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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

सर्ग हिन्दीटीकासहित (८७)

सर्ग हिन्दीटीकासहित (८७)

सिंधुना संस्तुतो रामः सेतुं सिंधौ बबंध ह । लंकायां रावणं हत्वा सगणं मधुसूदनः ॥ १७ ॥ आरोप्य पुष्पकं सीतां विभीषणसहायवान् । अयोध्यांमगमद्रामः सुग्रीवहनुमदादिभिः ॥ १८ ॥

फिर सिंधुसे स्तुतिको प्राप्त हो रामचन्द्रने सागरमें सेतु बांधा और लंकापुरी जाय गणोंसहित रावणको मारकर ॥ १७ ॥ विभीषणको साथ ले पुष्पक विमानमें सीताको बैठाया सुग्रीव हनुमदादिके सहित रामचन्द्र अयोध्याको चले ॥ १८ ॥

आनंदे योजयामास भ्रातॄन्मातॄंश्च बांधवान् । राजा सर्वस्य लोकस्य प्रजानामनुरंजनः ॥ १९ ॥ रामं राजानमासाद्य तिर्यञ्चोऽपि ययुर्मुदम् । देवदुन्दुभयो नेदुः सर्वदा हि नभस्तले । ववृषुर्जंलदाः काले पुष्पवृष्टिः पपात च ॥ २० ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे ज्वालाप्रसाद मिश्रकृत भाषाटीकायां रामराज्योपलंभनं नाम षोडशः सर्गः ॥ १६ ॥

भ्राता माता और बांधवोंको आनन्दमें युक्त किया, वह सब लोकके राजा प्रजाके आनन्द देनेवाले हुए ॥ १९ ॥ रामचन्द्र राजाको प्राप्त होकर पशु पक्षी भी प्रसन्न हुए, सर्वदा आकाशमें देवदुन्दुभी बजने लगी, समयपर मेघवर्षा और फूलोंकी वर्षा होने लगी ॥ २० ॥

इत्यार्षे श्रीम. वाल्मी. आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकांडे रामराज्योपलंभनं नामषोडशः सर्गः ॥ १६ ॥


सप्तदश सर्ग

जानकीवचन सहस्रमुख रावणका वृत्तान्त

प्राप्तराज्यस्य रामस्य राक्षसानां क्षये कृते ॥ आजग्मुर्मुनयस्तत्र राघवं प्रति नंदितुम् ॥ १ ॥ विश्वामित्रो यवक्रीतो रैभ्यश्चच्यवन एव च ॥ कण्वश्च मुनिशार्दूलो ये पूर्वा दिशमाश्रिताः ॥ २ ॥

जिस समय राक्षसोंका वध हो चुका और रामचन्द्रको राज्य मिला तब रामचन्द्रको अभिनन्दन करनेके निमित्त मुनिजन आये ॥ १ ॥ विश्वामित्र-

(८८) अद्भुतरामायण [सप्तदश-

यवक्रीत, रैभ्य, च्यवन, मुनिश्रेष्ठ कण्व जो पूर्वदिशाके रहनेवाले ऋषि थे वे आये ॥ २ ॥

स्वस्त्यात्रेयश्च नमुचोऽरिमुचोगस्त्य एव च ।। आजग्मुर्मुनयस्तत्र ये श्रिता दक्षिणां दिशम् ॥ ३ ॥ उपगुः कामठो धूम्रो रौद्राश्वो मुनिपुंगवः ।। आजग्मुर्मुनयस्तत्र ये प्रतीचीं समाश्रिताः ॥ ४ ॥

स्वस्तिआत्रेय, नमुच, अरिमुच, अगस्त्य यह दक्षिणदिशाके रहनेवाले मुनि आकर प्राप्त हुए ॥ ३ ॥ उपगु, कामठ, धूम्र, रौद्राश्व, मुनिश्रेष्ठ यह पश्चिम दिशाके रहनेवाले महात्मा ऋषि आकर प्राप्त हुए ॥ ४ ॥

शिष्योपशिष्यसहिता वसिष्ठप्रमुखर्षयः ।। आजग्मुर्हि महात्मानं उत्तरां दिशमाश्रिताः ॥ ५ ॥ प्राप्य ते तु महात्मानो राघवस्य निवेशनम् ।। गृहीत्वा फलमूलानि हुताशसमविग्रहाः ॥ ६ ॥

शिष्य उपशिष्य आदिके सहित वसिष्ठ आदि ऋषि उत्तरादिशाके रहनेवाले आकर प्राप्त हुए ॥ ५ ॥ यह सब महात्मा रामचन्द्रके स्थानमें आकर प्राप्त हुए फल मूल ग्रहण किये अग्निके समान शरीरवाले ॥ ६ ॥

राघवं प्रतिनंद्याथ विविशुः परमासने ।। राघवश्च महातेजाः सीतया सह सुव्रत ॥ ७ ॥ भ्रातृभिर्मंत्रिभिः सार्द्धं पौरैः श्रेणिमुखैस्तथा ।। विनीत उपसंगम्य पूजयामास तान्मुनीन् ॥ ८ ॥

रामचन्द्रको अभिनंदन कर परमासनमें स्थित हुए, महातेजस्वी रामचन्द्रजी जानकीके सहित ॥ ७ ॥ भाई और मंत्रियोंके साथ तथा पुरवासी जनोंके साथ नम्रतासे उन मुनियोंसे मिल उनकी पूजा करते हुए ॥ ८ ॥

अगस्त्यप्रमुखा विप्रा दिष्ट्या दिष्ट्येति चाब्रुवन् ।। राघवं प्रशशंसुस्ते मुनयो वाग्विदां वराः ॥ ९ ॥ त्वं हि देवो जगन्नाथो जगतामुपकारकः ।। रावणस्य सपुत्रस्य सामात्यस्य बधात्प्रभो ॥ १० ॥

और वाणी बोलनेमें चतुर से अगस्त्यादि महर्षि धन्य हो धन्य हो इस प्रकार कहकर रामचंद्रकी प्रशंसा करने लगे ॥ ९ ॥ हे देव जगन्नाथ ! तुमही जगत्‌के उपकार करनेवाले हो, हे प्रभो ! पुत्र अमात्य जनोंके सहित रावणका वध करनेसे ॥ १० ॥