंघृष्टा

(९४) अद्भुतरामायण [सप्तदश-

हंससारसनादिताः ॥ ५५ ॥ तत्र तत्रावनेर्देशा वैदूर्यमणिसन्निभाः ॥
शार्दूलैः परमोपेताः सुखार्थमुपकल्पिताः ॥ ५६ ॥
फूले पद्म उत्पलके वनके वन है, उनपर चकवाचकवी शोभित हैं, पक्षीगणोंसे नादित है ॥ ५५ ॥ उस वनके देश जहां तहां वैदूर्यमणियोंसे शोभित, शार्दूललोंसे युक्त जो सुखके निमित्त कल्प किये हैं ॥ ५६ ॥

सर्वर्तुसुखदा रम्याः पुंस्कोकिलकला रवाः ॥ ये वृक्षा नंदनेऽ-
तिष्ठन् ये च चैत्रवने स्थिताः ॥ ५७ ॥ मन्दरेऽन्येषु शैलेषु ते वृक्षास्तत्र
संस्थिताः ॥ नानामणिमयी भूमिर्मुक्ताजालमयी तथा ॥ ५८ ॥
सबऋतुओंमें सुख देनेवाले पुंस्कोकिलाके शब्दोंसे युक्त जो वृक्ष नन्दनवनमें स्थित हैं जो चैत्रवनमें स्थित हैं ॥ ५७॥ जो वृक्ष मन्दराचलपर स्थित हैं जो भूमि नानामणिमय मुक्ताजालमयी ॥ ५८ ॥

विचित्रबद्धसोपानप्रासादैरुपशोभिता ॥ पुरद्वारसमाकीर्णा पुरी
परमशोभना ॥ ५९ ॥ न देवैरनुभूयेत स्वर्गिभिर्नोनुभूयते ॥ तत्पुरी-
स्थितिमाकांक्ष्य तपः कुर्वन्ति सत्तमाः ॥ ६० ॥
विचित्र सीढ़ियोंसे महलोंसे शोभित पुरद्वारोंसे आकीर्ण पुरी शोभित है ॥ ५९॥ जिसका देवता और स्वर्गी भी अनुभव नहीं कर सकते उस पुरीमें स्थितिके निमित्त महात्मा तप करते हैं ॥ ६० ॥

तस्यां सहस्त्रवदनो रावणो राक्षसाधिपः ॥ आस्ते जगद्वशीकृत्य
हेलया बाहु लीलया ॥ ६१ ॥ इंद्रादींस्त्रिदशान्सर्वान्गले बद्ध्वा स
किन्नरान् ॥ गन्धर्वान्निन्दानवान्भीमान्सर्पान्विद्याधरांस्तथा ॥ ६२ ॥
उसका राजा वह सहस्त्र मुखका रावण है, और सब जगत्को अपनी भुजाओंसे वश करके स्थित होता है ॥ ६१ ॥ वह इन्द्रादि देवताओंको किन्नरों गन्धर्वों दानव भयंकर सर्प और विद्याधरोंको पराजय कर ॥ ६२ ॥

बालक्रीडनया क्रीडन्मेरुं मन्येत सर्षपम् ॥ गोष्पदं मन्यते चाब्धि
सर्वलोकांस्तृणोपमान् ॥ ६३ ॥ द्वीपांल्लोष्टसमान्वीरो न किंचिद्गणय-
न्दृशा ॥ स यदा सर्वलोकानां त्रासने समुपारभत् ॥ ६४ ॥
उनसे बालक्रीडाके समान खेल करता हुआ मेरुको सरसोंके समान मानता है सागरको गौके पदके समान और सब लोक को तृणके समान ॥६३॥ द्वीपोंको