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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (८३)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (८३)

एको देवस्त्वं करोषीह विश्वं त्वं पालयस्यखिलं विश्वरूपः ॥ त्वय्ये-
वास्ते विलयं विदतीदं नमामि त्वां शरणं त्वां प्रपन्नः ॥ १४ ॥
भवानीपति अणिमादिमान तेजकी राशि विश्व परमेष्ठी वरिष्ठ आत्मा-
नन्द अनुभव करता स्वयंज्योति वचन नित्य सबमें स्थित है ॥ १३ ॥ एकही
आप देव सब विश्वको करते हो आप अखिल विश्वरूपकी पालना करते हो
अन्तमें विश्व आपहीमें लीन होता है, मैं शरणमें प्राप्त हुआ आपको नमस्कार
करता हूँ ॥ १४ ॥

त्वामेकमाहुः परमं च रामं प्राणं वहंतं हरिमित्रमीशम् ॥ इन्दूं
मृत्युमनलं चेकितानं धातारमादित्यमनेकरूपम् ॥ १५ ॥ त्वमक्षरं
परं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ॥ त्वमव्ययः शाश्वतो
धर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषोत्तमोऽसि ॥ १६ ॥

हे राम आपहीको परम प्राणदाता हरि मित्र ईश कहते हैं, चन्द्रमा पवन
चेकितान धाता आदित्य अनेकरूप हो ॥ १५ ॥ आपही परम, अक्षर जानने
योग्य हो, आपही इसके परिधान हो, आपही अविनाशी शाश्वत धर्मके गोप्ता
सनातन उत्तम पुरुष हो ॥ १६ ॥

त्वमेव विष्णुश्चतुराननस्त्वं त्वमेव रुद्रो भगवानपीशः ॥ त्वं
विश्वनाभिः प्रकृतिः प्रतिष्ठा सर्वेश्वरस्त्वं परमेश्वरोऽसि ॥ १७ ॥
त्वामेकमाहुः पुरुषं पुराणमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥ चिन्मात्र-
मव्यक्तमर्चिन्त्यरूपं खं ब्रह्मशून्यं प्रकृतिं निर्गुणं च ॥ १८ ॥

आपही विष्णु चतुरानन हो आप रुद्र भगवान् ईश हो, आप विश्वकी नाभी
प्रकृति प्रतिष्ठा सर्वेश्वर परमेश्वर हो ॥ १७ ॥ आपही पुराणपुरुष एक
सूर्यवर्ण अन्धकार से परे हो चिन्मात्र अव्यक्त अचिन्त्यरूप खं ब्रह्म शून्य
प्रकृति निगुण हो ॥ १८ ॥

यदन्तरा सर्वमिदं विभाति यदव्ययं निर्मलमेकरूपम् ॥ किमप्यचिन्त्यं
तव रूपमेकं यदंतरा यत्प्रतिभाति तत्त्वम् ॥ १९ ॥ योगेश्वरं रूपमन-
न्तशक्तिं परायणं ब्रह्मतनुं पवित्रम् ॥ नमाम सर्वे शरणार्थिनस्त्वां
प्रसीद भूताधिपते प्रसीद ॥ २० ॥

जिसके अन्तरमें यह सब जगत् प्रकाश करता है जो अविनाशी निर्मल
एकरूप है, यह आपका रूप अचिन्त्य तत्त्ववाला है, और प्रकाशवान् है ॥ १९ ॥

(८४) अद्भुतरामायण [ पंचदश-

योगेश्वररूप अनन्तशक्ति परायण ब्रह्मतनु पवित्रको शरणकी इच्छावाले हम सब नमस्कार करते हैं, हे भूताधिपते ! प्रसन्न हूजिये ॥ २० ॥

त्वत्पादपद्मस्मरणादशेषं संसारबीजं विलयं प्रयाति ॥ मनो नियम्य प्रणिधाय कार्यं प्रसाद्याम्येकरसं भवंतम् ॥ २१ ॥ नमोऽस्तु रामाय भवोद्भवाय कालाय सर्वैकहराय तुभ्यम् ॥ नमोऽस्तु रामाय कपर्दिने ते नमोऽग्नये दर्शय रूपमग्र्यम् ॥ २२ ॥

आपके चरणकमलके स्मरणसे सब संसारके बीज जन्ममरण नष्ट हो जाते हैं, मनको रोक कायाको प्रणिधान कर एकरस आपको मैं प्रसन्न करता हूं ॥ २१ ॥ संसारके उत्पत्तिकारण, सबके उत्पन्न करनेवाले कालरूप एक हरनेवाले आपको प्रणाम है, राम कदर्पि अग्निरूप आपको प्रणाम है, आप अग्न्यरूप हो ॥ २२ ॥

ततः स भगवान्रामो लक्ष्मणेन सह प्रभुः ॥ संहृत्य परमं रूपं प्रकृतिस्थोऽभवत्स्वयम् ॥ २३ ॥ स तस्य स्तवमाकर्ण्य वायुपुत्रस्य धीमतः ॥ प्राह गम्भीरया वाचा हनूमन्तं रघूत्तमः ॥ २४ ॥

तब भगवान् राम अपना लक्ष्मणसहित रूप छिपाकर प्रकृतिमें स्थित होते हुए ॥ २३ ॥ तब वायुपुत्रका यह वचन सुनकर रामचन्द्र गम्भीर वचनसे कहने लगे ॥ २४ ॥

स्तोष्यांति येऽनया स्तुत्या ते यास्यंति परां गतिम् ॥ स्थिरो भव हनूमंस्त्वं कार्यमौपायिकं कुरु ॥ २५ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणेवाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे हनुमत्कृतस्तवराजे पञ्चदशः सर्गः ॥ १५ ॥

जो इस स्तोत्रसे स्तुति करेंगे वे परमगतिको प्राप्त होंगे, हे महावीर ! आप स्थित होकर उपाययुक्त कार्य करो ॥ २५ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मी. आदि. अद्भुतोत्तरकाण्डे ज्वालाप्रसाद मिश्रभाषाटीकायां हनुमत्कृतस्तवराजे पंचदशः सर्गः ॥ १५ ॥