अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (९१)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (९१)
अतिथिरूप वहां एक ब्राह्मण आया ॥ २७ ॥ वह ब्राह्मण आकर मेरे पितासे कहने लगा मैं चौमासेके चारं महीने तुम्हारे मंदिरमें रहूंगा ॥ २८ ॥
यदि सेवापरो नित्यं भवस्यमरसन्निभः ॥ जनको मत्पिता देवद्विजभक्तिपरायणः ॥ २९ ॥ ब्राह्मणं वासयामास नानाभक्ष्यं समादिशत् । अहं च तस्य सेवायै नियुक्ता धर्मभीरुणा ॥ ३० ॥
हे राजन् ! जो नित्य मेरी सेवामें तत्पर रहोगे तो, देवताहो जावोगे हमारे पिता जनकजी द्विज और देवताकी भक्तिमें परायण हैं ॥ २९ ॥ उस ब्राह्मणको नाना प्रकारके भक्ष्य भोज्यकी सामग्री प्रदान की गई; और धर्मभीरु हमारे महाराजने मुझे उसकी सेवा करनेको नियुक्त किया ॥ ३० ॥
यदा यथाज्ञापयति द्विजः स परमार्थवित् । तं तथा ह्यकरवं तत्र रात्रिन्दिवमतन्द्रिता ॥ ३१ ॥ नानातीर्थाभिगमनं कृतं तेन महात्मना। तत्रत्याश्च यथाश्चित्राः श्रावयामास मां द्विजः ॥ ३२ ॥
परमार्थका जाननेवाला वह ब्राह्मण जो जो आज्ञा देता, वह मैं रातदिन निरालस्य होकर सम्पादन करती थी ॥ ३१ ॥ उस महात्माने अनेक तीर्थोंमें अभिगमन किया था, वहां उस ब्राह्मणने मुझे अनेक प्रकारकी कथा श्रवण कराई ॥ ३२ ॥
सेवया मम धैर्येण चानुकूल्येन तर्पितः । कदाचिद्ब्राह्मणश्रेष्ठः प्रियभाषी यदात्थ माम् ॥ ३३ ॥ तद्वोऽहमभिधास्यामि शृणुत द्विजपुंगवाः । एकदा प्रातरुत्थाय कृतमैत्रः कृताह्निकः ॥ ३४ ॥
मेरी सेवा, धैर्य और अनुकूलतासे तृप्त होकर एक समय वह प्रियभाषी श्रेष्ठ ब्राह्मण मुझसे कहने लगा ॥ ३३ ॥ हे ब्राह्मणो ! वह मैं तुमसे वर्णन करती हूं एक समय ब्राह्मण प्रातःकाल उठकर सूर्यार्घादि कर्म कर ॥ ३४ ॥
सीते इति समाभाष्य प्रवक्तुमुप चक्रमे । शृणु सीते मया दृष्टमाश्चर्यं कमलानने ॥ ३५ ॥ दधिमंडोदकाब्धेश्चय परः स्वादूदकोब्धिकः । पुष्करद्वीपमावृत्य वर्तते वलया कृतिः ॥ ३६ ॥
हे सीते ! ऐसा संबोधन देकर कहनेकी इच्छा करने लगा, हे कमलानने जानकी, जो आश्चर्य मैंने देखा है वह सुन ॥ ३५ ॥ दही मांड और जलके सागरसे परे स्वादु जलका समुद्र है, वह पुष्करद्वीपको घेरकर वलयाकार स्थित हुआ है ॥ ३६ ॥
(९२) अद्भुतरामायण [ सप्तदश-
पुष्करं पुष्करे दृष्टं महावह्निशिखोज्ज्वलम् । पत्रायुतायुतयुतं ब्रह्मणः परमासनम् ॥ ३७ ॥ तद्द्वीपवर्षयोर्मध्ये मानसोत्तरसंज्ञकः । मर्यादापर्वतो दैर्घ्ये चायामेऽयुतयोजनः ॥ ३८ ॥
वहां महाकमल अग्निशिखाके समान प्रकाशित है दश सहस्र कर्णिकायुक्त ब्रह्माजीका परमासन है ॥ ३७ ॥ उस द्वीप और वर्षके बीचमें मानसोत्तर संज्ञावाले मर्यादापर्वत लम्बाई चौडाईमें दशसहस्र योजनके हैं ॥ ३८ ॥
तच्छैलस्य चतुर्दिक्षु इंद्रादीनां पुराणि हि । क्रीडार्थं निर्मितान्येषां महांति विश्वकर्मणा ॥ ३९ ॥ सुमाली राक्षसश्रेष्ठ कैकसी नाम तत्सुता । मुनेर्विश्रवसः पत्नी सासूत रावणद्वयम् ॥ ४० ॥
उस पर्वतकी चारों दिशाओंमें इन्द्रादि लोकपालोंके पुर हैं विश्वकर्माने उनको क्रीडाके निमित्त निर्माण किया है ॥ ३९ ॥ एक राक्षस श्रेष्ठ सुमाली जिसकी कैकसी नाम कन्या थी, वह विश्रवस मुनिकी पत्नी दो रावण उत्पन्न करती हुई ॥ ४० ॥
एकः सहस्रवदनो द्वितीयो दशवक्त्रकः । जन्मकाले सुरैरुक्तमाकाशे रावणद्वयम् ॥ ४१ ॥ लोकानां रावणाज्जातं नामयौगिकमेतयोः । कनिष्ठो दशकंठोऽयं शितिकंठप्रसादतः ॥ ४२ ॥
एक सहस्रमुखका, दूसरा, दशमुखका था, जन्मकालमें आकाशमें देवताओंने कह दिया था कि रावण दो हैं ॥ ४१ ॥ लोकमें दो रावण हुए हैं इस कारण उनका एकही नाम था उनमें छोटा यह शिवजीके प्रसादसे ॥ ४२ ॥
लंकामधिवसत्येष धनदेन विनिर्मिताम् । ब्रह्मणो वरदानेन त्रिलोकीमवमन्यते ॥ ४३ ॥ श्रेष्ठः सहस्रवदनो रावणो लोकरावणः । स्वाभाविकबलेनासौ पुष्करद्वीपमाश्रितः ॥ ४४ ॥
कुबेरकी निर्मित की हुई लंकापुरीमें निवास करता है और ब्रह्माके वरदानसे त्रिलोकीका तिरस्कार करता है ॥ ४३ ॥ इसमें जो लोकका रुवानेवाला था उसने स्वाभाविक बलसे पुष्करद्वीपका आश्रय किया है ॥ ४४ ॥
सूर्य्याचन्द्रमसौ गृह्य क्रीडेत्कंदुकलीलया ॥ कुलाचलान्समुद्गृह्य कंदुकं क्रीडते हि सः ॥ ४५ ॥ मानसोत्तरशैलस्य चतुर्दिक्षु पुराणि हि ॥ आच्छिद्य संगृहीतानि दिगीशानां महात्मनाम् ॥ ४६ ॥